वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 158, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंजीव नहीं; किंतु उससे अधिक अर्थात् जीवके स्वामी हैं। 'तत्त्वमसि', 'अयमात्मा ब्रह्म' इत्यादि वाक्योंद्वारा जो जीवको ब्रह्मरूप बताया गया है, वह पूर्ववर्णित कारण और कार्यकी अनन्यताको लेकर है। परमेश्वर कारण है और जड-चेतनात्मक जगत् उनका कार्य है। कारणसे कार्य अभिन्न होता है; क्योंकि वह उसकी ही शक्तिका विस्तार है। इसी दृष्टिसे जीव भी परमात्मासे अभिन्न है। फिर भी उनमें स्वरूपगत भेद तो है ही। जीव अल्पज्ञ है, ब्रह्म सर्वज्ञ है। जीव ईश्वरके अधीन है, परमात्मा सबके शासक और स्वामी हैं। अतः जीव और ब्रह्मका अत्यन्त अभेद नहीं सिद्ध होता। जिस प्रकार कार्यरूप जड प्रपंचकी कारणरूप ब्रह्मसे अभिन्नता होते हुए भी भेद प्रत्यक्ष है। उसी प्रकार जीवात्माका भी ब्रह्मसे भेद है। ब्रह्म नित्यमुक्त है; अतः अपना अहित करना—आवागमनके चक्रमें अपनेको डाले रहना आदि दोष उसपर नहीं लगाये जा सकते। सम्बन्ध— इसी बातको दृढ़ करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं— अश्मादिवच्च तदनुपपत्तिः ॥ २। १। २३॥ च=तथा; अश्मादिवत्=(जड) पत्थर आदिकी भाँति (अल्पज्ञ) जीवात्मा भी ब्रह्मसे भिन्न है, इसलिये; तदनुपपत्तिः=जीवात्मा और परमात्माका अत्यन्त अभेद नहीं सिद्ध होता। व्याख्या—जिस प्रकार परमेश्वर चेतन, ज्ञानस्वरूप, आनन्दमय तथा सबके रचयिता होनेके कारण अपनी अपरा प्रकृतिके विस्ताररूप पत्थर, काठ, लोहा और सुवर्ण आदि निर्जीव जड पदार्थोंसे भिन्न हैं, केवल कारणरूपसे उन वस्तुओंमें अनुगत होनेके कारण ही उनसे अभिन्न कहे जाते हैं, उसी प्रकार अपनी परा प्रकृतिके विस्तारभूत जीवसमुदायसे भी वे भिन्न ही हैं; क्योंकि जीव अल्पज्ञ एवं सुख- दुःख आदिका भोक्ता है और परमात्मा सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार, सर्वनियन्ता तथा सुख-दुःखसे परे है। कारण और कार्यकी अनन्यताको लेकर ही जीवमात्र परमेश्वरसे अभिन्न बतलाये जाते हैं। इसलिये