भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 157, कुल 486 में से

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पृष्ठ 157

१५४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ ४।३।७) तदनन्तर जाग्रत्, स्वप्न तथा सुषुप्ति आदि अवस्थाओंके भेदोंका वर्णन करते हुए कहा है कि 'यह जीव सुषुप्तिकालमें बाहर- भीतरके ज्ञानसे शून्य होकर परब्रह्म परमात्मासे संयुक्त होता है।' (बृ० उ० ४।३।२१) तत्पश्चात् मरणकालकी स्थितिका निरूपण करते हुए बताया है कि 'उस परब्रह्मसे अधिष्ठित हुआ यह एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाता है।' (बृ० उ० ४।३।३५) इस वर्णनसे जीव और ब्रह्मका भेद स्पष्ट हो जाता है। इसी प्रकार छान्दोग्योपनिषद्में जो यह कहा है कि 'अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य' इत्यादि; इसका अर्थ जीवरूपसे ब्रह्मका प्रवेश करना नहीं, अपितु जीवके सहित ब्रह्मका प्रवेश करना है। ऐसा माननेसे ही श्वेताश्वतरोपनिषद् (४।६)-में जो जीव और ईश्वरको एक ही शरीररूप वृक्षपर रहनेवाले दो पक्षियोंकी भाँति बताया गया है, वह संगत होता है।१ (एवं) कठोपनिषद्में जो द्विवचनका प्रयोग करके हृदयरूपी गुहामें प्रविष्ट दो तत्त्वों (जीवात्मा और परमात्मा)-का वर्णन किया गया है।२ श्वेताश्व० (१।९)-में जो सर्वज्ञ और अल्पज्ञ विशेषण देकर दो अजन्मा आत्माओं (जीव और ईश्वर)-का प्रतिपादन हुआ है तथा श्रुतिमें जो परब्रह्म परमेश्वरको प्रकृति एवं जीवात्मा दोनोंपर शासन करनेवाला कहा गया है, इन सब वर्णनोंकी संगति भी जीव और ब्रह्ममें भेद माननेपर ही हो सकती है। अन्तर्यामिब्राह्मणमें तो स्पष्ट शब्दोंमें जीवात्माको ब्रह्मका शरीर कहा गया है (बृ० उ० ३।७।२२)३ मैत्रेयी ब्राह्मण (बृ० उ० २।४।५)-में परमात्माको जानने तथा ध्यान करनेयोग्य बताया है। इस प्रकार वेदमें जीवात्मा और परमात्माके भेदका वर्णन होनेसे यही सिद्ध होता है कि वह जगत्का कर्ता, धर्ता और संहर्ता परमेश्वर १-यह मन्त्र सूत्र १।३।७ की व्याख्यामें आया है। २-यह मन्त्र सूत्र १।२।११ की व्याख्यामें आया है। ३-यह मन्त्र सूत्र १।२।२० की टिप्पणीमें आ गया है।