वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
सूत्र १८-१९] अध्याय २ १५१ जगत् अपने अप्राकट्यरूप धर्मको त्यागकर प्राकट्यरूप धर्मसे युक्त हुआ—अप्रकटसे प्रकट हो गया। छान्दोग्योपनिषद्में इस बातको स्पष्ट रूपसे समझाया है। वहाँ श्रुतिका वर्णन इस प्रकार है—'तद्धैक आहुरसदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयं तस्मादसत: सज्जायत॥' (६।२।१) अर्थात् 'कोई-कोई कहते हैं, यह जगत् पहले 'असत्' ही था, अकेला वही था, दूसरा कोई नहीं, फिर उस 'असत्' से 'सत्' उत्पन्न हुआ।' इतना कहकर श्रुति स्वयं ही अभावके भ्रमका निवारण करती हुई कहती है—'कुतस्तु खलु सोम्यैवँ स्यादिति होवाच कथमसतः सज्जायेतेति।' (६।२।२) 'किंतु हे सोम्य! ऐसा होना कैसे सम्भव है, असत्से सत् कैसे उत्पन्न हो सकता है।' तात्पर्य यह है कि अभावसे भावकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। इसलिये 'सत्त्वेव सोम्येदमग्र आसीत्।' (६।२।२) 'यह सब पहले सत् ही था।' यह श्रुतिने निश्चय किया है। इस प्रकार वाक्यशेषसे सत्कार्यवादकी ही सिद्धि होती है। सम्बन्ध—पुनः इसी बातको दृढ़ करते हैं— युक्तेः शब्दान्तराच्च ॥ २ । १ । १८ ॥ युक्तेः = युक्तिसे; च = तथा; शब्दान्तरात् = दूसरे शब्दोंसे भी (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—जो वस्तु वास्तवमें नहीं होती, उसका उत्पन्न होना भी नहीं देखा जाता, जैसे आकाशमें फूल और खरगोशके सींग होना आजतक किसीने नहीं देखा है। इस युक्तिसे तथा बृहदारण्यक आदिमें जो उसके लिये अव्याकृत आदि शब्द प्रयुक्त हैं, उन शब्दोंसे भी यही बात सिद्ध होती है कि 'यह जगत् उत्पन्न होनेसे पहले भी 'सत्' ही था।' सम्बन्ध—अब पुनः उसी बातको कपड़ेके दृष्टान्तसे सिद्ध करते हैं— पटवच्च ॥ २ । १ । १९ ॥ पटवत् = सूतमें वस्त्रकी भाँति; च = भी (ब्रह्ममें यह जगत् पहलेसे ही स्थित है)।
१५२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ व्याख्या—जबतक कपड़ा शक्तिरूपसे सूतमें अप्रकट रहता है, तबतक वह नहीं दीखता, वही जब बुननेवालेके द्वारा बुन लिये जानेपर कपड़ेके रूपमें प्रकट हो जाता है, तब अपने रूपमें दीखने लगता है। प्रकट होनेसे पहले और प्रकट होनेके बाद दोनों ही अवस्थाओंमें वस्त्र अपने कारणमें विद्यमान है और उससे अभिन्न भी है—इसी प्रकार जगत्को भी समझ लेना चाहिये। वह उत्पत्तिसे पहले भी ब्रह्ममें स्थित है और उत्पन्न होनेके बाद भी उससे पृथक् नहीं हुआ है। सम्बन्ध—इसी बातको प्राण आदिके दृष्टान्तसे समझाते हैं— यथा च प्राणादि॥ २। १। २०॥ च=तथा; यथा=जैसे; प्राणादि=प्राण और इन्द्रियाँ (स्थूल शरीरसे बाहर निकलनेपर नहीं दीखतीं तो भी उनकी सत्ता अवश्य रहती है, उसी प्रकार प्रलयकालमें भी अव्यक्तरूपसे जगत्की स्थिति अवश्य है)। व्याख्या—जैसे मृत्युकालमें प्राण और इन्द्रिय आदि जीवात्माके साथ-साथ शरीरसे बाहर अन्यत्र चले जाते हैं, तब उनके स्वरूपकी उपलब्धि नहीं होती तथापि उनकी सत्ता अवश्य है। उसी प्रकार प्रलयकालमें इस जगत्की अप्रकट अवस्था उपलब्ध न होनेपर भी इसकी कारणरूपमें सत्ता अवश्य है, ऐसा समझना चाहिये। सम्बन्ध—ब्रह्मको जगत्का कारण और जगत्की उसके साथ अनन्यता माननेमें दूसरे प्रकारकी शंका उठाकर उसका निराकरण करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— इतरव्यपदेशाद्धिताकरणादिदोषप्रसक्तिः॥ २। १। २१॥ इतरव्यपदेशात्=ब्रह्म ही जीवरूपसे उत्पन्न होता है, ऐसा कहनेसे; हिताकरणादिदोषप्रसक्तिः=(ब्रह्ममें) अपना हित न करने या अहित करने आदिका दोष आ सकता है।
सूत्र २२ ] अध्याय २ १५३
सूत्र २२ ] अध्याय २ १५३ व्याख्या — श्रुतिमें कहा है कि 'तत्त्वमसि श्वेतकेतो' (छा० उ० ६। ८। ७) — 'हे श्वेतकेतु! तू वही है।' 'अयमात्मा ब्रह्म' (बृह० उ० २। ५।१९) — 'यह आत्मा ब्रह्म है।' तथा 'सेयं देवतेमास्तिस्रो देवता अनेनैव जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरोत्' (छा० उ० ६। ३। ३)— अर्थात् 'इस देवता (ब्रह्म)-ने तेज आदि तत्त्वसे निर्मित शरीरमें इस जीवात्मारूपसे प्रवेश करके नाम-रूपोंको प्रकट किया।' इसके सिवा यह भी कहा गया है कि 'त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी' (श्वेता० ४। ३) — 'तू स्त्री है, तू पुरुष है, तू ही कुमार और कुमारी है' इत्यादि। इस वर्णनसे स्पष्ट है कि ब्रह्म स्वयं ही जीवरूपसे उत्पन्न हुआ है। इससे ब्रह्ममें अपना हित न करने अथवा अहित करनेका दोष आता है, जो उचित नहीं है; क्योंकि जगत्में ऐसा कोई भी प्राणी नहीं देखा जाता जो कि समर्थ होकर भी दुःख भोगता रहे और अपना हित न करे। यदि वह स्वयं ही जीव बनकर दुःख भोग रहा है, तब तो सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् परमेश्वरका इस प्रकार अपना हित न करना और अहित करना अर्थात् अपनेको जन्म-मरणके चक्करमें डाले रहना आदि अनेक दोष संघटित होने लगेंगे, जो कि सर्वथा अयुक्त हैं, अतः ब्रह्मको जगत्का कारण मानना उचित नहीं है। सम्बन्ध — अब उक्त शंकाका निराकरण करनेके लिये कहते हैं— अधिकं तु भेदनिर्देशात् ॥ २ । १ । २२ ॥ तु=किंतु (ब्रह्म जीव नहीं है, अपितु उससे); अधिकम्=अधिक है; भेदनिर्देशात्=क्योंकि जीवात्मासे ब्रह्मका भेद बताया गया है। व्याख्या — बृहदारण्यकोपनिषद्में जनक और याज्ञवल्क्यके संवादका वर्णन है। वहाँ सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि आदि दैवी ज्योतियोंका तथा वाणी आदि आध्यात्मिक ज्योतियोंका वर्णन करनेके पश्चात् इनके अभावमें 'आत्मा' को 'ज्योति' अर्थात् प्रकाशक बतलाया है। (बृह० उ० ४। ३। ४-६) फिर उस आत्माका स्वरूप पूछे जानेपर विज्ञानमय जीवको आत्मा बताया। (बृह० उ०
१५४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ ४।३।७) तदनन्तर जाग्रत्, स्वप्न तथा सुषुप्ति आदि अवस्थाओंके भेदोंका वर्णन करते हुए कहा है कि 'यह जीव सुषुप्तिकालमें बाहर- भीतरके ज्ञानसे शून्य होकर परब्रह्म परमात्मासे संयुक्त होता है।' (बृ० उ० ४।३।२१) तत्पश्चात् मरणकालकी स्थितिका निरूपण करते हुए बताया है कि 'उस परब्रह्मसे अधिष्ठित हुआ यह एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाता है।' (बृ० उ० ४।३।३५) इस वर्णनसे जीव और ब्रह्मका भेद स्पष्ट हो जाता है। इसी प्रकार छान्दोग्योपनिषद्में जो यह कहा है कि 'अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य' इत्यादि; इसका अर्थ जीवरूपसे ब्रह्मका प्रवेश करना नहीं, अपितु जीवके सहित ब्रह्मका प्रवेश करना है। ऐसा माननेसे ही श्वेताश्वतरोपनिषद् (४।६)-में जो जीव और ईश्वरको एक ही शरीररूप वृक्षपर रहनेवाले दो पक्षियोंकी भाँति बताया गया है, वह संगत होता है।१ (एवं) कठोपनिषद्में जो द्विवचनका प्रयोग करके हृदयरूपी गुहामें प्रविष्ट दो तत्त्वों (जीवात्मा और परमात्मा)-का वर्णन किया गया है।२ श्वेताश्व० (१।९)-में जो सर्वज्ञ और अल्पज्ञ विशेषण देकर दो अजन्मा आत्माओं (जीव और ईश्वर)-का प्रतिपादन हुआ है तथा श्रुतिमें जो परब्रह्म परमेश्वरको प्रकृति एवं जीवात्मा दोनोंपर शासन करनेवाला कहा गया है, इन सब वर्णनोंकी संगति भी जीव और ब्रह्ममें भेद माननेपर ही हो सकती है। अन्तर्यामिब्राह्मणमें तो स्पष्ट शब्दोंमें जीवात्माको ब्रह्मका शरीर कहा गया है (बृ० उ० ३।७।२२)३ मैत्रेयी ब्राह्मण (बृ० उ० २।४।५)-में परमात्माको जानने तथा ध्यान करनेयोग्य बताया है। इस प्रकार वेदमें जीवात्मा और परमात्माके भेदका वर्णन होनेसे यही सिद्ध होता है कि वह जगत्का कर्ता, धर्ता और संहर्ता परमेश्वर १-यह मन्त्र सूत्र १।३।७ की व्याख्यामें आया है। २-यह मन्त्र सूत्र १।२।११ की व्याख्यामें आया है। ३-यह मन्त्र सूत्र १।२।२० की टिप्पणीमें आ गया है।
जीव नहीं; किंतु उससे अधिक अर्थात् जीवके स्वामी हैं। 'तत्त्वमसि', 'अयमात्मा ब्रह्म' इत्यादि वाक्योंद्वारा जो जीवको ब्रह्मरूप बताया गया है, वह पूर्ववर्णित कारण और कार्यकी अनन्यताको लेकर है। परमेश्वर कारण है और जड-चेतनात्मक जगत् उनका कार्य है। कारणसे कार्य अभिन्न होता है; क्योंकि वह उसकी ही शक्तिका विस्तार है। इसी दृष्टिसे जीव भी परमात्मासे अभिन्न है। फिर भी उनमें स्वरूपगत भेद तो है ही। जीव अल्पज्ञ है, ब्रह्म सर्वज्ञ है। जीव ईश्वरके अधीन है, परमात्मा सबके शासक और स्वामी हैं। अतः जीव और ब्रह्मका अत्यन्त अभेद नहीं सिद्ध होता। जिस प्रकार कार्यरूप जड प्रपंचकी कारणरूप ब्रह्मसे अभिन्नता होते हुए भी भेद प्रत्यक्ष है। उसी प्रकार जीवात्माका भी ब्रह्मसे भेद है। ब्रह्म नित्यमुक्त है; अतः अपना अहित करना—आवागमनके चक्रमें अपनेको डाले रहना आदि दोष उसपर नहीं लगाये जा सकते। सम्बन्ध— इसी बातको दृढ़ करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं— अश्मादिवच्च तदनुपपत्तिः ॥ २। १। २३॥ च=तथा; अश्मादिवत्=(जड) पत्थर आदिकी भाँति (अल्पज्ञ) जीवात्मा भी ब्रह्मसे भिन्न है, इसलिये; तदनुपपत्तिः=जीवात्मा और परमात्माका अत्यन्त अभेद नहीं सिद्ध होता। व्याख्या—जिस प्रकार परमेश्वर चेतन, ज्ञानस्वरूप, आनन्दमय तथा सबके रचयिता होनेके कारण अपनी अपरा प्रकृतिके विस्ताररूप पत्थर, काठ, लोहा और सुवर्ण आदि निर्जीव जड पदार्थोंसे भिन्न हैं, केवल कारणरूपसे उन वस्तुओंमें अनुगत होनेके कारण ही उनसे अभिन्न कहे जाते हैं, उसी प्रकार अपनी परा प्रकृतिके विस्तारभूत जीवसमुदायसे भी वे भिन्न ही हैं; क्योंकि जीव अल्पज्ञ एवं सुख- दुःख आदिका भोक्ता है और परमात्मा सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार, सर्वनियन्ता तथा सुख-दुःखसे परे है। कारण और कार्यकी अनन्यताको लेकर ही जीवमात्र परमेश्वरसे अभिन्न बतलाये जाते हैं। इसलिये
