वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 152, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र १५-१६ ] अध्याय २ १४९ जगत्की उत्पत्ति एवं प्रलयरूप महाकारण हूँ।' (गीता ७। ६) इस कथनसे भगवान्ने अपनी प्रकृतियोंके साथ अनन्यता सिद्ध की है। इसी प्रकार सर्वत्र समझ लेना चाहिये। सम्बन्ध— पहले जो यह बात कही थी कि कार्य केवल वाणीका विषय है, कारण ही सत्य है, उससे यह भ्रम हो सकता है कि कार्यकी वास्तविक सत्ता नहीं है। अतः इस शंकाको दूर करनेके लिये यह सिद्ध करते हैं कि अपनी वर्तमान अवस्थाके पहले भी शक्तिरूपमें कार्यकी सत्ता रहती है— भावे चोपलब्धेः ॥ २ । १ । १५ ॥ भावे=(कारणमें शक्तिरूपसे) कार्यकी सत्ता होनेपर; च=ही; उपलब्धेः=उसकी उपलब्धि होती है, इसलिये (यह सिद्ध होता है कि यह जगत् अपने कारण ब्रह्ममें शक्तिरूपसे सदैव स्थित है)। व्याख्या—यह बात दृढ़ करते हैं कि कार्य अपने कारणमें शक्तिरूपसे सदैव विद्यमान रहता है, तभी उसकी उपलब्धि होती है; क्योंकि जो वस्तु वास्तवमें विद्यमान होती है, उसीकी उपलब्धि हुआ करती है। जो वस्तु नहीं होती अर्थात् खरगोशके सींग और आकाशके पुष्पकी भाँति जिसका सर्वथा अभाव होता है, उसकी उपलब्धि भी नहीं होती। इसलिये यह जड-चेतनात्मक जगत् अपने कारणरूप परब्रह्म परमेश्वरमें शक्तिरूपसे अवश्य विद्यमान है और सदैव अपने कारणसे अभिन्न है। सम्बन्ध—सत्कार्यवादकी सिद्धिके लिये पुनः कहते हैं— सत्त्वाच्चावरस्य ॥ २ । १ । १६ ॥ अवरस्य=कार्यका, सत्त्वात्=सत् होना श्रुतिमें कहा गया है, इससे; च=भी (प्रकट होनेके पहले उसका होना सिद्ध होता है)। व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद् (६। २। १)-में कहा गया है कि 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्'—'हे सोम्य! यह प्रकट होनेसे पहले भी सत्य था।'