भारतकोश
संग्रह पर लौटें

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

१०६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

१०६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ 'न शूद्राय मतिं दद्यात्। (४।८०) अर्थात् 'शूद्रको वेदविद्याका ज्ञान नहीं देना चाहिये।' इसी प्रकार अन्य स्मृतियोंमें भी जगह-जगह शूद्रके लिये वेदके श्रवण, अध्ययन तथा अर्थज्ञानका निषेध किया गया है। इससे यही मानना चाहिये कि वेदविद्यामें शूद्रका अधिकार नहीं है। इतिहासमें जो विदुर आदि शूद्रजातीय सत्पुरुषोंको ज्ञान प्राप्त होनेकी बात पायी जाती है, उसका भाव यों समझना चाहिये कि इतिहास-पुराणोंको सुनने और पढ़नेमें चारों वर्णोंका समान रूपसे अधिकार है। इतिहास-पुराणोंके द्वारा शूद्र भी परमात्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार उसे भी भक्ति एवं ज्ञानका फल प्राप्त हो सकता है। फलप्राप्तिमें कोई विरोध नहीं है; क्योंकि भगवान्‌की भक्तिद्वारा परम गति प्राप्त करनेमें मनुष्यमात्रका अधिकार है (गीता ९। ३२)। सम्बन्ध— यहाँतकके प्रकरणमें प्रसंगवश प्राप्त हुए अधिकारविषयक वर्णनको पूरा करके यह सिद्धान्त स्थिर किया कि ब्रह्मविद्यामें देवादिका अधिकार है और शूद्रका अधिकार नहीं है। अब इस विषयको यहीं समाप्त करके पुनः पूर्वोक्त अंगुष्ठमात्र पुरुषके स्वरूपपर विचार किया जाता है— कम्पनात् ॥ १ । ३ । ३९ ॥ (पूर्वोक्त अंगुष्ठमात्र पुरुष परब्रह्म परमात्मा ही है;) कम्पनात्=क्योंकि उसीमें सम्पूर्ण जगत् चेष्टा करता है और उसीके भयसे सब काँपते हैं। व्याख्या—कठोपनिषद्के दूसरे अध्यायमें प्रथम वल्लीसे लेकर तृतीय वल्लीतक अंगुष्ठमात्र पुरुषका प्रकरण आया है (देखिये २।१।१२, १३ तथा २।३।१७ के मन्त्र)। यहाँ अंगुष्ठमात्र पुरुषके रूपमें वर्णित उस परम पुरुष परमात्माके प्रभावका वर्णन किया है तथा बादमें यह बात कही है कि— यदिदं किं च जगत् सर्वं प्राण एजति निःसृतम्। महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ (क० उ० २। ३। २) 'उस परमात्मासे निकला हुआ यह जो कुछ भी सम्पूर्ण जगत् है, वह

सूत्र ४० ] अध्याय १ १०७

सूत्र ४० ] अध्याय १ १०७ उस प्राणस्वरूप ब्रह्ममें ही चेष्टा करता है, उस उठे हुए वज्रके समान महान् भयानक सर्वशक्तिमान् परमेश्वरको जो जानते हैं वे अमर हो जाते हैं।' तथा— भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः। भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः॥ (क० उ० २। ३। ३) 'इसीके भयसे अग्नि तपता है, इसीके भयसे सूर्य तपता है, इसीके भयसे इन्द्र, वायु तथा पाँचवें मृत्यु देवता—ये सब अपने-अपने कार्यमें दौड़ रहे हैं।' इस वर्णनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि अंगुष्ठमात्र पुरुष ब्रह्म ही है; क्योंकि सम्पूर्ण जगत् जिसमें चेष्टा करता है अथवा जिसके भयसे कम्पित होकर सब देवता अपने-अपने कार्यमें संलग्न रहते हैं, वह न तो प्राणवायु हो सकता है और न इन्द्र ही। वायु और इन्द्र स्वयं ही उसकी आज्ञाका पालन करनेके लिये भयभीत रहते हैं। अतः यहाँ अंगुष्ठमात्र पुरुष ब्रह्म ही है, इसमें लेशमात्र भी संशयके लिये स्थान नहीं है। सम्बन्ध— इस पादके चौदहवें सूत्रसे लेकर तेईसवेंतक दहराकाशका प्रकरण चलता रहा। वहाँ यह बताया गया कि 'दहर' शब्द परब्रह्म परमात्माका वाचक है; फिर २४ वें सूत्रसे कठोपनिषद्में वर्णित अंगुष्ठमात्र पुरुषके स्वरूपपर विचार चल पड़ा; क्योंकि दहराकाशकी भाँति वह भी हृदयमें ही स्थित बताया गया है। उसी प्रकरणमें देवादिके वेदविद्यामें अधिकार-सम्बन्धी प्रासंगिक विषयपर विचार चल पड़ा और अड़तीसवें सूत्रमें वह प्रसंग समाप्त हुआ। फिर उनतालीसवें सूत्रमें पहलेके छोड़े हुए अंगुष्ठमात्र पुरुषके स्वरूपपर विचार किया गया। इस प्रकार बीचमें आये हुए प्रसंगान्तरोंपर विचार करके अब पुनः दहराकाशविषयक छूटे हुए प्रकरणपर विचार आरम्भ किया जाता है— ज्योतिर्दर्शनात् ॥ १। ३। ४० ॥ ज्योतिः = यहाँ 'ज्योति' शब्द परब्रह्मका ही वाचक है; दर्शनात् = क्योंकि श्रुतिमें (अनेक स्थलोंपर) ब्रह्मके अर्थमें 'ज्योतिः' शब्दका प्रयोग देखा जाता है।

