वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
३७४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
३७४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ अधिकोपदेशात्तु बादरायणस्यैवं तद्दर्शनात् ॥ ३ । ४ । ८ ॥ तु=किंतु; अधिकोपदेशात्=श्रुतिमें कर्मोंकी अपेक्षा अधिक ब्रह्मविद्याके माहात्म्यका कथन होनेके कारण; बादरायणस्य=व्यासजीका मत; एवम्=जैसा प्रथम सूत्रमें कहा था वैसा ही है; तद्दर्शनात्=क्योंकि श्रुतिमें विद्याकी अधिकता वैसी दिखलायी गयी है। व्याख्या—जैमिनिने जो विद्याको कर्मका अंग बताया है, वह ठीक नहीं है। उन्होंने अपने कथनकी सिद्धिके लिये जो युक्तियाँ दी हैं, वे भी आभासमात्र ही हैं। अतः बादरायणने पूर्वसूत्रमें जो अपना मत प्रकट किया है, वह अब भी ज्यों-का-त्यों है। जैमिनिकी युक्तियोंसे उसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। यद्यपि ब्रह्मज्ञानके साथ-साथ लोकसंग्रहके लिये या प्रारब्धानुसार शरीर-स्थितिके निमित्त किये जानेवाले कर्म रहें, तो उनसे कोई हानि नहीं है; तथापि परमात्माकी प्राप्तिरूप पुरुषार्थका कारण तो एकमात्र परमात्माका तत्त्वज्ञान ही है। इसके सिवा, न तो कर्म-ज्ञानका समुच्चय परमपुरुषार्थका साधन है और न केवल कर्म ही; क्योंकि श्रुतिमें कहा है— इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः । नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥ ‘इष्ट और पूर्त कर्मोंको ही श्रेष्ठ माननेवाले मूर्खलोग उससे भिन्न वास्तविक श्रेयको नहीं जानते। वे शुभ कर्मोंके फलरूप स्वर्गलोकके उच्चतम स्थानमें वहाँके भोगोंका अनुभव करके इस मनुष्यलोकमें या इससे भी अत्यन्त नीचेके लोकमें गिरते हैं।’ (मु० उ० १ । २ । १०) परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन । तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥ ‘इस प्रकार कर्मसे प्राप्त होनेवाले लोकोंकी परीक्षा करके अर्थात् उनकी अनित्यताको समझकर द्विजको उनसे सर्वथा विरक्त हो जाना चाहिये तथा यह निश्चय करना चाहिये कि वह अकृत अर्थात् स्वतःसिद्ध
सूत्र ९ ] अध्याय ३ ३७५ परमात्मा कर्मोंके द्वारा नहीं मिल सकता। अतः जिज्ञासु पुरुष उस ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये वेदज्ञ, ब्रह्मनिष्ठ गुरुके समीप हाथमें समिधा लिये हुए जाय।' (मु० उ० १।२।१२) 'इस तरह अपनी शरणमें आये हुए शिष्यको ब्रह्मज्ञानी महात्मा ब्रह्मविद्याका उपदेश करे।' (मु० उ० १। २।१३) यह सब कहकर श्रुतिने वहाँ ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन किया है और उसे ज्ञानके द्वारा प्राप्त होनेयोग्य बतलाकर (मु० उ० २।२।७) कहा है कि 'कार्य-कारणस्वरूप उस ब्रह्मको जान लेनेपर इस मनुष्यके हृदयकी चिज्जड-ग्रन्थिका भेदन हो जाता है, सब संशय नष्ट हो जाते हैं और समस्त कर्मोंका क्षय हो जाता है।' (मु० उ० २।२।८)* इस प्रकार श्रुतियोंमें जगह-जगह कर्मोंकी अपेक्षा ब्रह्मज्ञानका महत्त्व बहुत अधिक बताया गया है। इसलिये ब्रह्मविद्या कर्मोंका अंग नहीं है। सम्बन्ध—श्रेष्ठ पुरुषोंका आचार देखनेसे जो विद्याको कर्मका अंग बताया गया था, उसका उत्तर देते हैं— तुल्यं तु दर्शनम् ॥ ३।४।९॥ दर्शनम्=आचारका दर्शन; तु=तो; तुल्यम्=समान है (अतः उससे विद्या कर्मका अंग है, यह नहीं सिद्ध होता)। व्याख्या—आचारसे भी यह सिद्ध नहीं होता कि विद्या कर्मका अंग है, क्योंकि श्रुतिमें दोनों प्रकारका आचार देखा जाता है। एक ओर ज्ञाननिष्ठ जनकादि गृहस्थ महापुरुष लोकसंग्रहके लिये यज्ञ-यागादि कर्म करते देखे जाते हैं तो दूसरी ओर केवल भिक्षासे निर्वाह करनेवाले विरक्त संन्यासी महात्मा लोकसंग्रहके लिये ही समस्त कर्मोंका त्याग करके ज्ञाननिष्ठ हो केवल ब्रह्मचिन्तनमें रत रहते हैं। इस प्रकार आचार तो दोनों ही तरहके उपलब्ध होते हैं। इससे कर्मकी प्रधानता नहीं सिद्ध होती है। जिनको वास्तवमें ज्ञान प्राप्त
- भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे॥
३७६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
३७६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ हो गया है, उनको न तो कर्म करनेसे कोई प्रयोजन है और न उनके त्यागसे ही (गीता ३। १७)। अतएव प्रारब्ध तथा ईश्वरके विधानानुसार उनका आचरण दोनों प्रकारका ही होता है। इसके सिवा श्रुतिमें यह भी कहा है कि 'इसीलिये पूर्वके विद्वानोंने अग्निहोत्रादि कर्मोंका अनुष्ठान नहीं किया' (कौ० उ० २। ५) 'इस आत्माको जानकर ही ब्राह्मणलोग पुत्रादिकी इच्छाका त्याग करके विरक्त हो भिक्षासे निर्वाह करते हुए विचरते हैं' (बृह० उ० ३। ५। १) याज्ञवल्क्यने भी दूसरोंमें वैराग्यकी भावना उत्पन्न करनेके लिये अन्तमें संन्यास ग्रहण किया (बृह० उ० ४। ५। १५)। इस प्रकार श्रुतियोंके कर्म-त्यागके आचारका भी जगह-जगह वर्णन पाया जाता है। इसलिये यही सिद्ध होता है कि परमपुरुषार्थका हेतु केवल ब्रह्मज्ञान ही है और वह कर्मका अंग नहीं है। सम्बन्ध — पूर्वपक्षकी ओरसे जो श्रुतिका प्रमाण दिया गया था, उसका उत्तर देते हैं— असार्वत्रिकी ॥ ३ । ४ । १० ॥ असार्वत्रिकी = (वह श्रुति) सर्वत्र सम्बन्ध रखनेवाली नहीं है—एक- देशीय है। व्याख्या — पूर्वपक्षीने जो 'यदेव विद्यया करोति' (छा० उ० १। १। १०) इत्यादि श्रुतिका प्रमाण दिया है, वह सब विद्याओंसे सम्बन्धित नहीं है— एकदेशीय है। अतः उस प्रकरणमें आयी हुई उद्गीथ-विद्यासे ही उसका सम्बन्ध है, उसको ही वह कर्मका अंग बताती है, अन्य सब प्रकरणोंमें वर्णित समस्त विद्याओंसे उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। अतः उस एकदेशीय श्रुतिसे यह सिद्ध नहीं हो सकता कि विद्यामात्र कर्मका अंग है। सम्बन्ध — पाँचवें सूत्रमें पूर्वपक्षीने जिस श्रुतिका प्रमाण दिया है, उसके विषयमें उत्तर देते हैं— विभागः शतवत् ॥ ३ । ४ । ११ ॥ शतवत्=एक सौ मुद्राके विभागकी भाँति; विभागः=उस श्रुतिमें कहा हुआ विद्या-कर्मका विभाग अधिकारिभेदसे समझना चाहिये।
व्याख्या - जिस प्रकार किसीको आज्ञा दी जाय कि 'एक सौ मुद्रा उपस्थित लोगोंको दे दो।' तो सुननेवाला पुरुष पानेवाले लोगोंके अधिकारके अनुसार विभाग करके उन मुद्राओंका वितरण करेगा। उसी प्रकार इस श्रुतिके कथनका भाव भी अधिकारीके अनुसार विभागपूर्वक समझना चाहिये। जो ब्रह्मज्ञानी है, उसके कर्म तो यहीं नष्ट हो जाते हैं। अतः वह केवल विद्याके बलसे ही ब्रह्मलोकको जाता है। उसके साथ कर्म नहीं जाते (मु० उ० १।२।११) और जो सांसारिक मनुष्य हैं या साधनभ्रष्ट हैं, उनके साथ विद्या और कर्म दोनोंके ही संस्कार जाते हैं। वहाँ विद्याका अर्थ परमात्माका अपरोक्षज्ञान नहीं, किंतु केवल श्रवण, मनन आदिका अभ्यास समझना चाहिये। अतः इससे भी विद्या कर्मका अंग है, यह सिद्ध नहीं होता। सम्बन्ध - पूर्वपक्षकी ओरसे जो छठे सूत्रमें प्रजापतिके वचनोंका प्रमाण दिया गया था, उसका उत्तर देते हैं— अध्ययनमात्रवतः ॥ ३।४।१२॥ अध्ययनमात्रवतः = जिसने विद्याका केवल अध्ययनमात्र किया है, अनुष्ठान नहीं, ऐसे विद्वान्के विषयमें यह कथन है। व्याख्या - प्रजापतिके उपदेशमें जो विद्यासम्पन्न पुरुषके लिये कुटुम्बमें जाने और कर्म करनेकी बात कही गयी है, वह कथन गुरुकुलसे अध्ययनमात्र करके निकलनेवाले ब्रह्मचारीके लिये है। अतः जिसने ब्रह्मविद्याका केवल अध्ययन किया है, मनन और निदिध्यासनपूर्वक उसका अनुष्ठान नहीं किया, ऐसे अधिकारीके प्रति अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये कर्मोंका विधान है, जो कि सर्वथा उचित है; किंतु इससे यह सिद्ध नहीं होता कि ब्रह्मविद्या कर्मोंका अंग है। सम्बन्ध - पूर्वपक्षकी ओरसे जो अन्तिम श्रुति-प्रमाण दिया गया है, उसका उत्तर चार सूत्रोंमें अनेक प्रकारसे देते हैं—
३७८ वेदान्त-दर्शन [पाद ४
३७८ वेदान्त-दर्शन [पाद ४ नाविशेषात् ॥ ३ । ४ । १३ ॥ अविशेषात् = वह श्रुति विशेषरूपसे विद्वान्के लिये नहीं कही गयी है, इसलिये; न = ज्ञानके साथ उसका समुच्चय नहीं है। व्याख्या—वहाँ जो त्यागपूर्वक आजीवन कर्म करनेके लिये कहा है, वह कथन सभी साधकोंके लिये समानभावसे है, ज्ञानीके लिये विशेषरूपसे नहीं है। अतः उससे न तो यह सिद्ध होता है कि ब्रह्मविद्या कर्मका अंग है और न यही सिद्ध होता है कि केवल ब्रह्मविद्यासे परम पुरुषार्थ प्राप्त नहीं होता। सम्बन्ध—यदि उस श्रुतिको समानभावसे सबके लिये मान लिया जाय तो फिर उसके द्वारा ज्ञानीके लिये भी तो कर्मका विधान हो ही जाता है, इसपर कहते हैं— स्तुतयेऽनुमतिर्वा ॥ ३ । ४ । १४ ॥ वा=अथवा यों समझो कि; स्तुतये=विद्याकी स्तुतिके लिये; अनुमतिः=सम्मतिमात्र है। व्याख्या—यदि इस श्रुतिको समानभावसे ज्ञानीके लिये भी माना जाय तो उसका यह भाव समझना चाहिये कि ज्ञानी लोकसंग्रहार्थ आजीवन कर्म करता रहे तो भी ब्रह्मविद्याके प्रभावसे उसमें कर्म लिप्त नहीं होते। वह उनसे सर्वथा सम्बन्धरहित रहता है। इस प्रकार ब्रह्मविद्याकी प्रशंसा करनेके लिये यह श्रुति कर्म करनेकी सम्मतिमात्र देती है, उसे कर्म करनेके लिये बाध्य नहीं करती, अतः यह श्रुति विद्याको कर्मोंका अंग बतलानेके लिये नहीं है। सम्बन्ध—इसी बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं— कामकारेण चैके ॥ ३ । ४ । १५ ॥ च=इसके सिवा; एके=कई एक विद्वान्; कामकारेण=स्वेच्छापूर्वक (कर्मोंका त्याग कर देते हैं, इसलिये भी विद्या कर्मोंका अंग नहीं है)। व्याख्या—श्रुति कहती है कि 'किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं लोकः।'—'हम प्रजासे क्या प्रयोजन सिद्ध करेंगे जिनका यह परब्रह्म
सूत्र १६ ] अध्याय ३ ३७९