१५६ वेदान्त-दर्शन [पाद १
१५६ वेदान्त-दर्शन [पाद १ ब्रह्ममें यह दोष नहीं आता कि 'वह अपना अहित करता है।' वह हित-अहितसे ऊपर है। सबका हित उसीसे होता है। सम्बन्ध - यहाँतक सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् परमेश्वरको समस्त जगत्का कारण होते हुए भी सबसे विलक्षण तथा सर्वश्रेष्ठ सिद्ध किया गया है। उसमें प्रतीत होनेवाले दोषोंका भी भलीभाँति निराकरण किया गया। अब उस सत्यसंकल्प परमेश्वरका बिना किसीकी सहायता और परिश्रमके केवल संकल्पमात्रसे ही विचित्र जगत्की रचना कर देना उन्हींके अनुरूप है, यह सिद्ध करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— उपसंहारदर्शनान्नेति चेन्न क्षीरवद्धि॥२।१।२४॥ चेत्=यदि कहो; उपसंहारदर्शनात्=(लोकमें घट आदि बनानेके लिये) साधन-सामग्रीका संग्रह देखा जाता है, (किंतु ब्रह्मके पास कोई साधन नहीं है) इसलिये; न=ब्रह्म जगत्का कर्ता नहीं है; इति न=तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; हि=क्योंकि; क्षीरवत्=दूधकी भाँति (ब्रह्मको अन्य साधनोंकी अपेक्षा नहीं है)। व्याख्या—यदि कहो कि लोकमें घड़ा, वस्त्र आदि बनानेके लिये सक्रिय कार्यकर्त्ताका होना तथा मिट्टी, दण्ड, चाक और सूत, करघा आदि साधनोंका संग्रह अवश्य देखा जाता है; उन साधन-सामग्रियोंके बिना कोई भी कार्य होता नहीं दिखायी देता है। परंतु ब्रह्मको एकमात्र, अद्वितीय, निराकार, निष्क्रिय आदि कहा गया है, उसके पास कोई भी साधन-सामग्री नहीं है; इसलिये वह इस विचित्र जगत्की सृष्टिका कार्य नहीं कर सकता तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; क्योंकि जैसे दूध अपनी सहज शक्तिसे, किसी बाह्य साधनकी सहायता लिये बिना ही दहीरूपमें परिणत हो जाता है, उसी प्रकार परमात्मा भी अपनी स्वाभाविक शक्तिसे जगत्का स्वरूप धारण कर लेता है। जैसे मकड़ीको जाला बनानेके लिये किसी अन्य साधनकी अपेक्षा नहीं होती, उसी प्रकार परब्रह्म भी किसी अन्य साधनका सहारा लिये बिना अपनी अचिन्त्य
सूत्र २५ ] अध्याय २ १५७
सूत्र २५ ] अध्याय २ १५७ शक्तिसे ही जगत्की रचना करता है। श्रुति परमेश्वरकी उस अचिन्त्य शक्तिका वर्णन इस प्रकार करती है—'उस परमात्माको किसी साधनकी आवश्यकता नहीं है, उसके समान और उससे बढ़कर भी कोई नहीं देखा जाता है। उसकी ज्ञान, बल और क्रियारूप स्वाभाविक पराशक्ति नाना प्रकारकी ही सुनी जाती है।' (श्वेता० ६।८)१ सम्बन्ध— यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि 'दूध-जल आदि जड वस्तुओंमें तो इस प्रकारका परिणाम होना सम्भव है, क्योंकि उसमें संकल्पपूर्वक विचित्र रचना करनेकी प्रवृत्ति नहीं देखी जाती; परंतु ब्रह्म तो ईक्षण (संकल्प या विचार)- पूर्वक जगत्की रचना करता है, अतः उसके लिये दूधका दृष्टान्त देना ठीक नहीं है। जो लोग सोच-विचारकर कार्य करनेवाले हैं ऐसे लोगोंको साधन- सामग्रीकी आवश्यकता होती ही है। ब्रह्म अद्वितीय होनेके कारण साधनशून्य है, इसलिये वह जगत्का कर्ता कैसे हो सकता है?' इसपर कहते हैं— देवादिवदपि लोके॥ २। १। २५॥ लोके=लोकमें; देवादिवत्=देवता आदिकी भाँति; अपि=(बिना उपकरणके) भी (कार्य करनेकी शक्ति देखी जाती है)। व्याख्या—जैसे लोकमें देवता और योगी आदि बिना किसी उपकरणकी सहायताके अपनी अद्भुत शक्तिके द्वारा ही बहुत-से शरीर आदिकी रचना कर लेते हैं; बिना किसी साधन-सामग्रीके संकल्पमात्रसे मनोवांछित विचित्र पदार्थोंको प्रकट कर लेते हैं२, उसी प्रकार अचिन्त्यशक्तिसम्पन्न परमेश्वर अपने संकल्पमात्रसे यदि जड-चेतनके समुदायरूप विचित्र जगत्की रचना कर दे या स्वयं उसके रूपमें प्रकट हो जाय तो क्या आश्चर्य है। साधारण मकड़ी भी अपनी ही शक्तिसे अन्य साधनोंके बिना ही जाला बना लेती है, तब सर्वशक्तिमान् १-यह मन्त्र सूत्र १। १। २ की टिप्पणीमें आ गया है। २-देखिये वाल्मीकिरामायण तथा रामचरितमानसमें भरद्वाजजीके द्वारा भरतके आतिथ्यसत्कारका प्रसंग।
१५८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
१५८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ परमेश्वरको इस जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण माननेमें क्या आपत्ति हो सकती है। सम्बन्ध— उपर्युक्त बातको दृढ़ करनेके लिये शंका उपस्थित करते हैं— कृत्स्नप्रसक्तिर्निरवयवत्वशब्दकोपो वा॥ २।१।२६॥ कृत्स्नप्रसक्तिः = (ब्रह्मको जगत्का कारण माननेपर) वह पूर्णरूपसे जगत्के रूपमें परिणत हो गया, ऐसा माननेका दोष उपस्थित होगा; वा = अथवा; निरवयवत्वशब्दकोपः = उसको अवयवरहित बतानेवाले श्रुतिके शब्दोंसे विरोध होगा। व्याख्या— पूर्वपक्षका कहना है कि यदि ब्रह्मको जगत्का कारण माना जायगा तो उसमें दो दोष आवेंगे। एक तो यह कि ब्रह्म अवयवरहित होनेके कारण अपने सम्पूर्ण रूपसे ही जगत्के आकारमें परिणत हो गया, ऐसा मानना पड़ेगा, फिर जगत्से भिन्न ब्रह्मनामकी कोई वस्तु नहीं रही। यदि ब्रह्म सावयव होता तो ऐसा समझते कि उसके शरीरका एक अंश विकृत होकर जगत्-रूपमें परिणत हो गया और शेष अंश ब्रह्मरूपमें ही स्थित है; परंतु वह अवयवयुक्त तो है नहीं; क्योंकि श्रुति उसे 'निष्कल, निष्क्रिय, शान्त, निरवद्य और निरंजन' बताती है१, दिव्य और अमूर्त आदि विशेषणोंसे विभूषित करती है।