१०८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

१०८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ व्याख्या-छान्दोग्योपनिषद्के अन्तर्गत दहराकाशविषयक प्रकरणमें यह कहा गया है कि 'य एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते।' (८।३।४) अर्थात् 'यह जो सम्प्रसाद (जीवात्मा) है, वह शरीरसे निकलकर परम ज्योतिको प्राप्त हो अपने स्वरूपसे सम्पन्न हो जाता है।' इस वर्णनमें जो 'ज्योतिः' शब्द आया है, वह परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है, क्योंकि श्रुतिमें अनेक स्थलोंपर ब्रह्मके अर्थमें 'ज्योतिः' शब्दका प्रयोग देखा जाता है। उदाहरणके लिये यह श्रुति उद्धृत की जाती है- 'अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते।' (छा० उ० ३।१३।७) अर्थात् 'इस द्युलोकसे परे जो परम ज्योति प्रकाशित हो रही है।' इसमें 'ज्योतिः' पद परमात्माके ही अर्थमें है; इसका निर्णय पहले किया जा चुका है। ऊपर दी हुई (८।३।४) श्रुतिमें 'ज्योतिः' पदका 'परम' विशेषण आया है; इससे भी यही सिद्ध होता है कि परब्रह्मको ही वहाँ 'परम ज्योति' कहा गया है। सम्बन्ध - उपर्युक्त सूत्रमें 'दहर' के प्रकरणमें आये हुए 'ज्योतिः' पदको परब्रह्मका वाचक बताकर उस प्रसंगको वहीं समाप्त कर दिया गया। अब यह जिज्ञासा होती है कि 'दहराकाश' के प्रकरणमें आया हुआ 'आकाश' शब्द परब्रह्मका वाचक हो, परंतु छान्दोग्य० (८।१४।१) - में जो 'आकाश' शब्द आया है, वह किस अर्थमें है? अतः इसका निर्णय करनेके लिये आगेका सूत्र प्रारम्भ करते हैं- आकाशोऽर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात् ॥ १ । ३ । ४१ ॥ आकाशः=(वहाँ) 'आकाश' शब्द परब्रह्मका ही वाचक है; अर्थान्तर- त्वादिव्यपदेशात्=क्योंकि उसे नाम-रूपमय जगत्से भिन्न वस्तु बताया गया है। व्याख्या - छान्दोग्योपनिषद् (८।१४।१)-में कहा गया है कि 'आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्ब्रह्म तदमृत ँस आत्मा।' अर्थात् 'आकाश नामसे प्रसिद्ध तत्त्व नाम और रूपका निर्वाह करनेवाला है, वे दोनों जिसके भीतर हैं, वह ब्रह्म है, वह अमृत है और वही आत्मा है।' इस प्रसंगमें 'आकाश' को नाम-रूपसे भिन्न तथा नाम-

सूत्र ४२ ] अध्याय १ १०९

सूत्र ४२ ] अध्याय १ १०९ रूपात्मक जगत्‌को धारण करनेवाला बताया गया है; इसलिये वह भूताकाश अथवा जीवात्माका वाचक नहीं हो सकता; क्योंकि भूताकाश तो स्वयं नाम-रूपात्मक प्रपंचके अन्तर्गत है और जीवात्मा सबको धारण करनेमें समर्थ नहीं है। इसलिये जो भूताकाशसहित समस्त जड-चेतनात्मक जगत्‌को अपनेमें धारण करनेवाला है, वह परब्रह्म परमात्मा ही यहाँ 'आकाश' नामसे कहा गया है। वहाँ जो ब्रह्म, अमृत और आत्मा- ये विशेषण दिये गये हैं, वे भी भूताकाश अथवा जीवात्माके उपयुक्त नहीं हैं; इसलिये उनसे भिन्न परब्रह्म परमात्माका ही वहाँ 'आकाश' नामसे वर्णन हुआ है। सम्बन्ध - यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि मुक्तात्मा जब ब्रह्मको प्राप्त होता है, उस समय उसमें ब्रह्मके सभी लक्षण आ जाते हैं। अतः यहाँ उसीको आकाश नामसे कहा गया है; ऐसा मान लें तो क्या हानि है? इसपर कहते हैं- सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर्भेदेन ॥ १। ३ । ४२ ॥ सुषुप्त्युत्क्रान्त्योः = सुषुप्ति तथा मृत्युकालमें भी; भेदेन = (जीवात्मा और परमात्माका) भेदपूर्वक वर्णन है (इसलिये 'आकाश' शब्द यहाँ परमात्माका ही बोधक है)। व्याख्या - छान्दोग्योपनिषद् (६।८।१)-में कहा है कि जिस अवस्थामें यह पुरुष सोता है, उस समय यह सत् (अपने कारण) -से सम्पन्न (संयुक्त) होता है। १ यह वर्णन सुषुप्तिकालका है। इसमें जीवात्माका 'पुरुष' नामसे और कारणभूत परमात्माका 'सत्' नामसे भेदपूर्वक उल्लेख हुआ है। इसी तरह उत्क्रान्तिका भी इस प्रकार वर्णन मिलता है - 'यह जीवात्मा इस शरीरसे निकलकर परमज्योतिः स्वरूप परमात्माको प्राप्त हो अपने शुद्धरूपसे सम्पन्न हो जाता है।' (छा० उ० ८।३।४) २ इसमें भी सम्प्रसाद नामसे जीवात्माका १-यह मन्त्र अर्थसहित पृष्ठ २९ में सूत्र १।१।९ की व्याख्यामें आ गया है। २-यह मन्त्र सूत्र १। ३। १९ की व्याख्या (पृष्ठ ९०) में आ गया है।

११० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ और 'परमज्योति' नामसे परमात्माका भेदपूर्वक निरूपण है। इस प्रकार सुषुप्ति और उत्क्रान्तिकालमें भी जीवात्मा और परमात्माका भेदपूर्वक वर्णन होनेसे उपर्युक्त 'आकाश' शब्द मुक्तात्माका वाचक नहीं हो सकता; क्योंकि मुक्तात्मामें ब्रह्मके सदृश कुछ सद्गुणोंका आविर्भाव होनेपर भी उसमें नाम-रूपात्मक जगत्को धारण करनेकी शक्ति नहीं आती। सम्बन्ध—उपर्युक्त कथनकी पुष्टिके लिये ही दूसरा हेतु उपस्थित करते हैं— पत्यादिशब्देभ्यः ॥ १ । ३ । ४३ ॥ पत्यादिशब्देभ्यः = उस परब्रह्मके लिये श्रुतिमें पति, परमपति, परममहेश्वर आदि विशेष शब्दोंका प्रयोग होनेसे भी (यह सिद्ध होता है कि जीवात्मा और परमात्मामें भेद है)। व्याख्या—श्वेताश्वतरोपनिषद् (६।७)-में परमात्माके स्वरूपका इस प्रकार वर्णन आया है— तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम्। पतिं पतीनां परमं परस्ताद् विदाम देवं भुवनेशमीड्यम्॥ 'ईश्वरोंके भी परम महेश्वर, देवताओंके भी परम देवता तथा पतियोंके भी परम पति, अखिल ब्रह्माण्डके स्वामी एवं स्तवन करनेयोग्य उस प्रकाशस्वरूप परमात्माको हमलोग सबसे परे जानते हैं।' इस मन्त्रमें देवता आदिकी कोटिमें जीवात्मा हैं और परम देवता, परम महेश्वर एवं परम पतिके नामसे परमात्माका वर्णन किया गया है। इससे भी यही निश्चय होता है कि जीवात्मा और परमात्मामें भेद है। इसलिये 'आकाश' शब्द परमात्माका ही वाचक है, मुक्त जीवका नहीं। तीसरा पाद सम्पूर्ण

