वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 394, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र २९-३० ] अध्याय ३ ३९१ अतएव वहाँ जो यह कहा है कि इस रहस्यको जाननेवालेके लिये कोई अभक्ष्य नहीं होता, उसका अभिप्राय प्राणविद्याके ज्ञानकी स्तुति करनेमें है, न कि अभक्ष्य-भक्षणके विधानमें; क्योंकि वैसा कहनेपर अभक्ष्यका निषेध करनेवाले शास्त्र-वचनोंसे विरोध होगा। इसलिये साधारण परिस्थितिमें मनुष्यको अपने आचार तथा आहारकी पवित्रताके संरक्षण-सम्बन्धी नियमका त्याग कदापि नहीं करना चाहिये। सम्बन्ध—दूसरी युक्तिसे पुनः इसी बातको पुष्ट करते हैं— अबाधाच्च ॥ ३।४।२९॥ अबाधात् = अन्य श्रुतिका बाध नहीं होना चाहिये, इस कारणसे; च = भी (यही सिद्ध होता है कि आपत्कालके सिवा, अन्य परिस्थितिमें आचारका त्याग नहीं करना चाहिये। व्याख्या—'आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः'—आहारकी शुद्धिसे अन्तः- करणकी शुद्धि होती है` (छा० उ० ७।२६।२), इत्यादि जो भक्ष्याभक्ष्यका विचार करनेवाले शास्त्र-वचन हैं, उनके साथ एकवाक्यता करनेके लिये उनका दूसरी श्रुतिके द्वारा बाध (विरोध) होना उचित नहीं है। इस कारणसे भी आपत्तिकालके सिवा, साधारण अवस्थामें भक्ष्याभक्ष्य-विचार एवं अभक्ष्यके त्यागरूप आचारका त्याग नहीं करना चाहिये। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे पुनः इसी बातको सिद्ध करते हैं— अपि च स्मर्यते ॥ ३।४।३०॥ अपि च = इसके सिवा; स्मर्यते = स्मृति भी इसी बातका समर्थन करती है। व्याख्या—मनुस्मृतिमें कहा है कि— जीवितात्ययमापन्नो योऽन्नमत्ति यतस्ततः। आकाशमिव पंकेन न स पापेन लिप्यते॥ 'जो मनुष्य प्राणसंकटमें पड़नेपर जहाँ-कहींसे भी अन्न लेकर