भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 155, कुल 486 में से

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१५२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ व्याख्या—जबतक कपड़ा शक्तिरूपसे सूतमें अप्रकट रहता है, तबतक वह नहीं दीखता, वही जब बुननेवालेके द्वारा बुन लिये जानेपर कपड़ेके रूपमें प्रकट हो जाता है, तब अपने रूपमें दीखने लगता है। प्रकट होनेसे पहले और प्रकट होनेके बाद दोनों ही अवस्थाओंमें वस्त्र अपने कारणमें विद्यमान है और उससे अभिन्न भी है—इसी प्रकार जगत्‌को भी समझ लेना चाहिये। वह उत्पत्तिसे पहले भी ब्रह्ममें स्थित है और उत्पन्न होनेके बाद भी उससे पृथक् नहीं हुआ है। सम्बन्ध—इसी बातको प्राण आदिके दृष्टान्तसे समझाते हैं— यथा च प्राणादि॥ २। १। २०॥ च=तथा; यथा=जैसे; प्राणादि=प्राण और इन्द्रियाँ (स्थूल शरीरसे बाहर निकलनेपर नहीं दीखतीं तो भी उनकी सत्ता अवश्य रहती है, उसी प्रकार प्रलयकालमें भी अव्यक्तरूपसे जगत्‌की स्थिति अवश्य है)। व्याख्या—जैसे मृत्युकालमें प्राण और इन्द्रिय आदि जीवात्माके साथ-साथ शरीरसे बाहर अन्यत्र चले जाते हैं, तब उनके स्वरूपकी उपलब्धि नहीं होती तथापि उनकी सत्ता अवश्य है। उसी प्रकार प्रलयकालमें इस जगत्‌की अप्रकट अवस्था उपलब्ध न होनेपर भी इसकी कारणरूपमें सत्ता अवश्य है, ऐसा समझना चाहिये। सम्बन्ध—ब्रह्मको जगत्‌का कारण और जगत्‌की उसके साथ अनन्यता माननेमें दूसरे प्रकारकी शंका उठाकर उसका निराकरण करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— इतरव्यपदेशाद्धिताकरणादिदोषप्रसक्तिः॥ २। १। २१॥ इतरव्यपदेशात्=ब्रह्म ही जीवरूपसे उत्पन्न होता है, ऐसा कहनेसे; हिताकरणादिदोषप्रसक्तिः=(ब्रह्ममें) अपना हित न करने या अहित करने आदिका दोष आ सकता है।

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