चौथा पाद

चौथा पाद सम्बन्ध — पहलेके तीन पादोंमें ब्रह्मको जगत्के जन्म आदिका कारण बताकर वेदवाक्योंद्वारा वह बात प्रमाणित की गयी। श्रुतियोंमें जहाँ- जहाँ संदेह होता था, उन स्थलोंपर विचार करके उस संदेहका निवारण किया गया। आकाश, आनन्दमय, ज्योति, प्राण आदि जो शब्द या नाम ब्रह्मपरक नहीं प्रतीत होते थे; जीवात्मा या जडप्रकृतिके बोधक जान पड़ते थे, उन सबको परब्रह्म परमात्माका वाचक सिद्ध किया गया। प्रसंगवश आयी हुई दूसरी-दूसरी बातोंका भी निर्णय किया गया। अब यह जिज्ञासा होती है कि वेदमें कहीं प्रकृतिका वर्णन है या नहीं? यदि है तो उसका स्वरूप क्या माना गया है? इत्यादि। इन्हीं सब ज्ञातव्य विषयोंपर विचार करनेके लिये चतुर्थ पाद आरम्भ किया जाता है। कठोपनिषद्में 'अव्यक्त' नाम आया है; वहाँ 'अव्यक्तम्' पद प्रकृतिका वाचक है या अन्य किसीका? इस शंकाका निवारण करनेके लिये सूत्रकार कहते हैं— आनुमानिकमप्येकेषामिति चेन्न शरीररूपकविन्यस्त- गृहीतेर्दर्शयति च॥ १। ४। १॥ चेत्=यदि कहो; आनुमानिकम् = अनुमानकल्पित जडप्रकृति; अपि = भी; एकेषाम्=एक शाखावालोंके मतमें वेदप्रतिपादित है; इति न=तो यह कथन ठीक नहीं है; शरीररूपकविन्यस्तगृहीतेः = क्योंकि शरीर ही यहाँ रथके रूपकमें पड़कर 'अव्यक्त' शब्दसे गृहीत होता है; दर्शयति च=यही बात श्रुति दिखाती भी है। व्याख्या—यदि कहो कि कठोपनिषद् (१।३।११)-में जो 'अव्यक्तम्' पद आया है, वह अनुमानकल्पित या सांख्यप्रतिपादित प्रकृतिका वाचक है, तो यह ठीक नहीं है; क्योंकि आत्मा, शरीर, बुद्धि, मन, इन्द्रिय और विषय आदिकी जो रथ, रथी एवं सारथि आदिके रूपमें कल्पना की गयी है, उस कल्पनामें रथके स्थानपर शरीरको रखा गया है। उसीका नाम यहाँ

११२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४

११२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ ‘अव्यक्त’ है। यही बात उक्त प्रकरणमें प्रदर्शित है। भाव यह है कि कठोपनिषद्के इस रूपक-प्रकरणमें आत्माको रथी, शरीरको रथ, बुद्धिको सारथि, मनको लगाम, इन्द्रियोंको घोड़ा और विषयोंको उन घोड़ोंका चारा बताया गया है। इन उपकरणोंद्वारा परमपदस्वरूप परमेश्वरको ही प्राप्त करनेयोग्य कहा गया है। इस प्रकार पूरे रूपकमें सात वस्तुओंकी कल्पना हुई है। उन्हीं सातोंका वर्णन एकसे दूसरेको बलवान् बतानेमें भी होना चाहिये। वहाँ इन्द्रियोंकी अपेक्षा विषयोंको बलवान् बताया गया है। जैसे घास या चारा-दाना देखकर घोड़े हठात् उस ओर आकृष्ट होते हैं, उसी प्रकार इन्द्रियाँ भी हठात् विषयोंकी ओर खिंच जाती हैं। फिर विषयोंसे परे मनकी स्थिति कही गयी है; क्योंकि यदि सारथि लगामको खींचे रखे तो घोड़े चारा-दानाकी ओर हठात् नहीं जा सकते हैं। उसके बाद मनसे परे बुद्धिका स्थान माना गया है, वही सारथि है। लगामकी अपेक्षा सारथिको श्रेष्ठ बतलाना उचित ही है; क्योंकि लगाम सारथिके ही अधीन रहती है। बुद्धिसे परे महान् आत्मा है; यह ‘रथी’ के रूपमें कहा हुआ जीवात्मा ही होना चाहिये। ‘महान् आत्मा’ का अर्थ महत्तत्त्व मान लें तो इस रूपकमें दो दोष आते हैं। एक तो बुद्धिरूप सारथिके स्वामी रथी आत्माको छोड़ देना और दूसरा जिसका रूपकमें वर्णन नहीं है, उस महत्तत्त्वकी व्यर्थ कल्पना करना। अतः महान् आत्मा यहाँ रथीके रूपमें बताया हुआ जीवात्मा ही है। फिर महान् आत्मासे परे जो अव्यक्त कहा गया है, वह है भगवान्की शक्तिरूप प्रकृति। उसीका अंश कारणशरीर है। उसे ही इस प्रसंगमें रथका रूप दिया गया है। अन्यथा रूपकमें रथकी जगह बताया हुआ शरीर एकसे दूसरेको श्रेष्ठ बतानेकी परम्परामें छूट जाता है और अव्यक्त नामसे किसी अन्य तत्त्वकी अप्रासंगिक कल्पना करनी पड़ती है। अतः कारणशरीर भगवान्की प्रकृतिका अंश होनेसे उसे ही ‘अव्यक्त’ नामसे कहा गया है— सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि शरीरको ‘अव्यक्त’ कहना कैसे ठीक होगा; क्योंकि वह तो प्रत्यक्ष ही व्यक्त है। इसपर कहते हैं—

सूत्र २-३ ] अध्याय १ ११३

सूत्र २-३ ] अध्याय १ ११३ सूक्ष्मं तु तदर्हत्वात् ॥ १ । ४ । २ ॥ तु = किंतु; सूक्ष्मम् = (इस प्रकरणमें ‘शरीर’ शब्दसे) सूक्ष्म शरीर गृहीत होता है; तदर्हत्वात् = क्योंकि परमधामकी यात्रामें रथके स्थानमें उसीको मानना उचित है। व्याख्या—परमात्माकी शक्तिरूप प्रकृति सूक्ष्म है, वह देखने और वर्णन करनेमें नहीं आती, उसीका अंश कारणशरीर है, अतः उसको अव्यक्त कहना उचित ही है। इसके सिवा परमधामकी यात्रामें रथके स्थानमें सूक्ष्म शरीर ही माना जा सकता है, क्योंकि स्थूल तो यहीं रह जाता है।* सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जब प्रकृतिके अंशको ‘अव्यक्त’ नामसे स्वीकार कर लिया, तब सांख्यशास्त्रमें कहे हुए प्रधानको स्वीकार करनेमें क्या आपत्ति है ? सांख्यशास्त्र भी तो भूतोंके कारणरूप सूक्ष्म तत्त्वको ही ‘प्रधान’ या ‘प्रकृति’ कहता है। इसपर कहते हैं— तदधीनत्वादर्थवत् ॥ १ । ४ । ३ ॥ तदधीनत्वात् = उस परमात्माके अधीन होनेके कारण; अर्थवत् = वह (शक्तिरूपा प्रकृति) सार्थक है। व्याख्या—सांख्यमतावलम्बी प्रकृतिको स्वतन्त्र और जगत्का कारण मानते हैं; परंतु वेदका ऐसा मत नहीं है, वेदमें उस प्रकृतिको परब्रह्म परमेश्वरके ही अधीन रहनेवाली उसीकी एक शक्ति बताया गया है। शक्ति शक्तिमान्‌से भिन्न नहीं होती, अतः उसका स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं माना जाता। इस प्रकार परमात्माके अधीन उसीकी एक शक्ति होनेके कारण उसकी सार्थकता है, क्योंकि शक्ति होनेसे ही शक्तिमान् परमेश्वरके द्वारा जगत्की सृष्टि आदि कार्योंका होना सम्भव है। यदि परब्रह्म परमेश्वरको शक्तिहीन मान लिया जाय, तब वह इस जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्का कर्ता-धर्ता और संहर्ता कैसे हो