सूत्र १६ ] अध्याय ३ ३७९ परमेश्वर ही लोक अर्थात् निवासस्थान है।' (बृह० उ० ४।४।२२) इत्यादि श्रुतियोंमें कितने ही विद्वानोंका स्वेच्छापूर्वक गृहस्थ-आश्रम और कर्मोंका त्याग करना बतलाया गया है। यदि 'कुर्वन्नेवेह' इत्यादि श्रुति सभी विद्वानोंके लिये कर्मका विधान करनेवाली मान ली जाय तो इस श्रुतिसे विरोध आयेगा। अतः यही समझना चाहिये कि विद्वानोंमें कोई अपनी पूर्वप्रकृतिके अनुसार आजीवन कर्म करता रहता है और कोई छोड़ देता है, इसमें उनकी स्वतन्त्रता है। इसलिये भी यह सिद्ध नहीं होता कि विद्या कर्मका अंग है। सम्बन्ध - प्रकारान्तरसे इसी बातको सिद्ध करते हैं- उपमर्दं च ॥ ३।४।१६ ॥ च=इसके सिवा; उपमर्दम्= ब्रह्मविद्यासे कर्मोंका सर्वथा नाश हो जाना कहा है (इससे भी पूर्वोक्त बात सिद्ध होती है)। व्याख्या- 'उस परमात्माका ज्ञान हो जानेपर इसके समस्त कर्म नष्ट हो जाते हैं' (मु० उ० २।२।८) इत्यादि श्रुतियोंमें तथा स्मृतिमें भी ज्ञानका फल समस्त कर्मोंका भलीभाँति नाश बतलाया है (गीता ४।३७) * इसलिये ब्रह्मविद्याको कर्मका अंग नहीं माना जा सकता; तथा केवल ब्रह्मविद्यासे परमात्माकी प्राप्तिरूप परमपुरुषार्थकी सिद्धि नहीं होती, यह कहना भी नहीं बन सकता। सम्बन्ध - यहाँतक जैमिनिद्वारा उपस्थित की हुई सब शंकाओंका उत्तर देकर यह सिद्ध किया कि 'विद्या कर्मका अंग नहीं है, स्वतन्त्र साधन है।' अब उसी बातकी पुनः पुष्टि करते हैं-
- यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन। ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा॥ 'हे अर्जुन ! जैसे प्रज्वलित आग लकड़ियोंको भस्म कर डालती है, उसी प्रकार ज्ञानरूपी अग्नि सब कर्मोंको भस्म कर देती है।'
३८० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
३८० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ ऊर्ध्वरेतस्सु च शब्दे हि॥ ३। ४। १७॥ ऊर्ध्वरेतस्सु=जिनमें वीर्यको सुरक्षित रखनेका विधान है ऐसे तीन आश्रमोंमें; च=भी (ब्रह्मविद्याका अधिकार है;) हि=क्योंकि; शब्दे=वेदमें ऐसा कहा है (इसलिये ब्रह्मविद्या कर्मोंका अंग नहीं है)। व्याख्या—जैसे गृहस्थ-आश्रममें ब्रह्मविद्याके अनुष्ठानका अधिकार है, उसी प्रकार ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास इन तीनों आश्रमोंमें भी उसके अनुष्ठानका अधिकार है; क्योंकि वेदमें ऐसा ही वर्णन है। मुण्डकोपनिषद् (१।२।११)-में कहा है कि— तपःश्रद्धे ये ह्युपवसन्त्यरण्ये शान्ता विद्वांसो भैक्ष्यचर्यां चरन्तः। सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा॥ 'जो वनमें रहनेवाले (वानप्रस्थ), शान्त स्वभाववाले विद्वान् गृहस्थ तथा भिक्षासे निर्वाह करनेवाले ब्रह्मचारी और संन्यासी तप एवं श्रद्धाका सेवन करते हैं, वे रजोगुणसे रहित साधक सूर्यके मार्गसे वहाँ चले जाते हैं, जहाँ जन्म-मृत्युसे रहित नित्य अविनाशी परम पुरुष निवास करता है।' इसके सिवा अन्य श्रुतियोंमें भी इसी प्रकारका वर्णन मिलता है। (प्र० उ० १।१०) इससे यह सिद्ध होता है कि विद्या कर्मोंका अंग नहीं है, क्योंकि संन्यासीके लिये वैदिक यज्ञादि कर्मोंका विधान नहीं है और उनका ब्रह्मविद्यामें अधिकार है। यदि ब्रह्मविद्याको कर्मका अंग मान लिया जाय तो संन्यासीके द्वारा उसका अनुष्ठान कैसे सम्भव होगा ? सम्बन्ध—अब जैमिनिकी ओरसे पुनः शंका उपस्थित की जाती है— परामर्शं जैमिनिरचोदना चापवदति हि॥ ३।४।१८॥ जैमिनिः=आचार्य जैमिनि; परामर्शम्=उक्त श्रुतिमें संन्यास-आश्रमका अनुवादमात्र मानते हैं, विधि नहीं; हि=क्योंकि; अचोदना=उसमें विधिसूचक क्रियापदका प्रयोग नहीं है; च=इसके सिवा; अपवदति=श्रुति संन्यासका अपवाद (निषेध) करती है।
सूत्र १९ ] अध्याय ३ ३८१
सूत्र १९ ] अध्याय ३ ३८१ व्याख्या—आचार्य जैमिनिका कथन है कि संन्यास-आश्रम अनुष्ठेय (पालन करनेयोग्य) नहीं है। गृहस्थ-आश्रममें रहकर कर्मानुष्ठान करते हुए ही मनुष्यका परम पुरुषार्थ सिद्ध हो सकता है। पूर्वोक्त श्रुतिमें 'भैक्ष्यचर्यां चरन्तः' इन पदोंके द्वारा संन्यासका अनुवादमात्र ही हुआ है, विधि नहीं है, क्योंकि वह विधिसूचक क्रियापदका प्रयोग नहीं है। इसके सिवा, श्रुतिने स्पष्ट शब्दोंमें संन्यासका निषेध भी किया है। जैसे—'जो अग्निहोत्रका त्याग करता है, वह देवोंके वीरोंको मारनेवाला है' (तै० सं० १।५।२।१)। 'आचार्यको उनकी इच्छाके अनुरूप धन दक्षिणामें देकर संतान-परम्पराको बनाये रखो, उसका उच्छेद न करो।' (तै० उ० १।११) इन वचनोंद्वारा संन्यास-आश्रमका प्रतिवाद होनेसे यही सिद्ध होता है कि संन्यास-आश्रम आचरणमें लानेयोग्य नहीं है। अतएव संन्यासीका ब्रह्मविद्यामें अधिकार बताकर यह कहना कि 'विद्या कर्मका अंग नहीं है।' ठीक नहीं है। सम्बन्ध—इसके उत्तरमें सूत्रकार अपना मत व्यक्त करते हैं— अनुष्ठेयं बादरायणः साम्यश्रुतेः ॥ ३।४।१९॥ बादरायणः = व्यासदेव कहते हैं कि; अनुष्ठेयम् = गृहस्थकी ही भाँति अन्य आश्रमोंके धर्मोंका अनुष्ठान भी कर्तव्य है; साम्यश्रुतेः = क्योंकि श्रुतिमें समस्त आश्रमोंकी और उनके धर्मोंकी कर्तव्यताका समानरूपसे प्रतिपादन किया गया है। व्याख्या—जैमिनिके उक्त कथनका उत्तर देते हुए वेदव्यासजी कहते हैं—उक्त श्रुतिमें चारों आश्रमोंका अनुवाद है; परन्तु अनुवाद भी उसीका होता है, जो अन्यत्र विहित हो। दूसरी-दूसरी श्रुतियोंमें जैसे गृहस्थ-आश्रमका विधान प्राप्त होता है, उसी प्रकार अन्य आश्रमोंका विधान भी उपलब्ध होता है; इसमें कोई अन्तर नहीं है। अतः जिस प्रकार गृहस्थ-आश्रमके धर्मोंका अनुष्ठान उचित है, उसी प्रकार ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यासके धर्मोंका भी अनुष्ठान करना चाहिये। पूर्वपक्षीने जिन श्रुतियोंके द्वारा संन्यासका निषेध
३८२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
३८२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ सूचित किया है, उनका तात्पर्य दूसरा ही है। वहाँ अग्निहोत्रका त्याग न करनेपर जोर दिया गया है। यह बात उन्हीं लोगोंपर लागू होती है जो उसके अधिकारी हैं। गृहस्थ और वानप्रस्थ-आश्रमोंमें रहते हुए कभी अग्निहोत्रका त्याग नहीं करना चाहिये। यही बताना श्रुतिको अभीष्ट है। इस प्रकार संतान-परम्पराको उच्छेद न करनेका आदेश भी उन्हींके लिये है, जो पूर्णतः विरक्त नहीं हुए हैं। विरक्तके लिये तो तत्काल संन्यास लेनेका विधान श्रुतिमें स्पष्ट देखा जाता है। यथा—'यदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रव्रजेत्।' अर्थात् 'जिस दिन वैराग्य हो, उसी दिन संन्यास ले ले।' अतः संन्यासीका भी ब्रह्मविद्यामें अधिकार होनेके कारण विद्याको कर्मका अंग न मानना ही ठीक है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी सिद्धान्तको दृढ़ करते हैं— विधिर्वा धारणवत् ॥ ३।४।२० ॥ वा=अथवा; विधिः=उक्त मन्त्रमें अन्य आश्रमोंकी विधि ही माननी चाहिये, अनुवाद नहीं; धारणवत्=जैसे समिधा-धारण-सम्बन्धी वाक्यमें 'ऊपर धारण' की क्रियाको अनुवाद न मानकर विधि ही माना गया है। व्याख्या—जैसे—'अधस्तात् समिधं धारयन्ननुद्रवेदुपरि हि देवेभ्यो धारयति।' अर्थात् 'स्रुग्दण्डके नीचे समिधा-धारण करके अनुद्रवण करे, किंतु देवताओंके लिये ऊपर धारण करे।' इस वाक्यमें स्रुग्दण्डके अधोभागमें समिधा-धारणकी विधिके साथ एकवाक्यताकी प्रतीति होनेपर 'ऊपर धारण' की क्रियाको अपूर्व होनेके कारण विधि मान लिया गया है। उसी प्रकार पूर्वोक्त श्रुतिमें जो चारों आश्रमोंका सांकेतिक वर्णन है, उसे अनुवाद न मानकर विधि ही स्वीकार करना चाहिये। दूसरी श्रुतिमें आश्रमोंका विधान करनेवाले वचन स्पष्ट मिलते हैं। यथा—'ब्रह्मचर्यं परिसमाप्य गृही भवेत्। गृही भूत्वा वनी भवेत्। वनी भूत्वा प्रव्रजेत्। यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद् गृहाद् वा वनाद् वा। ......'यदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रव्रजेत्।' (जाबा० उ० ४) अर्थात् 'ब्रह्मचर्यको पूर्ण करके गृहस्थ होना चाहिये। गृहस्थको वानप्रस्थ होकर उसके बाद संन्यासी होना
उचित है। अथवा तीव्र इच्छा हो तो दूसरे प्रकारसे - ब्रह्मचर्यसे, गृहस्थसे या वानप्रस्थसे संन्यास ग्रहण कर लेना चाहिये। जिस दिन पूर्ण वैराग्य हो जाय, उसी दिन संन्यास ले लेना चाहिये।' इसी प्रकार अन्यान्य श्रुतियोंमें भी आश्रमोंके लिये विधि देखी जाती है। अतः जहाँ केवल सांकेतिकरूपसे आश्रमोंका वर्णन हो, वहाँ संकेतसे ही उनकी विधि भी मान लेनी चाहिये। यहाँ यह बात भी ध्यानमें रखनी चाहिये कि कर्मत्यागका निषेध करनेवाली जो श्रुति है, वह कर्मासक्त मनुष्योंके लिये ही है, विरक्तके लिये नहीं है। इस विवेचनसे यह सिद्ध हो गया कि कर्मोंके बिना केवल ज्ञानसे ही ब्रह्मप्राप्तिरूप परम पुरुषार्थकी सिद्धि होती है। सम्बन्ध - पूर्व प्रकरणमें संन्यास-आश्रमकी सिद्धि की गयी। अब यज्ञकर्मके अंगभूत उद्गीथ आदिमें की जानेवाली जो उपासना है, उसकी तथा उसके लिये बताये हुए गुणोंकी विधेयता सिद्ध करके विद्या कर्मोंका अंग नहीं है यह सिद्ध करनेके उद्देश्यसे अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है- स्तुतिमात्रमुपादानादिति चेन्नापूर्वत्वात् ॥ ३।४।२१॥ चेत् = यदि कहो; उपादानात् = उद्गीथ आदि उपासनाओंमें जो उनकी महिमाके सूचक वचन हैं, उनमें कर्मके अंगभूत उद्गीथ आदिको लेकर वैसा वर्णन किया गया है, इसलिये; स्तुतिमात्रम् = वह सब, केवल उनकी स्तुतिमात्र हैं; इति न = तो ऐसी बात नहीं है; अपूर्वत्वात् = क्योंकि वे उपासनाएँ और उनके रसतमत्व आदि गुण अपूर्व हैं। व्याख्या - यदि कहो कि 'यह जो उद्गीथ है वह रसोंका भी उत्तम रस है, परमात्माका आश्रयस्थान और पृथिवी आदि रसोंमें आठवाँ सर्वश्रेष्ठ रस है।' (छा० उ० १।१।३) इस प्रकारसे जो उद्गीथके विषयमें वर्णन है, वह केवल स्तुतिमात्र है; क्योंकि यज्ञके अंगभूत उद्गीथको लेकर ऐसा कहा गया है। इसी प्रकार सभी कर्मांगभूत उपासनाओंमें जिन-जिन विशेष गुणोंका वर्णन है वह सब उस-उस
