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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

३८६ वेदान्त-दर्शन [पाद ४

३८६ वेदान्त-दर्शन [पाद ४ वहाँ कही हुई विद्याओंका ही अंग मानना उचित है; क्योंकि सन्निकट होनेसे इन विद्याओंके साथ ही इनका सम्बन्ध हो सकता है। विद्यामें रुचि उत्पन्न करने तथा परब्रह्मके स्वरूपका तत्त्व सरलतासे समझनेके लिये ही इन कथाओंका उपयोग किया गया है। इस प्रकार इनका उन प्रकरणोंमें वर्णित विद्याओंके साथ एकवाक्यता रूप सम्बन्ध है, इसलिये ये सब आख्यान ब्रह्मविद्याके ही अंग हैं, कर्मोंके नहीं; ऐसा मानना ही ठीक है। सम्बन्ध - यहाँतक यह बात सिद्ध की गयी कि ब्रह्मविद्या यज्ञादि कर्मोंका अंग नहीं है तथा वह स्वयं बिना किसी सहायताके परमपुरुषार्थको सिद्ध करनेमें समर्थ है। अब पुनः इसीका समर्थन करते हुए इस प्रकरणके अन्तमें कहते हैं— अतएव चाग्नीन्धनाद्यनपेक्षा ॥ ३।४।२५ ॥ च= तथा; अतएव = इसीलिये; अग्नीन्धनाद्यनपेक्षा= इस ब्रह्मविद्यारूप यज्ञमें अग्नि, समिधा, घृत आदि पदार्थोंकी आवश्यकता नहीं है। व्याख्या- यह ब्रह्मविद्यारूप यज्ञ अपना ध्येय सिद्ध करनेमें सर्वथा समर्थ है। यह पूर्ण होते ही स्वयं परमात्माका साक्षात्कार करा देता है। इसीलिये इस यज्ञमें अग्नि, समिधा, घृत आदि भिन्न-भिन्न पदार्थोंका विधान न करके केवल एक परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका ही प्रतिपादन किया गया है। श्रीमद्भगवद्गीतामें भी भगवान् श्रीकृष्णने इस बातका समर्थन इस प्रकार किया है— ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥ (४।२४) 'उस ब्रह्मचिन्तनरूप यज्ञमें भिन्न-भिन्न उपकरण और सामग्री आवश्यक नहीं होती, किंतु उसमें तो स्रुवा भी ब्रह्म है, हवि भी ब्रह्म है और ब्रह्मरूप अग्निमें ब्रह्मरूप होताद्वारा ब्रह्मरूप हवनक्रिया की जाती है, उस ब्रह्मचिन्तनरूप कर्ममें समाहित हुए साधकद्वारा जो प्राप्त किया जानेवाला फल है, वह भी ब्रह्म ही है।' इस प्रकार यह ब्रह्मविद्या उस परमपुरुषार्थकी सिद्धिमें सर्वथा स्वतन्त्र होनेके कारण कर्मकी अंगभूत नहीं हो सकती।

सूत्र २६ ] अध्याय ३ ३८७

सूत्र २६ ] अध्याय ३ ३८७ सम्बन्ध— यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि क्या ब्रह्मविद्याका किसी भी यज्ञ-यागादि अथवा शम-दमादि कर्मोंसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है, क्या इसमें किसी भी कर्मकी आवश्यकता नहीं है? अतः इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत् ॥ ३।४।२६॥ च = इसके सिवा; सर्वापेक्षा = विद्याकी उत्पत्तिके लिये समस्त वर्णा- श्रमोचित कर्मोंकी आवश्यकता है; यज्ञादिश्रुतेः = क्योंकि यज्ञादि कर्मोंको ब्रह्मविद्यामें हेतु बतानेवाली श्रुति है; अश्ववत् = जैसे घोड़ा योग्यतानुसार सवारीके काममें ही लिया जाता है, प्रासादपर चढ़नेके कार्यमें नहीं; उसी प्रकार कर्म विद्याकी उत्पत्तिके लिये अपेक्षित है, मोक्षके लिये नहीं। व्याख्या—'यह सर्वेश्वर है, यह समस्त प्राणियोंका स्वामी है' इत्यादि वचनोंसे परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन करके श्रुतिमें कहा है कि 'इस परमेश्वरको ब्राह्मणलोग निष्कामभावसे किये हुए स्वाध्याय, यज्ञ, दान और तपके द्वारा जाननेकी इच्छा करते हैं। इसीको जानकर मनुष्य मननशील होता है, इस संन्यासियोंके लोकको पानेकी इच्छासे मनुष्यगण संन्यास ग्रहण करते हैं।' इत्यादि (बृह० उ० ४।४।२२)। तथा दूसरी श्रुतिमें भी कहा है कि 'जिस परमपदका सब वेद बार-बार प्रतिपादन करते हैं; समस्त तप जिसका लक्ष्य कराते हैं अर्थात् जिसकी प्राप्तिके साधन हैं तथा जिसको चाहनेवाले लोग ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं, उस पदको मैं तुझे संक्षेपमें कहता हूँ' (क० उ० १।२।१५) इत्यादि। श्रुतिके इन वचनोंसे यह सिद्ध होता है कि परमात्माके तत्त्वको जाननेके लिये सभी वर्णाश्रमोचित कर्मोंकी आवश्यकता है। इसीलिये भगवान्ने भी गीता (१८।५-६) में कहा है— यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥

३८८ वेदान्त-दर्शन [पाद ४ एतान्यपि तु कर्माणि संगं त्यक्त्वा फलानि च। कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥ 'यज्ञ, दान और तप—ये कर्म त्याज्य नहीं हैं। इनका अनुष्ठान तो करना ही चाहिये; क्योंकि यज्ञ, दान और तप—ये मनीषी पुरुषोंको पवित्र करनेवाले हैं। अर्जुन! इनका तथा अन्य सब कर्मोंका भी अनुष्ठान फल और आसक्तिको त्यागकर ही करना चाहिये। यही मेरा निश्चित किया हुआ उत्तम मत है।' जिसका जैसा अधिकार है, उसीके अनुसार शास्त्रोंमें वर्ण और आश्रम-सम्बन्धी कर्म बताये गये हैं। अतः यह समझना चाहिये कि सभी कर्म सब साधकोंके लिये उपादेय नहीं होते, किंतु श्रुतिमें बतलाये हुए ब्रह्मप्राप्तिके साधनोंमेंसे जिस साधनको लेकर जो साधक अग्रसर हो रहा है, उसे अपने वर्ण, आश्रम और योग्यतानुसार अन्य शास्त्रविहित कर्मोंका अनुष्ठान भी निष्कामभावसे करते रहना चाहिये। इसी उद्देश्यसे श्रुतिमें विकल्प दिखलाया गया है कि कोई तो गृहस्थमें रहकर यज्ञ, दान और तपके द्वारा उसे प्राप्त करना चाहता है, कोई संन्यास-आश्रममें रहकर उसे जानना चाहता है, कोई ब्रह्मचर्यके पालनद्वारा उसे पाना चाहता है और कोई (वानप्रस्थमें रहकर) केवल तपस्यासे ही उसे पानेकी इच्छा रखता है, इत्यादि। इस प्रकार ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये कर्म अत्यन्त आवश्यक हैं, परंतु परमात्माकी प्राप्तिमें उनकी अपेक्षा नहीं है, ब्रह्मविद्यासे ही उस फलकी सिद्धि होती है। इसके लिये सूत्रकारने अश्वका दृष्टान्त दिया है। जैसे योग्यतानुसार घोड़ा सवारीके काममें लिया जाता है, प्रासादपर चढ़नेके कार्यमें नहीं, उसी प्रकार कर्म ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिमें सहायक है, ब्रह्मके साक्षात्कारमें नहीं। सम्बन्ध— परमात्माकी प्राप्तिके लिये क्या ऐसे विशेष साधन भी हैं, जो सभी वर्ण, आश्रम और योग्यतावाले साधकोंके लिये समानभावसे आवश्यक हों? इस जिज्ञासापर कहते हैं—

सूत्र २७ ] अध्याय ३ ३८९

सूत्र २७ ] अध्याय ३ ३८९ शमदमाद्युपेतः स्यात्तथापि तु तद्विधेस्तदंगतया तेषामवश्यानुष्ठेयत्वात् ॥ ३ । ४ । २७ ॥ तथापि = अन्य कर्म आवश्यक न होनेपर भी (साधकको); शमदमा- द्युपेतः = शम, दम, तितिक्षा आदि गुणोंसे सम्पन्न; स्यात् = होना चाहिये; तु = क्योंकि; तदंगतया = उस ब्रह्मविद्याके अंगरूपसे; तद्विधेः = उन शम-दमादिका विधान होनेके कारण; तेषाम् = उनका; अवश्यानुष्ठेयत्वात् = अनुष्ठान अवश्य कर्तव्य है। व्याख्या — श्रुतिमें पहले ब्रह्मवेत्ताके महत्त्वका वर्णन करके कहा गया है कि 'यह ब्रह्मवेत्ताकी महिमा नित्य है। यह न कर्मोंसे बढ़ती है और न घटती है। इस महिमाको जानना चाहिये। ब्रह्मवेत्ताकी महिमाको जाननेवाला पापकर्मोंसे लिप्त नहीं होता, इसलिये इस महिमाको जाननेवाला साधक शान्त (अन्तःकरणका संयमी); दान्त (इन्द्रियोंका संयमी), उपरत, तितिक्षु और ध्यानमें स्थित होकर आत्मामें ही आत्माको देखता है।' (बृह० उ० ४ । ४ । २३) इस प्रकार श्रुतिमें परमात्माको जाननेकी इच्छावाले साधकके लिये शम-दमादि साधनोंका ब्रह्मविद्याके अंगरूपसे विधान है, इस कारण उनका अनुष्ठान करना साधकके लिये परम आवश्यक हो जाता है। अतएव जिस साधकके लिये वर्ण, आश्रमके यज्ञादि कर्म आवश्यक न हों, उसको भी इन शम, दम, तितिक्षा, ध्यानाभ्यास आदि साधनोंसे सम्पन्न अवश्य होना चाहिये। सूत्रमें आये हुए तथापि शब्दसे उपर्युक्त भाव तो निकलता ही है। उसके सिवा, यह भाव भी व्यक्त होता है कि अधिकांश साधकोंके लिये तो पूर्वसूत्रके कथनानुसार अपने-अपने वर्ण और आश्रमके लिये विहित सभी कर्म आवश्यक हैं, किंतु वैराग्य और उपरति आदि किसी विशेष कारणसे किसी-किसीके लिये अन्य कर्म आवश्यक न हो तो भी शम-दमादिका अनुष्ठान तो अवश्य होना चाहिये। सम्बन्ध — श्रुतिमें कहीं-कहीं यह वर्णन भी मिलता है कि प्राण-विद्याके

३९० वेदान्त-दर्शन [पाद ४

३९० वेदान्त-दर्शन [पाद ४ रहस्यको जाननेवालेके लिये कोई अन्न अभक्ष्य नहीं होता (छा० उ० ५।२। १), (बृह० उ० ६।१।१४)। इसलिये साधकको अन्नके विषयमें भक्ष्याभक्ष्यका विचार रखना चाहिये या नहीं ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— सर्वान्नानुमतिश्च प्राणात्यये तद्दर्शनात् ॥ ३।४।२८॥ सर्वान्नानुमतिः = सब प्रकारके अन्नको भक्षण करनेकी अनुमति; च=तो; प्राणात्यये = अन्न बिना प्राण न रहनेकी सम्भावना होनेपर ही है (सदा नहीं); तद्दर्शनात् =क्योंकि श्रुतिमें वैसा ही आचार देखा जाता है। व्याख्या—श्रुतिमें एक कथा आती है—किसी समय कुरुदेशमें टिड्डियोंके गिरने अथवा ओले पड़नेसे भारी अकाल पड़ गया। उस समय उषस्ति नामवाले एक विद्वान् ब्राह्मण अपनी पत्नी आटिकीके साथ इभ्य- ग्राममें रहते थे। वे दरिद्रताके कारण बड़े संकटमें थे। कई दिनोंसे भूखे रहनेके कारण उनके प्राण जानेकी सम्भावना हो गयी। तब वे एक महावतके पास गये। वह उड़द खा रहा था, उन्होंने उससे उड़द माँगा। महावतने कहा—'मेरे पास इतना ही है, इसे मैंने पात्रमें रखकर खाना आरम्भ कर दिया है, यह जूठा अन्न आपको कैसे दूँ?' उषस्ति बोले— 'इन्हींमेंसे मुझे दे दो।' महावतने वे उड़द उनको दे दिये और कहा, 'यह जल भी प्रस्तुत है, पी लीजिये।' उषस्तिने कहा—'नहीं, यह जूठा है, इससे जूठा पानी पीनेका दोष लगेगा।' यह सुनकर महावत बोला—'क्या ये उड़द जूठे नहीं थे?' उषस्तिने कहा—'इनको न खानेसे तो मेरा जीना असम्भव था, किंतु जल तो मुझे अन्यत्र भी इच्छानुसार मिल सकता है।' इत्यादि (छा० उ० १।१०।१ से ७ तक)। श्रुतिमें कही हुई इस कथाको देखनेसे यह सिद्ध होता है कि जिस समय अन्नके बिना मनुष्य जीवन धारण करनेमें असमर्थ हो जाय, प्राण बचनेकी आशा न रहे, ऐसी परिस्थितिमें ही अपवित्र या उच्छिष्ट अन्न भक्षण करनेके लिये शास्त्रकी सम्मति है, साधारण अवस्थामें नहीं; क्योंकि उड़द खानेके बाद उषस्तिने जल ग्रहण न करके इस बातको भली प्रकार स्पष्ट कर दिया है।