  • यह विषय सूत्र ४।२।५ से ४।२।११ तक विस्तारसे देखना चाहिये।

११४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४

११४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ सकता है? फिर तो उसे सर्वशक्तिमान् भी कैसे माना जा सकता है? श्वेताश्वतरोपनिषद्में स्पष्ट कहा गया है कि 'महर्षियोंने ध्यानयोगमें स्थित होकर परमात्मदेवकी स्वरूपभूता अचिन्त्य शक्तिका साक्षात्कार किया जो अपने गुणोंसे आवृत है।'१ वहीं यह भी कहा गया है कि उस परमेश्वरकी स्वाभाविक ज्ञान, बल और क्रियारूप शक्तियाँ नाना प्रकारकी सुनी जाती हैं।२ सम्बन्ध — वेदमें बतायी हुई प्रकृति सांख्योक्त प्रधान नहीं है, इस बातको दृढ़ करनेके लिये दूसरा कारण बताते हैं— ज्ञेयत्वावचनाच्च ॥ १ । ४ । ४ ॥ ज्ञेयत्वावचनात् = वेदमें प्रकृतिको ज्ञेय नहीं बताया गया है, इसलिये; च = भी (यह सांख्योक्त प्रधान नहीं है)। व्याख्या—सांख्यमतावलम्बी प्रकृतिको ज्ञेय मानते हैं। उनका कहना है कि 'गुणपुरुषान्तरज्ञानात् कैवल्यम्' अर्थात् 'गुणमयी प्रकृति और पुरुषका पार्थक्य जान लेनेसे कैवल्य (मोक्ष) प्राप्त होता है।' प्रकृतिके स्वरूपको अच्छी तरह जाने बिना उससे पुरुषका पार्थक्य (भेद) कैसे ज्ञात होगा, अतः उनके मतमें प्रकृति भी ज्ञेय है। परंतु वेदमें प्रकृतिको ज्ञेय अथवा उपास्य कहीं नहीं कहा गया है। वहाँ तो एकमात्र परब्रह्म परमेश्वरको ही जाननेयोग्य तथा उपास्य बताया गया है। इससे यही सिद्ध होता है कि वेदोक्त प्रकृति सांख्यवादियोंके माने हुए 'प्रधान' तत्त्वसे भिन्न है। सम्बन्ध — अपने मतकी पुष्टिके लिये सूत्रकार स्वयं ही शंका उठाकर उसका समाधान करते हैं— वदतीति चेन्न प्राज्ञो हि प्रकरणात् ॥ १ । ४ । ५ ॥ चेत् = यदि कहो; वदति = (वेद प्रकृतिको भी ज्ञेय) बताता है; इति न = तो १-'ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्।' (श्वेता० १।३) २-यह मन्त्र पृष्ठ २४ की टिप्पणीमें आ गया है।

सूत्र ६ ] अध्याय १ ११५

सूत्र ६ ] अध्याय १ ११५ ऐसा कहना ठीक नहीं है; हि=क्योंकि (वहाँ ज्ञेयतत्त्व); प्राज्ञः=परमात्मा ही है; प्रकरणात्=प्रकरणसे (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—कठोपनिषद्में जहाँ 'अव्यक्त' की चर्चा आयी है; उस प्रकरणके अन्त (१।३।१५)-में कहा गया है कि— अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत्। अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते॥ 'जो शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धसे रहित, अविनाशी, नित्य, अनादि, अनन्त, महत्से परे तथा ध्रुव (निश्चल) है, उस तत्त्वको जानकर मनुष्य मृत्युके मुखसे छूट जाता है।' 'इस मन्त्रमें ज्ञेयतत्त्वके जो लक्षण बताये गये हैं, वे सब सांख्योक्त प्रधानमें भी संगत होते हैं; अतः यहाँ प्रधानको ही ज्ञेय बताना सिद्ध होता है।' ऐसी बात यदि कोई कहे तो उसका यह कथन ठीक नहीं है; क्योंकि यहाँ परब्रह्म परमेश्वरके स्वरूपवर्णनका ही प्रकरण है; आगे-पीछे सब जगह उसीको जानने और प्राप्त करनेयोग्य बताया गया है। ऊपर जो मन्त्र उद्धृत किया गया है, उसमें बताये हुए सभी लक्षण परमात्मामें ही यथार्थरूपसे संगत होते हैं; अतः उसमें परमात्माके ही स्वरूपका वर्णन तथा उसे जाननेके फलका प्रतिपादन है, यह मानना पड़ेगा। इसलिये इस प्रकरणसे यही सिद्ध होता है कि श्रुतिमें परमात्माको ही जाननेके योग्य कहा गया है तथा उसीको जाननेका फल मृत्युके मुखसे छूटना बताया गया है। यहाँ प्रकृतिका वर्णन नहीं है। सम्बन्ध—कठोपनिषद्में अग्नि, जीवात्मा तथा परमात्मा—इन तीनका प्रकरण तो है ही; इसी प्रकार चौथे 'प्रधान' तत्त्वका भी प्रकरण मान लिया जाय तो क्या हानि है? इसपर कहते हैं— त्रयाणामेव चैवमुपन्यासः प्रश्नश्च॥ १।४।६॥ त्रयाणाम्=(इस उपनिषद्में) तीनका; एव=ही; एवम्=इस प्रकार ज्ञेय- रूपसे; उपन्यासः=उल्लेख हुआ है; च=तथा (इन्हीं तीनोंके सम्बन्धमें); प्रश्नः=प्रश्न; च=भी (किया गया) है।

