भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 156, कुल 486 में से

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पृष्ठ 156

सूत्र २२ ] अध्याय २ १५३ व्याख्या — श्रुतिमें कहा है कि 'तत्त्वमसि श्वेतकेतो' (छा० उ० ६। ८। ७) — 'हे श्वेतकेतु! तू वही है।' 'अयमात्मा ब्रह्म' (बृह० उ० २। ५।१९) — 'यह आत्मा ब्रह्म है।' तथा 'सेयं देवतेमास्तिस्रो देवता अनेनैव जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरोत्' (छा० उ० ६। ३। ३)— अर्थात् 'इस देवता (ब्रह्म)-ने तेज आदि तत्त्वसे निर्मित शरीरमें इस जीवात्मारूपसे प्रवेश करके नाम-रूपोंको प्रकट किया।' इसके सिवा यह भी कहा गया है कि 'त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी' (श्वेता० ४। ३) — 'तू स्त्री है, तू पुरुष है, तू ही कुमार और कुमारी है' इत्यादि। इस वर्णनसे स्पष्ट है कि ब्रह्म स्वयं ही जीवरूपसे उत्पन्न हुआ है। इससे ब्रह्ममें अपना हित न करने अथवा अहित करनेका दोष आता है, जो उचित नहीं है; क्योंकि जगत्में ऐसा कोई भी प्राणी नहीं देखा जाता जो कि समर्थ होकर भी दुःख भोगता रहे और अपना हित न करे। यदि वह स्वयं ही जीव बनकर दुःख भोग रहा है, तब तो सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् परमेश्वरका इस प्रकार अपना हित न करना और अहित करना अर्थात् अपनेको जन्म-मरणके चक्करमें डाले रहना आदि अनेक दोष संघटित होने लगेंगे, जो कि सर्वथा अयुक्त हैं, अतः ब्रह्मको जगत्का कारण मानना उचित नहीं है। सम्बन्ध — अब उक्त शंकाका निराकरण करनेके लिये कहते हैं— अधिकं तु भेदनिर्देशात् ॥ २ । १ । २२ ॥ तु=किंतु (ब्रह्म जीव नहीं है, अपितु उससे); अधिकम्=अधिक है; भेदनिर्देशात्=क्योंकि जीवात्मासे ब्रह्मका भेद बताया गया है। व्याख्या — बृहदारण्यकोपनिषद्में जनक और याज्ञवल्क्यके संवादका वर्णन है। वहाँ सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि आदि दैवी ज्योतियोंका तथा वाणी आदि आध्यात्मिक ज्योतियोंका वर्णन करनेके पश्चात् इनके अभावमें 'आत्मा' को 'ज्योति' अर्थात् प्रकाशक बतलाया है। (बृह० उ० ४। ३। ४-६) फिर उस आत्माका स्वरूप पूछे जानेपर विज्ञानमय जीवको आत्मा बताया। (बृह० उ०