वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र २७ ] अध्याय ३ ३८९ शमदमाद्युपेतः स्यात्तथापि तु तद्विधेस्तदंगतया तेषामवश्यानुष्ठेयत्वात् ॥ ३ । ४ । २७ ॥ तथापि = अन्य कर्म आवश्यक न होनेपर भी (साधकको); शमदमा- द्युपेतः = शम, दम, तितिक्षा आदि गुणोंसे सम्पन्न; स्यात् = होना चाहिये; तु = क्योंकि; तदंगतया = उस ब्रह्मविद्याके अंगरूपसे; तद्विधेः = उन शम-दमादिका विधान होनेके कारण; तेषाम् = उनका; अवश्यानुष्ठेयत्वात् = अनुष्ठान अवश्य कर्तव्य है। व्याख्या — श्रुतिमें पहले ब्रह्मवेत्ताके महत्त्वका वर्णन करके कहा गया है कि 'यह ब्रह्मवेत्ताकी महिमा नित्य है। यह न कर्मोंसे बढ़ती है और न घटती है। इस महिमाको जानना चाहिये। ब्रह्मवेत्ताकी महिमाको जाननेवाला पापकर्मोंसे लिप्त नहीं होता, इसलिये इस महिमाको जाननेवाला साधक शान्त (अन्तःकरणका संयमी); दान्त (इन्द्रियोंका संयमी), उपरत, तितिक्षु और ध्यानमें स्थित होकर आत्मामें ही आत्माको देखता है।' (बृह० उ० ४ । ४ । २३) इस प्रकार श्रुतिमें परमात्माको जाननेकी इच्छावाले साधकके लिये शम-दमादि साधनोंका ब्रह्मविद्याके अंगरूपसे विधान है, इस कारण उनका अनुष्ठान करना साधकके लिये परम आवश्यक हो जाता है। अतएव जिस साधकके लिये वर्ण, आश्रमके यज्ञादि कर्म आवश्यक न हों, उसको भी इन शम, दम, तितिक्षा, ध्यानाभ्यास आदि साधनोंसे सम्पन्न अवश्य होना चाहिये। सूत्रमें आये हुए तथापि शब्दसे उपर्युक्त भाव तो निकलता ही है। उसके सिवा, यह भाव भी व्यक्त होता है कि अधिकांश साधकोंके लिये तो पूर्वसूत्रके कथनानुसार अपने-अपने वर्ण और आश्रमके लिये विहित सभी कर्म आवश्यक हैं, किंतु वैराग्य और उपरति आदि किसी विशेष कारणसे किसी-किसीके लिये अन्य कर्म आवश्यक न हो तो भी शम-दमादिका अनुष्ठान तो अवश्य होना चाहिये। सम्बन्ध — श्रुतिमें कहीं-कहीं यह वर्णन भी मिलता है कि प्राण-विद्याके