३८४ वेदान्त-दर्शन [पाद ४
३८४ वेदान्त-दर्शन [पाद ४ अंगकी स्तुतिमात्र है, इसलिये विद्या कर्मका अंग है; तो यह कहना उचित नहीं है, क्योंकि वे उपासनाएँ और उनके सम्बन्धसे बनाये हुए गुण अपूर्व हैं। जो अन्य किसी प्रमाणसे प्राप्त न हो, उसे अपूर्व कहते हैं। इन उपासनाओं और उनके गुणोंका न तो अन्यत्र कहीं वर्णन है और न अनुमान आदिसे ही उनका ज्ञान होता है; अतः उन्हें अपूर्व माना गया है, इसलिये यह कथन स्तुतिके लिये नहीं किंतु उद्गीथ आदिको प्रतीक बनाकर उसमें उपास्यदेवकी भावना करनेके लिये स्पष्ट प्रेरणा देनेवाला विधिवाक्य है। अतः विद्या कर्मका अंग नहीं है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी बातको पुष्ट करते हैं— भावशब्दाच्च ॥ ३।४।२२॥ च=इसके सिवा; (उस प्रकरणमें) भावशब्दात्=इस प्रकार उपासना करनी चाहिये इत्यादि विधिवाचक शब्दोंका स्पष्ट प्रयोग होनेके कारण भी (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—केवल अपूर्व होनेसे ही उसे विधि-वाक्य माना जाता हो, ऐसी बात नहीं है। उस प्रकरणमें 'उद्गीथकी उपासना करनी चाहिये' (छा० उ० १।१।१) 'सामकी उपासना करनी चाहिये' (छा० उ० २।२।१) इत्यादि रूपसे अत्यन्त स्पष्ट विधिसूचक शब्दोंका प्रयोग भी है। जैसे उनकी अपूर्व विधि है, उसी प्रकार उन-उन उपासनाओंका अपूर्व फल भी बतलाया गया है (छा० उ० १।१।७; १।७।९ और २।२।३) इसलिये यह सिद्ध हुआ कि वह कथन कर्मके अंगभूत उद्गीथ आदिकी स्तुतिके लिये नहीं है, उनको प्रतीक बनाकर उपासनाका विधान करनेके लिये है और इसीलिये विद्या कर्मका अंग नहीं है। सम्बन्ध—भिन्न-भिन्न प्रकरणोंमें जो आख्यायिकाओंका (इतिहासोंका) वर्णन है, उसका क्या अभिप्राय है? इसका निर्णय करके विद्या कर्मका अंग नहीं है यह सिद्ध करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
सूत्र २३-२४ ] अध्याय ३ ३८५
सूत्र २३-२४ ] अध्याय ३ ३८५ पारिप्लवार्था इति चेन्न विशेषितत्वात् ॥ ३।४।२३॥ चेत् = यदि कहो; पारिप्लवार्थाः = उपनिषदोंमें वर्णित आख्यायिकाएँ पारिप्लव नामक कर्मके लिये हैं; इति न = तो यह ठीक नहीं है; विशेषितत्वात् = क्योंकि पारिप्लव-कर्ममें कुछ ही आख्यायिकाओंको विशेषरूपसे ग्रहण किया गया है। व्याख्या—'उपनिषदोंमें जो यम और नचिकेता, देवता और यक्ष, मैत्रेयी और याज्ञवल्क्य, प्रतर्दन और इन्द्र, जानश्रुति और रैक्व तथा याज्ञवल्क्य और जनक आदिकी कथाएँ आती हैं, वे यज्ञ-सम्बन्धी पारिप्लव नामक कर्मकी अंगभूत हैं; क्योंकि 'पारिप्लवमाचक्षीत' ('पारिप्लव' नामक वैदिक उपाख्यान कहे) इस विधि-वाक्यद्वारा श्रुतिमें उसका स्पष्ट विधान किया है। अश्वमेधयागमें जो रात्रिके समय कुटुम्बसहित बैठे हुए राजाको अध्वर्यु उपाख्यान सुनाता है, वही 'पारिप्लव' कहलाता है। इस पारिप्लव कर्मके लिये ही उपर्युक्त कथाएँ हैं। ऐसा यदि कोई कहे तो ठीक नहीं है; क्योंकि पारिप्लवका प्रकरण आरम्भ करके श्रुतिने 'मनुर्वैवस्वतो राजा' इत्यादि वाक्योंद्वारा कुछ विशेष उपाख्यानोंको ही वहाँ सुनानेयोग्य कहा है। उनमें ऊपर बतायी हुई उपनिषदोंकी कथाएँ नहीं आती हैं। अतः वे पारिप्लव- कर्मकी अंगभूत नहीं हैं। वे सब आख्यान ब्रह्मविद्याको भलीभाँति समझानेके लिये कहे हुए ब्रह्मविद्याके ही अंग हैं। इसीलिये इन सब आख्यानोंका विशेष माहात्म्य बतलाया गया है (क० उ० १।३।१६)। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी बातको दृढ़ करते हैं— तथा चैकवाक्यतोपबन्धात् ॥ ३।४।२४॥ तथा च = इस प्रकार उन आख्यायिकाओंको पारिप्लवार्थक न मानकर विद्याका ही अंग मानना चाहिये; एकवाक्यतोपबन्धात् = क्योंकि उन उपाख्यानोंकी वहाँ कही हुई विद्याओंके साथ एकवाक्यता देखी जाती है। व्याख्या—इस प्रकार उन कथाओंको पारिप्लवकर्मका अंग न मानकर
३८६ वेदान्त-दर्शन [पाद ४
