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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

९८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

९८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ अतएव च नित्यत्वम् ॥ १। ३। २९ ॥ अतएव = इसीसे; नित्यत्वम् = वेदकी नित्यता; च = भी (सिद्ध होती है)। व्याख्या—सृष्टिकर्ता परमेश्वर वैदिक शब्दोंके अनुसार ही समस्त जगत्की रचना करते हैं, यह कहा गया है। इससे वेदोंकी नित्यता स्वतःसिद्ध हो जाती है; क्योंकि प्रत्येक कल्पमें परमेश्वरद्वारा वेदोंकी भी नयी रचना की जाती है; यह बात कहीं नहीं कही गयी है। सम्बन्ध—प्रत्येक कल्पमें देवताओंके नाम-रूप बदल जानेके कारण वेदोक्त शब्दोंकी नित्यतामें विरोध कैसे नहीं आयेगा? इस जिज्ञासापर कहते हैं— समाननामरूपत्वाच्चावृत्तावप्यविरोधो दर्शनात् स्मृतेश्च ॥ १। ३। ३० ॥ च = तथा; समाननामरूपत्वात् = (कल्पान्तरमें उत्पन्न होनेवाले देवादिकों- के) नाम-रूप पहलेके ही समान होते हैं, इस कारण; आवृत्तौ = पुनः आवृत्ति होनेपर; अपि = भी; अविरोधः = किसी प्रकारका विरोध नहीं है; दर्शनात् = क्योंकि (श्रुतिमें) ऐसा ही वर्णन देखा गया है; च = और; स्मृतेः = स्मृतिसे भी (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—वेदमें कहा गया है कि 'सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्व- मकल्पयत्।' (ऋ० १०। १९०। ३) अर्थात् 'जगत्स्रष्टा परमेश्वरने सूर्य, चन्द्रमा आदि सबको पहलेकी भाँति बनाया।' श्वेताश्वतरोपनिषद् (६। १८)- में इस प्रकार वर्णन आता है— यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै। तँ ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥ 'जो परमेश्वर निश्चय ही सृष्टिकालमें सबसे पहले ब्रह्माको उत्पन्न करता है और उन्हें समस्त वेदोंका उपदेश देता है, उस आत्मज्ञानविषयक बुद्धिको प्रकट करनेवाले प्रसिद्ध देव परमेश्वरकी मैं मुमुक्षुभावसे शरण ग्रहण करता हूँ।' इसी प्रकार स्मृतिमें भी कहा गया है कि—

सूत्र ३१ ] अध्याय १ ९९

सूत्र ३१ ] अध्याय १ ९९ तेषां ये यानि कर्माणि प्राक्सृष्ट्यां प्रतिपेदिरे। तान्येव ते प्रपद्यन्ते सृज्यमानाः पुनः पुनः॥ (महा०) 'पूर्वकल्पकी सृष्टिमें जिन्होंने जिन कर्मोंको अपनाया था, बादकी सृष्टिमें बार-बार रचे हुए वे प्राणी फिर उन्हीं कर्मोंको प्राप्त होते हैं।' इस प्रकार श्रुतियों तथा स्मृतियोंके वर्णनसे यह सिद्ध होता है कि कल्पान्तरमें उत्पन्न होनेवाले देवादिकोंके नाम, रूप पहलेके सदृश ही वेद- वचनानुसार रचे जाते हैं, इसलिये उनकी बार-बार आवृत्ति होती रहनेपर भी वेदकी नित्यता तथा प्रामाणिकतामें किसी प्रकारका विरोध नहीं आता है। सम्बन्ध— २६ वें सूत्रमें जो प्रसंगवश यह बात कही गयी थी कि ब्रह्मविद्यामें देवादिका भी अधिकार है; ऐसा वेदव्यासजी मानते हैं, उसीकी पुष्टि तीसवें सूत्रतक की गयी। अब आचार्य जैमिनिके मतानुसार यह बात कही जाती है कि ब्रह्मविद्यामें देवता आदिका अधिकार नहीं है— मध्वादिष्वसम्भवादनधिकारं जैमिनिः ॥ १ । ३ । ३१ ॥ जैमिनिः = जैमिनि नामक आचार्य; मध्वादिषु = मधु-विद्या आदिमें; अनधिकारम् (आह) = देवता आदिका अधिकार नहीं बताते हैं; असम्भवात् = क्योंकि यह सम्भव नहीं है। व्याख्या— छान्दोग्योपनिषद्के तीसरे अध्यायमें प्रथमसे लेकर ग्यारहवें खण्डतक मधुविद्याका प्रकरण है। वहाँ 'सूर्य' को देवताओंका 'मधु' बताया गया है। मनुष्योंके लिये साधनद्वारा प्राप्त होनेवाली वस्तु देवताओंको स्वतः प्राप्त है; इस कारण देवताओंके लिये मधुविद्या अनावश्यक है; अतः उस विद्यामें उनका अधिकार मानना सम्भव नहीं है। इसी प्रकार स्वर्गादि देवलोकके भोगोंकी प्राप्तिके लिये जो वेदोंमें यज्ञादिके द्वारा देवताओंकी सकाम उपासनाका वर्णन है, उसका अनुष्ठान भी देवताओंके लिये अनावश्यक होनेके कारण उनके द्वारा किया जाना सम्भव नहीं है। अतएव उसमें भी उनका अधिकार नहीं है, इसलिये यह सिद्ध होता है कि जैसे मनुष्योंके लिये यज्ञादि कर्मद्वारा स्वर्गादिकी प्राप्ति

१०० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

१०० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ करानेवाली वेदवर्णित विद्याओंमें देवताओंका अधिकार नहीं है, उसी प्रकार ब्रह्मविद्यामें भी उनका अधिकार नहीं है? यों आचार्य जैमिनि कहते हैं। सम्बन्ध— इसी बातको पुष्ट करनेके लिये आचार्य जैमिनि दूसरी युक्ति देते हैं— ज्योतिषि भावाच्च ॥ १ । ३ । ३२ ॥ ज्योतिषि=ज्योतिर्मय लोकोंमें; भावात्=देवताओंकी स्थिति होनेके कारण; च=भी (उनका यज्ञादि कर्म और ब्रह्मविद्यामें अधिकार नहीं है)। व्याख्या—वे देवता स्वभावसे ही ज्योतिर्मय देवलोकोंमें निवास करते हैं, वहाँ उन्हें स्वभावसे ही सब प्रकारका ऐश्वर्य प्राप्त है, नये कर्मोंद्वारा उनको किसी प्रकारका नूतन ऐश्वर्य नहीं प्राप्त करना है; अतएव उन सब लोकोंकी प्राप्तिके लिये बताये हुए कर्मोंमें उनकी प्रवृत्ति सम्भव नहीं है; इसलिये जिस प्रकार वेदविहित अन्य विद्याओंमें उनका अधिकार नहीं है, उसी प्रकार ब्रह्मविद्यामें भी नहीं है। सम्बन्ध— पूर्वोक्त दो सूत्रोंमें जैमिनिके मतानुसार पूर्वपक्षकी स्थापना की गयी। अब उसके उत्तरमें सूत्रकार अपना निश्चित मत बतलाकर देवताओंके अधिकार-विषयक प्रकरणको समाप्त करते हैं— भावं तु बादरायणोऽस्ति हि ॥ १ । ३ । ३३ ॥ तु=किंतु; बादरायणः=बादरायण आचार्य (यज्ञादि कर्म तथा ब्रह्म- विद्यामें); भावम् (मन्यते)=देवता आदिके अधिकारका भाव (अस्तित्व) मानते हैं; हि=क्योंकि; अस्ति=श्रुतिमें (उनके अधिकारका) वर्णन है। व्याख्या—बादरायण आचार्य अपने मतका दृढ़तापूर्वक प्रतिपादन करते हुए 'तु' इस अव्यय पदके द्वारा यह सूचित करते हैं कि पूर्वपक्षीका मत शब्द- प्रमाणसे रहित होनेके कारण मान्य नहीं है। निश्चय ही यज्ञादि कर्म तथा ब्रह्मविद्यामें देवताओंका भी अधिकार है; क्योंकि वेदमें उनका यह अधिकार सूचित करनेवाले वचन मिलते हैं। जैसे—'प्रजापतिरकामयत प्रजायेयेति स एतदग्निहोत्रं मिथुनमपश्यत्। तदुदिते सूर्येऽजुहोत्।' (तै० ब्रा० २। १। २।८) तथा

सूत्र ३४ ] अध्याय १ १०१ 'देवा वै सत्रमासत्।' (तै० सं० २।३।३) अर्थात् 'प्रजापतिने इच्छा की कि मैं उत्पन्न होऊँ, भलीभाँति जन्म ग्रहण करूँ, उन्होंने अग्निहोत्ररूप मिथुनपर दृष्टिपात किया और सूर्योदय होनेपर उसका हवन किया।' तथा 'निश्चय ही देवताओंने यज्ञका अनुष्ठान किया।' इत्यादि वचनोंद्वारा देवताओंका कर्माधिकार सूचित होता है। इसी प्रकार ब्रह्मविद्यामें देवताओंका अधिकार बतानेवाले वचन ये हैं—'तद् यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत्।' (बृह० उ० १।४।१०) अर्थात् 'देवताओंमेंसे जिसने उस ब्रह्मको जान लिया, वही वह—ब्रह्म हो गया' इत्यादि। इसके सिवा, छान्दोग्योपनिषद्में (८।७।२ से ८।१२।६ तक) यह प्रसंग आता है कि इन्द्र और विरोचनने ब्रह्माजीकी सेवामें रहकर बहुत वर्षोंतक ब्रह्मचर्य-पालन करनेके पश्चात् ब्रह्मविद्या प्राप्त की। इन सब प्रमाणोंसे यही सिद्ध होता है कि देवता आदिका भी कर्म और ब्रह्मविद्यामें अधिकार है। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि क्या सभी वर्णके मनुष्योंका वेदविद्यामें अधिकार है? क्योंकि छान्दोग्योपनिषद्में ऐसा वर्णन मिलता है कि रैक्वने राजा जानश्रुतिको शूद्र कहते हुए भी उन्हें ब्रह्मविद्याका उपदेश दिया। इससे तो यही सिद्ध होता है कि शूद्रका भी ब्रह्मविद्यामें अधिकार है। अतः इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— शुगस्य तदनादरश्रवणात्तदाद्रवणात् सूच्यते हि ॥ १। ३ । ३४ ॥ तदनादरश्रवणात्=उन हंसोंके मुखसे अपना अनादर सुनकर, अस्य=इस राजा जानश्रुतिके मनमें, शुक्=शोक उत्पन्न हुआ; तत्=तदनन्तर; आद्रवणात्=(जिनकी अपेक्षा अपनी तुच्छता सुनकर शोक हुआ था) उन रैक्वमुनिके पास वह विद्याप्राप्तिके लिये दौड़ा गया; (इस कारण उन रैक्वने उसे शूद्र कहकर पुकारा) हि=क्योंकि (इससे); सूच्यते=(रैक्वमुनिकी सर्वज्ञता) सूचित होती है। व्याख्या—इस प्रकरणमें रैक्वने राजा जानश्रुतिको जो शूद्र कहकर सम्बोधित किया, इसका यह अभिप्राय नहीं है कि वह जातिसे शूद्र था; अपितु

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१०२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ वह शोकसे व्याकुल होकर दौड़ा आया था, इसलिये उसे शूद्र* कहा। यही बात उस प्रकरणकी समालोचनासे सिद्ध होती है। छान्दोग्योपनिषद्में (४।१।१ से ४ तक) वह प्रकरण इस प्रकार है— 'राजा जानश्रुति श्रद्धापूर्वक बहुत दान देनेवाला था। वह अतिथियोंके भोजन- के लिये बहुत अधिक अन्न तैयार कराकर रखता था। उनके ठहरनेके लिये उसने बहुत-सी विश्रामशालाएँ भी बनवा रखी थीं। एक दिनकी बात है, राजा जानश्रुति रातके समय अपने महलकी छतपर बैठा था। उसी समय उसके ऊपरसे आकाशमें कुछ हंस उड़ते हुए जा रहे थे। उनमेंसे एक हंसने दूसरेको पुकारकर कहा—'अरे! सावधान, इस राजा जानश्रुतिका महान् तेज आकाशमें फैला हुआ है, कहीं भूलसे उसका स्पर्श न कर लेना, नहीं तो वह तुझे भस्म कर देगा।' यह सुनकर आगे जानेवाले हंसने कहा—अरे भाई! तू किस महत्ताको लेकर इस राजाको इतना महान् मान रहा है, क्या तू इसको गाड़ीवाले रैक्वके समान समझता है?' इसपर पीछेवाले हंसने पूछा— 'रैक्व कैसा है?' अगले हंसने उत्तर दिया—'यह सारी प्रजा जो कुछ भी शुभ कर्म करती है, वह सब उस रैक्वको प्राप्त होता है तथा जिस तत्त्वको रैक्व जानता है, उसे जो कोई भी जान ले, उसकी भी ऐसी ही महिमा हो जाती है।' इस प्रकार हंसोंसे अपनी तुच्छताकी बात सुनकर राजाके मनमें शोक हुआ; फिर वह रैक्वकी खोज कराकर उनके पास विद्याग्रहणके लिये गया। रैक्व- मुनि सर्वज्ञ थे, वे राजाकी मनःस्थितिको जान गये। उन्होंने उसके मनमें जगे हुए ईर्ष्याभावको दूर करके उसमें श्रद्धाका भाव उत्पन्न करनेका विचार किया और अपनी सर्वज्ञता सूचित करके उसे सावधान करते हुए 'शूद्र' कहकर पुकारा। यह जानते हुए भी कि जानश्रुति क्षत्रिय है, रैक्वने उसे 'शूद्र' इसलिये कहा कि वह शोकके वशीभूत होकर दौड़ा आया था। अतः इससे यह नहीं सिद्ध होता कि वेदविद्यामें शूद्रका अधिकार है।

  • शुचम् आद्रवति इति शूद्रः—जो शोकके पीछे दौड़ता है, वह शूद्र है, इस व्युत्पत्तिके अनुसार रैक्वने उसे 'शूद्र' कहा।

सूत्र ३५-३६ ] अध्याय १ १०३ सम्बन्ध— राजा जानश्रुतिका क्षत्रिय होना कैसे सिद्ध होता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— क्षत्रियत्वावगतेश्चोत्तरत्र चैत्ररथेन लिंगात् ॥ १ । ३ । ३५ ॥ क्षत्रियत्वावगतेः=जानश्रुतिका क्षत्रिय होना प्रकरणमें आये हुए लक्षणसे जाना जाता है, इससे; च=तथा; उत्तरत्र=बादमें कहे हुए; चैत्ररथेन=चैत्ररथके सम्बन्धसे; लिंगात्=जो क्षत्रियत्वसूचक चिह्न या प्रमाण प्राप्त होता है, उससे भी (उसका क्षत्रिय होना ज्ञात होता है)। व्याख्या—उक्त प्रकरणमें जानश्रुतिको श्रद्धापूर्वक बहुत दान देनेवाला और अतिथियोंके लिये ही तैयार कराकर रखी हुई रसोईसे प्रतिदिन उनका सत्कार करनेवाला बताया गया है। उसके राजोचित ऐश्वर्यका भी वर्णन है, साथ ही यह भी कहा गया है कि राजाकी कन्याको रैक्वने पत्नीरूपमें ग्रहण किया। इन सब बातोंसे यह सिद्ध होता है कि वह शूद्र नहीं, क्षत्रिय था। इसलिये यही सिद्ध होता है कि वेदविद्यामें जाति-शूद्रका अधिकार नहीं है। इसके सिवा, इस प्रसंगके अन्तिम भागमें रैक्वने वायु तथा प्राणको सबका भक्षण करनेवाला कहकर उन दोनोंकी स्तुतिके लिये एक आख्यायिका उपस्थित की है। उसमें ऐसा कहा है कि 'शौनक और अभिप्रतारी चैत्ररथ— इन दोनोंको जब भोजन परोसा जा रहा था, उस समय एक ब्रह्मचारीने भिक्षा माँगी' इत्यादि। इस आख्यायिकामें राजा जानश्रुतिके यहाँ शौनक और चैत्र- रथको भोजन परोसे जानेकी बात कही गयी है, इससे जानश्रुतिका क्षत्रिय होना सिद्ध होता है; क्योंकि शौनक ब्राह्मण और चैत्ररथ क्षत्रिय थे; वे शूद्रके यहाँ भोजन नहीं कर सकते थे। अतः यही सिद्ध होता है कि जाति-शूद्रका वेदविद्यामें अधिकार नहीं है। सम्बन्ध— उपर्युक्त बातकी सिद्धिके लिये ही दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं— संस्कारपरामर्शात्तदभावाभिलापाच्च ॥ १ । ३ । ३६ ॥ संस्कारपरामर्शात्=श्रुतिमें वेदविद्या ग्रहण करनेके लिये पहले उपनयन

१०४ | वेदान्त-दर्शन | [ पाद ३

१०४ | वेदान्त-दर्शन | [ पाद ३

आदि संस्कारोंका होना आवश्यक बताया गया है, इसलिये; च= तथा; तद्भावाभिलापात् = शूद्रके लिये उन संस्कारोंका अभाव कहा गया है; इसलिये भी (जाति-शूद्रका वेदविद्यामें अधिकार नहीं है)। व्याख्या—उपनिषदोंमें जहाँ-जहाँ वेदविद्याके अध्ययनका प्रसंग आया है वहाँ सब जगह यह देखा जाता है कि आचार्य पहले शिष्यका उपनयनादि संस्कार करके ही उसे वेदविद्याका उपदेश देते हैं। यथा— 'तेषामेवैतां ब्रह्मविद्यां वदेत शिरोव्रतं विधिवद् यैस्तु चीर्णम्॥' (मु० उ० ३।२।१०) अर्थात् 'उन्हींको इस ब्रह्मविद्याका उपदेश दे, जिन्होंने विधिपूर्वक उपनयनादि संस्कार कराकर ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन किया हो।' 'उप त्वा नेष्ये' (छा० उ० ४।४।५) 'तेरा उपनयन- संस्कार करूँगा।' 'तं॒ँ होपनिन्ये।' (श० ब्रा० ११।५।३।१३) 'उसका उपनयन-संस्कार किया' इत्यादि। इस प्रकार वेदविद्याके अध्ययनमें उपनयन आदि संस्कारोंका होना परम आवश्यक माना गया है तथा शूद्रोंके लिये उन संस्कारोंका विधान नहीं किया है; इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि शूद्रोंका वेदविद्यामें अधिकार नहीं है। सम्बन्ध—इसी बातको दृढ़ करनेके लिये दूसरा कारण बताते हैं— तद्भावनिर्धारणे च प्रवृत्तेः ॥ १। ३। ३७॥ तद्भावनिर्धारणे=शिष्यमें उस शूद्रत्वका अभाव निश्चित करनेके लिये; प्रवृत्तेः=आचार्यकी प्रवृत्ति पायी जाती है, इससे; च=भी (यही सिद्ध होता है कि वेदाध्ययनमें शूद्रका अधिकार नहीं है)। व्याख्या—जानश्रुति तथा रैक्वकी कथाके बाद ही सत्यकाम जाबालका प्रसंग इस प्रकार आया है—'जाबालके पुत्र सत्यकामने गौतम नामक आचार्यकी शरणमें जाकर कहा—'भगवन्! मैं ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक आपकी सेवामें रहनेके लिये उपस्थित हुआ हूँ।' तब गौतमने उसकी जातिका निश्चय करनेके लिये पूछा—'तेरा गोत्र क्या है?' इसपर उसने स्पष्ट शब्दोंमें कहा— 'मैं अपना गोत्र नहीं जानता। मैंने अपनी मातासे गोत्र पूछा था, उसने कहा कि

सूत्र ३८ ] अध्याय १ १०५

सूत्र ३८ ] अध्याय १ १०५ 'मुझे गोत्र नहीं मालूम है, मेरा.नाम जबाला है और तेरा नाम सत्यकाम है।' इसलिये मैं तो इतना ही कह सकता हूँ कि 'मैं जबालाका पुत्र सत्यकाम हूँ।' तब गुरुने कहा- 'इतना स्पष्ट और सत्यभाषण ब्राह्मण ही कर सकता है, दूसरा कोई नहीं।' इस प्रकार सत्यभाषणरूप हेतुसे यह निश्चय करके कि सत्यकाम ब्राह्मण है, शूद्र नहीं है, उसे आचार्य गौतमने समिधा लानेका आदेश दिया और उसका उपनयन-संस्कार कर दिया' (छा० उ० ४।४।३-५)। इस तरह इस प्रकरणमें आचार्यद्वारा पहले यह निश्चय कर लिया गया कि 'सत्यकाम शूद्र नहीं, ब्राह्मण है'। फिर उसका उपनयन- संस्कार करके उसे विद्याध्ययनका अधिकार प्रदान किया गया; इससे यही सिद्ध होता है कि शूद्रका वेदविद्यामें अधिकार नहीं है। सम्बन्ध- अब प्रमाणद्वारा शूद्रके वेदविद्यामें अधिकारका निषेध करते हैं- श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषेधात् स्मृतेश्च ॥ १। ३। ३८॥ श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषेधात्=शूद्रके लिये वेदोंके श्रवण, अध्ययन तथा अर्थज्ञानका भी निषेध किया गया है, इससे; च=तथा; स्मृतेः=स्मृति-प्रमाणसे भी (यही सिद्ध होता है कि वेदविद्यामें शूद्रका अधिकार नहीं है)। व्याख्या-श्रुतिमें शूद्रके लिये वेदके श्रवण, अध्ययन तथा अर्थज्ञानका भी निषेध किया गया है। यथा- एतच्छ्मशानं यच्छूद्रस्तस्माच्छूद्रस्य समीपे नाध्येतव्यम्।' अर्थात् 'जो शूद्र है, वह श्मशानके तुल्य है, अतः शूद्रके समीप वेदाध्ययन नहीं करना चाहिये।' इसके द्वारा शूद्रके वेद-श्रवणका निषेध सूचित होता है। जब सुननेतकका निषेध है, तब अध्ययन और अर्थज्ञानका निषेध स्वतः सिद्ध हो जाता है। इससे तथा स्मृतिके वचनसे भी यही सिद्ध होता है कि 'शूद्रको वेदाध्ययनका अधिकार नहीं है।' इस विषयमें पराशर-स्मृतिका वचन इस प्रकार है- 'वेदाक्षरविचारेण शूद्रः पतति तत्क्षणात्।' (१।७३) अर्थात् 'वेदके अक्षरोंका अर्थ समझनेके लिये विचार करनेपर शूद्र तत्काल पतित हो जाता है।' मनुस्मृतिमें भी कहा है कि