सूत्र २९-३० ] अध्याय ३ ३९१ अतएव वहाँ जो यह कहा है कि इस रहस्यको जाननेवालेके लिये कोई अभक्ष्य नहीं होता, उसका अभिप्राय प्राणविद्याके ज्ञानकी स्तुति करनेमें है, न कि अभक्ष्य-भक्षणके विधानमें; क्योंकि वैसा कहनेपर अभक्ष्यका निषेध करनेवाले शास्त्र-वचनोंसे विरोध होगा। इसलिये साधारण परिस्थितिमें मनुष्यको अपने आचार तथा आहारकी पवित्रताके संरक्षण-सम्बन्धी नियमका त्याग कदापि नहीं करना चाहिये। सम्बन्ध—दूसरी युक्तिसे पुनः इसी बातको पुष्ट करते हैं— अबाधाच्च ॥ ३।४।२९॥ अबाधात् = अन्य श्रुतिका बाध नहीं होना चाहिये, इस कारणसे; च = भी (यही सिद्ध होता है कि आपत्कालके सिवा, अन्य परिस्थितिमें आचारका त्याग नहीं करना चाहिये। व्याख्या—'आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः'—आहारकी शुद्धिसे अन्तः- करणकी शुद्धि होती है` (छा० उ० ७।२६।२), इत्यादि जो भक्ष्याभक्ष्यका विचार करनेवाले शास्त्र-वचन हैं, उनके साथ एकवाक्यता करनेके लिये उनका दूसरी श्रुतिके द्वारा बाध (विरोध) होना उचित नहीं है। इस कारणसे भी आपत्तिकालके सिवा, साधारण अवस्थामें भक्ष्याभक्ष्य-विचार एवं अभक्ष्यके त्यागरूप आचारका त्याग नहीं करना चाहिये। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे पुनः इसी बातको सिद्ध करते हैं— अपि च स्मर्यते ॥ ३।४।३०॥ अपि च = इसके सिवा; स्मर्यते = स्मृति भी इसी बातका समर्थन करती है। व्याख्या—मनुस्मृतिमें कहा है कि— जीवितात्ययमापन्नो योऽन्नमत्ति यतस्ततः। आकाशमिव पंकेन न स पापेन लिप्यते॥ 'जो मनुष्य प्राणसंकटमें पड़नेपर जहाँ-कहींसे भी अन्न लेकर

३९२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४

३९२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ खा लेता है, वह उसी प्रकार पापसे लिप्त नहीं होता जैसे कीचड़से आकाश' (मनु० १०।१०४)। इस प्रकार जो स्मृति-वचन उपलब्ध होते हैं, उनसे भी यही सिद्ध होता है कि प्राण जानेकी परिस्थिति उत्पन्न न होनेतक आहार-शुद्धिसम्बन्धी सदाचारका परित्याग नहीं करना चाहिये। सम्बन्ध—अब श्रुति-प्रमाणसे भी अभक्ष्य-भक्षणका निषेध सिद्ध करते हैं— शब्दश्चातोऽकामकारे ॥ ३ । ४ । ३१ ॥ अकामकारे = इच्छानुसार अभक्ष्यभोजनके निषेधमें; शब्दः = श्रुतिप्रमाण; च = भी है; अतः = इसलिये (प्राणसंकटकी स्थिति आये बिना निषिद्ध अन्न-जलका ग्रहण नहीं करना चाहिये)। व्याख्या—इच्छानुसार अभक्ष्य-भक्षणका निषेध करनेवाली श्रुति भी है, * इसलिये यह सिद्ध हुआ कि जहाँ-कहीं श्रुतिमें ज्ञानकी विशेषता दिखलानेके लिये विद्वान्‌के सम्बन्धमें यह कहा है कि 'उसके लिये कुछ भी अभक्ष्य नहीं होता', वह केवल विद्याकी स्तुतिके लिये है। सिद्धान्त यही है कि जबतक प्राण जानेकी परिस्थिति न पैदा हो जाय, तबतक अभक्ष्य-त्यागसम्बन्धी सदाचारका त्याग नहीं करना चाहिये। सम्बन्ध—यहाँतक यह सिद्ध किया गया कि ज्ञानकी प्राप्ति हो जानेपर भी अभक्ष्य-त्याग आदिके आचारका पालन करना चाहिये। अब यह जिज्ञासा होती है कि ज्ञानीको कर्म करना चाहिये या नहीं? यदि करना चाहिये तो कौन-से कर्म करने चाहिये? अतः इसके निर्णयके लिये कहते हैं—

  • स्तेनो हिरण्यस्य सुरां पिबँश्च गुरोस्तल्पमावसन् ब्रह्महा चैते पतन्ति चत्वारः पञ्चमश्चाचरँस्तैरिति ॥ (छा० उ० ५।१०।९) 'सुवर्ण चुरानेवाला, शराबी, गुरुपत्नीगामी तथा ब्रह्महत्यारा—ये चारों पतित होते हैं और पाँचवाँ उनके साथ संसर्ग रखनेवाला भी पतित होता है।' सुरा (मद्य) अभक्ष्य है। यहाँ इसे पीनेवालेको महापातकी बताकर उसके पानका निषेध किया गया है।