२ ऐसी दशामें पूर्णतः ब्रह्मका परिणाम मान लेनेपर उसके श्रवण, मनन और निदिध्यासन आदिका उपदेश व्यर्थ होगा। और यदि इस दोषसे बचनेके लिये ब्रह्मको सावयव मान लिया जाय तब तो उसे 'अवयवरहित अजन्मा' आदि बतानेवाले श्रुतिके शब्दोंसे स्पष्ट ही विरोध आता है; सावयव होनेपर वह नित्य और सनातन भी नहीं रह सकेगा; इसलिये ब्रह्मको जगत्का कारण मानना युक्तिसंगत नहीं है। सम्बन्ध— इस शंकाके उत्तरमें कहते हैं— १-निष्कलँ निष्क्रियँ शान्तं निरवद्यं निरंजनम्। (श्वेता० ६।१९) २-दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः। (मु० उ० २।१।२)
सूत्र २७ ] अध्याय २ १५९
सूत्र २७ ] अध्याय २ १५९ श्रुतेस्तु शब्दमूलत्वात् ॥ २ । १ । २७ ॥ तु = किंतु (यह दोष नहीं आता, क्योंकि); श्रुतेः = श्रुतिसे (यह सिद्ध है कि ब्रह्म जगत्का कारण होता हुआ भी निर्विकाररूपसे स्थित है); शब्द मूलत्वात् = ब्रह्मका स्वरूप कैसा है? इसमें वेद ही प्रमाण है (इसलिये वेद जैसा वर्णन करता है, वैसा ही उसका स्वरूप मानना चाहिये)। व्याख्या - पूर्वपक्षीने जो दोष उपस्थित किये हैं; वे सिद्धान्तपक्षपर लागू नहीं होते; क्योंकि वह श्रुतिपर आधारित है। श्रुतिने जिस प्रकार ब्रह्मसे जगत्की उत्पत्ति बतायी है, उसी प्रकार निर्विकार रूपसे ब्रह्मकी स्थितिका भी प्रतिपादन किया है। (देखिये श्वेताश्वतर० ६ । १६ - १९१ तथा मुण्डक० १।१।९२) अतः श्रुतिप्रमाणसे यही मानना ठीक है कि ब्रह्म जगत्का कारण होता हुआ भी निर्विकार रूपसे नित्य स्थित है। वह अवयवरहित और निष्क्रिय होते हुए ही जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण है। उस सर्वशक्तिमान् परमेश्वरके लिये कोई बात असम्भव नहीं है। वह मन-इन्द्रिय आदिसे अतीत है, इनका विषय नहीं है। उसकी सिद्धि कोरे तर्क और युक्तिसे नहीं होती। उसके लिये तो वेद ही सर्वोपरि निर्भ्रान्त प्रमाण है। वेदने उसका स्वरूप जैसा बताया है, वैसा ही मानना चाहिये। वेद उस परब्रह्मको अवयव- रहित बतानेके साथ ही यह भी कहता है कि 'वह सम्पूर्णरूपेण जगत्के आकारमें परिणत नहीं होता।' यह समस्त ब्रह्माण्ड ब्रह्मके एक पादमें स्थित है, शेष अमृतस्वरूप तीन पाद परमधाममें स्थित हैं, ३ ऐसा श्रुतिने स्पष्ट १-स विश्वकृद्विश्वविदात्मयोनिर्ज्ञः कालकालो गुणी सर्वविद्यः । (श्वेता० ६ । १६) निष्कलं निष्क्रियँ शान्तं निरवद्यं निरंजनम् । (श्वेता० ६ । १९) २-यह मन्त्र सूत्र २ । १ । ३० की व्याख्यामें है। ३-तावानस्य महिमा ततो ज्यायाश्च पूरुषः । पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥ (छा० उ० ३ । १२ । ६)
१६० वेदान्त-दर्शन [ पाद १
१६० वेदान्त-दर्शन [ पाद १ शब्दोंमें वर्णन किया है। अतः ब्रह्मको जगत्का कारण माननेमें पूर्वोक्त दोनों ही दोष नहीं प्राप्त होते हैं। सम्बन्ध— इसी बातको युक्तिसे भी दृढ़ करते हैं— आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि॥२।१।२८॥ च=इसके सिवा (युक्तिसे भी इसमें कोई विरोध नहीं है), हि=क्योंकि; आत्मनि=(अवयवरहित) जीवात्मामें; च=भी; एवम्=ऐसी; विचित्राः=विचित्र सृष्टियाँ (देखी जाती हैं)। व्याख्या—पूर्व सूत्रमें ब्रह्मके विषयमें केवल श्रुति-प्रमाणकी गति बतायी गयी, सो तो है ही, उसके सिवा, विचार करनेपर युक्तिसे भी यह बात समझमें आ सकती है कि अवयवरहित परब्रह्मसे इस विचित्र जगत्का उत्पन्न होना असंगत नहीं है; क्योंकि स्वप्नावस्थामें इस अवयवरहित निर्विकार जीवात्मासे नाना प्रकारकी विचित्र सृष्टि होती देखी जाती है; यह सबके अनुभवकी बात है। योगी लोग भी स्वयं अपने स्वरूपसे अविकृत रहते हुए ही अनेक प्रकारकी रचना करते हुए देखे जाते हैं। महर्षि विश्वामित्र, च्यवन, भरद्वाज, वसिष्ठ तथा उनकी धेनु नन्दिनी आदिमें अद्भुत सृष्टि-रचनाशक्तिका वर्णन इतिहासपुराणोंमें जगह-जगह पाया जाता है। जब ऋषि-मुनि आदि विशिष्ट जीवकोटिके लोग भी स्वरूपसे अविकृत रहकर विचित्र सृष्टि-निर्माणमें समर्थ हो सकते हैं, तब परब्रह्ममें ऐसी शक्तिका होना तो कोई आश्चर्यकी बात ही नहीं है। विष्णुपुराणमें प्रश्न और उत्तरके द्वारा इस बातको बहुत अच्छी तरह समझाया गया है।* * निर्गुणस्याप्रमेयस्य शुद्धस्याप्यमलात्मनः। कथं सर्गादिकर्तृत्वं ब्रह्मणोऽभ्युपगम्यते॥ (वि० पु० १।३।१) मैत्रेय पूछते हैं—‘मुने! जो ब्रह्म निर्गुण, अप्रमेय, शुद्ध और निर्मलात्मा है, उसे सृष्टि आदिका कर्ता कैसे माना जा सकता है?’