११६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४

११६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ व्याख्या—कठोपनिषद्के प्रकरणमें नचिकेताने अग्नि, जीवात्मा और परमात्मा—इन्हीं तीनोंको जाननेके लिये प्रश्न किया है। अग्निविषयक प्रश्न इस प्रकार है—'स त्वमग्निँ स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि त्वँ श्रद्दधानाय मह्यम्।' (क० उ० १। १। १३) अर्थात् 'हे यमराज! आप स्वर्गकी प्राप्तिके साधनरूप अग्निको जानते हैं; अतः मुझ श्रद्धालुके लिये वह अग्निविद्या भलीभाँति समझाकर कहिये।' तदनन्तर जीव-विषयक प्रश्न इस प्रकार किया गया है—'येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके। एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहम्।' (क० उ० १। १। २०) अर्थात् "मरे हुए मनुष्यके विषयमें कोई तो कहता है, 'यह रहता है' और कोई कहता है 'नहीं रहता।' इस प्रकारकी यह शंका है, इसका निर्णय मैं आपके द्वारा उपदेश पाकर जानना चाहता हूँ।" तत्पश्चात् आगे चलकर परमात्माके विषयमें इस प्रकार प्रश्न उपस्थित किया गया है— अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात् कृताकृतात्। अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत् पश्यसि तद् वद॥ (क० उ० १। २। १४) 'जो धर्म और अधर्म दोनोंसे, कार्य-कारणरूप समस्त जगत्से एवं भूत, वर्तमान और भविष्यत्—इन तीन भेदोंवाले कालसे तथा तत्त्वसम्बन्धी समस्त पदार्थोंसे अलग है, ऐसे जिस तत्त्वको आप जानते हैं, उसीका मुझे उपदेश कीजिये।' —इस प्रकार इन तीनोंके विषयमें नचिकेताका प्रश्न है और प्रश्नके अनुसार ही यमराजका क्रमशः उत्तर भी है। अग्निविषयक प्रश्नका उत्तर क्रमशः १। १। १४ से १९ तकके मन्त्रोंमें दिया गया है। जीवविषयक प्रश्नका उत्तर पहले तो १। २। १८, १९ में, फिर २। २। ७ में दिया गया है। परमात्म- विषयक प्रश्नका उत्तर १। २। २० से लेकर ग्रन्थकी समाप्तितक दिया गया है। बीच-बीचमें कहीं जीवके स्वरूपका भी वर्णन हुआ है। परंतु 'प्रधान' के

सूत्र ७-८ ] अध्याय १ ११७

सूत्र ७-८ ] अध्याय १ ११७ विषयमें न तो कोई प्रश्न है और न उत्तर ही। इससे यह निश्चित होता है कि यहाँ उक्त तीनोंके सिवा चौथेका प्रसंग ही नहीं है। सम्बन्ध— जब प्रधानका वाचक 'अव्यक्त' शब्द उस प्रकरणमें पड़ा है तो उसे दूसरे अर्थमें कैसे लगाया जा सकता है? इसपर कहते हैं— महद्वच्च ॥ १ । ४ । ७ ॥ महद्वत् = 'महत्' शब्दकी भाँति; च=ही इसको भी दूसरे अर्थमें लेना अयुक्त नहीं है। व्याख्या—जिस प्रकार 'महत्' शब्द सांख्यशास्त्रमें महत्तत्त्वके लिये प्रयुक्त हुआ है, किंतु कठोपनिषद्में वही शब्द आत्माके अर्थमें प्रयुक्त है, उसी प्रकार 'अव्यक्त' शब्द भी दूसरे अर्थमें माना जाय तो कोई विरोध नहीं है। 'महत्' शब्दका प्रयोग जीवात्माके अर्थमें इस प्रकार आया है—'बुद्धेरात्मा महान् परः' (क० उ० १।३।१०) 'बुद्धिसे महान् आत्मा पर है।' यहाँ इसको बुद्धिसे परे बताया गया है, किंतु सांख्यमतमें बुद्धिका ही नाम महत्तत्त्व है। इसलिये यहाँ 'महत्' शब्द जीवात्माका वाचक है। इस प्रकार वेदोंमें जगह-जगह 'महत्' शब्दका प्रयोग सांख्यमतके विपरीत देखा जाता है, उसी प्रकार 'अव्यक्त' शब्दका अर्थ भी सांख्यमतसे भिन्न मानना अनुचित नहीं है, प्रत्युत उचित ही है। सम्बन्ध— 'इस प्रकरणमें आया हुआ 'अव्यक्त' शब्द यदि दूसरे अर्थमें मान लिया जाय तो भी श्वेताश्वतरोपनिषद्में 'अजा' शब्दसे अनादि प्रकृतिका वर्णन उपलब्ध होता है। वहाँ उसे श्वेत, लाल और काला—इन तीन वर्णोंवाली कहा गया है। इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि सांख्यशास्त्रोक्त त्रिगुणात्मिका प्रकृतिको ही वेदमें जगत्का कारण माना गया है।' ऐसा संदेह उपस्थित होनेपर कहते हैं— चमसवदविशेषात् ॥ १ । ४ । ८ ॥ ('अजा' शब्द वहाँ सांख्यशास्त्रोक्त प्रकृतिका ही वाचक है, यह सिद्ध

१९८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ नहीं होता; क्योंकि) अविशेषात् = किसी प्रकारकी विशेषताका उल्लेख न होनेसे; चमसवत् = 'चमस' की भाँति (उसे दूसरे अर्थमें भी लिया जा सकता है)। व्याख्या—श्वेताश्वतरोपनिषद् (१।९ तथा ४।५)-में जिस 'अजा'- का वर्णन है, उसका नाम चाहे जो रख लिया जाय, परंतु वास्तवमें वह परब्रह्मकी शक्ति है और उस ब्रह्मसे भिन्न नहीं है। उक्त उपनिषद्में यह स्पष्ट लिखा है कि 'ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन्देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्। यः कारणानि निखिलानि तानि कालात्मयुक्तान्यधितिष्ठत्येकः ॥' 'जगत्का कारण कौन है?' इसपर विचार करनेवाले उन महर्षियोंने ध्यानयोगमें स्थित होकर उस परमदेव परमेश्वरकी स्वरूपभूता अपने गुणोंसे छिपी हुई अचिन्त्यशक्तिको ही कारणरूपमें देखा और यह निश्चय किया कि जो परमदेव अकेला ही काल, स्वभाव आदिसे लेकर आत्मातक समस्त तत्त्वोंका अधिष्ठान है, जिसके आश्रयसे ही वे सब अपने-अपने स्थानमें कारण बनते हैं, वही परमात्मा इस जगत्का कारण है (१।३)। अतः यह सिद्ध होता है कि वेदमें 'अजा' नामसे जिस प्रकृतिका वर्णन हुआ है, वह भगवान्‌के अधीन रहनेवाली उन्हींकी अभिन्न-स्वरूपा अचिन्त्य- शक्ति है, सांख्यकथित स्वतन्त्र तत्त्वरूप प्रधान या प्रकृति नहीं। इसी बातको स्पष्ट करनेके लिये सूत्रमें कहा गया है कि जिस प्रकार 'चमस' शब्द रूढ़िसे सोमपानके लिये निर्मित पात्रविशेषका वाचक होनेपर भी बृहदारण्यकोपनिषद् (२।२।३)-में आये हुए 'अर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नः' इत्यादि मन्त्रमें वह 'शिर' के अर्थमें प्रयुक्त हुआ है; उसी प्रकार यहाँ 'अजा' शब्द भगवान्‌की स्वरूपभूता अनादि-अचिन्त्य शक्तिके अर्थमें है, ऐसा माननेमें कोई बाधा नहीं है, क्योकि यहाँ ऐसा कोई विशेष कारण नहीं दीखता, जिससे 'अजा' शब्दके द्वारा सांख्यकथित स्वतन्त्र प्रकृतिको ही ग्रहण किया जाय। सम्बन्ध—'अजा' शब्द जिस अर्थमें रूढ़ है, उसको न लेकर यहाँ दूसरा कौन-सा अर्थ लिया गया है? इस जिज्ञासापर कहते हैं—

