वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 153, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें१५० वेदान्त-दर्शन [ पाद १ बृहदारण्यकमें भी कहा है 'तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत्' (१।४।७)— 'उस समय यह अप्रकट था।' इन वर्णनोंसे यह सिद्ध है कि स्थूलरूपमें प्रकट होनेके पहले यह सम्पूर्ण जगत् अपने कारणमें शक्तिरूपसे विद्यमान रहता है और वही सृष्टिकालमें प्रकट होता है। सम्बन्ध— श्रुतिमें विरोध प्रतीत होनेपर उसका निराकरण करते हैं— असद्व्यपदेशान्नेति चेन्न धर्मान्तरेण वाक्यशेषात् ॥ २।१।१७ ॥ चेत्=यदि कहो; (दूसरी श्रुतिमें) असद्व्यपदेशात्=उत्पत्ति के पहले इस जगत्को 'असत्' बतलाया है, इसलिये; न=कार्यका कारणमें पहलेसे ही विद्यमान होना सिद्ध नहीं होता; इति न=तो ऐसी बात नहीं है; (क्योंकि) धर्मान्तरेण=वैसा कहना धर्मान्तरकी अपेक्षासे है; वाक्यशेषात्=यह बात अन्तिम वाक्यसे सिद्ध होती है। व्याख्या— तैत्तिरीयोपनिषद्में कहा है कि 'असद् वा इदमग्र आसीत्। ततो वै सदजायत। तदात्मानँ् स्वयमकुरुत। तस्मात्तत्सुकृतमुच्यते॥' (तै० उ० २।७) अर्थात् 'यह सब पहले 'असत्' ही था, उसीसे सत् उत्पन्न हुआ; उसने स्वयं ही अपनेको इस रूपमें बनाया, इसलिये उसे 'सुकृत' कहते हैं।' इस श्रुतिमें जो यह बात कही गयी है कि 'पहले असत् ही था।' उसका अभिप्राय यह नहीं है कि यह जगत् प्रकट होनेके पहले नहीं था; क्योंकि इसके बाद 'आसीत्' पदसे उसका होना कहा है। फिर उससे सत्की उत्पत्ति बतलायी है। तत्पश्चात् यह कहा है कि उसने स्वयं ही अपनेको इस रूपमें प्रकट किया है। अतः यहाँ यह समझना चाहिये कि धर्मान्तरकी अपेक्षासे उसको 'असत्' कहा है। अर्थात् प्रकट होनेसे पहले जो अप्रकट रूपमें विद्यमान रहना धर्मान्तर है, इसीको 'असत्' नामसे कहा गया है, उसकी अविद्यमानता बतानेके लिये नहीं। तात्पर्य यह कि उत्पत्तिसे पूर्व यह जगत् असत्— अप्रकट था। फिर उससे सत्की उत्पत्ति हुई—अर्थात् अप्रकट