सूत्र २९-३० ] अध्याय २ १६१
सूत्र २९-३० ] अध्याय २ १६१ सम्बन्ध-इतना ही नहीं, निरवयव वस्तुसे विचित्र सावयव जगत्की सृष्टि सांख्यवादी स्वयं भी मानते हैं। अतः— स्वपक्षदोषाच्च ॥ २।१। २९ ॥ स्वपक्षदोषात् = उनके अपने पक्षमें ही उक्त दोष आता है, इसलिये; च=भी (परब्रह्म परमेश्वरको ही जगत्का कारण मानना ठीक है)। व्याख्या-यदि सांख्यमतके अनुसार प्रधानको जगत्का कारण मान लिया जाय तो उसमें भी अनेक दोष आवेंगे; क्योंकि वह वेदसे तो प्रमाणित है ही नहीं; युक्तिसे भी, उस अवयवरहित जड प्रधानसे इस अवयवयुक्त सजीव जगत्की उत्पत्ति माननेमें विरोध आता है; क्योंकि सांख्यवादी भी प्रधानको न तो सीमित मानते हैं, न सावयव । अतः उनके मतमें भी प्रधानका जगत्-रूपमें परिणत होना स्वीकार करनेपर पूर्वकथित सभी दोष प्राप्त होते हैं। अतः यही ठीक है कि परब्रह्म परमेश्वर ही जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण है। सम्बन्ध - सांख्यादि मतोंकी मान्यतामें दोष दिखाकर अब पुनः अपने सिद्धान्तको निर्दोष सिद्ध करते हुए कहते हैं- सर्वोपेता च तद्दर्शनात् ॥ २।१।३० ॥ च= इसके सिवा, वह परा देवता (परब्रह्म परमेश्वर); सर्वोपेता = सब शक्तियोंसे सम्पन्न है; तद्दर्शनात् = क्योंकि श्रुतिके वर्णनमें ऐसा ही देखा जाता है। शक्तयः सर्वभावानामचिन्त्यज्ञानगोचराः। यतोऽतो ब्रह्मणस्तास्तु सर्गाद्या भावशक्तयः । भवन्ति तपतां श्रेष्ठ पावकस्य यथोष्णता ॥ (वि० पु० १।३।२-३) पराशर मुनि उत्तर देते हैं— 'तपस्वियोंमें श्रेष्ठ मैत्रेय! समस्त भावपदार्थोंकी शक्तियाँ अचिन्त्य ज्ञानकी विषय हैं, (साधारण मनुष्य उनको नहीं समझ सकता) अग्निकी उष्णता-शक्तिकी भाँति ब्रह्मकी भी सर्गादिरचनारूप शक्तियाँ स्वाभाविक हैं।'
१६२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
१६२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ व्याख्या—वह परमात्मा सब शक्तियोंसे सम्पन्न है, ऐसी बात वेदमें जगह-जगह कही गयी है। जैसे—'सत्यसंकल्प आकाशात्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः ॥' (छा० उ० ३।१४।२) अर्थात् 'वह ब्रह्म सत्यसंकल्प, आकाशस्वरूप, सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, समस्त जगत्को सब ओरसे व्याप्त करनेवाला, वाणीरहित और मानरहित है।' यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः। तस्मादेतद् ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते॥ (मु० उ० १।१।९) 'जो सर्वज्ञ, सबको जाननेवाला है, जिसका ज्ञानमय तप है, उसी परमेश्वरसे यह विराट्-रूप जगत् और नाम, रूप तथा अन्न उत्पन्न होते हैं।' तथा उस परब्रह्मके शासनमें सूर्य-चन्द्रमा आदिको दृढ़तापूर्वक स्थित बताया जाना (बृ० उ० ३।८।९), उसमें ज्ञान, बल और क्रियारूप नाना प्रकारकी स्वाभाविक शक्तियोंका होना (श्वेता० ६।८)*, जगत्के कारणका अनुसंधान करनेवाले महर्षियोंद्वारा उस परमात्मदेवकी आत्मभूता शक्तिका दर्शन करना (श्वेता० १।३) इत्यादि प्रकारसे परब्रह्मकी शक्तियोंको सूचित करनेवाले बहुत-से वचन वेदमें मिलते हैं जिनका उल्लेख पहले भी हो चुका है। इस तरह अनेक विचित्र शक्तियोंसे सम्पन्न होनेके कारण उस परब्रह्म परमात्मासे इस विचित्र जगत्का उत्पन्न होना अयुक्त नहीं है। श्रुतिमें जो ब्रह्मको अवयवरहित बताया गया है, वह उसके स्वरूपकी अखण्डता बतलानेके उद्देश्यसे है, उसकी शक्तिरूप अंशोंके निषेधमें उसका अभिप्राय नहीं है; इसलिये परमात्मा ही इस जगत्का कारण है, यही मानना ठीक है। सम्बन्ध—पुनः शंका उठाकर उसका निराकरण करते हैं—
- यह मन्त्र पृष्ठ २ की टिप्पणीमें आ गया है।
सूत्र ३१-३२ ] अध्याय २ १६३
सूत्र ३१-३२ ] अध्याय २ १६३ विकरणत्वान्नेति चेत्तदुक्तम्॥ २। १। ३१॥ ( श्रुतिमें उस परमात्माको) विकरणत्वात्= मन और इन्द्रिय आदि कारणोंसे रहित बताया गया है, इसलिये; न=(वह) जगत्का कारण नहीं है; चेत्=यदि; इति= ऐसा कहो; तदुक्तम्= तो उसका उत्तर दिया जा चुका है। व्याख्या-यदि कहो, 'ब्रह्मको शरीर, बुद्धि, मन और इन्द्रिय आदि करणोंसे रहित कहा गया है, (श्वेता० ६। ८) इसलिये वह जगत्का बनानेवाला नहीं हो सकता' तो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि इसका उत्तर पहले 'सर्वोपेता च तद्दर्शनात्' (२। १। ३०) इस सूत्रमें परब्रह्मको सर्वशक्तिसम्पन्न बताकर दे दिया गया है तथा श्रुतिने भी स्पष्ट शब्दोंमें यह कहा है कि वह परमेश्वर हाथ-पैर आदि समस्त इन्द्रियोंसे रहित होकर भी सबका कार्य करनेमें समर्थ है (श्वेता० ३। १९)*। इसलिये ब्रह्म ही जगत्का कारण है; ऐसा माननेमें कोई आपत्ति नहीं है। सम्बन्ध - अब पुनः दूसरे प्रकारकी शंका उपस्थित करते हैं- न प्रयोजनवत्त्वात् ॥ २। १। ३२॥ न=परमात्मा जगत्का कारण नहीं हो सकता; प्रयोजनवत्त्वात् = क्योंकि प्रत्येक कार्य किसी-न-किसी प्रयोजनसे प्रयुक्त होता है (और परमात्मा पूर्णकाम होनेके कारण प्रयोजनरहित है)। व्याख्या - ब्रह्मका इस विचित्र जगत्की सृष्टि करनेसे कोई प्रयोजन नहीं है; क्योंकि वह तो पूर्णकाम है। जीवोंके लिये भी जगत्की रचना करना आवश्यक नहीं है; क्योंकि परमेश्वरकी प्रवृत्ति तो सबका हित करनेके लिये ही होनी चाहिये। इस दुःखमय संसारसे जीवोंको कोई भी सुख मिलता हो, ऐसी बात नहीं है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि परमेश्वर जगत्का कर्ता नहीं
- अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः। स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम् ॥
१६४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
१६४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ है; क्योंकि जगत्में प्रत्येक कार्यकर्ता किसी-न-किसी प्रयोजनसे ही कार्य आरम्भ करता है। बिना किसी प्रयोजनके कोई भी कर्ममें प्रवृत्त नहीं होता। अतः परब्रह्मको जगत्का कर्ता नहीं मानना चाहिये। सम्बन्ध— पूर्वोक्त शंकाका उत्तर देते हैं— लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्॥ २।१।३३॥ तु=किंतु (उस परब्रह्म परमेश्वरका विश्वरचनादिरूप कर्ममें प्रवृत्त होना तो); लोकवत्=लोकमें आप्तकाम पुरुषोंकी भाँति; लीलाकैवल्यम्=केवल लीलामात्र है। व्याख्या—जैसे लोकमें देखा जाता है कि जो परमात्माको प्राप्त हो चुके हैं। जिनका जगत्से अपना कोई स्वार्थ नहीं रह गया है, कर्म करने या न करनेसे जिनका कोई प्रयोजन नहीं है, जो आप्तकाम और वीतराग हैं, ऐसे सिद्ध महापुरुषोंद्वारा बिना किसी प्रयोजनके जगत्का हित-साधन करनेवाले कर्म स्वभावतः किये जाते हैं; उनके कर्म किसी प्रकारका फल उत्पन्न करनेमें समर्थ न होनेके कारण केवल लीलामात्र ही हैं। उसी प्रकार उस परब्रह्म परमात्माका भी जगत्-रचना आदि कर्मोंसे अथवा मनुष्यादि-अवतार-शरीर धारण करके भाँति-भाँतिके लोकपावन चरित्र करनेसे अपना कोई प्रयोजन नहीं है तथा इन कर्मोंमें कर्तापनका अभिमान या आसक्ति भी नहीं है; इसलिये उनके कर्म केवल लीलामात्र ही हैं। इसीलिये शास्त्रोंमें परमेश्वरके कर्मोंको दिव्य (अलौकिक) एवं निर्मल बताया है। यद्यपि हमलोगोंकी दृष्टिमें संसारकी सृष्टिरूप कार्य महान् दुष्कर एवं गुरुतर है तथापि परमेश्वरकी यह लीलामात्र है; वे अनायास ही कोटि-कोटि ब्रह्माण्डोंकी रचना और संहार कर सकते हैं; क्योंकि उनकी शक्ति अनन्त है, इसलिये परमेश्वरके द्वारा बिना प्रयोजन इस जगत्की रचना आदि कार्यका होना उचित ही है।*
- भगवान् केवल संकल्पमात्रसे बिना किसी परिश्रमके इस विचित्र विश्वकी रचनामें
सूत्र ३४ ] अध्याय २ १६५
सूत्र ३४ ] अध्याय २ १६५ सम्बन्ध — यदि परब्रह्म परमात्माको जगत्का कारण माना जाय तो उसमें विषमता (राग-द्वेषपूर्ण भाव) तथा निर्दयताका दोष आता है; क्योंकि वह देवता आदिको अधिक सुखी और पशु आदिको अत्यन्त दुःखी बनाता है तथा मनुष्योंको सुख-दुःखसे परिपूर्ण मध्यम स्थितिमें उत्पन्न करता है। जिन्हें वह सुखी बनाता है, उनके प्रति उसका राग या पक्षपात सूचित होता है और जिन्हें दुःखी बनाता है, उनके प्रति उसकी द्वेष-बुद्धि एवं निर्दयता प्रतीत होती है। इस दोषका निराकरण करनेके लिये कहते हैं— वैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात्तथा हि दर्शयति ॥ २ । १ । ३४ ॥ वैषम्यनैर्घृण्ये = (परमेश्वरमें) विषमता और निर्दयताका दोष; न=नहीं आता; सापेक्षत्वात् = क्योंकि वह जीवोंके शुभाशुभ कर्मोंकी अपेक्षा रखकर सृष्टि करता है; तथा हि = ऐसा ही; दर्शयति = श्रुति दिखलाती है। व्याख्या—श्रुतिमें कहा है—'पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन।' (बृह० उ० ३।२।१३) अर्थात् 'निश्चय ही यह जीव पुण्य कर्मसे पुण्यशील होता—पुण्ययोनिमें जन्म पाता है और पाप-कर्मसे पापशील होता— पापयोनिमें जन्म ग्रहण करता है।' 'साधुकारी साधुर्भवति पापकारी पापो भवति।' (बृह० उ० ४।४।५) अर्थात् 'अच्छे कर्म करनेवाला अच्छा होता है—सुखी एवं सदाचारी कुलमें जन्म पाता है और पाप करनेवाला पापात्मा होता है—पापयोनिमें जन्म ग्रहण करके दुःख उठाता है।' इत्यादि। इस वर्णनसे स्पष्ट है कि जीवोंके शुभाशुभ कर्मोंकी अपेक्षा रखकर ही परमात्मा समर्थ हैं। उनकी इस अद्भुत शक्तिको देखकर, सुनकर और समझकर भगवदीय सत्ता और उनके गुण-प्रभावपर श्रद्धा-विश्वास करके उनकी शरणमें जानेसे मनुष्य अनायास ही चिरशान्ति और भगवत्प्रेम प्राप्त कर सकता है। भगवान् सबके सुहृद् हैं, उनकी एक-एक लीला जगत्के जीवोंके उद्धारके लिये होती है; इस प्रकार उनकी दिव्य लीलाका रहस्य समझमें आ जानेपर मनुष्यका जगत्में प्रतिक्षण घटित होनेवाली घटनाओंके प्रति राग- द्वेषका अभाव हो जाता है; उसे किसी भी बातसे हर्ष या शोक नहीं होता। अतः साधकको इसपर विशेष ध्यान देकर भगवान्के भजन-चिन्तनमें संलग्न रहना चाहिये।