सूत्र ९ ] अध्याय १ ११९

सूत्र ९ ] अध्याय १ ११९ ज्योतिरुपक्रमा तु तथा ह्यधीयत एके॥ १। ४ । ९॥ तु=निश्चय ही; ज्योतिरुपक्रमा=यहाँ 'अजा' शब्द तेज आदि त्रिविध तत्त्वोंकी कारणभूता परमेश्वरकी शक्तिका वाचक है; हि=क्योंकि; एके=एक शाखावाले; तथा=ऐसा ही; अधीयते=अध्ययन (वर्णन) करते हैं। व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद् (६। २। ३, ४)-में परमेश्वरसे उत्पन्न तेज आदि तत्त्वोंसे जगत्के विस्तारका वर्णन है। अतः यहाँ यही मानना ठीक है कि उनकी कारणभूता परमेश्वर-शक्तिको ही 'अजा' कहा गया है। छान्दोग्यमें बताया गया है कि 'उस परमेश्वरने विचार किया; 'मैं बहुत हो जाऊँ।' फिर उसने तेजको रचा, तत्पश्चात् तेजसे जल और जलसे अन्नकी उत्पत्ति कही गयी है। इसके बाद इनके तीन रूपोंका वर्णन है। अग्निमें जो लाल रंग है, वह तेजका है, जो सफेद रंग है, वह जलका है तथा जो काला रंग है, वह अन्न (पृथिवी)-का है।' इस प्रकार प्रत्येक वस्तुमें उक्त तेज आदि तीनों तत्त्वोंकी व्यापकताका वर्णन है (छा० उ० ६। ४। १ से ७ तक)। इसी तरह श्वेताश्वतरोपनिषद्में जो 'अजा' के तीन रंग बताये गये हैं, वे भी तेज आदिमें उपलब्ध होते हैं। अतः निश्चित रूपसे यह नहीं कहा जा सकता कि यहाँ अजाके नामसे प्रधानका ही वर्णन है। यदि प्रकृति या प्रधानका वर्णन मान लिया जाय तो भी यही मानना होगा कि वह उस परब्रह्मके अधीन रहनेवाली उसीकी अभिन्न शक्ति है, जो उक्त तेज आदि तीनों तत्त्वोंका भी कारण है। सांख्यशास्त्रोक्त प्रधानका वहाँ वर्णन नहीं है, क्योंकि श्वेताश्वतरोपनिषद् (१। १०)- में जहाँ उसका 'प्रधान' के नामसे वर्णन हुआ है, वहाँ भी उसको स्वतन्त्र नहीं माना है। अपितु क्षर-प्रधान अर्थात् भगवान्की शक्तिरूप अपरा प्रकृति, अक्षर-जीवात्मा अर्थात् भगवान्की परा प्रकृति-इन दोनोंको शासन करनेवाला उस परम पुरुष परमेश्वरको बताया है।* फिर

  • क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः। (श्वेता० १।१०)

१२० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ आगे चलकर स्पष्ट कर दिया है कि भोक्ता (अक्षरतत्त्व), भोग्य (क्षरतत्त्व) और उन दोनोंका प्रेरक ईश्वर—इन तीनों रूपोंमें ब्रह्म ही बताया गया है।* अतः ‘अजा’ शब्दका पर्याय ‘प्रधान’ होनेपर भी वह सांख्यशास्त्रोक्त ‘प्रधान’ नहीं है। अपितु परमेश्वरके अधीन रहनेवाली उसीकी एक शक्ति है। सम्बन्ध—‘‘अनादि ईश्वर-शक्तिको यहाँ ‘अजा’ कहा गया है; यह बात कैसे मानी जा सकती है; क्योंकि वह तो रूप आदिसे रहित है और यहाँ अजाके लाल, सफेद और काला—ये तीन रंगके रूप बताये गये हैं?’’ ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं— कल्पनोपदेशाच्च मध्वादिवदविरोधः ॥ १। ४। १० ॥ कल्पनोपदेशात् = जहाँ ‘अजा’ का रूपक मानकर उसके त्रिविध रूपकी कल्पनापूर्वक उपदेश किया गया है, इसलिये; च = भी; मध्वादिवत् = मधु आदिकी भाँति; अविरोधः = कोई विरोध नहीं है। व्याख्या—जैसे छान्दोग्य० (३।१)-में रूपककी कल्पना करते हुए, जो वास्तवमें मधु नहीं, उस सूर्यको मधु कहा गया है। बृहदारण्यकमें वाणीको; धेनु न होनेपर भी धेनु कहा गया है (बृह० उ० ९। ८। १), तथा द्युलोक आदिको अग्नि बताया गया है (बृह० उ० ६। २। ९)। इसी प्रकार यहाँ भी रूपककी कल्पनामें भगवान्‌की शक्तिभूता प्रकृतिको ‘अजा’ नाम देकर उसके लाल, सफेद और काले तीन रंग बताये गये हैं; इसलिये कोई विरोध नहीं है। जिज्ञासुको समझानेके लिये रूपककी कल्पना करके वर्णन करना उचित ही है। सम्बन्ध—‘‘पूर्व प्रकरणमें यह बात सिद्ध की गयी कि श्रुतिमें आया हुआ ‘अजा’ शब्द सांख्यशास्त्रोक्त त्रिगुणात्मिका प्रकृतिका वाचक नहीं, परब्रह्म परमात्माकी स्वरूपभूता अनादि शक्तिका वाचक है। किंतु दूसरी श्रुतिमें ‘पंचपंच’ यह संख्यावाचक शब्द पाया जाता है। इससे यह धारणा होती है कि यहाँ सांख्योक्त पचीस तत्त्वोंका ही समर्थन किया

  • भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत्॥ (श्वेता० १। १२)