३८६ वेदान्त-दर्शन [पाद ४ वहाँ कही हुई विद्याओंका ही अंग मानना उचित है; क्योंकि सन्निकट होनेसे इन विद्याओंके साथ ही इनका सम्बन्ध हो सकता है। विद्यामें रुचि उत्पन्न करने तथा परब्रह्मके स्वरूपका तत्त्व सरलतासे समझनेके लिये ही इन कथाओंका उपयोग किया गया है। इस प्रकार इनका उन प्रकरणोंमें वर्णित विद्याओंके साथ एकवाक्यता रूप सम्बन्ध है, इसलिये ये सब आख्यान ब्रह्मविद्याके ही अंग हैं, कर्मोंके नहीं; ऐसा मानना ही ठीक है। सम्बन्ध - यहाँतक यह बात सिद्ध की गयी कि ब्रह्मविद्या यज्ञादि कर्मोंका अंग नहीं है तथा वह स्वयं बिना किसी सहायताके परमपुरुषार्थको सिद्ध करनेमें समर्थ है। अब पुनः इसीका समर्थन करते हुए इस प्रकरणके अन्तमें कहते हैं— अतएव चाग्नीन्धनाद्यनपेक्षा ॥ ३।४।२५ ॥ च= तथा; अतएव = इसीलिये; अग्नीन्धनाद्यनपेक्षा= इस ब्रह्मविद्यारूप यज्ञमें अग्नि, समिधा, घृत आदि पदार्थोंकी आवश्यकता नहीं है। व्याख्या- यह ब्रह्मविद्यारूप यज्ञ अपना ध्येय सिद्ध करनेमें सर्वथा समर्थ है। यह पूर्ण होते ही स्वयं परमात्माका साक्षात्कार करा देता है। इसीलिये इस यज्ञमें अग्नि, समिधा, घृत आदि भिन्न-भिन्न पदार्थोंका विधान न करके केवल एक परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका ही प्रतिपादन किया गया है। श्रीमद्भगवद्गीतामें भी भगवान् श्रीकृष्णने इस बातका समर्थन इस प्रकार किया है— ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥ (४।२४) 'उस ब्रह्मचिन्तनरूप यज्ञमें भिन्न-भिन्न उपकरण और सामग्री आवश्यक नहीं होती, किंतु उसमें तो स्रुवा भी ब्रह्म है, हवि भी ब्रह्म है और ब्रह्मरूप अग्निमें ब्रह्मरूप होताद्वारा ब्रह्मरूप हवनक्रिया की जाती है, उस ब्रह्मचिन्तनरूप कर्ममें समाहित हुए साधकद्वारा जो प्राप्त किया जानेवाला फल है, वह भी ब्रह्म ही है।' इस प्रकार यह ब्रह्मविद्या उस परमपुरुषार्थकी सिद्धिमें सर्वथा स्वतन्त्र होनेके कारण कर्मकी अंगभूत नहीं हो सकती।
सूत्र २६ ] अध्याय ३ ३८७
सूत्र २६ ] अध्याय ३ ३८७ सम्बन्ध— यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि क्या ब्रह्मविद्याका किसी भी यज्ञ-यागादि अथवा शम-दमादि कर्मोंसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है, क्या इसमें किसी भी कर्मकी आवश्यकता नहीं है? अतः इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत् ॥ ३।४।२६॥ च = इसके सिवा; सर्वापेक्षा = विद्याकी उत्पत्तिके लिये समस्त वर्णा- श्रमोचित कर्मोंकी आवश्यकता है; यज्ञादिश्रुतेः = क्योंकि यज्ञादि कर्मोंको ब्रह्मविद्यामें हेतु बतानेवाली श्रुति है; अश्ववत् = जैसे घोड़ा योग्यतानुसार सवारीके काममें ही लिया जाता है, प्रासादपर चढ़नेके कार्यमें नहीं; उसी प्रकार कर्म विद्याकी उत्पत्तिके लिये अपेक्षित है, मोक्षके लिये नहीं। व्याख्या—'यह सर्वेश्वर है, यह समस्त प्राणियोंका स्वामी है' इत्यादि वचनोंसे परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन करके श्रुतिमें कहा है कि 'इस परमेश्वरको ब्राह्मणलोग निष्कामभावसे किये हुए स्वाध्याय, यज्ञ, दान और तपके द्वारा जाननेकी इच्छा करते हैं। इसीको जानकर मनुष्य मननशील होता है, इस संन्यासियोंके लोकको पानेकी इच्छासे मनुष्यगण संन्यास ग्रहण करते हैं।' इत्यादि (बृह० उ० ४।४।२२)। तथा दूसरी श्रुतिमें भी कहा है कि 'जिस परमपदका सब वेद बार-बार प्रतिपादन करते हैं; समस्त तप जिसका लक्ष्य कराते हैं अर्थात् जिसकी प्राप्तिके साधन हैं तथा जिसको चाहनेवाले लोग ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं, उस पदको मैं तुझे संक्षेपमें कहता हूँ' (क० उ० १।२।१५) इत्यादि। श्रुतिके इन वचनोंसे यह सिद्ध होता है कि परमात्माके तत्त्वको जाननेके लिये सभी वर्णाश्रमोचित कर्मोंकी आवश्यकता है। इसीलिये भगवान्ने भी गीता (१८।५-६) में कहा है— यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥
३८८ वेदान्त-दर्शन [पाद ४ एतान्यपि तु कर्माणि संगं त्यक्त्वा फलानि च। कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥ 'यज्ञ, दान और तप—ये कर्म त्याज्य नहीं हैं। इनका अनुष्ठान तो करना ही चाहिये; क्योंकि यज्ञ, दान और तप—ये मनीषी पुरुषोंको पवित्र करनेवाले हैं। अर्जुन! इनका तथा अन्य सब कर्मोंका भी अनुष्ठान फल और आसक्तिको त्यागकर ही करना चाहिये। यही मेरा निश्चित किया हुआ उत्तम मत है।' जिसका जैसा अधिकार है, उसीके अनुसार शास्त्रोंमें वर्ण और आश्रम-सम्बन्धी कर्म बताये गये हैं। अतः यह समझना चाहिये कि सभी कर्म सब साधकोंके लिये उपादेय नहीं होते, किंतु श्रुतिमें बतलाये हुए ब्रह्मप्राप्तिके साधनोंमेंसे जिस साधनको लेकर जो साधक अग्रसर हो रहा है, उसे अपने वर्ण, आश्रम और योग्यतानुसार अन्य शास्त्रविहित कर्मोंका अनुष्ठान भी निष्कामभावसे करते रहना चाहिये। इसी उद्देश्यसे श्रुतिमें विकल्प दिखलाया गया है कि कोई तो गृहस्थमें रहकर यज्ञ, दान और तपके द्वारा उसे प्राप्त करना चाहता है, कोई संन्यास-आश्रममें रहकर उसे जानना चाहता है, कोई ब्रह्मचर्यके पालनद्वारा उसे पाना चाहता है और कोई (वानप्रस्थमें रहकर) केवल तपस्यासे ही उसे पानेकी इच्छा रखता है, इत्यादि। इस प्रकार ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये कर्म अत्यन्त आवश्यक हैं, परंतु परमात्माकी प्राप्तिमें उनकी अपेक्षा नहीं है, ब्रह्मविद्यासे ही उस फलकी सिद्धि होती है। इसके लिये सूत्रकारने अश्वका दृष्टान्त दिया है। जैसे योग्यतानुसार घोड़ा सवारीके काममें लिया जाता है, प्रासादपर चढ़नेके कार्यमें नहीं, उसी प्रकार कर्म ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिमें सहायक है, ब्रह्मके साक्षात्कारमें नहीं। सम्बन्ध— परमात्माकी प्राप्तिके लिये क्या ऐसे विशेष साधन भी हैं, जो सभी वर्ण, आश्रम और योग्यतावाले साधकोंके लिये समानभावसे आवश्यक हों? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