उनको कर्मानुसार अच्छी-बुरी (सुखी-दुःखी) योनियोंमें उत्पन्न करते हैं। इसलिये अच्छे न्यायाधीशकी भाँति निष्पक्षभावसे न्याय करनेवाले परमात्मापर विषमता और निर्दयताका दोष नहीं लगाया जा सकता है। स्मृतियोंमें भी जगह-जगह कहा गया है कि जीवको अपने शुभाशुभ कर्मके अनुसार सुख-दुःखकी प्राप्ति होती है। जैसे- 'कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्।' (गीता १४।१६) अर्थात् 'पुण्यकर्मका फल सात्त्विक एवं निर्मल बताया गया है।' इसी प्रकार भगवान्ने अशुभ कर्ममें रत रहनेवाले असुर-स्वभावके लोगोंको आसुरी योनिमें डालनेकी बात बतायी है। * इन प्रमाणोंसे परमेश्वरमें उपर्युक्त दोषोंका सर्वथा अभाव सिद्ध होता है; अतः उन्हें जगत्का कारण मानना ठीक ही है। सम्बन्ध - पूर्वसूत्रमें कही गयी बातपर शंका उपस्थित करके उसका निराकरण करते हैं- न कर्माविभागादिति चेन्नानादित्वात् ॥ २।१।३५ ॥ चेत् = यदि कहो; कर्माविभागात् = जगत्की उत्पत्तिसे पहले जीव और उनके कर्मोंका ब्रह्मसे विभाग नहीं था, इसलिये; न=परमात्मा कर्मोंकी अपेक्षासे सृष्टि करता है, यह कहना नहीं बन सकता; इति न= तो ऐसी बात नहीं है; अनादित्वात् = क्योंकि जीव और उनके कर्म अनादि हैं।
- अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः । मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥ तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् । क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥ (गीता १६। १८-१९) 'जो अहंकार, बल, दर्प, काम और क्रोधका आश्रय ले अपने तथा दूसरोंके शरीरोंमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित मुझ परमेश्वरसे द्वेष रखते हैं, निन्दा करते हैं; उन द्वेषी, क्रूर, अशुभ- कर्मपरायण नीच मनुष्योंको मैं निरन्तर संसारमें आसुरी योनियोंमें ही डालता हूँ।'
सूत्र ३५ ] अध्याय २ १६७
सूत्र ३५ ] अध्याय २ १६७ व्याख्या—यदि कहो कि जगत्की उत्पत्ति होनेसे पहले तो एकमात्र सत्स्वरूप परमात्मा ही था,* यह बात उपनिषदोंमें बार-बार कही गयी है। इससे सिद्ध है कि उस समय भिन्न-भिन्न जीव और उनके कर्मोंका कोई विभाग नहीं था; ऐसी स्थितिमें यह कहना नहीं बनता कि जगत्कर्ता परमात्माने जीवोंके कर्मोंकी अपेक्षा रखकर ही भोक्ता, भोग्य और भोग-सामग्रियोंके समुदायरूप इस विचित्र जगत्की रचना की है; जिससे परमेश्वरमें विषमता और निर्दयताका दोष न आवे। तो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि जीव और उनके कर्म अनादि हैं। श्रुति कहती है—'धाता यथापूर्वमकल्पयत्।' परमात्माने पूर्व कल्पके अनुसार सूर्य, चन्द्रमा आदि जगत्की रचना की। (ऋ० १०। १९०। ३) इससे जड-चेतनात्मक जगत्की अनादि सत्ता सिद्ध होती है। प्रलयकालमें सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमात्मामें विलीन हो जानेपर भी उसकी सत्ता एवं सूक्ष्म विभागका अभाव नहीं होता। उपर्युक्त श्रुतिसे ही यह बात भी सिद्ध है कि जगत्की उत्पत्तिके पहले भी वह अव्यक्त रूपसे उस सर्वशक्तिमान् परमात्मामें है; उसका अभाव नहीं हुआ है। 'लीङ्श्लेषणे' धातुसे लय शब्द बनता है। अतः उसका अर्थ संयुक्त होना या मिलना ही है। उस वस्तुका अभाव हो जाना नहीं। जैसे नमक जलमें घुल-मिल जाता है, तो भी उसकी सत्ता नहीं मिट जाती। उसके पृथक् स्वादकी उपलब्धि होनेके कारण जलसे उसका सूक्ष्म विभाग भी है ही। उसी प्रकार जीव और उनके कर्म प्रलयकालमें ब्रह्मसे अविभक्त रहते हैं तो भी उनकी सत्ता एवं सूक्ष्म विभागका अभाव नहीं होता। इसलिये परमात्माको जीवोंके शुभाशुभ कर्मानुसार विचित्र जगत्का कर्ता माननेमें कोई आपत्ति नहीं है। सम्बन्ध—इसपर यह जिज्ञासा होती है कि जीव और उनके कर्म अनादि हैं, इसमें क्या प्रमाण है? इसपर कहते हैं—
- 'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्।' (छा० उ० ६।२।१)
१६८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
