वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र १८-१९] अध्याय २ १५१ जगत् अपने अप्राकट्यरूप धर्मको त्यागकर प्राकट्यरूप धर्मसे युक्त हुआ—अप्रकटसे प्रकट हो गया। छान्दोग्योपनिषद्में इस बातको स्पष्ट रूपसे समझाया है। वहाँ श्रुतिका वर्णन इस प्रकार है—'तद्धैक आहुरसदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयं तस्मादसत: सज्जायत॥' (६।२।१) अर्थात् 'कोई-कोई कहते हैं, यह जगत् पहले 'असत्' ही था, अकेला वही था, दूसरा कोई नहीं, फिर उस 'असत्' से 'सत्' उत्पन्न हुआ।' इतना कहकर श्रुति स्वयं ही अभावके भ्रमका निवारण करती हुई कहती है—'कुतस्तु खलु सोम्यैवँ स्यादिति होवाच कथमसतः सज्जायेतेति।' (६।२।२) 'किंतु हे सोम्य! ऐसा होना कैसे सम्भव है, असत्से सत् कैसे उत्पन्न हो सकता है।' तात्पर्य यह है कि अभावसे भावकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। इसलिये 'सत्त्वेव सोम्येदमग्र आसीत्।' (६।२।२) 'यह सब पहले सत् ही था।' यह श्रुतिने निश्चय किया है। इस प्रकार वाक्यशेषसे सत्कार्यवादकी ही सिद्धि होती है। सम्बन्ध—पुनः इसी बातको दृढ़ करते हैं— युक्तेः शब्दान्तराच्च ॥ २ । १ । १८ ॥ युक्तेः = युक्तिसे; च = तथा; शब्दान्तरात् = दूसरे शब्दोंसे भी (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—जो वस्तु वास्तवमें नहीं होती, उसका उत्पन्न होना भी नहीं देखा जाता, जैसे आकाशमें फूल और खरगोशके सींग होना आजतक किसीने नहीं देखा है। इस युक्तिसे तथा बृहदारण्यक आदिमें जो उसके लिये अव्याकृत आदि शब्द प्रयुक्त हैं, उन शब्दोंसे भी यही बात सिद्ध होती है कि 'यह जगत् उत्पन्न होनेसे पहले भी 'सत्' ही था।' सम्बन्ध—अब पुनः उसी बातको कपड़ेके दृष्टान्तसे सिद्ध करते हैं— पटवच्च ॥ २ । १ । १९ ॥ पटवत् = सूतमें वस्त्रकी भाँति; च = भी (ब्रह्ममें यह जगत् पहलेसे ही स्थित है)।