वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 159, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें१५६ वेदान्त-दर्शन [पाद १ ब्रह्ममें यह दोष नहीं आता कि 'वह अपना अहित करता है।' वह हित-अहितसे ऊपर है। सबका हित उसीसे होता है। सम्बन्ध - यहाँतक सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् परमेश्वरको समस्त जगत्का कारण होते हुए भी सबसे विलक्षण तथा सर्वश्रेष्ठ सिद्ध किया गया है। उसमें प्रतीत होनेवाले दोषोंका भी भलीभाँति निराकरण किया गया। अब उस सत्यसंकल्प परमेश्वरका बिना किसीकी सहायता और परिश्रमके केवल संकल्पमात्रसे ही विचित्र जगत्की रचना कर देना उन्हींके अनुरूप है, यह सिद्ध करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— उपसंहारदर्शनान्नेति चेन्न क्षीरवद्धि॥२।१।२४॥ चेत्=यदि कहो; उपसंहारदर्शनात्=(लोकमें घट आदि बनानेके लिये) साधन-सामग्रीका संग्रह देखा जाता है, (किंतु ब्रह्मके पास कोई साधन नहीं है) इसलिये; न=ब्रह्म जगत्का कर्ता नहीं है; इति न=तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; हि=क्योंकि; क्षीरवत्=दूधकी भाँति (ब्रह्मको अन्य साधनोंकी अपेक्षा नहीं है)। व्याख्या—यदि कहो कि लोकमें घड़ा, वस्त्र आदि बनानेके लिये सक्रिय कार्यकर्त्ताका होना तथा मिट्टी, दण्ड, चाक और सूत, करघा आदि साधनोंका संग्रह अवश्य देखा जाता है; उन साधन-सामग्रियोंके बिना कोई भी कार्य होता नहीं दिखायी देता है। परंतु ब्रह्मको एकमात्र, अद्वितीय, निराकार, निष्क्रिय आदि कहा गया है, उसके पास कोई भी साधन-सामग्री नहीं है; इसलिये वह इस विचित्र जगत्की सृष्टिका कार्य नहीं कर सकता तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; क्योंकि जैसे दूध अपनी सहज शक्तिसे, किसी बाह्य साधनकी सहायता लिये बिना ही दहीरूपमें परिणत हो जाता है, उसी प्रकार परमात्मा भी अपनी स्वाभाविक शक्तिसे जगत्का स्वरूप धारण कर लेता है। जैसे मकड़ीको जाला बनानेके लिये किसी अन्य साधनकी अपेक्षा नहीं होती, उसी प्रकार परब्रह्म भी किसी अन्य साधनका सहारा लिये बिना अपनी अचिन्त्य