१६८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ उपपद्यते चाप्युपलभ्यते च ॥ २ । १ । ३६ ॥ च=इसके सिवा (जीव और उनके कर्मोंका अनादि होना); उपपद्यते= युक्तिसे भी सिद्ध होता है; च=और; उपलभ्यते अपि= (वेदों तथा स्मृतियोंमें) ऐसा वर्णन उपलब्ध भी होता है। व्याख्या—जीव और उनके कर्म अनादि हैं, यह बात युक्तिसे भी सिद्ध होती है; क्योंकि यदि इनको अनादि नहीं माना जायगा तो प्रलयकालमें परमात्माको प्राप्त हुए जीवोंके पुनरागमन माननेका दोष प्राप्त होगा। अथवा प्रलयकालमें सब जीव अपने-आप मुक्त हो जाते हैं, यह स्वीकार करना होगा। इससे शास्त्र और उनमें बताये हुए सब साधन व्यर्थ सिद्ध होंगे, जो सर्वथा अनुचित है। इसके सिवा श्रुति भी बारम्बार जीव और उनके कर्मोंको अनादि बताती है। जैसे—'यह जीवात्मा नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीरके नाशसे इसका नाश नहीं होता।'* तथा 'वह यह प्रत्यक्ष जगत् उत्पन्न होनेसे पहले नाम-रूपसे प्रकट नहीं था, वही पीछे प्रकट किया गया।' (बृ० उ० १।४।७) 'परमात्माने शरीरकी रचना करके उसमें इस जीवात्माके सहित प्रवेश किया।' (तै० उ० २।७) इत्यादि। इन सब वर्णनोंसे जीवात्मा और यह जगत् अनादि सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार स्मृतिमें भी स्पष्ट कहा गया है कि 'पुरुष (जीवसमुदाय) और प्रकृति (स्वभाव, जिसमें जीवोंके कर्म भी संस्काररूपमें रहते हैं)— इन दोनोंको ही अनादि समझो।' (गीता १३।१९) इस प्रकार जीव और उनके कर्म अनादि सिद्ध होनेसे उनका विभक्त होना अनिवार्य है; अतः कर्मोंकी अपेक्षासे परमेश्वरको इस विचित्र जगत्का कर्ता माननेमें कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध—अपने पक्षमें अविरोध (विरोधका अभाव) सिद्ध करनेके लिये आरम्भ किये हुए इस पहले पादका उपसंहार करते हुए सूत्रकार कहते हैं—
- अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ (क० उ० १।२।१८)
सूत्र ३७ ] अध्याय २ १६९
सूत्र ३७ ] अध्याय २ १६९ सर्वधर्मोपपत्तेश्च ॥ २ । १ । ३७ ॥ सर्वधर्मोपपत्तेः = (इस जगत्कारण परब्रह्ममें) सब धर्मोंकी संगति है, इसलिये; च = भी (किसी प्रकारका विरोध नहीं है)। व्याख्या—इस जगत्कारणरूप परब्रह्म परमात्मामें सभी धर्मोंका होना संगत है; क्योंकि वह सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, सर्वधर्मा, सर्वाधार और सब कुछ बननेमें समर्थ है। इसीलिये वह सगुण भी है और निर्गुण भी। समस्त जगद्व्यापारसे रहित होकर भी सब कुछ करनेवाला है। वह व्यक्त भी है और अव्यक्त भी। उस सर्वधर्माश्रय परब्रह्म परमेश्वरके लिये कुछ भी दुष्कर या असम्भव नहीं है। इस प्रकार विवेचन करनेसे यह सिद्ध हुआ कि ब्रह्मको जगत्का कारण माननेमें कोई भी दोष या विरोध नहीं है। इस पादमें आचार्य बादरायणने प्रधानतः अपने पक्षमें आनेवाले दोषोंका निराकरण करते हुए अन्तमें जीव और उनके कर्मोंको अनादि बतलाकर इस जगत्की अनादि-सत्ता तथा सत्कार्यवादकी सिद्धि की है। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि ग्रन्थकार परमेश्वरको केवल निर्गुण, निराकार और निर्विशेष ही नहीं मानते; किंतु सर्वज्ञता आदि सब धर्मोंसे सम्पन्न भी मानते हैं। पहला पाद सम्पूर्ण
दूसरा पाद
दूसरा पाद सम्बन्ध— पहले पादमें प्रधानतासे अपने पक्षमें प्रतीत होनेवाले समस्त दोषोंका खण्डन करके यह निश्चय कर दिया कि इस जगत्का निमित्त और उपादानकारण परब्रह्म परमेश्वर ही है। अब दूसरोंद्वारा प्रतिपादित जगत्कारणोंको स्वीकार करनेमें जो-जो दोष आते हैं; उनका दिग्दर्शन कराकर अपने सिद्धान्तकी पुष्टिके लिये दूसरा पाद आरम्भ किया जाता है। इसमें प्रथम दस सूत्रोंद्वारा यह सिद्ध करते हैं कि सांख्योक्त 'प्रधान' को जगत्का कारण मानना युक्तिसंगत नहीं है— रचनानुपपत्तेश्च नानुमानम्॥ २।२।१॥ च=इसके सिवा; अनुमानम्=जो केवल अनुमान है (वेदोंद्वारा जिसकी ब्रह्मसे पृथक् सत्ता सिद्ध नहीं होती), वह प्रधान; न=जगत्का कारण नहीं है; रचनानुपपत्तेः=क्योंकि उसके द्वारा नाना प्रकारकी रचना सम्भव नहीं है। व्याख्या—प्रधान या प्रकृतिको जगत्का कारण नहीं कहा जा सकता; क्योंकि वह जड है। कब कहाँ किस वस्तुकी आवश्यकता है, इसका विचार जड प्रकृति नहीं कर सकती, अतएव उसके द्वारा ऐसी विशिष्ट रचना नहीं प्रस्तुत की जा सकती, जिससे किसीकी आवश्यकता पूर्ण हो सके। इसके सिवा, चेतन कर्ताकी सहायताके बिना जड वस्तु स्वयं कुछ करनेमें समर्थ भी नहीं है। गृह, वस्त्र, भाँति-भाँतिके पात्र, हथियार और मशीन आदि जितनी भी आवश्यक वस्तुएँ हैं, सबकी रचना बुद्धियुक्त कुशल कारीगरके द्वारा ही की जाती है। जड प्रकृति स्वयं वस्तुओंका निर्माण कर लेती हो, ऐसा दृष्टान्त कहीं नहीं मिलता है फिर जो पृथिवी, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र आदि विविध एवं अद्भुत वस्तुओंसे सम्पन्न है; मनुष्य, पशु, पक्षी, वृक्ष और तृण आदिसे सुशोभित है तथा शरीर, इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदि आध्यात्मिक तत्त्वोंसे अलंकृत है; जिसके निर्माण-कौशलकी कल्पना बड़े-बड़े