गया है। ऐसी दशामें 'अजा' शब्द भी सांख्यसम्मत मूल प्रकृतिका ही वाचक क्यों न माना जाय?' इस शंकाका निराकरण करनेके लिये कहते हैं— न संख्योपसंग्रहादपि नानाभावादतिरेकाच्च ॥ १। ४। ११॥ संख्योपसंग्रहात् =(श्रुतिमें) संख्याका ग्रहण होनेसे; अपि=भी; न=वह (सांख्यमतोक्त तत्त्वोंकी) गणना नहीं है; नानाभावात्=क्योंकि वह संख्या दूसरे-दूसरे अनेक भाव व्यक्त करनेवाली है; च=तथा; अतिरेकात्=(वहाँ) उससे अधिकका भी वर्णन है। व्याख्या-बृहदारण्यकोपनिषद्में कहा गया है कि— यस्मिन् पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः। तमेव मन्य आत्मानं विद्वान् ब्रह्मामृतोऽमृतम् ॥ (४। ४। १७) 'जिसमें पाँच पंचजन और आकाश भी प्रतिष्ठित है, उसी आत्माको मृत्युसे रहित मैं विद्वान् अमृतस्वरूप ब्रह्म मानता हूँ।'-इस मन्त्रमें जो संख्यावाचक 'पंच-पंच' शब्द आये हैं, इनको लेकर पचीस तत्त्वोंकी कल्पना करना उचित नहीं है; क्योंकि यहाँ ये संख्यावाचक शब्द दूसरे- दूसरे भावको व्यक्त करनेवाले हैं। इसके सिवा, 'पंच-पंच' से पचीस संख्या माननेपर भी उक्त मन्त्रमें वर्णित आकाश और आत्माको लेकर सत्ताईस तत्त्व होते हैं; जो सांख्यमतकी निश्चित गणनासे अधिक हो जाते हैं। अतः यही मानना ठीक है कि वेदमें न तो सांख्यसम्मत स्वतन्त्र 'प्रधान' का वर्णन है और न पचीस तत्त्वोंका ही। जिस प्रकार श्वेताश्वतरोपनिषद्में 'अजा' शब्दसे उस परब्रह्म परमेश्वरकी अनादि शक्तिका वर्णन किया गया है, उसी प्रकार यहाँ 'पञ्च पञ्चजनाः' पदोंके द्वारा परमेश्वरकी विभिन्न कार्य-शक्तियोंका वर्णन है। सम्बन्ध—तब फिर यहाँ 'पञ्च पञ्चजनाः' पदोंके द्वारा किनका ग्रहण होता है? ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं—

१२२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४

१२२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ प्राणादयो वाक्यशेषात् ॥ १ । ४ । १२ ॥ वाक्यशेषात्=बादवाले मन्त्रमें कहे हुए वाक्यसे; प्राणादयः=(यहाँ) प्राण और इन्द्रियाँ ही ग्रहण करनेयोग्य हैं। व्याख्या-उपर्युक्त मन्त्रके बाद आया हुआ मन्त्र इस प्रकार है- ‘प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुरुत श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो ये मनो विदुः। ते निचिक्युर्ब्रह्म पुराणमग्र्यम् ॥' (४।४। १८) अर्थात् 'जो विद्वान् उस प्राणके प्राण, चक्षुके चक्षु, श्रोत्रके श्रोत्र तथा मनके भी मनको जानते हैं; वे उस आदि पुराण-पुरुष परमेश्वरको जानते हैं।' इस वर्णनसे यह सिद्ध होता है कि पूर्वमन्त्रमें ‘पञ्च पञ्चजनाः' पदोंके द्वारा पंच प्राण, पंच ज्ञानेन्द्रिय, पंच कर्मेन्द्रिय, मन तथा बुद्धि आदि परमेश्वरकी कार्यशक्तियोंका ही वर्णन है; क्योंकि उस ब्रह्मको ही उक्त मन्त्रमें प्राणका प्राण' चक्षुका चक्षु, श्रोत्रका श्रोत्र तथा मनका भी मन कहा गया है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि उस परब्रह्मके सम्बन्धसे ही प्राण आदि अपना कार्य करनेमें समर्थ होते हैं, इसलिये यहाँ इनके रूपमें उसीकी शक्तिविशेषका विस्तार बताया गया है। सम्बन्ध - "माध्यन्दिनी शाखावालोंके पाठके अनुसार 'प्राणस्य प्राणम्' इत्यादि मन्त्रमें अन्नका भी वर्णन होनेसे प्राण, चक्षु, श्रोत्र, मन और अन्नको लेकर पाँचकी संख्या पूर्ण हो जाती है; परंतु काण्वशाखाके मन्त्रमें 'अन्न' का वर्णन नहीं है; अतः वहाँ उस परमेश्वरकी पंचविध कार्यशक्तियोंकी संख्या कैसे पूरी होगी ?'' ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं- ज्योतिषैकेषामसत्यन्ने ॥ १ । ४ । १३ ॥ एकेषाम् = एक शाखावालोंके पाठमें; अन्ने = अन्नका वर्णन; असति = न होनेपर; ज्योतिषा = पूर्ववर्णित 'ज्योतिष' के द्वारा (संख्यापूर्ति की जा सकती है)। व्याख्या- 'माध्यन्दिनी' शाखावालोंके पाठके अनुसार इस मन्त्रमें ब्रह्मको 'प्राणका प्राण' आदि बताते हुए 'अन्नका अन्न' भी कहा गया है। अतः उनके पाठानुसार यहाँ पाँचकी संख्या पूर्ण हो जाती है। परंतु काण्वशाखा-

सूत्र १४ ] अध्याय १ १२३ वालोंके पाठमें 'अन्नस्य अन्नम्' इस अंशका ग्रहण नहीं हुआ है; अतः उनके अनुसार चारका ही वर्णन होनेपर पाँचकी संख्या-पूर्तिमें एककी कमी रह जाती है। अतः सूत्रकार कहते हैं कि काण्वशाखाके पाठमें अन्नका ग्रहण न होनेसे जो एककी कमी रहती है, उसकी पूर्ति ४।४।१६ के मन्त्रमें वर्णित 'ज्योति' के द्वारा कर लेनी चाहिये। वहाँ उस ब्रह्मको 'ज्योतिकी भी ज्योति' बताया गया है। सत्रहवें मन्त्रका वर्णन तो संकेतमात्र है, इसलिये उसमें पाँच संख्याकी पूर्ति करना आवश्यक नहीं है, तो भी ग्रन्थकारने किसी प्रकार भी प्रसंगवश उठनेवाली शंकाका निराकरण करनेके लिये यह सूत्र कहा है। सम्बन्ध — यहाँ यह शंका होती है कि 'श्रुतियोंमें जगत्‌के कारणका अनेक प्रकारसे वर्णन आया है। कहीं सत्‌से सृष्टि बतायी गयी है, कहीं असत्‌से तथा जगत्‌की उत्पत्तिके क्रममें भी भेद है। कहीं पहले आकाशकी उत्पत्ति बतायी है, कहीं तेजकी, कहीं प्राणकी और कहीं अन्य किसीकी। इस प्रकार वर्णनमें भेद होनेसे वेदवाक्योंद्वारा यह निश्चित नहीं किया जा सकता कि जगत्‌का कारण केवल परब्रह्म परमेश्वर ही है तथा सृष्टिका क्रम अमुक प्रकारका ही है।' इसपर कहते हैं— कारणत्वेन चाकाशादिषु यथाव्यपदिष्टोक्तेः ॥ १ । ४। १४॥ आकाशादिषु=आकाश आदि किसी भी क्रमसे रचे जानेवाले पदार्थोंमें; कारणत्वेन=कारणरूपसे; च=तो; यथाव्यपदिष्टोक्तेः=सर्वत्र एक ही वेदान्त-वर्णित ब्रह्मका प्रतिपादन किया गया है; इसलिये (परब्रह्म ही जगत्‌का कारण है)। व्याख्या — वेदमें जगत्‌के कारणोंका वर्णन नाना प्रकारसे किया गया है तथा जगत्‌की उत्पत्तिका क्रम भी अनेक प्रकारसे बताया गया है, तथापि केवल परब्रह्मको ही जगत्‌का कारण माननेमें कोई दोष नहीं है; क्योंकि जगत्‌के दूसरे कारण जो आकाश आदि कहे गये हैं, उनका भी परम कारण परब्रह्मको ही बताया गया है। इससे ब्रह्मकी ही कारणता सिद्ध होती है, अन्य किसीकी नहीं। जगत्‌की उत्पत्तिके क्रममें जो भेद आता है, वह इस प्रकार

