वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 393, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें३९० वेदान्त-दर्शन [पाद ४ रहस्यको जाननेवालेके लिये कोई अन्न अभक्ष्य नहीं होता (छा० उ० ५।२। १), (बृह० उ० ६।१।१४)। इसलिये साधकको अन्नके विषयमें भक्ष्याभक्ष्यका विचार रखना चाहिये या नहीं ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— सर्वान्नानुमतिश्च प्राणात्यये तद्दर्शनात् ॥ ३।४।२८॥ सर्वान्नानुमतिः = सब प्रकारके अन्नको भक्षण करनेकी अनुमति; च=तो; प्राणात्यये = अन्न बिना प्राण न रहनेकी सम्भावना होनेपर ही है (सदा नहीं); तद्दर्शनात् =क्योंकि श्रुतिमें वैसा ही आचार देखा जाता है। व्याख्या—श्रुतिमें एक कथा आती है—किसी समय कुरुदेशमें टिड्डियोंके गिरने अथवा ओले पड़नेसे भारी अकाल पड़ गया। उस समय उषस्ति नामवाले एक विद्वान् ब्राह्मण अपनी पत्नी आटिकीके साथ इभ्य- ग्राममें रहते थे। वे दरिद्रताके कारण बड़े संकटमें थे। कई दिनोंसे भूखे रहनेके कारण उनके प्राण जानेकी सम्भावना हो गयी। तब वे एक महावतके पास गये। वह उड़द खा रहा था, उन्होंने उससे उड़द माँगा। महावतने कहा—'मेरे पास इतना ही है, इसे मैंने पात्रमें रखकर खाना आरम्भ कर दिया है, यह जूठा अन्न आपको कैसे दूँ?' उषस्ति बोले— 'इन्हींमेंसे मुझे दे दो।' महावतने वे उड़द उनको दे दिये और कहा, 'यह जल भी प्रस्तुत है, पी लीजिये।' उषस्तिने कहा—'नहीं, यह जूठा है, इससे जूठा पानी पीनेका दोष लगेगा।' यह सुनकर महावत बोला—'क्या ये उड़द जूठे नहीं थे?' उषस्तिने कहा—'इनको न खानेसे तो मेरा जीना असम्भव था, किंतु जल तो मुझे अन्यत्र भी इच्छानुसार मिल सकता है।' इत्यादि (छा० उ० १।१०।१ से ७ तक)। श्रुतिमें कही हुई इस कथाको देखनेसे यह सिद्ध होता है कि जिस समय अन्नके बिना मनुष्य जीवन धारण करनेमें असमर्थ हो जाय, प्राण बचनेकी आशा न रहे, ऐसी परिस्थितिमें ही अपवित्र या उच्छिष्ट अन्न भक्षण करनेके लिये शास्त्रकी सम्मति है, साधारण अवस्थामें नहीं; क्योंकि उड़द खानेके बाद उषस्तिने जल ग्रहण न करके इस बातको भली प्रकार स्पष्ट कर दिया है।