सूत्र २७ ] अध्याय ३ ३८९
सूत्र २७ ] अध्याय ३ ३८९ शमदमाद्युपेतः स्यात्तथापि तु तद्विधेस्तदंगतया तेषामवश्यानुष्ठेयत्वात् ॥ ३ । ४ । २७ ॥ तथापि = अन्य कर्म आवश्यक न होनेपर भी (साधकको); शमदमा- द्युपेतः = शम, दम, तितिक्षा आदि गुणोंसे सम्पन्न; स्यात् = होना चाहिये; तु = क्योंकि; तदंगतया = उस ब्रह्मविद्याके अंगरूपसे; तद्विधेः = उन शम-दमादिका विधान होनेके कारण; तेषाम् = उनका; अवश्यानुष्ठेयत्वात् = अनुष्ठान अवश्य कर्तव्य है। व्याख्या — श्रुतिमें पहले ब्रह्मवेत्ताके महत्त्वका वर्णन करके कहा गया है कि 'यह ब्रह्मवेत्ताकी महिमा नित्य है। यह न कर्मोंसे बढ़ती है और न घटती है। इस महिमाको जानना चाहिये। ब्रह्मवेत्ताकी महिमाको जाननेवाला पापकर्मोंसे लिप्त नहीं होता, इसलिये इस महिमाको जाननेवाला साधक शान्त (अन्तःकरणका संयमी); दान्त (इन्द्रियोंका संयमी), उपरत, तितिक्षु और ध्यानमें स्थित होकर आत्मामें ही आत्माको देखता है।' (बृह० उ० ४ । ४ । २३) इस प्रकार श्रुतिमें परमात्माको जाननेकी इच्छावाले साधकके लिये शम-दमादि साधनोंका ब्रह्मविद्याके अंगरूपसे विधान है, इस कारण उनका अनुष्ठान करना साधकके लिये परम आवश्यक हो जाता है। अतएव जिस साधकके लिये वर्ण, आश्रमके यज्ञादि कर्म आवश्यक न हों, उसको भी इन शम, दम, तितिक्षा, ध्यानाभ्यास आदि साधनोंसे सम्पन्न अवश्य होना चाहिये। सूत्रमें आये हुए तथापि शब्दसे उपर्युक्त भाव तो निकलता ही है। उसके सिवा, यह भाव भी व्यक्त होता है कि अधिकांश साधकोंके लिये तो पूर्वसूत्रके कथनानुसार अपने-अपने वर्ण और आश्रमके लिये विहित सभी कर्म आवश्यक हैं, किंतु वैराग्य और उपरति आदि किसी विशेष कारणसे किसी-किसीके लिये अन्य कर्म आवश्यक न हो तो भी शम-दमादिका अनुष्ठान तो अवश्य होना चाहिये। सम्बन्ध — श्रुतिमें कहीं-कहीं यह वर्णन भी मिलता है कि प्राण-विद्याके
३९० वेदान्त-दर्शन [पाद ४
३९० वेदान्त-दर्शन [पाद ४ रहस्यको जाननेवालेके लिये कोई अन्न अभक्ष्य नहीं होता (छा० उ० ५।२। १), (बृह० उ० ६।१।१४)। इसलिये साधकको अन्नके विषयमें भक्ष्याभक्ष्यका विचार रखना चाहिये या नहीं ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— सर्वान्नानुमतिश्च प्राणात्यये तद्दर्शनात् ॥ ३।४।२८॥ सर्वान्नानुमतिः = सब प्रकारके अन्नको भक्षण करनेकी अनुमति; च=तो; प्राणात्यये = अन्न बिना प्राण न रहनेकी सम्भावना होनेपर ही है (सदा नहीं); तद्दर्शनात् =क्योंकि श्रुतिमें वैसा ही आचार देखा जाता है। व्याख्या—श्रुतिमें एक कथा आती है—किसी समय कुरुदेशमें टिड्डियोंके गिरने अथवा ओले पड़नेसे भारी अकाल पड़ गया। उस समय उषस्ति नामवाले एक विद्वान् ब्राह्मण अपनी पत्नी आटिकीके साथ इभ्य- ग्राममें रहते थे। वे दरिद्रताके कारण बड़े संकटमें थे। कई दिनोंसे भूखे रहनेके कारण उनके प्राण जानेकी सम्भावना हो गयी। तब वे एक महावतके पास गये। वह उड़द खा रहा था, उन्होंने उससे उड़द माँगा। महावतने कहा—'मेरे पास इतना ही है, इसे मैंने पात्रमें रखकर खाना आरम्भ कर दिया है, यह जूठा अन्न आपको कैसे दूँ?' उषस्ति बोले— 'इन्हींमेंसे मुझे दे दो।' महावतने वे उड़द उनको दे दिये और कहा, 'यह जल भी प्रस्तुत है, पी लीजिये।' उषस्तिने कहा—'नहीं, यह जूठा है, इससे जूठा पानी पीनेका दोष लगेगा।' यह सुनकर महावत बोला—'क्या ये उड़द जूठे नहीं थे?' उषस्तिने कहा—'इनको न खानेसे तो मेरा जीना असम्भव था, किंतु जल तो मुझे अन्यत्र भी इच्छानुसार मिल सकता है।' इत्यादि (छा० उ० १।१०।१ से ७ तक)। श्रुतिमें कही हुई इस कथाको देखनेसे यह सिद्ध होता है कि जिस समय अन्नके बिना मनुष्य जीवन धारण करनेमें असमर्थ हो जाय, प्राण बचनेकी आशा न रहे, ऐसी परिस्थितिमें ही अपवित्र या उच्छिष्ट अन्न भक्षण करनेके लिये शास्त्रकी सम्मति है, साधारण अवस्थामें नहीं; क्योंकि उड़द खानेके बाद उषस्तिने जल ग्रहण न करके इस बातको भली प्रकार स्पष्ट कर दिया है।