सूत्र ३२-३३ ] अध्याय ३ ३९३ विहितत्वाच्चाश्रमकर्मापि ॥ ३।४।३२॥ च=तथा; विहितत्वात्=शास्त्रविहित होनेके कारण; आश्रमकर्म=आश्रम- सम्बन्धी कर्मोंका; अपि=भी (अनुष्ठान करना चाहिये)। व्याख्या—ज्ञानीके द्वारा भी जिस प्रकार शरीर स्थितिके लिये उपयोगी भोजनादि कर्म तथा ब्रह्मविद्योपयोगी शम-दमादि कर्म लोकसंग्रहके लिये कर्तव्य हैं, उसी प्रकार जिस आश्रममें वह रहता हो, उस आश्रमके कर्म भी उसके लिये विहित हैं (बृह० उ० ४।४।२२)।* अतः उनका अनुष्ठान अवश्य करना चाहिये; इसीलिये भगवान्ने भी कहा है— ‘हे अर्जुन! जैसे अज्ञानी मनुष्य कर्मोंमें आसक्त होकर उनका अनुष्ठान करता है वैसे ही ज्ञानी भी लोकसंग्रहको चाहता हुआ बिना आसक्तिके उनका अनुष्ठान करे। (गीता ३।२५) सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी बातको दृढ़ करते हैं— सहकारित्वेन च॥ ३।४।३३॥ सहकारित्वेन=साधनमें सहायक होनेके कारण; च=भी (उनका अनुष्ठान लोकसंग्रहके लिये करना चाहिये)। व्याख्या—जिस प्रकार शम, दम, तितिक्षादि कर्म परमात्माकी प्राप्तिके साधनमें सहायक हैं, उसी प्रकार निष्कामभावसे किये जानेवाले शास्त्रविहित आश्रमसम्बन्धी आचार, व्यवहार आदि भी सहायक हैं। इसलिये उनका अनुष्ठान भी लोकसंग्रहके लिये अवश्य करना चाहिये, त्याग नहीं करना चाहिये। सम्बन्ध—यहाँतक यह सिद्ध किया गया कि ब्रह्मविद्याका अभ्यास करनेवाले साधकोंके लिये निष्कामभावसे और परमात्माको प्राप्त हुए महात्माओंके लिये लोकसंग्रहार्थ आश्रम-सम्बन्धी विहित कर्मोंका अनुष्ठान तथा खान- पानसम्बन्धी सदाचारका पालन आवश्यक है। अब परब्रह्म पुरुषोत्तमकी

  • तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन।

३९४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४

३९४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ भक्तिके अंगभूत जो श्रवण, कीर्तन आदि कर्म हैं, उनका पालन किस परिस्थितिमें और किस प्रकार करना चाहिये? इसपर विचार करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— सर्वथापि त एवोभयलिङ्गात् ॥ ३।४।३४॥ अपि = किसी कारणसे कठिनता प्राप्त होनेपर भी; ते = वे भक्तिसम्बन्धी कर्म या भागवतधर्म तो; सर्वथा = सब प्रकारसे; एव = ही आचरणमें लानेयोग्य हैं; उभयलिङ्गात् = क्योंकि श्रुति और स्मृति दोनोंके निश्चयात्मक वर्णनरूप लिंग (लक्षण)-से यही सिद्ध होता है। व्याख्या—श्रुतिमें कहा है कि— तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः। नानुध्यायाद् बहून् शब्दान् वाचो विग्लापनँ हि तत्॥ 'बुद्धिमान् ब्राह्मणको चाहिये कि उस परब्रह्म पुरुषोत्तमके तत्त्वको समझकर उसीमें बुद्धिको प्रविष्ट करे, अन्य नाना प्रकारके व्यर्थ शब्दोंपर ध्यान न दे; क्योंकि वह तो केवल वाणीका अपव्ययमात्र है।' (बृ० उ० ४।४।२१) तथा— यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः। तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः॥ 'जिस परब्रह्म परमेश्वरमें स्वर्ग, पृथिवी, अन्तरिक्ष, मनसहित समस्त इन्द्रियाँ और प्राण स्थित हैं, उसी एक सबके आत्मा परमेश्वरको कहे हुए उपायोंद्वारा जानो, दूसरी बातोंको छोड़ो। यही अमृतस्वरूप परमात्माको पानेके लिये सेतुके सदृश सरल मार्ग है।' (मु० उ० २।२।५) इसी प्रकार श्रीमद्भागवतमें भी कहा है कि— शृण्वन्ति गायन्ति गृणन्त्यभीक्ष्णशः स्मरन्ति नन्दन्ति तवेहितं जनाः। त एव पश्यन्त्यचिरेण तावकं भवप्रवाहोपरमं पदाम्बुजम्॥

सूत्र ३५ ] अध्याय ३ ३९५

सूत्र ३५ ] अध्याय ३ ३९५ 'जो आपके भक्त आपके चरित्रोंको प्रतिक्षण सुनते हैं, गाते हैं और वर्णन करते हैं तथा उन्हींका स्मरण करके आनन्दित होते हैं, वे ही अविलम्ब आपके उन चरण-कमलोंका दर्शन करते हैं, जो जन्म-मरणरूप प्रवाहके नाशक हैं' (१ । ८ । ३६) । श्रीमद्भगवद्गीतामें भी कहा है— महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः । भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥ सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः । नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥ 'हे पार्थ! दैवी प्रकृतिमें स्थित हुए अनन्य मनवाले महात्मागण मुझे समस्त प्राणियोंका आदि और अविनाशी जानकर मेरा भजन करते हैं। वे यत्नशील दृढ़ निश्चयवाले भक्त निरन्तर मेरा कीर्तन और मुझे नमस्कार करते हुए, सदा मुझमें ही संलग्न रहकर प्रेमपूर्वक मेरी उपासना करते हैं।' (गीता ९। १३-१४) इत्यादि श्रुतियों और स्मृतियोंमें वर्णित लक्षणोंसे यही सिद्ध होता है कि आपत्तिकालमें किसी कारणवश वर्ण, आश्रम और शरीर-निर्वाहसम्बन्धी अन्य कर्मोंका पालन पूर्णतया न हो सके तो भी उन भगवदुपासनाविषयक श्रवण, कीर्तन आदि मुख्य धर्मोंका अनुष्ठान तो किसी भी प्रकारसे अवश्य करना ही चाहिये। भाव यह कि किसी भी अवस्थामें इनके अनुष्ठानमें शिथिलता नहीं आने देनी चाहिये। सम्बन्ध— उक्त धर्मानुष्ठानकी विशेषता दिखलाते हैं— अनभिभवं च दर्शयति ॥ ३।४।३५ ॥ (श्रुति इनका अनुष्ठान करनेवालेका) अनभिभवम् = पापोंसे अभिभूत न होना; च=भी; दर्शयति=दिखलाती है (इससे भी यह सिद्ध होता है कि इनका अनुष्ठान अवश्य करना चाहिये)। व्याख्या—श्रुतिने कहा है कि 'उस परमात्माको प्राप्त करनेवालेकी महिमाको जाननेवाले जिस साधकका मन शान्त है अर्थात् विषय-वासनासे

३९६ वेदान्त-दर्शन [पाद ४

३९६ वेदान्त-दर्शन [पाद ४ अभिभूत नहीं है, जिसकी इन्द्रियाँ वशमें की हुई हैं, जो अन्य सभी क्रिया- कलापसे उपरत है, सब प्रकारके शारीरिक और मानसिक सुख-दुःखोंको सहन करनेमें समर्थ-तितिक्षु है तथा परमात्माके स्मरणमें तल्लीन है, वह अपने हृदयमें स्थित उस आत्मस्वरूप परमेश्वरका साक्षात्कार करता है; अतः वह समस्त पापोंसे पार हो जाता है, उसे पाप ताप नहीं पहुँचा सकते; अपितु वही पापोंको संतप्त करता है।' इत्यादि (बृह० उ० ४।४।२३)। इस प्रकार श्रुतिमें भगवान्‌का भजन-स्मरण करनेवालेको पाप नहीं दबा सकते, यह बात कही गयी है। इसलिये यही सिद्ध होता है कि परमात्माकी प्राप्तिके लिये बतलाये हुए जो उपासनाविषयक श्रवण, कीर्तन और स्मरण आदि धर्म हैं, उनका अनुष्ठान तो प्रत्येक परिस्थितिमें करते ही रहना चाहिये। सम्बन्ध- प्रकारान्तरसे पुनः उपासनाविषयक कर्मानुष्ठानकी विशेषताका प्रतिपादन करते हैं- अन्तरा चापि तु तद्दृष्टेः ॥ ३ । ४ । ३६ ॥ तु=इसके सिवा; अन्तरा=आश्रमधर्मोंके अभावमें; च अपि=भी (केवल उपासनाविषयक अनुष्ठानसे परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है), तद्दृष्टेः=क्योंकि श्रुतिमें ऐसा विधान देखा जाता है। व्याख्या- श्वेताश्वतरोपनिषद् (१। १४)-में कहा है- स्वदेहमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम्। ध्याननिर्मथनाभ्यासाद् देवं पश्येन्निगूढवत् ॥ 'अपने शरीरको नीचेकी अरणि और प्रणवको ऊपरकी अरणि बनाकर ध्यानके द्वारा निरन्तर मन्थन करते रहनेसे साधक छिपी हुई अग्निकी भाँति हृदयमें स्थित परमदेव परमेश्वरको देखे।' इस कथनके पश्चात् उपर्युक्तरूपसे परमेश्वरमें ध्यानकी स्थितिके लिये प्रार्थना करने तथा उन्हीं परमात्माकी शरण ग्रहण करनेका भी वर्णन है (श्वेता० उ० २।१ से ५)। तदनन्तर यह कहा गया है कि 'हे साधक! सम्पूर्ण जगत्‌के उत्पादक सर्वान्तर्यामी परमेश्वरकी प्रेरणासे तुम्हें उन परब्रह्म

सूत्र ३७ ] अध्याय ३ ३९७

सूत्र ३७ ] अध्याय ३ ३९७ परमात्माकी सेवा-समाराधना करनी चाहिये। उन परमेश्वरकी ही शरण लेकर उन्हींमें अपने-आपको विलीन कर देना चाहिये। ऐसा करनेसे तुम्हारे पूर्वकृत समस्त संचित कर्म साधनमें विघ्नकारक नहीं होंगे' (श्वेता० उ० २।७)। इसके बाद इसका फल आत्मा और परमात्माके स्वरूपका साक्षात्कार बताया है (२।१४, १५)। इसी तरह अन्य श्रुतियोंमें भी केवल उपासनासे ही परमात्माकी प्राप्ति बतायी है। (श्वेता० उ० ४।१७ तथा ६।२३) इससे यह सिद्ध होता है कि जो अन्य वर्णाश्रमधर्मोंका पालन करनेमें असमर्थ हैं, उनको केवल उपासनाके धर्मोंका पालन करनेसे ही परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है। सम्बन्ध — इसी बातके समर्थनमें स्मृतिका प्रमाण देते हैं— अपि च स्मर्यते ॥ ३।४।३७॥ अपि च=इसके सिवा; स्मर्यते=स्मृतियोंमें भी यही बात कही गयी है। व्याख्या — गीता आदि स्मृतियोंमें जो वर्णाश्रमोचित कर्मके अधिकारी नहीं हैं, ऐसे पापयोनि चाण्डाल आदिको भी भगवान्‌की शरणागतिसे परमगतिकी प्राप्ति बतलायी गयी है (गीता ९।३२)। वहाँ भगवान्‌ने यह स्पष्ट कहा है कि 'मेरी प्राप्तिमें वेदाध्ययन, यज्ञानुष्ठान, दान तथा नाना प्रकारकी क्रिया और उग्र तप हेतु नहीं है, केवलमात्र अनन्यभक्तिसे ही मैं जाना, देखा और प्राप्त किया जा सकता हूँ' (११।४८, ५३, ५४)। इसी प्रकार श्रीमद्भागवत आदि ग्रन्थोंमें भी जगह-जगह इस बातका समर्थन किया गया है कि वर्ण और आश्रमकी मर्यादासे रहित मनुष्य केवल भक्तिसे पवित्र होकर परमात्माको प्राप्तकर लेता है। यथा — किरातहूणान्ध्रपुलिन्दपुल्कसा आभीरकंका यवनाः खसादयः। येऽन्ये च पापा यदुपाश्रयाश्रयाः शुद्ध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नमः ॥ 'किरात, हूण, आन्ध्र, पुलिन्द, पुल्कस, आभीर, कंक, यवन, खस आदि तथा अन्य जितने भी पापयोनिके मनुष्य हैं, वे सब जिनकी शरण लेनेसे शुद्ध

३९८ \t वेदान्त-दर्शन \t [ पाद ४

३९८ \t वेदान्त-दर्शन \t [ पाद ४ हो परमात्माको प्राप्त हो जाते हैं, उन सर्वसमर्थ भगवान्‌को नमस्कार है' (श्रीमद्भा० २। ४। १८)। इन सब वचनोंसे यह सिद्ध होता है कि उपासनासम्बन्धी धर्मोंका अनुष्ठान ही परम आवश्यक है। सम्बन्ध— अब भागवतधर्मानुष्ठानका विशेष माहात्म्य सिद्ध करते हैं— विशेषानुग्रहश्च ॥ ३।४।३८ ॥ च = इसके सिवा; विशेषानुग्रहः = भगवान्‌की भक्तिसम्बन्धी धर्मोंका पालन करनेसे भगवान्‌का विशेष अनुग्रह होता है। व्याख्या— ऊपर बतलायी हुई अन्य सब बातें तो भागवतधर्मकी विशेषतामें हेतु हैं ही। उनके सिवा, यह एक विशेष बात है कि अन्य किसी प्रकारके धर्म-कर्म आदिका आश्रय न लेकर जो अनन्य-भावसे केवल भगवान्‌की भक्तिका अनुष्ठान करता है,* उसको भगवान्‌की विशेष कृपा प्राप्त होती है। गीतामें भगवान्‌ने स्वयं कहा है कि 'उन भक्तोंके लिये मैं सुलभ हूँ' (गीता ८। १४)', 'उनका योग-क्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ' (९।२२)। भगवान्‌ने अपने भक्तोंका महत्त्व बतलाते हुए श्रीमद्भागवतमें यहाँतक कह दिया है कि 'मैं सदा भक्तोंके अधीन रहता हूँ' (९।४।६३)। इसके सिवा इतिहास, पुराण और स्मृतियोंमें यह वर्णन विशेषरूपसे पाया जाता है कि भक्तिका अनुष्ठान करनेवालोंपर भगवान्‌की विशेष कृपा होती है। यही कारण है कि भगवान्‌के इस भक्तवत्सल स्वभावको जाननेवाले निरन्तर उनके भजन, स्मरणमें ही लगे रहते हैं (गीता १५। १९) तथा वे भक्तजन मुक्तिका भी निरादर करके केवल भक्ति ही चाहते हैं।

  • भक्तिका वर्णन श्रीमद्भागवतमें इस प्रकार आया है— श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥ (७।५।२३) 'भगवान् विष्णुका श्रवण, कीर्तन, स्मरण, चरणसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन—ये भगवद्भक्तिके नौ भेद हैं।' (इन्हींको नवधा भक्ति कहते हैं।)

प्रतिपादन करते हैं—

सूत्र ३९ ] अध्याय ३ ३१९ सम्बन्ध—अब अन्य धर्मोंकी अपेक्षा भागवतधर्मोंकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन करते हैं— अतस्त्वितरज्याय्यो लिंगाच्च ॥ ३।४।३९ ॥ अतः=ऊपर बतलाये हुए इन सभी कारणोंसे (यह सिद्ध हुआ कि); इतरज्ज्यायः=अन्य सब धर्मोंकी अपेक्षा भगवान्‌की भक्तिविषयक धर्म श्रेष्ठ है; तु=इसके सिवा; लिंगात्=लक्षणोंसे (स्मृति-प्रमाणसे); च=भी (यही सिद्ध होता है)। व्याख्या—ऊपर बतलाये हुए कारणोंसे यह बात सिद्ध हो चुकी कि अन्य सभी प्रकारके धर्मोंसे भगवान्‌की भक्तिविषयक धर्म अधिक श्रेष्ठ है। इसके सिवा स्मृति-प्रमाणसे भी यही बात सिद्ध होती है। श्रीमद्भागवतमें कहा है— विप्राद् द्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभ- पादारविन्दविमुखाच्छ्वपचं वरिष्ठम्। मन्ये तदर्पितमनोवचनेहितार्थ- प्राणं पुनाति स कुलं न तु भूरिमानः॥ ‘बारह प्रकारके गुणोंसे युक्त ब्राह्मण भी यदि भगवान् पद्मनाभके चरण- कमलसे विमुख है तो उसकी अपेक्षा उस चाण्डालको मैं श्रेष्ठ मानता हूँ, जिसके मन, धन, वचन, कर्म और प्राण परमात्माको अर्पित हैं; क्योंकि वह भक्त चाण्डाल अपनी भक्तिके प्रतापसे सारे कुलको पवित्र कर सकता है, परंतु वह बहुत मानवाला ब्राह्मण ऐसा नहीं कर सकता।' (७।९।१०) अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान् यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्। तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते॥ ‘अहो! आश्चर्य है कि जिसकी जिह्वापर तुम्हारा पवित्र नाम रहता है, वह चाण्डाल भी श्रेष्ठ है; क्योंकि जो तुम्हारे नामका कीर्तन करते हैं, उन श्रेष्ठ

४०० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४

४०० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ पुरुषोंने तप, यज्ञ, तीर्थस्थान और वेदाध्ययन आदि सब कुछ कर लिये।' (श्रीमद्भा० ३।३३।७) इसी प्रकार जगह-जगह भगवान्‌के भक्तोंके लक्षण बतलाते हुए वर्ण- आश्रम आदिके धर्मका पालन करनेवालोंकी अपेक्षा उनकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन किया गया है। सम्बन्ध- इस प्रकार उपासनाविषयक श्रवण, कीर्तन आदि विशेष धर्मोंका महत्त्व दिखलाया गया। अब यह जिज्ञासा होती है कि यदि कोई मनुष्य किसी कारणवश आश्रमका व्यतिक्रम करना चाहे तो कर सकता है या नहीं? यदि कर ले तो उसका व्यक्तित्व कैसा माना जाना चाहिये? इत्यादि। अतः इस विषयका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं- तद्भूतस्य नातद्भावो जैमिनेरपि नियमात्- द्रूपाभावेभ्यः ॥ ३।४।४०॥ तद्भूतस्य = उच्च आश्रममें स्थित मनुष्यका; [तु =] तो; अतद्भावः = उसे छोड़कर पूर्व आश्रममें लौट आना; न=नहीं बन सकता; नियमात्- द्रूपाभावेभ्यः = क्योंकि शास्त्रोंमें पीछे न लौटनेका ही नियम है, श्रुतिमें आश्रम बदलनेका जो क्रम कहा गया है, उससे यह विपरीत है और इस प्रकारका शिष्टाचार भी नहीं है; जैमिनेः अपि = जैमिनि ऋषिकी भी यही सम्मति है। व्याख्या - जो चतुर्थ आश्रम ग्रहण कर चुके हैं, उनका पुनः गृहस्थाश्रममें लौटना शास्त्रसम्मत नहीं है। इसी प्रकार वानप्रस्थका भी पुनः गृहस्थमें प्रवेश उचित नहीं है; क्योंकि ऊँचे आश्रमोंमें जाकर पुनः लौटनेका श्रुति-स्मृतियोंमें निषेध है तथा आश्रम बदलनेका जो क्रम श्रुतिमें बताया गया है, वह इस प्रकार है- 'ब्रह्मचर्यं परिसमाप्य गृही भवेत्। गृही भूत्वा वनी भवेत्। वनी भूत्वा प्रव्रजेत्। यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद् गृहाद् वा वनाद् वा।'-'ब्रह्मचर्यको पूरा करके गृहस्थ होवे, गृहस्थसे वानप्रस्थ हो और वानप्रस्थसे संन्यास ले अथवा दूसरे प्रकारसे यानी ब्रह्मचर्यसे या गृहस्थसे

सूत्र ४१-४२ ] अध्याय ३ ४०१

सूत्र ४१-४२ ] अध्याय ३ ४०१ अथवा वानप्रस्थसे ही संन्यास ले' (जाबाल० उ० ४)। अतः पीछे लौटना उस क्रमसे विपरीत है। इसके सिवा इस प्रकारका शिष्टाचार भी नहीं है। इन सब कारणोंसे जैमिनि ऋषिकी भी यही सम्मति है कि उच्च आश्रमसे पुनः लौटना नहीं हो सकता। इसलिये यही सिद्ध हुआ कि वेद और स्मृतियोंमें जो एक आश्रमसे दूसरे आश्रममें प्रवेश करनेकी रीति बतायी गयी है, उसको छोड़कर आश्रमका व्यतिक्रम करना किसी प्रकार भी न्यायसंगत नहीं है। सम्बन्ध — इस प्रकारका मनुष्य प्रायश्चित्त कर लेनेपर तो शुद्ध हो जाता होगा ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— न चाधिकारिकमपि पतनानुमानात्तदयोगात् ॥ ३।४।४१ ॥ च=इसके सिवा; आधिकारिकम्=प्रायश्चित्तके अधिकारी अन्य आश्रम- वालोंके लिये जो प्रायश्चित्त बताया गया है, वह; अपि=भी; न=उसके लिये विहित नहीं है; पतनानुमानात्=क्योंकि स्मृतिमें उसका महान् पतन माना गया है; तदयोगात्=इसलिये वह प्रायश्चित्तके उपयुक्त नहीं रहा। व्याख्या—ब्रह्मचर्य-आश्रममें यदि ब्रह्मचारीका व्रत भंग हो जाय तो वेद और स्मृतियोंमें उसका प्रायश्चित्त बताया गया है (मनु० २।१८१) तथा गृहस्थ भी ऋतुकाल आदिका नियमपालन भंग कर दे तो उसका प्रायश्चित्त है; क्योंकि वे प्रायश्चित्तके अधिकारी हैं। परंतु जिन्होंने वानप्रस्थ या संन्यास आश्रम स्वीकार कर लिया, वे यदि पुनः गृहस्थ आश्रममें लौटकर स्त्री- प्रसंगादिमें प्रवृत्त होकर पतित हो गये हैं तो उनके लिये शास्त्रोंमें किसी प्रकारके प्रायश्चित्तका विधान नहीं है; क्योंकि स्मृतियोंमें उनका अतिशय पतन माना गया है। इसलिये वे प्रायश्चित्तके अधिकारी नहीं रहे। जैमिनि आचार्यकी भी सूत्रकारके मतानुसार यही सम्मति है कि उनके लिये प्रायश्चित्तका विधान नहीं है। सम्बन्ध—इसपर अन्य आचार्योंका मत बताते हैं— उपपूर्वमपि त्वेके भावमशनवत्तदुक्तम् ॥ ३ । ४ । ४२ ॥ एके=कई एक आचार्य; तु=तो; उपपूर्वम्=इसे उपपातक; अपि=भी

४०२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ मानते हैं, (इसलिये वे); अशनवत् = भोजनके नियमभंगके प्रायश्चित्तकी भाँति; भावम् = इसके लिये भी प्रायश्चित्तका भाव मानते हैं; तदुक्तम् = यह बात शास्त्रमें कही है (यह भी उनका कहना है)। व्याख्या—कई एक आचार्योंका कहना है कि जिस प्रकार ब्रह्मचारी अपने व्रतसे भ्रष्ट होकर प्रायश्चित्तका अधिकारी होता है, वैसे ही वानप्रस्थी और संन्यासियोंका भी प्रायश्चित्तमें अधिकार है; क्योंकि यह महापातक नहीं है, किंतु उपपातक है और उपपातकके प्रायश्चित्तका शास्त्रमें विधान है ही। अतः अभक्ष्य-भक्षण आदिके प्रायश्चित्तकी भाँति इसका भी प्रायश्चित्त अवश्य होना उचित है। सम्बन्ध—इसपर आचार्य अपनी सम्मति बताते हैं— बहिस्तूभयथापि स्मृतेराचाराच्च ॥ ३।४।४३॥ तु = किंतु; उभयथापि = दोनों प्रकारसे ही; बहिः = वह अधिकारसे बहिष्कृत है; स्मृतेः = क्योंकि स्मृतिप्रमाणसे; च = और; आचारात् = शिष्टाचारसे भी (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—वे उच्च आश्रमसे पतित हुए संन्यासी और वानप्रस्थी लोग महापातकी हों या उपपातकी, दोनों प्रकारसे ही शिष्ट सम्प्रदाय और वैदिक ब्रह्मविद्याके अधिकारसे सर्वथा बहिष्कृत हैं; क्योंकि स्मृतिप्रमाण और शिष्टोंके आचार-व्यवहारसे यही बात सिद्ध होती है। उनका पतन भोगोंकी आसक्तिसे ही होता है। अतः वे ब्रह्मविद्याके अधिकारी नहीं हैं। श्रेष्ठ पुरुष उनके साथ यज्ञ, स्वाध्याय और विवाह आदि सम्बन्ध भी नहीं करते हैं। सम्बन्ध—इस प्रकार उच्च आश्रमसे भ्रष्ट हुए द्विजोंका विद्यामें अधिकार नहीं है, यह सिद्ध किया गया। अब जो कर्मोंके अंगभूत उद्गीथ आदिमें उपासना की जाती है, उसका कर्ता यजमान होता है या कर्म करनेवाला ऋत्विक्—इसपर विचार करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है—

सूत्र ४४-४५ ] अध्याय ३ ४०३

सूत्र ४४-४५ ] अध्याय ३ ४०३ स्वामिनः फलश्रुतेरित्यात्रेयः ॥ ३ । ४ । ४४ ॥ स्वामिनः=उस उपासनामें यजमानका ही कर्तापन है; इति=ऐसा; आत्रेयः=आत्रेय मानते हैं; फलश्रुतेः=क्योंकि श्रुतिमें यजमानके लिये ही फलका वर्णन किया गया है। व्याख्या—आत्रेय ऋषि मानते हैं कि श्रुतिमें 'जो इस उपासनाको इस प्रकार जानता है, वह पुरुष वृष्टिमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करता है, उसके लिये वर्षा होती है, वह वर्षा करानेमें समर्थ होता है।' (छा० उ० २। ३।२) बृहदारण्यकोपनिषद्में प्रस्तोताद्वारा की जानेवाली अनेक प्रार्थनाओंका उल्लेख करके अन्तमें उद्गाताका कर्म बताते हुए कहा है कि 'उद्गाता अपने या यजमानके लिये जिसकी कामना करता है, उसका आगान करता है' (बृह० उ० १।३।३८)। इस प्रकार फलका वर्णन करनेवाली श्रुतियोंसे सिद्ध होता है कि यज्ञके स्वामीको उसका फल मिलता है, अतएव इन फल-कामनायुक्त उपासनाओंका कर्तापन भी स्वामीका अर्थात् यजमानका ही होना उचित है। सम्बन्ध — इसपर दूसरे आचार्यका मत कहते हैं- आर्त्विज्यमित्यौडुलोमिस्तस्मै हि परिक्रीयते ॥ ३ । ४ । ४५ ॥ आर्त्विज्यम्=कर्तापन ऋत्विक्का है; इति=ऐसा; औडुलोमिः=औडुलोमि आचार्य मानते हैं; हि=क्योंकि; तस्मै = उस कर्मके लिये, परिक्रीयते = वह ऋत्विक् यजमानद्वारा धनदानादिसे वरण कर लिया जाता है। व्याख्या- आचार्य औडुलोमि ऐसा मानते हैं कि कर्तापन यजमानका नहीं, किंतु ऋत्विक्का ही है; तथापि फल यजमानको मिलता है, क्योंकि वह ऋत्विक् उस कर्मके लिये यजमानके द्वारा धनदानादिसे वरण कर लिया जाता है। अतः वह दाताद्वारा दी हुई दक्षिणाका ही अधिकारी है; उसका फलमें अधिकार नहीं है। सम्बन्ध - सूत्रकार श्रुतिप्रमाणसे अपनी सम्मति प्रकट करते हैं-

४०४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४

४०४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ श्रुतेश्च ॥ ३ । ४ । ४६ ॥ श्रुतेः=श्रुतिप्रमाणसे; च=भी (औडुलोमिका ही मत उचित सिद्ध होता है) । व्याख्या—यज्ञका ऋत्विक् जो कुछ भी कामना करता है, वह निःसंदेह यजमानके लिये ही करता है (शत० १।३।१।१६), इसलिये इस प्रकार जाननेवाला उद्गाता यजमानसे कहे कि 'मैं तेरे लिये किन-किन भोगोंका आगान करूँ' (छा० उ० १।७।८) इत्यादि श्रुतियोंसे भी कर्मका कर्तापन ऋत्विक्का और फलमें अधिकार यजमानका सिद्ध होता है। सम्बन्ध—इस प्रकार प्रसंगानुसार सकाम उपासनाके फल और कर्तापनका निर्णय किया गया। अब ब्रह्मविद्याका अधिकार किसी एक ही आश्रममें है या सभी आश्रमोंमें? इस बातका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— सहकार्यन्तरविधिः पक्षेण तृतीयं तद्वतो विध्यादिवत् ॥ ३ । ४ । ४७ ॥ तद्वतः=ब्रह्मविद्यासम्बन्धी साधनयुक्त साधकके लिये; तृतीयम्= बालकपन और पाण्डित्यके साथ कहा हुआ जो तीसरा मौन साधन है, वह विधेय है; सहकार्यन्तरविधिः=(क्योंकि) उसका दूसरे सहकारी साधनके रूपमें विधान है; विध्यादिवत्=दूसरे स्थलमें कहे हुए विधिवाक्योंकी भाँति; पक्षेण=एक पक्षको लेकर यह भी विधि है। व्याख्या—कहोलने याज्ञवल्क्यसे साक्षात् परब्रह्मका स्वरूप पूछा; उसके उत्तरमें याज्ञवल्क्यने सबके अन्तरात्मा परमात्माका स्वरूप संकेतसे बताकर कहा कि 'जो शोक, मोह, भूख, प्यास, बुढ़ापा और मृत्युसे अतीत है, वह परमात्मा है, ऐसे इस परमात्माको जानकर ब्राह्मण पुत्रकामना, धन- कामना तथा मान-बड़ाई और स्वर्गसम्बन्धी लोककामनासे विरक्त होकर भिक्षासे निर्वाह करनेवाले मार्गसे विचरता है।' इसके बाद इन तीनों कामनाओंकी एकता करके कामनामात्रको त्याज्य बताया और अन्तमें कहा कि 'वह ब्राह्मण उस पाण्डित्यको भलीभाँति समझकर बाल्यभावसे

सूत्र ४८ ] अध्याय ३ ४०५

सूत्र ४८ ] अध्याय ३ ४०५ स्थित रहनेकी इच्छा करे, फिर उससे भी उपरत होकर मुनि हो जाय, फिर वह मौन और अमौन—दोनोंसे उपरत होकर ब्राह्मण हो जाता है अर्थात् ब्रह्मको भलीभाँति प्राप्त हो जाता है' इत्यादि (बृह० उ० ३।५।१)। इस प्रकरणमें संन्यास-आश्रममें परमात्माकी प्राप्तिका वर्णन किया गया। इस वर्णनमें पाण्डित्य और बाल्यभावके अन्तमें तो 'तिष्ठासेत्' (स्थित रहनेकी इच्छा करे) यह विधिवाक्य है, परंतु मुनि शब्दके बाद कोई विधि नहीं है, इसलिये सूत्रकारका कहना है कि जिस प्रकार अन्यत्र कहे हुए वचनोंमें स्पष्ट विधिका प्रयोग न होनेपर सहकारीभावसे एकके लिये प्रयुक्त विधिवाक्य दूसरेके लिये भी मान लिये जाते हैं, वैसे ही यहाँ भी पाण्डित्य और बाल्यभाव—इन दो सहकारी साधनोंसे युक्त साधकके प्रति उनके साथ कहे हुए इस तीसरे साधन मुनिभावके लिये भी विधिवाक्यका प्रयोग पक्षान्तरसे समझ लेना चाहिये। ध्यान रहे, इस प्रकरणमें आये हुए बाल्यभावसे तो दम्भ, मान आदि विकारोंका अभाव दिखाया गया है और मननशीलताको मौन कहा गया है। अतः ब्रह्मका शास्त्रीय ज्ञान (पाण्डित्य), उक्त विकारोंका अभाव (बाल्य- भाव) और निरन्तर मनन तथा निदिध्यासन (मौन) इन तीनोंकी परिपक्व- अवस्था होनेसे ही ब्रह्मसाक्षात्कार होता है, यही इस प्रकरणका भाव है। सम्बन्ध—पूर्व सूत्रमें जिस प्रकरणपर विचार किया गया है; वह संन्यास- आश्रमका द्योतक है, अतः यह जिज्ञासा होती है कि संन्यास-आश्रममें ही ब्रह्मविद्याका साधन हो सकता है या अन्य आश्रमोंमें भी उसका अधिकार है। यदि संन्यास-आश्रममें ही उसका साधन हो सकता है तो (छा० उ० ८।१५। १ की) श्रुतिमें गृहस्थ-आश्रमके साथ-साथ ब्रह्मविद्याका प्रकरण क्यों समाप्त किया गया है। वहाँके वर्णनसे तो गृहस्थका ही अधिकार स्पष्टरूपसे सूचित होता है, अतः इसका निर्णय करनेके लिये कहते हैं— कृत्स्नभावात्तु गृहिणोपसंहारः ॥ ३।४।४८॥ कृत्स्नभावात्=गृहस्थ-आश्रममें सम्पूर्ण आश्रमोंका भाव है, इसलिये;