१२४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४

१२४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ है—कहीं तो 'आत्मन् आकाशः सम्भूतः' (तै० उ० २। १) इत्यादि श्रुतिके द्वारा आकाश आदिके क्रमसे सृष्टि बतायी गयी है। कहीं 'तत्तेजोऽसृजत' (छा० उ० ६। २। ३) इत्यादि मन्त्रोंद्वारा तेज आदिके क्रमसे सृष्टिका प्रतिपादन किया गया है। कहीं 'स प्राणमसृजत' (प्र० उ० ६।४) इत्यादि वाक्योंद्वारा प्राण आदिके क्रमसे सृष्टिका वर्णन किया गया है। कहीं 'स इमाँल्लोकानसृजत। अम्भो मरीचीर्मरमापः' (ऐ० उ० १।१।२) इत्यादि वचनोंद्वारा बिना किसी सुव्यवस्थित क्रमके ही सृष्टिका वर्णन मिलता है। इस प्रकार सृष्टि-क्रमके वर्णनमें भेद होनेपर भी कोई दोषकी बात नहीं है, बल्कि इस प्रकार विचित्र रचनाका वर्णन तो ब्रह्मके महत्त्वका ही द्योतक है। कल्पभेदसे ऐसा होना सम्भव भी है। इसलिये ब्रह्मको ही जगत्का कारण बताना सर्वथा सुसंगत है। सम्बन्ध—"उपनिषदोंमें कहीं तो यह कहा है कि 'पहले एकमात्र असत् ही था' (तै० उ० २।७), कहीं कहा है 'पहले केवल सत् ही था' (छा० उ० ६।२।१), कहीं 'पहले अव्याकृत था' (बृह० उ० १।४।७) ऐसा वर्णन आता है। उपर्युक्त 'असत्' आदि शब्द ब्रह्मके वाचक कैसे हो सकते हैं?'' ऐसी शंका होनेपर कहते हैं— समाकर्षात् ॥ १। ४। १५॥ समाकर्षात्=आगे-पीछे कहे हुए वाक्यका पूर्णरूपसे आकर्षण करके उसके साथ सम्बन्ध जोड़ लेनेसे ('असत्' आदि शब्द भी ब्रह्मके ही वाचक सिद्ध होते हैं)। व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद्में जो यह कहा है कि 'असद्वा इदमग्र आसीत्। ततो वै सदजायत।' (२।७) अर्थात् 'पहले यह असत् ही था। इसीसे सत् उत्पन्न हुआ।' यहाँ 'असत्' शब्द अभाव या मिथ्याका वाचक नहीं है; क्योंकि पहले अनुवाकमें ब्रह्मका लक्षण बताते हुए उसे सत्य, ज्ञान और अनन्त कहा गया है। फिर उसीसे आकाश आदिके क्रमसे समस्त जगत्की उत्पत्ति बतायी है। तदनन्तर छठे अनुवाकमें 'सोऽकामयत' के 'सः'

सूत्र १५ ] अध्याय १ १२५

सूत्र १५ ] अध्याय १ १२५ पदसे उसी पूर्वानुवाकमें वर्णित ब्रह्मका आकर्षण किया गया है। तत्पश्चात् अन्तमें कहा गया है कि यह जो कुछ है, वह सत्य ही है—सत्यस्वरूप ब्रह्म ही है।' उसके बाद इसी विषयमें प्रमाणरूपमें श्लोक कहनेकी प्रतिज्ञा करके सातवें अनुवाकमें, 'असद् वा इदमग्र आसीत्' इत्यादि मन्त्र प्रस्तुत किया गया। इस प्रकार पूर्वापर-प्रसंगको देखते हुए इस मन्त्रमें आया हुआ 'असत्' शब्द मिथ्या या अभावका वाचक सिद्ध नहीं होता; अतः वहाँ 'असत्' का अर्थ 'अप्रकट ब्रह्म' और उससे होनेवाले 'सत्' का अर्थ जगत्-रूपमें 'प्रकट ब्रह्म' ही होगा। इसलिये यहाँ अर्थान्तरकी कल्पना अनावश्यक है। इसी प्रकार छान्दोग्योपनिषद्में भी जो यह कहा गया है कि 'आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशस्तस्योपव्याख्यानमसदेवेदमग्र आसीत्।' (छा० उ० ३।१९।१) अर्थात् 'आदित्य ब्रह्म है, यह उपदेश है, उसीका यह विस्तार है। पहले यह असत् ही था' इत्यादि। यहाँ भी तैत्तिरीयोपनिषद्की भाँति 'असत्' शब्द 'अप्रकट ब्रह्म' का ही वाचक है; क्योंकि इसी मन्त्रके अगले वाक्यमें 'तत्सदासीत्' कहकर उसका 'सत्' नामसे भी वर्णन आया है। इसके सिवा 'बृहदारण्यकोपनिषद्में स्पष्ट ही 'असत्' के स्थानमें 'अव्याकृत' शब्दका प्रयोग किया गया है। (बृह० उ० १।४।७) जो कि 'अप्रकट' का ही पर्याय है। अतः सब जगह पूर्वापरके प्रसंगमें कहे हुए शब्दों या वाक्योंका आकर्षण करके अन्वय करनेपर यही निश्चय होता है कि जगत्के कारणरूपसे भिन्न-भिन्न नामोंद्वारा उस पूर्णब्रह्म परमेश्वरका ही वर्णन है, अन्य किसीका नहीं। प्रकृति या प्रधानकी सार्थकता परमात्माकी एक शक्ति माननेसे ही हो सकती है; उनसे भिन्न स्वतन्त्र पदार्थान्तर माननेसे नहीं। सम्बन्ध—ब्रह्म ही सम्पूर्ण जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण है, जड प्रकृति जगत्का कारण नहीं हो सकती। यह दृढ़ करनेके लिये सूत्रकार कौषीतकि-उपनिषद्के प्रसंगपर विचार करते हुए कहते हैं—