सूत्र २९-३० ] अध्याय ३ ३९१ अतएव वहाँ जो यह कहा है कि इस रहस्यको जाननेवालेके लिये कोई अभक्ष्य नहीं होता, उसका अभिप्राय प्राणविद्याके ज्ञानकी स्तुति करनेमें है, न कि अभक्ष्य-भक्षणके विधानमें; क्योंकि वैसा कहनेपर अभक्ष्यका निषेध करनेवाले शास्त्र-वचनोंसे विरोध होगा। इसलिये साधारण परिस्थितिमें मनुष्यको अपने आचार तथा आहारकी पवित्रताके संरक्षण-सम्बन्धी नियमका त्याग कदापि नहीं करना चाहिये। सम्बन्ध—दूसरी युक्तिसे पुनः इसी बातको पुष्ट करते हैं— अबाधाच्च ॥ ३।४।२९॥ अबाधात् = अन्य श्रुतिका बाध नहीं होना चाहिये, इस कारणसे; च = भी (यही सिद्ध होता है कि आपत्कालके सिवा, अन्य परिस्थितिमें आचारका त्याग नहीं करना चाहिये। व्याख्या—'आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः'—आहारकी शुद्धिसे अन्तः- करणकी शुद्धि होती है` (छा० उ० ७।२६।२), इत्यादि जो भक्ष्याभक्ष्यका विचार करनेवाले शास्त्र-वचन हैं, उनके साथ एकवाक्यता करनेके लिये उनका दूसरी श्रुतिके द्वारा बाध (विरोध) होना उचित नहीं है। इस कारणसे भी आपत्तिकालके सिवा, साधारण अवस्थामें भक्ष्याभक्ष्य-विचार एवं अभक्ष्यके त्यागरूप आचारका त्याग नहीं करना चाहिये। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे पुनः इसी बातको सिद्ध करते हैं— अपि च स्मर्यते ॥ ३।४।३०॥ अपि च = इसके सिवा; स्मर्यते = स्मृति भी इसी बातका समर्थन करती है। व्याख्या—मनुस्मृतिमें कहा है कि— जीवितात्ययमापन्नो योऽन्नमत्ति यतस्ततः। आकाशमिव पंकेन न स पापेन लिप्यते॥ 'जो मनुष्य प्राणसंकटमें पड़नेपर जहाँ-कहींसे भी अन्न लेकर
३९२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
३९२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ खा लेता है, वह उसी प्रकार पापसे लिप्त नहीं होता जैसे कीचड़से आकाश' (मनु० १०।१०४)। इस प्रकार जो स्मृति-वचन उपलब्ध होते हैं, उनसे भी यही सिद्ध होता है कि प्राण जानेकी परिस्थिति उत्पन्न न होनेतक आहार-शुद्धिसम्बन्धी सदाचारका परित्याग नहीं करना चाहिये। सम्बन्ध—अब श्रुति-प्रमाणसे भी अभक्ष्य-भक्षणका निषेध सिद्ध करते हैं— शब्दश्चातोऽकामकारे ॥ ३ । ४ । ३१ ॥ अकामकारे = इच्छानुसार अभक्ष्यभोजनके निषेधमें; शब्दः = श्रुतिप्रमाण; च = भी है; अतः = इसलिये (प्राणसंकटकी स्थिति आये बिना निषिद्ध अन्न-जलका ग्रहण नहीं करना चाहिये)। व्याख्या—इच्छानुसार अभक्ष्य-भक्षणका निषेध करनेवाली श्रुति भी है, * इसलिये यह सिद्ध हुआ कि जहाँ-कहीं श्रुतिमें ज्ञानकी विशेषता दिखलानेके लिये विद्वान्के सम्बन्धमें यह कहा है कि 'उसके लिये कुछ भी अभक्ष्य नहीं होता', वह केवल विद्याकी स्तुतिके लिये है। सिद्धान्त यही है कि जबतक प्राण जानेकी परिस्थिति न पैदा हो जाय, तबतक अभक्ष्य-त्यागसम्बन्धी सदाचारका त्याग नहीं करना चाहिये। सम्बन्ध—यहाँतक यह सिद्ध किया गया कि ज्ञानकी प्राप्ति हो जानेपर भी अभक्ष्य-त्याग आदिके आचारका पालन करना चाहिये। अब यह जिज्ञासा होती है कि ज्ञानीको कर्म करना चाहिये या नहीं? यदि करना चाहिये तो कौन-से कर्म करने चाहिये? अतः इसके निर्णयके लिये कहते हैं—
- स्तेनो हिरण्यस्य सुरां पिबँश्च गुरोस्तल्पमावसन् ब्रह्महा चैते पतन्ति चत्वारः पञ्चमश्चाचरँस्तैरिति ॥ (छा० उ० ५।१०।९) 'सुवर्ण चुरानेवाला, शराबी, गुरुपत्नीगामी तथा ब्रह्महत्यारा—ये चारों पतित होते हैं और पाँचवाँ उनके साथ संसर्ग रखनेवाला भी पतित होता है।' सुरा (मद्य) अभक्ष्य है। यहाँ इसे पीनेवालेको महापातकी बताकर उसके पानका निषेध किया गया है।
सूत्र ३२-३३ ] अध्याय ३ ३९३ विहितत्वाच्चाश्रमकर्मापि ॥ ३।४।३२॥ च=तथा; विहितत्वात्=शास्त्रविहित होनेके कारण; आश्रमकर्म=आश्रम- सम्बन्धी कर्मोंका; अपि=भी (अनुष्ठान करना चाहिये)। व्याख्या—ज्ञानीके द्वारा भी जिस प्रकार शरीर स्थितिके लिये उपयोगी भोजनादि कर्म तथा ब्रह्मविद्योपयोगी शम-दमादि कर्म लोकसंग्रहके लिये कर्तव्य हैं, उसी प्रकार जिस आश्रममें वह रहता हो, उस आश्रमके कर्म भी उसके लिये विहित हैं (बृह० उ० ४।४।२२)।* अतः उनका अनुष्ठान अवश्य करना चाहिये; इसीलिये भगवान्ने भी कहा है— ‘हे अर्जुन! जैसे अज्ञानी मनुष्य कर्मोंमें आसक्त होकर उनका अनुष्ठान करता है वैसे ही ज्ञानी भी लोकसंग्रहको चाहता हुआ बिना आसक्तिके उनका अनुष्ठान करे। (गीता ३।२५) सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी बातको दृढ़ करते हैं— सहकारित्वेन च॥ ३।४।३३॥ सहकारित्वेन=साधनमें सहायक होनेके कारण; च=भी (उनका अनुष्ठान लोकसंग्रहके लिये करना चाहिये)। व्याख्या—जिस प्रकार शम, दम, तितिक्षादि कर्म परमात्माकी प्राप्तिके साधनमें सहायक हैं, उसी प्रकार निष्कामभावसे किये जानेवाले शास्त्रविहित आश्रमसम्बन्धी आचार, व्यवहार आदि भी सहायक हैं। इसलिये उनका अनुष्ठान भी लोकसंग्रहके लिये अवश्य करना चाहिये, त्याग नहीं करना चाहिये। सम्बन्ध—यहाँतक यह सिद्ध किया गया कि ब्रह्मविद्याका अभ्यास करनेवाले साधकोंके लिये निष्कामभावसे और परमात्माको प्राप्त हुए महात्माओंके लिये लोकसंग्रहार्थ आश्रम-सम्बन्धी विहित कर्मोंका अनुष्ठान तथा खान- पानसम्बन्धी सदाचारका पालन आवश्यक है। अब परब्रह्म पुरुषोत्तमकी
- तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन।