वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
३०८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
३०८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ सर्वज्ञ, स्वयं ही अपने प्राकट्यका हेतु, कालका भी महाकाल, समस्त कल्याणमय गुणोंसे सम्पन्न और सबको जाननेवाला है। वह प्रकृति और जीवात्माका स्वामी, समस्त गुणोंका शासक तथा जन्म-मृत्युरूप संसारमें बाँधने, स्थित रखने और उससे मुक्त करनेवाला है।'१ चौथा हेतु है भेदका प्रतिपादन। उस परब्रह्म परमात्माको इन दोनों प्रकृतियोंका अन्तर्यामी एवं धारण-पोषण करनेवाला बताकर तथा अन्य प्रकारसे भी श्रुतिने इनसे उसकी भिन्नताका निरूपण किया है।२ इन सब कारणोंसे यही सिद्ध होता है कि वह सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, सर्वान्तर्यामी, सर्वाधार, सबका स्वामी परमात्मा अपनी दोनों प्रकृतियोंसे अत्यन्त विलक्षण और परम श्रेष्ठ है; क्योंकि इन श्रुतियोंमें कहा हुआ उन परमात्माका स्वरूप दिव्य, अलौकिक और उपाधिरहित है तथा उस परब्रह्मको जाननेका फल परम शान्तिकी प्राप्ति,३ सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त होना४ तथा अमृतको प्राप्त होना बताया गया है।५ सम्बन्ध- यहाँतक यह सिद्ध किया गया कि उस परब्रह्म परमात्माका अपनी अपरा और परा नामक प्रकृतियोंके साथ अभेद भी है और भेद भी। १. स विश्वकृद् विश्वविदात्मयोनिर्ज्ञः कालकालो गुणी सर्वविद् यः। प्रधानक्षेत्रज्ञपतिर्गुणेशः सँसारमोक्षस्थितिबन्धहेतुः ॥ (श्वेता० ६। १६) २. देखिये (श्वेताश्वतरोपनिषद् अध्याय ४ के ६, ७, ८-१४-१५ आदिमन्त्र), (मु० उ० ३।१।१-२), (श्वेता० उ० १।९), (बृ० उ० ३।४।१-२ तथा ३।७।१ से २३ तक)। ३. तमीशानं वरदं देवमीड्यं निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ॥ (श्वेता० उ० ४।११) 'ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति ॥' (श्वेता० उ० ४।१४) 'तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥' (क० उ० २।२।१३) ४. ज्ञात्वा देवं सर्वपाशापहानिः। (श्वेता० उ० १।११) ५. तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥ (श्वेता० उ० ३।८)
सूत्र ३२ ] अध्याय ३ ३०९
सूत्र ३२ ] अध्याय ३ ३०९ अब यह जिज्ञासा होती है कि इन दोनोंमेंसे अभेदपक्ष उत्तम है या भेदपक्ष ? अतः इसका निर्णय करनेके लिये सूत्रकार कहते हैं— सामान्यात् ॥ ३ । २ । ३२ ॥ सामान्यात्=श्रुतिमें भेद-वर्णन और अभेद-वर्णन दोनों समानभावसे हैं इससे, तु=तो (यही निश्चय होता है कि भेद और अभेद दोनों ही पक्ष मान्य हैं)। व्याख्या—परब्रह्म परमात्माको सबका ईश्वर१, अधिपति२, प्रेरक३, शासक४ और अन्तर्यामी५ बतानेवाली भेदप्रतिपादक श्रुतियाँ जिस प्रकार प्रमाण-भूत हैं, उसी प्रकार ‘तत्त्वमसि’ (छा० उ० ६।८ वेंसे १६ वें खण्डतक)—‘वह ब्रह्म तू है,’ ‘अयमात्मा ब्रह्म’ (बृह० उ० २।५।१९)— ‘यह आत्मा ब्रह्म है।’ इत्यादि अभेदप्रतिपादक श्रुतियाँ भी प्रमाण हैं। दोनोंकी प्रामाणिकतामें किंचिन्मात्र भी अन्तर नहीं है। इसलिये किसी एक पक्षको श्रेष्ठ और दूसरेको इसके विपरीत बताना कदापि सम्भव नहीं है। अतः भेद और अभेद दोनों ही पक्ष मान्य हैं। सम्बन्ध— श्रुतिमें कहीं तो उस ब्रह्मको अपनेसे भिन्न मानकर उसकी उपासना करनेके लिये कहा है; यथा—‘तंँह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥’ (श्वेता० उ० ६।१८)—‘परमात्मज्ञानविषयक बुद्धिको प्रकट करनेवाले उन प्रसिद्ध देव परमेश्वरकी मैं संसारबन्धनसे छूटनेकी इच्छावाला उपासक शरण लेता हूँ।’ इस मन्त्रके अनुसार उपासक अपनेसे भिन्न उपास्यदेवकी शरण ग्रहण करता है। इससे भेदोपासना सिद्ध होती है और कहीं १. ‘एष सर्वेश्वरः’। (मा० उ० ६) २. ‘एष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिः। (बृह० उ० ४।४।२२) ३. ‘भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा’। (श्वेता० उ० १।१२) ४. ‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः।’ (बृह० उ० ३।८।९) ५. ‘एष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥’ (बृह० उ० ३।७।३)
३१० वेदान्त-दर्शन [ पाद २
३१० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ 'तत्त्वमसि' (छा० उ० ६।८।८- 'वह ब्रह्म तू है।' 'अयमात्मा ब्रह्म' (बृह० उ० २।५।१९) - 'यह आत्मा ब्रह्म है।' तथा 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत।' (छा० उ० ३।१४।१) - 'यह सब जगत् ब्रह्म है; क्योंकि उसीसे उत्पन्न होता, उसीमें रहकर जीवन धारण करता और उसीमें लीन हो जाता है; इस प्रकार शान्तचित्त होकर उपासना करे।' इत्यादि वचनोंद्वारा केवल अभेदभावसे उपासनाका उपदेश मिलता है। इस प्रकार कहीं भेदभावसे और कहीं अभेदभावसे उपासनाके लिये आदेश देनेका क्या अभिप्राय है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— बुद्धयर्थः पादवत्॥ ३।२।३३॥ पादवत् = अवयवरहित परमात्माके चार पाद बताये जानेकी भाँति; बुद्धयर्थः = मनन-निदिध्यासन आदि उपासनाके लिये वैसा उपदेश है। व्याख्या—जिस प्रकार अवयवरहित एकरस परब्रह्म पुरुषोत्तमका तत्त्व समझानेके लिये चार पादोंकी कल्पना करके श्रुतिमें उसके स्वरूपका वर्णन किया गया है, (मा० उ० २) उसी प्रकार पूर्वोक्त रीतिसे भेद या अभेदभावसे उपासनाका उपदेश उस परमात्माके तत्त्वका बोध करानेके लिये ही किया गया है; क्योंकि साधकोंकी प्रकृति भिन्न-भिन्न होती है। कोई भेदोपासनाको ग्रहण करते हैं, कोई अभेदोपासनाको। किसी भी भावसे उपासना करनेवाला साधक एक ही लक्ष्यपर पहुँचता है। दोनों प्रकारकी उपासनाओंसे होनेवाला तत्त्वज्ञान और भगवत्प्राप्तिरूप फल एक ही है। अतः परमात्माके तत्त्वका बोध करानेके लिये साधककी प्रकृति, योग्यता, रुचि और विश्वासके अनुसार श्रुतिमें भेद या अभेद उपासनाका वर्णन सर्वथा उचित ही है। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि यदि ब्रह्म और उसकी दोनों प्रकृतियोंमें भेद नहीं है तो ब्रह्मकी परा प्रकृतिरूप जो जीवसमुदाय हैं, उनमें भी परस्पर भेद सिद्ध नहीं होगा। ऐसा सिद्ध होनेसे श्रुतियोंमें जो उसके नानात्वका वर्णन है, उसकी संगति कैसे होगी? इसपर कहते हैं—
सूत्र ३४-३५ ] अध्याय ३ ३११ स्थानविशेषात् प्रकाशादिवत् ॥ ३।२।३४॥ प्रकाशादिवत् = प्रकाश आदिकी भाँति; स्थानविशेषात् = शरीररूप स्थानकी विशेषताके कारण (उनमें नानात्व आदि भेदका होना विरुद्ध नहीं है)। व्याख्या—जिस प्रकार सभी प्रकाशमान पदार्थ प्रकाश-जातिकी दृष्टिसे एक हैं; किंतु दीपक, ग्रह, नक्षत्र, तारा, अग्नि, सूर्य, चन्द्र आदिमें स्थान और शक्तिका भेद होनेके कारण इन सबमें परस्पर भेद एवं नानात्व है ही; उसी प्रकार भगवान्की पराप्रकृतिके नाते सब जीवसमुदाय अभिन्न हैं तथापि जीवोंके अनादि कर्म-संस्कारोंका जो समूह है, उसके अनुसार फलरूपमें प्राप्त हुए शरीर, बुद्धि एवं शक्ति आदिके तारतम्यसे उनमें परस्पर भेद होना असंगत नहीं है। सम्बन्ध—उसी बातको दृढ़ करनेके लिये कहते हैं— उपपत्तेश्च ॥ ३।२।३५ ॥ उपपत्तेः = श्रुतिकी संगतिसे; च = भी (यह बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—श्रुतिमें जगत्की उत्पत्तिसे पहले एकमात्र अद्वितीय परमात्माकी ही सत्ता बतायी गयी है। फिर उसीसे सबकी उत्पत्तिका वर्णन करके उसे सबका अभिन्ननिमित्तोपादान कारण सिद्ध किया गया है। उसके बाद 'तत्त्वमसि' (वह ब्रह्म तू है) इत्यादि वचनोंद्वारा उस परमात्माको अपनेसे अभिन्न मानकर उसकी उपासना करनेके लिये उपदेश दिया गया है। फिर उसीको भोक्ता, भोग्य आदिसे युक्त इस विचित्र जड-चेतनात्मक जगत्का स्रष्टा, संचालक तथा जीवोंके कर्मफलभोग एवं बन्ध-मोक्षकी व्यवस्था करनेवाला कहा गया है। जीवसमुदाय तथा उनके कर्म-संस्कारोंको अनादि बताकर उनकी उत्पत्तिका निषेध किया गया है। इन सब प्रसंगोंपर विचार करनेसे यही सिद्ध होता है कि जीवसमुदाय चैतन्य-जातिके कारण तो परस्पर एक या अभिन्न हैं; परंतु विभिन्न कर्म-संस्कारजनित सीमित व्यक्तित्वके कारण भिन्न-भिन्न हैं। प्रलयकालमें सब जीव ब्रह्ममें विलीन होते हैं, सृष्टिके समय
३१२ वेदान्त-दर्शन [पाद २
३१२ वेदान्त-दर्शन [पाद २ पुनः उसीसे प्रकट होते हैं तथा ब्रह्मकी ही परा प्रकृतिके अन्तर्गत होनेसे उसीके अंश हैं; इसलिये तो वे परमात्मासे अभिन्न कहलाते हैं और परमात्मा उनका नियामक है तथा समस्त जीव उनके नियम्य हैं, इस कारण वे उस ब्रह्मसे भी भिन्न हैं और परस्पर भी। यही मानना युक्तिसंगत है। तथान्यप्रतिषेधात् ॥ ३ । २ । ३६ ॥ तथा = उसी प्रकार; अन्यप्रतिषेधात् = दूसरेका निषेध किया गया है, इसलिये भी (यही सिद्ध होता है)। व्याख्या - श्रुतिमें जगह-जगह परब्रह्म परमात्मासे भिन्न दूसरी किसी वस्तुकी सत्ताका निषेध किया गया है।* इससे भी यही सिद्ध होता है कि अपनी अपरा और परा दोनों शक्तियोंसे सम्पन्न वह परब्रह्म परमात्मा ही नाना रूपोंमें प्रकट हो रहा है। उसकी दोनों प्रकृतियोंमें नानात्व होनेपर भी उसमें कोई भेद नहीं है। वह सर्वथा निर्विकार, असंग, भेदरहित और अखण्ड है। सम्बन्ध - पूर्वोक्त बातको ही सिद्ध करनेके लिये दूसरी युक्ति प्रस्तुत करते हैं- अनेन सर्वगतत्वमायामशब्दादिभ्यः ॥ ३ । २ । ३७ ॥ अनेन = इस प्रकार भेद और अभेदके विवेचनसे; आयामशब्दादिभ्यः = तथा श्रुतिमें जो ब्रह्मकी व्यापकताको सूचित करनेवाले शब्द आदि हेतु हैं, उनसे भी; सर्वगतत्वम् = उस ब्रह्मका सर्वगत (सर्वत्र व्यापक) होना सिद्ध होता है। व्याख्या - 'उस सर्वश्रेष्ठ पुरुषोत्तमसे यह सम्पूर्ण जगत् परिपूर्ण हो रहा है।' (श्वेता० उ० ३ । ९ तथा ईश० १) 'परम पुरुष वह है जिससे यह समस्त जगत् व्याप्त है (गीता ८ । २२) इत्यादि श्रुति और स्मृतिके वचनोंमें जो परमात्माकी सर्वव्यापकताको सूचित करनेवाले 'सर्वगत' आदि शब्द प्रयुक्त
- मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किंचन। (क० उ० २ । १ । ११)
सूत्र ३८-३९] अध्याय ३ ३१३
सूत्र ३८-३९] अध्याय ३ ३१३ हुए हैं, उनसे तथा उपर्युक्त विवेचनसे भी यही सिद्ध होता है कि वह परमात्मा सर्वत्र व्यापक है। सर्वथा अभेद मान लेनेसे इस व्याप्य-व्यापक भावकी सिद्धि नहीं होगी। अतः यही निश्चय हुआ कि परब्रह्म पुरुषोत्तम अपनी दोनों प्रकृतियोंसे भिन्न भी हैं और अभिन्न भी; क्योंकि वे उनकी शक्ति हैं। शक्ति और शक्तिमान्में भेद नहीं होता इसलिये तथा उन प्रकृतियोंके अभिन्न निमित्तो- पादान कारण होनेसे भी वे उनसे अभिन्न हैं और इस प्रकार अभिन्न होते हुए भी उनके नियन्ता होनेके कारण वे उनसे सर्वथा विलक्षण एवं उत्तम भी हैं। सम्बन्ध—इस तरह उस ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन करके अब इस बातका निर्णय करनेके लिये कि जीवोंके कर्मोंका यथायोग्य फल देनेवाला कौन है, अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— फलमत उपपत्तेः ॥ ३।२।३८॥ फलम्=जीवोंके कर्मोंका फल; अतः=इस परब्रह्मसे ही होता है; उपपत्तेः=क्योंकि ऐसा मानना ही युक्तिसंगत है। व्याख्या—जो सर्वशक्तिमान् और सबके कर्मोंको जाननेवाला हो, वही जीवोंद्वारा किये हुए कर्मोंका यथायोग्य फल प्रदान कर सकता है। उसके सिवा न तो जड प्रकृति ही कर्मोंको जानने और उनके फलकी व्यवस्था करनेमें समर्थ है और न स्वयं जीवात्मा ही; क्योंकि वह अल्पज्ञ और अल्प शक्तिवाला है। कहीं-कहीं जो देवता आदिको कर्मोंका फल देनेवाला कहा गया है, वह भी भगवान्के विधानको लेकर कहा गया है, भगवान् ही उनको निमित्त बनाकर वह फल देते हैं (गीता ७। २२)। इस न्यायसे यही सिद्ध हुआ कि जीवोंके कर्मफल-भोगकी व्यवस्था करनेवाला वह परमात्मा ही है, दूसरा कोई नहीं। सम्बन्ध—केवल युक्तिसे ही यह बात सिद्ध होती है, ऐसा नहीं; किंतु— श्रुतत्वाच्च ॥ ३।२।३९॥ श्रुतत्वात्=श्रुतिमें ऐसा ही कहा गया है, इसलिये; च=भी (यही मानना ठीक है कि कर्मोंका फल परमात्मासे ही प्राप्त होता है)।
३१४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
३१४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ व्याख्या—वह परमेश्वर ही कर्मफलको देनेवाला है, इसका वर्णन वेदमें इस प्रकार आता है—य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः । तदेव शुक्लं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ॥ (क० उ० २ । २ । ८) 'जो यह जीवोंके कर्मानुसार नाना प्रकारके भोगोंका निर्माण करनेवाला परम पुरुष परमेश्वर प्रलयकालमें सबके सो जानेपर भी जागता रहता है, वही परम विशुद्ध है, वही ब्रह्म है और उसीको अमृत कहते हैं।' तथा श्वेताश्वतरमें भी इस प्रकार वर्णन आया है—'नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्' (श्वे० उ० ६ । १३)— 'जो एक नित्य चेतन परमात्मा बहुत-से नित्य चेतन आत्माओंके कर्मफल-भोगोंका विधान करता है।' इन वेदवाक्योंसे भी यही सिद्ध होता है कि जीवोंके कर्मफलकी व्यवस्था करनेवाला परमेश्वर ही है। सम्बन्ध—उस विषयमें आचार्य जैमिनिका मत उपस्थित किया जाता है— धर्मं जैमिनिरत एव ॥ ३ । २ । ४० ॥ अत एव=पूर्वोक्त कारणोंसे ही; जैमिनिः=जैमिनि; धर्मम्=धर्म (कर्म)-को (फलदाता) कहते हैं। व्याख्या—जैमिनि आचार्य मानते हैं कि युक्ति और वैदिक प्रमाण— इन दोनों कारणोंसे यह सिद्ध होता है कि धर्म अर्थात् कर्म स्वयं ही फलका दाता है; क्योंकि यह प्रत्यक्ष देखा जाता है कि खेती आदि कर्म करनेसे अन्नकी उत्पत्तिरूप फल होता है। इसी प्रकार वेदमें भी 'अमुक फलकी इच्छा हो तो अमुक कर्म करना चाहिये', ऐसा विधि-वाक्य होनेसे यही सिद्ध होता है कि कर्म स्वयं ही फल देनेवाला है, उससे भिन्न किसी कर्मफलदाताकी कल्पना आवश्यक नहीं है। सम्बन्ध—आचार्य जैमिनिके इस कथनको अयुक्त सिद्ध करते हुए सूत्रकार अपने मतको ही उपादेय बताते हैं—
सूत्र ४१ ] अध्याय ३ ३१५
सूत्र ४१ ] अध्याय ३ ३१५ पूर्वं तु बादरायणो हेतुव्यपदेशात् ॥ ३ । २ । ४१ ॥ तु=परंतु; बादरायणः=वेदव्यासः; पूर्वम्=पूर्वोक्त परमेश्वरको ही कर्मफलदाता मानते हैं; हेतुव्यपदेशात्=क्योंकि वेदमें उसीको सबका कारण बताया गया है (इसलिये जैमिनिका कथन ठीक नहीं है)। व्याख्या—सूत्रकार व्यासजी कहते हैं कि जैमिनि जो कर्मको ही फल देनेवाला कहते हैं वह ठीक नहीं; कर्म तो निमित्तमात्र होता है, वह जड, परिवर्तनशील और क्षणिक होनेके कारण फलकी व्यवस्था नहीं कर सकता; अतः जैसा कि पहले कहा गया है; वह परमेश्वर ही जीवोंके कर्मानुसार फल देनेवाला है; क्योंकि श्रुतिमें ईश्वरको ही सबका हेतु बताया गया है। दूसरा पाद सम्पूर्ण
तीसरा पाद
तीसरा पाद दूसरे पादमें जीवकी स्वप्नावस्था एवं सुषुप्ति-अवस्थाका वर्णन करके परब्रह्म परमेश्वरके स्वरूपके विषयमें यह निर्णय किया गया कि वह निर्गुण- सगुण दोनों लक्षणोंवाला है। तत्पश्चात् उस परब्रह्म परमेश्वरका अपनी शक्तिस्वरूप परा और अपरा प्रकृतियोंसे किस प्रकार अभेद है और किस प्रकार भेद है, इसका निरूपण किया गया। फिर अन्तमें यह निश्चित किया गया कि जीवोंके कर्मफलकी व्यवस्था करनेवाला एकमात्र वह परब्रह्म परमेश्वर ही है। अब वेदान्तवाक्योंमें जो एक ही आत्मविद्याका अनेक प्रकारसे वर्णन किया गया है, उसकी एकता बताने तथा नाना स्थलोंमें आये हुए भगवत्प्राप्तिविषयक भिन्न-भिन्न वाक्योंके विरोधको दूर करके उनकी एकताका प्रतिपादन करनेके लिये यह तीसरा पाद आरम्भ किया जाता है— सर्ववेदान्तप्रत्ययं चोदनाद्यविशेषात् ॥ ३ । ३ । १ ॥ सर्ववेदान्तप्रत्ययम्=समस्त उपनिषदोंमें जो अध्यात्मविद्याका वर्णन है, वह अभिन्न है; चोदनाद्यविशेषात्=क्योंकि आज्ञा आदिमें भेद नहीं है। व्याख्या—उपनिषदोंमें जो नाना प्रकारकी अध्यात्मविद्याओंका वर्णन है, उन सबमें विधि-वाक्योंकी एकता है अर्थात् सभी विद्याओंद्वारा एकमात्र उस परब्रह्म परमात्माको ही जाननेके लिये कहा गया है तथा सबका फल उसीकी प्राप्ति बताया गया है, इसलिये उन सबकी एकता है। कहीं तो 'ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत।' (छा० उ० १।४।१) 'ॐ यह अक्षर उद्गीथ है, इस प्रकार इसकी उपासना करे' इत्यादि वाक्योंसे प्रतीकोपासनाका वर्णन करके उसके द्वारा उस परब्रह्मको लक्ष्य कराया गया है और कहीं 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म'—'ब्रह्म सत्य, ज्ञानस्वरूप और अनन्त है', (तै० २।१) 'यही सर्वेश्वर, सर्वज्ञ, सर्वान्तर्यामी, सबका परम कारण, सब प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयका स्थान है' (मा० उ० ६)—इस प्रकार विधिमुखसे उसके कल्याणमय दिव्य लक्षणोंद्वारा उसको लक्ष्य कराया गया है तथा
सूत्र २ ] अध्याय ३ ३१७
सूत्र २ ] अध्याय ३ ३१७ कहीं 'शब्दरहित, स्पर्शरहित, रूपरहित, रसरहित और गन्धरहित तथा अविनाशी, नित्य, अनादि, अनन्त (सीमारहित), सर्वश्रेष्ठ' (क० उ० १।३।१५) इस प्रकार समस्त प्राकृत जड और चेतन पदार्थोंसे भिन्न बताकर उसका लक्ष्य कराया गया है और अन्तमें कहा गया है कि इसे पाकर उपासक जन्म- मरणसे छूट जाता है। इन सभी वर्णनोंका उद्देश्य एकमात्र उस परब्रह्म परमेश्वरको लक्ष्य कराकर उसे प्राप्त करा देना है। सभी जगह प्रकारभेदसे उस परमात्माका ही चिन्तन करनेके लिये कहा गया है, अतः विधि और साध्यकी एकताके कारण साधनरूप विद्याओंमें वास्तविक भेद नहीं है, अधिकारीके भेदसे प्रकारभेद है। इसके सिवा, जो भिन्न शाखावालोंके द्वारा वर्णित एक ही प्रकारकी वैश्वानर आदि विद्याओंमें आंशिक भेद दिखलायी देता है, उससे भी विद्याओंमें भेद नहीं समझना चाहिये; क्योंकि उनमें सर्वत्र विधिवाक्य और फलकी एकता है, इसलिये उनमें कोई वास्तविक भेद नहीं है। सम्बन्ध — वर्णन-शैलीमें कुछ भेद होनेपर भी विद्यामें भेद नहीं मानना चाहिये; इसका प्रतिपादन करते हैं— भेदान्नेति चेन्नैकस्यामपि ॥ ३।३।२॥ चेत् = यदि ऐसा कहो कि; भेदात् = उन स्थलोंमें वर्णनका भेद है, इसलिये; न = एकता सिद्ध नहीं होती; इति न = तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि; एकस्याम् = एक विद्यामें; अपि = भी (इस प्रकार वर्णनका भेद होना अनुचित नहीं है)। व्याख्या — जगत्के कारणको ब्रह्म कहा गया है और वही उपास्य होना चाहिये; किंतु कहीं तो 'जगत्की उत्पत्तिके पूर्व एक सत् ही था, उसने इच्छा की कि मैं बहुत होऊँ, उसने तेजको उत्पन्न किया।' (छा० उ० ६।२।१, ३) इस प्रकार जगत्की उत्पत्ति सत्से बतायी है। कहीं 'पहले यह आत्मा ही था, दूसरा कोई भी चेष्टाशील नहीं था, उसने इच्छा की कि मैं लोकोंको रचूँ।'
३१८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
३१८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ (ऐ० उ० १।१) इस प्रकार जगत्की उत्पत्ति आत्मासे बतायी है, कहीं 'आनन्दमय' का वर्णन करनेके अनन्तर उसीसे सब जगत्की उत्पत्ति बतायी है, वहाँ किसी प्रकारके क्रमका वर्णन नहीं किया है (तै० उ० २।६-७)। कहीं आत्मासे आकाशादिके क्रमसे जगत्की उत्पत्ति बतायी है (तै० उ० २।१), कहीं रयि और प्राण—इन दोनोंके द्वारा जगत्की उत्पत्तिका वर्णन किया है (प्र० उ० १।४), तथा कहीं 'यह उस समय अप्रकट था; फिर प्रकट हुआ।' (बृह० उ० १।४।७) ऐसा कहकर अव्यक्तसे जगत्की उत्पत्ति बतायी है। इस तरह भिन्न-भिन्न कारणोंसे और भिन्न-भिन्न क्रमसे जगत्की उत्पत्तिका वर्णन किया गया है। इन सब वेदवाक्योंकी एकता नहीं हो सकती। इसी प्रकार दूसरे विषयमें भी समझना चाहिये। ऐसा यदि कोई कहे तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि यहाँ सभी श्रुतियोंका अभिप्राय जगत्की उत्पत्तिके पहले उसके कारणरूप एक परमेश्वरको बताना है, उसीको 'सत्' नामसे कहा गया है तथा उसीका 'आत्मा', 'आनन्दमय', 'प्रजापति' और 'अव्याकृत' नामसे भी वर्णन किया गया है। इस प्रकार एक ही तत्त्वका प्रतिपादन करनेवाली एक विद्यामें वर्णनका भेद होना अनुचित नहीं है, उद्देश्य और फल एक होनेके कारण उन सबकी एकता ही है। सम्बन्ध—"मुण्डकोपनिषद्में कहा है कि 'जिन्होंने शिरोव्रतका अर्थात् सिरपर जटा-धारणपूर्वक ब्रह्मचर्यव्रतका विधिपूर्वक पालन किया हो, उन्हींको इस ब्रह्मविद्याका उपदेश देना चाहिये।' (३।२।१०) किंतु दूसरी शाखावालोंने ऐसा नहीं कहा है; अतः इस आथर्वणशाखामें बतायी हुई ब्रह्मविद्याका अन्य शाखामें कही हुई ब्रह्मविद्यासे अवश्य भेद होना चाहिये।'" ऐसी शंका होनेपर कहते हैं— स्वाध्यायस्य तथात्वेन हि समाचारेऽधिकाराच्च सववच्च तन्नियमः ॥ ३।३।३॥ स्वाध्यायस्य = यह शिरोव्रतका पालन अध्ययनका अंग है; हि = क्योंकि;
सूत्र ४ ] अध्याय ३ ३१९
सूत्र ४ ] अध्याय ३ ३१९ समाचारे = आथर्वणशाखावालोंके परम्परागत शिष्टाचारमें; तथात्वेन = अध्ययनके अंगरूपसे ही उसका विधान है; च = तथा; अधिकारात् = उस व्रतका पालन करनेवालेका ही ब्रह्मविद्या-अध्ययनमें अधिकार होनेके कारण; च = भी; सववत् = 'सव' होमकी भाँति; तन्नियमः = वह शिरोव्रतवाला नियम आथर्वणशाखावालोंके लिये ही है। व्याख्या—आथर्वणशाखाके उपनिषद् (मु० उ० ३ । २ । १०)-में कहा गया है कि 'तेषामेवैतां ब्रह्मविद्यां वदेत शिरोव्रतं विधिवद् यैस्तु चीर्णम् ॥'— 'उन्हींको इस ब्रह्मविद्याका उपदेश करना चाहिये; जिन्होंने विधिपूर्वक शिरोव्रतका पालन किया है।' उक्त शाखावालोंके लिये जो शिरोव्रतके पालनका नियम किया गया है, वह विद्याके भेदके कारण नहीं; अपितु उन शाखावालोंके अध्ययन-विषयक परम्परागत आचारमें ही यह नियम चला आता है कि जो शिरोव्रतका पालन करता हो, उसीको उक्त ब्रह्मविद्याका उपदेश करना चाहिये। उसीका उसमें अधिकार है। जिसने शिरोव्रतका पालन नहीं किया, उसका उस ब्रह्मविद्याके अध्ययनमें अधिकार नहीं है। जिस प्रकार 'सव' होमका नियम उन्हींकी शाखावालोंके लिये है, वैसे ही इस शिरोव्रतके पालनका नियम भी उन्हींके लिये है। इस प्रकार यह नियम केवल अध्ययनाध्यापनके विषयमें ही होनेके कारण इससे ब्रह्मविद्याकी एकतामें किसी प्रकारका विरोध नहीं है। सम्बन्ध—सब उपनिषदोंमें एक परमात्माके स्वरूपको बतानेके लिये ही प्रकार-भेदसे ब्रह्मविद्याका वर्णन है, यह बात वेद प्रमाणसे भी सिद्ध करते हैं— दर्शयति च ॥ ३ । ३ । ४ ॥ दर्शयति च = श्रुति भी यही बात दिखाती है। व्याख्या—कठोपनिषद्में कहा है कि 'सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति'— 'समस्त वेद जिस परम प्राप्य परमेश्वरका प्रतिपादन करते हैं।' इत्यादि (क० उ० १ । २ । १५) इसी प्रकारका वर्णन अन्यान्य श्रुतियोंमें भी है। तथा श्रीमद्भगवद्गीतामें भगवान्ने भी कहा है कि 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः'
३२० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ (१५। १५) 'सब वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य मैं ही हूँ।' इस प्रकार श्रुति- स्मृतियोंके सभी वचनोंका एक ही उद्देश्य देखनेमें आता है। इसलिये यही सिद्ध होता है कि ब्रह्मविद्या भिन्न-भिन्न नहीं है। सम्बन्ध—यदि यही बात है तो एक जगहके वर्णनमें दूसरी जगहकी अपेक्षा कुछ बातें अधिक बतायी गयी हैं और कहीं कुछ बातें कम हैं, ऐसी परिस्थितिमें विभिन्न प्रकरणोंके वर्णनकी एकता कैसे होगी। इस जिज्ञासापर कहते हैं— उपसंहारोऽर्थभेदाद्विधिशेषवत्समाने च ॥ ३।३।५॥ समाने=एक प्रकारकी विद्यामें; च=ही; अर्थाभेदात् =प्रयोजनमें भेद न होनेके कारण; उपसंहारः =एक जगह कहे हुए गुणोंका दूसरी जगह उपसंहार कर लेना; विधिशेषवत् =विधिशेषकी भाँति (उचित है)। व्याख्या—जिस प्रकार कर्मकाण्डमें प्रयोजनका भेद न होनेपर एक शाखामें बताये हुए यज्ञादिके विधिशेषरूप अग्निहोत्र आदि धर्मोंका दूसरी जगह भी उपसंहार (अध्याहार) कर लिया जाता है, उसी प्रकार विभिन्न प्रकरणोंमें आयी हुई ब्रह्मविद्याके वर्णनमें भी प्रयोजन-भेद न होनेके कारण एक जगह कही हुई अधिक बातोंका दूसरी जगह उपसंहार (अध्याहार) कर लेना चाहिये। सम्बन्ध—श्रुतिमें वर्णित जो ब्रह्मविद्याएँ हैं, उनमें कहीं शब्दभेदसे, कहीं नामभेदसे और कहीं प्रकरणके भेदसे भिन्नता प्रतीत होती है, अतः उनकी एकताका प्रतिपादन करनेके लिये सूत्रकार स्वयं शंका उठाकर उनका समाधान करते हैं— अन्यथात्वं शब्दादिति चेन्नाविशेषात् ॥ ३।३।६॥ चेत्=यदि ऐसा कहो कि; शब्दात्=कहे हुए शब्दसे; अन्यथात्वम् = दोनोंकी भिन्नता प्रतीत होती है, अतः एकता सिद्ध नहीं होती; इति न=तो ऐसी बात नहीं है; अविशेषात् =विधि और फल आदिमें भेद न होनेके कारण (दोनों विद्याओंमें समानता है)।
सूत्र ६ ] अध्याय ३ ३२१
सूत्र ६ ] अध्याय ३ ३२१ व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद्के आठवें अध्यायमें दहरविद्या और प्राजापत्यविद्या—इस प्रकार दो ब्रह्मविद्याओंका वर्णन है। वे दोनों विद्याएँ परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिका मार्ग बतानेवाली हैं, इसलिये उनकी समानता मानी जाती है। इसपर पूर्वपक्षकी ओरसे शंका उठायी जाती है कि दोनों विद्याओंमें शब्दका अन्तर है अर्थात् दहरविद्याके प्रकरणमें तो यह कहा गया है कि 'मनुष्य-शरीररूप ब्रह्मपुरमें हृदयरूप घरके भीतर जो आन्तरिक आकाश है और उसके भीतर जो वस्तु है, उसका अनुसंधान करना चाहिये।' (छा० उ० ८।१।१) तथा प्राजापत्यविद्यामें 'अपहतपाप्मा' आदि विशेषणोंसे युक्त आत्माको जाननेके योग्य बताया गया है (८।७।१)। इस प्रकार दोनों विद्याओंके वर्णनमें शब्दका भेद है, इसलिये वे दोनों एक नहीं हो सकतीं। इसके उत्तरमें सूत्रकार कहते हैं कि ऐसी बात नहीं है, क्योंकि दहरविद्यामें उस अन्तराकाशको ब्रह्मलोक, आत्मा और सबको धारण करनेवाला कहा गया है तथा उसे सब पापों और सब विकारोंसे रहित तथा सत्यसंकल्प आदि समस्त दिव्य गुणोंसे सम्पन्न बताकर (छा० उ० ८।१।५) उसी जाननेयोग्य तत्त्वको (छा० उ० ८।१।६) परब्रह्म निश्चित किया गया है, उसी प्रकार प्राजापत्यविद्यामें भी उस जाननेयोग्य तत्त्वको आत्मा नामसे कहकर उसे समस्त पापों और विकारोंसे रहित तथा सत्यसंकल्पत्व, सत्यकामत्व आदि दिव्य गुणोंसे युक्त परब्रह्म निश्चित किया गया है। दहरविद्यामें दहर आकाशको ही उपास्य बताया गया है, न कि उसके अन्तर्वर्ती लोकोंको। वहाँ प्रकारान्तरसे उस ब्रह्मको सबका आधार बतानेके लिये पहले उसके भीतरकी वस्तुओंको खोजनेके लिये कहा गया है। इस प्रकार वास्तवमें कोई भेद न होनेके कारण दोनों विद्याओंकी एकता है। इसी प्रकार दूसरी विद्याओंमें भी समानता समझ लेनी चाहिये। सम्बन्ध— पूर्वोक्त विद्याओंकी एकता सिद्ध करनेके लिये दूसरी असमान विद्याओंसे उनकी विशेषताका प्रतिपादन करते हैं—
न वा प्रकरणभेदात्परोऽवरीयस्त्वादिवत्॥ ३। ३। ७॥
३२२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ न वा प्रकरणभेदात्परोऽवरीयस्त्वादिवत्॥ ३। ३। ७॥ वा=अथवा; परोऽवरीयस्त्वादिवत्=परम उत्कृष्टता-अपकृष्टता आदि गुणोंसे युक्त दूसरी विद्याओंकी भाँति; प्रकरणभेदात्=प्रकरणके भेदसे उक्त दोनों विद्याएँ भिन्न; न=सिद्ध नहीं हो सकतीं। व्याख्या—छान्दोग्य और बृहदारण्यकोपनिषद्में उद्गीथविद्याका प्रकरण आता है, किंतु छान्दोग्यमें जो उद्गीथविद्या है वह अत्यन्त श्रेष्ठ है; क्योंकि वहाँ उद्गीथकी 'ॐकार' अक्षरके साथ एकता करके उसका महत्त्व बढ़ाया गया है (छा० उ० १। १ पूरा खण्ड), इसलिये उसका फल भी अत्यन्त श्रेष्ठ बताया गया है (छा० उ० १।९।१ से ४ तक), किंतु बृहदारण्यककी उद्गीथविद्या केवल प्राणोंका श्रेष्ठत्व सम्पादन करनेके लिये तथा यज्ञादिमें उद्गीथगानके समय स्वरकी विशेषता दिखानेके लिये है (बृह० उ० १। ३। १ से २७ तक)। इसलिये उसका फल भी वैसा नहीं बताया गया है। दोनों प्रकरणोंमें केवल देवासुर-संग्रामविषयक समानता है, पर उसमें भी उपासनाके प्रकारका भेद है; अतः किंचिन्मात्र समानताके कारण दोनोंकी समानता नहीं हो सकती। समानताके लिये उद्देश्य, विधेय और फलकी एकता चाहिये, वह उन प्रकरणोंमें नहीं है। इसलिये उनमें भेद होना उचित है; किंतु ऊपर कही हुई दहरविद्या और प्राजापत्यविद्यामें ऐसी बात नहीं है, केवल वर्णनका भेद है। अतः वर्णनमात्रका भेद होनेके कारण उत्तम और मध्यम आदिके भेदसे युक्त उद्गीथविद्याकी भाँति ऊपर कही हुई दहरविद्या और प्राजापत्यविद्यामें भेद सिद्ध नहीं हो सकता; क्योंकि दोनोंके उद्देश्य, विधेय और फलमें भेद नहीं है। सम्बन्ध—अब दूसरे प्रकारकी शंकाका उत्तर देकर दोनों विद्याओंकी एकता सिद्ध करते हैं— संज्ञातश्चेत्तदुक्तमस्ति तु तदपि ॥ ३ । ३ । ८ ॥ चेत्=यदि कहो कि; संज्ञातः=संज्ञासे परस्पर-भेद होनेके कारण (एकता
सूत्र ९ ] अध्याय ३ ३२३
सूत्र ९ ] अध्याय ३ ३२३ सिद्ध नहीं हो सकती) तो; तदुक्तम् = उसका उत्तर (सूत्र ३।३।१ में) दे चुके हैं; तु = तथा; तदपि = वह (संज्ञाभेदके कारण होनेवाली विद्याविषयक विषमता) भी; अस्ति = अन्यत्र है। व्याख्या — यदि कहो कि उसमें संज्ञाका अर्थात् नामका भेद है; उस विद्याका नाम दहरविद्या है और दूसरीका नाम प्राजापत्यविद्या है; इसलिये दोनोंकी एकता नहीं हो सकती तो इसका उत्तर हम पहले सूत्र (३।३।१)-में ही दे चुके हैं। वहाँ बता आये हैं कि समस्त उपनिषदोंमें भिन्न-भिन्न नामोंसे जिन ब्रह्मविद्याओंका वर्णन है, उन सबमें विधिवाक्य, फल और उद्देश्य-विधेय आदिकी एकता होनेसे सब ब्रह्मविद्याओंकी एकता है। इसलिये यहाँ संज्ञाभेदसे कोई विरोध नहीं है। इसके सिवा, जिनमें उद्देश्य-विधेय और फल आदिकी समानता नहीं है, उन विद्याओंमें संज्ञा आदिके कारण भेद होता है और वैसी विद्याओंका वर्णन भी उपनिषदोंमें है ही (छा० उ० ३।१८।१ तथा ३।१९।१)। सम्बन्ध — नामका भेद होनेपर भी विद्यामें एकता हो सकती है, इस बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरा कारण बतलाते हैं— व्याप्तेश्च समंजसम् ॥ ३।३।९ ॥ व्याप्तेः = ब्रह्म सर्वत्र व्याप्त है, इस कारण; च = भी; समंजसम् = ब्रह्म- विद्याओंमें समानता है। व्याख्या — परब्रह्म परमात्मा सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान् और सर्वज्ञ है, इसलिये ब्रह्मविषयक विद्याके भिन्न-भिन्न नाम और प्रकरण होनेपर भी उनकी एकता होना उचित है, क्योंकि उन ब्रह्मविषयक सभी विद्याओंका उद्देश्य एकमात्र परब्रह्म परमात्माके ही स्वरूपका नाना प्रकारसे प्रतिपादन करना है। सम्बन्ध — अब यह जिज्ञासा होती है कि विद्याओंकी एकता और भिन्नताका निर्णय करनेके लिये प्रकरण, संज्ञा और वर्णनकी एकता और भेदकी अपेक्षा है या नहीं? इसपर कहते हैं—
३२४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
३२४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सर्वाभेदादन्यत्रेमे ॥ ३। ३। १० ॥ सर्वाभेदात् = सर्वस्वरूप परब्रह्मसम्बन्धी विद्यासे; अन्यत्र = दूसरी विद्याके सम्बन्धसे; इमे = इन पूर्व सूत्रोंमें कहे हुए सभी हेतुओंका उपयोग है। व्याख्या—परब्रह्म परमात्मा सबसे अभिन्न सर्वस्वरूप हैं। अतः उनके तत्त्वका प्रतिपादन करनेवाली विद्याओंमें भी भेद नहीं है। अतः संज्ञा, प्रकरण और शब्दसे इनकी भिन्नता सिद्ध नहीं की जा सकती; क्योंकि ब्रह्मकी सभी संज्ञाएँ हो सकती हैं। प्रत्येक प्रकरणमें उसकी बात आ सकती है तथा उसका वर्णन भी भिन्न-भिन्न सभी शब्दोंद्वारा किया जा सकता है। किंतु ब्रह्मविद्याके अतिरिक्त जो दूसरी विद्याएँ हैं, जिनका उद्देश्य ब्रह्मका प्रतिपादन करना नहीं है; उनकी एक-दूसरीसे भिन्नता या अभिन्नताको समझनेके लिये पहले कहे हुए प्रकरण, संज्ञा और शब्द—इन तीनों हेतुओंका उपयोग किया जा सकता है। सम्बन्ध—श्रुतिमें एक जगह ब्रह्मविद्याके प्रकरणमें ब्रह्मके जो आनन्द, सर्वज्ञता, सर्वकामता, सत्यसंकल्पत्व, सर्वेश्वरत्व तथा सर्वशक्तिमत्ता आदि धर्म बताये गये हैं, उनका उपसंहार (संग्रह) दूसरी जगह ब्रह्मके वर्णनमें किया जा सकता है। यह बात पहले सूत्र (३। ३। ५)-में कही गयी, अतः यह जिज्ञासा होती है कि तैत्तिरीयोपनिषद्में आनन्दमय पुरुषके वर्णनमें पक्षीके रूपकमें जिन शब्दोंका वर्णन आता है क्या उनका भी सर्वत्र उपसंहार किया जा सकता है? इसपर कहते हैं— आनन्दादयः प्रधानस्य ॥ ३। ३। ११॥ आनन्दादयः = आनन्द आदि; प्रधानस्य = सर्वश्रेष्ठ परब्रह्म परमात्माके धर्म हैं (उन सबका अन्यत्र भी ब्रह्मके वर्णनमें अध्याहार किया जा सकता है)। व्याख्या—आनन्द, सर्वगतत्व, सर्वात्मत्व तथा सर्वज्ञता आदि जितने भी परब्रह्म परमात्माके धर्म हैं, वे यदि श्रुतिमें एक जगह ब्रह्मके वर्णनमें आये हैं तो दूसरी जगह भी ब्रह्मके वर्णनमें उनका उपसंहार किया जा सकता है अर्थात् एक जगहके वर्णनमें जो धर्म या दिव्य गुण-सूचक विशेषण छूट गये हैं, उनकी पूर्ति अन्यत्रके वर्णनसे कर लेनी चाहिये।
सूत्र १२-१३ ] अध्याय ३ ३२५
सूत्र १२-१३ ] अध्याय ३ ३२५ सम्बन्ध- "यदि ऐसी बात है, तब तो तैत्तिरीयोपनिषद्में जो आनन्दमय आत्माका प्रकरण प्रारम्भ करके कहा गया है कि 'प्रिय ही उसका सिर है, मोद दाहिना पंख है, प्रमोद बायाँ पंख है, आनन्द आत्मा है और ब्रह्म ही पुच्छ एवं प्रतिष्ठा है।' इसके अनुसार 'प्रियशिरस्त्व' आदि धर्मोंका भी सर्वत्र ब्रह्मविद्यामें संग्रह हो सकता है।" ऐसी आशंका होनेपर कहते हैं- प्रियशिरस्त्वाद्यप्राप्तिरुपचयापचयौ हि भेदे॥ ३। ३। १२॥ प्रियशिरस्त्वाद्यप्राप्तिः = 'प्रियशिरस्त्व'-'प्रियरूप सिरका होना' आदि धर्मोंकी प्राप्ति अन्यत्र ब्रह्मविद्याके प्रकरणमें नहीं होती है; हि=क्योंकि; भेदे = इस प्रकार सिर आदि अंगोंका भेद मान लेनेपर; उपचयापचयौ = ब्रह्ममें बढ़ने-घटनेका दोष उपस्थित होगा। व्याख्या-प्रिय उसका सिर है, मोद और प्रमोद पाँख हैं, इस प्रकार पक्षीका रूपक देकर जो अंगोंकी कल्पना की गयी है यह ब्रह्मका स्वरूपगत धर्म नहीं है; अतः इसका संग्रह दूसरी जगह ब्रह्मविद्याके प्रसंगमें करना उचित नहीं है; क्योंकि इस प्रकार अंग-प्रत्यंगके भेदसे ब्रह्ममें भेद मान लेनेपर उसमें बढ़ने-घटनेके दोषकी आशंका होगी; इसलिये जो ब्रह्मके स्वाभाविक लक्षण न हों, किसी रूपकके उद्देश्यसे कहे गये हों, उनको दूसरी जगह नहीं लेना चाहिये। सम्बन्ध-उसमें जो आनन्द और ब्रह्म शब्द आये हैं, उनको दूसरी जगह लेना चाहिये या नहीं? इस जिज्ञासापर कहते हैं- इतरे त्वर्थसामान्यात् ॥ ३। ३। १३॥ तु = किंतु; इतरे = दूसरे जो आनन्द आदि धर्म हैं, वे (ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन करनेके लिये श्रुतिमें कहे गये हैं, इसलिये अन्यत्र ब्रह्मविद्याके प्रसंगमें उनका ग्रहण किया जा सकता है); अर्थसामान्यात् = क्योंकि उन सबमें अर्थकी समानता है।
३२६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
३२६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ व्याख्या—रूपकके लिये अवयवकी कल्पनासे युक्त जो प्रियशिरस्त्व आदि धर्म हैं, उनको छोड़कर दूसरे-दूसरे जो आनन्द आदि स्वरूपगत धर्म हैं, उनका संग्रह प्रत्येक ब्रह्मविद्याके प्रसंगमें किया जा सकता है; क्योंकि उनमें अर्थकी समानता है अर्थात् उन सबके द्वारा प्रतिपाद्य ब्रह्म एक ही है। सम्बन्ध—कठोपनिषद्में जो रथके रूपककी कल्पना करके इन्द्रिय आदिका घोड़े आदिके रूपमें वर्णन किया है, वहाँ तो इन्द्रिय आदिके संयमकी बात समझानेके लिये वैसा कहना सार्थक मालूम होता है, परंतु यहाँ तो पक्षीके रूपकका कोई विशेष प्रयोजन नहीं दीखता। अतः यहाँ इस रूपककी कल्पना किसलिये की गयी? इस जिज्ञासापर कहते हैं— आध्यानाय प्रयोजनाभावात् ॥ ३।३।१४॥ प्रयोजनाभावात् = अन्य किसी प्रकारका प्रयोजन न होनेके कारण (यही मालूम होता है कि); आध्यानाय = उस परमेश्वरका भलीभाँति चिन्तन करनेके लिये (उसका तत्त्व रूपकद्वारा समझाया गया है)। व्याख्या—इस रूपकका दूसरा कोई प्रयोजन दिखलायी नहीं देता, इसलिये यही समझना चाहिये कि पहले जिस परब्रह्म परमेश्वरका सत्य, ज्ञान और अनन्तके नामसे वर्णन करके उसको सबके हृदयमें स्थित बतलाया है और उसकी प्राप्तिके महत्त्वका वर्णन किया है (तै० उ० २।१)। उसको प्राप्त करनेका एकमात्र उपाय बारम्बार चिन्तन करना है, पर उसके स्वरूपकी कुछ जानकारी हुए बिना चिन्तन नहीं हो सकता; अतः वह किस प्रकार सबके हृदयमें व्याप्त है; यह बात समझानेके लिये यहाँ अन्नमय आदि कोशवाचक शब्दोंके द्वारा प्रकरण उठाया गया, क्योंकि किसी पेटीमें बन्द करके गुप्त रखे हुए रत्नकी भाँति वह परमेश्वर भी सबके हृदयमें बुद्धिरूप गुफाके भीतर छिपा है; यह तत्त्व समझाना है। वहाँ सबसे पहले जो यह अन्नमय स्थूल शरीर है, इसको पुरुषके नामसे कहकर उसके अंगोंकी पक्षीके अंगोंसे तुलना करके आगेका प्रकरण चलाया गया तथा क्रमशः एकका दूसरेको अन्तरात्मा बताते हुए प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय पुरुषका वर्णन किया गया।
सूत्र १५-१६ ] अध्याय ३ ३२७
सूत्र १५-१६ ] अध्याय ३ ३२७ साथ ही प्रत्येकका आत्मा एक ही तत्त्वको निश्चित किया गया। इससे यह मालूम होता है कि उत्तरोत्तर सूक्ष्म तत्त्वके भीतर दृष्टि ले जाकर उस एक ही अन्तरात्माको लक्ष्य कराया गया है। वहाँ विज्ञानमय जीवात्माका वर्णन करके उसका भी अन्तरात्मा आनन्दमयको बतलाया। अन्तमें सबका अन्तरात्मा आनन्दमयको बतलाकर तथा उसका अन्तरात्मा भी उसीको बतलाकर इस रूपककी परम्पराको समाप्त कर दिया गया। इससे यही सिद्ध होता है कि परब्रह्म परमेश्वरका भलीभाँति चिन्तन करनेके लिये उसके सूक्ष्म तत्त्वको समझाना ही इस रूपकका प्रयोजन है। सम्बन्ध— यहाँ आनन्दमय नामसे परमात्माको ही लक्ष्य कराया गया है, अन्य किसी तत्त्वको नहीं, यह निश्चय कैसे हो सकता है? इसपर कहते हैं— आत्मशब्दाच्च ॥ ३। ३। १५ ॥ आत्मशब्दात् = आत्मशब्दका प्रयोग होनेके कारण; च = भी (यह सिद्ध हो जाता है)। व्याख्या— ऊपर कहे हुए कारणके सिवा, इस प्रकरणमें बारम्बार सबका अन्तरात्मा बताते हुए अन्तमें विज्ञानमयका अन्तरात्मा आनन्दमयको बतलाया है; उसके बाद उसका अन्तरात्मा दूसरे किसीको नहीं बतलाया। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि यहाँ आनन्दमय शब्द ब्रह्मका ही वाचक है। सम्बन्ध— 'आत्मा' शब्दका प्रयोग तो अधिकतर प्रत्यगात्मा (जीवात्मा)- का ही वाचक होता है। फिर यह निश्चय कैसे हुआ कि यहाँ 'आत्मा' शब्द ब्रह्मका वाचक है? इसपर कहते हैं— आत्मगृहीतिरितरवदुत्तरात् ॥ ३। ३। १६ ॥ आत्मगृहीतिः = आत्म-शब्दसे परमात्माका ग्रहण; इतरवत् = दूसरी श्रुतिकी भाँति; उत्तरात् = उसके बादके वर्णनसे (सिद्ध होता है)। व्याख्या— जिस प्रकार 'आत्मा वा इदमेकमेवाग्र आसीन्नान्यत् किञ्चन मिषत् स ईक्षत लोकान्नु सृजै', (ऐ० उ० १।१) 'पहले यह एक आत्मा ही