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१०६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ 'न शूद्राय मतिं दद्यात्। (४।८०) अर्थात् 'शूद्रको वेदविद्याका ज्ञान नहीं देना चाहिये।' इसी प्रकार अन्य स्मृतियोंमें भी जगह-जगह शूद्रके लिये वेदके श्रवण, अध्ययन तथा अर्थज्ञानका निषेध किया गया है। इससे यही मानना चाहिये कि वेदविद्यामें शूद्रका अधिकार नहीं है। इतिहासमें जो विदुर आदि शूद्रजातीय सत्पुरुषोंको ज्ञान प्राप्त होनेकी बात पायी जाती है, उसका भाव यों समझना चाहिये कि इतिहास-पुराणोंको सुनने और पढ़नेमें चारों वर्णोंका समान रूपसे अधिकार है। इतिहास-पुराणोंके द्वारा शूद्र भी परमात्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार उसे भी भक्ति एवं ज्ञानका फल प्राप्त हो सकता है। फलप्राप्तिमें कोई विरोध नहीं है; क्योंकि भगवान्‌की भक्तिद्वारा परम गति प्राप्त करनेमें मनुष्यमात्रका अधिकार है (गीता ९। ३२)। सम्बन्ध— यहाँतकके प्रकरणमें प्रसंगवश प्राप्त हुए अधिकारविषयक वर्णनको पूरा करके यह सिद्धान्त स्थिर किया कि ब्रह्मविद्यामें देवादिका अधिकार है और शूद्रका अधिकार नहीं है। अब इस विषयको यहीं समाप्त करके पुनः पूर्वोक्त अंगुष्ठमात्र पुरुषके स्वरूपपर विचार किया जाता है— कम्पनात् ॥ १ । ३ । ३९ ॥ (पूर्वोक्त अंगुष्ठमात्र पुरुष परब्रह्म परमात्मा ही है;) कम्पनात्=क्योंकि उसीमें सम्पूर्ण जगत् चेष्टा करता है और उसीके भयसे सब काँपते हैं। व्याख्या—कठोपनिषद्के दूसरे अध्यायमें प्रथम वल्लीसे लेकर तृतीय वल्लीतक अंगुष्ठमात्र पुरुषका प्रकरण आया है (देखिये २।१।१२, १३ तथा २।३।१७ के मन्त्र)। यहाँ अंगुष्ठमात्र पुरुषके रूपमें वर्णित उस परम पुरुष परमात्माके प्रभावका वर्णन किया है तथा बादमें यह बात कही है कि— यदिदं किं च जगत् सर्वं प्राण एजति निःसृतम्। महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ (क० उ० २। ३। २) 'उस परमात्मासे निकला हुआ यह जो कुछ भी सम्पूर्ण जगत् है, वह

सूत्र ४० ] अध्याय १ १०७

सूत्र ४० ] अध्याय १ १०७ उस प्राणस्वरूप ब्रह्ममें ही चेष्टा करता है, उस उठे हुए वज्रके समान महान् भयानक सर्वशक्तिमान् परमेश्वरको जो जानते हैं वे अमर हो जाते हैं।' तथा— भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः। भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः॥ (क० उ० २। ३। ३) 'इसीके भयसे अग्नि तपता है, इसीके भयसे सूर्य तपता है, इसीके भयसे इन्द्र, वायु तथा पाँचवें मृत्यु देवता—ये सब अपने-अपने कार्यमें दौड़ रहे हैं।' इस वर्णनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि अंगुष्ठमात्र पुरुष ब्रह्म ही है; क्योंकि सम्पूर्ण जगत् जिसमें चेष्टा करता है अथवा जिसके भयसे कम्पित होकर सब देवता अपने-अपने कार्यमें संलग्न रहते हैं, वह न तो प्राणवायु हो सकता है और न इन्द्र ही। वायु और इन्द्र स्वयं ही उसकी आज्ञाका पालन करनेके लिये भयभीत रहते हैं। अतः यहाँ अंगुष्ठमात्र पुरुष ब्रह्म ही है, इसमें लेशमात्र भी संशयके लिये स्थान नहीं है। सम्बन्ध— इस पादके चौदहवें सूत्रसे लेकर तेईसवेंतक दहराकाशका प्रकरण चलता रहा। वहाँ यह बताया गया कि 'दहर' शब्द परब्रह्म परमात्माका वाचक है; फिर २४ वें सूत्रसे कठोपनिषद्में वर्णित अंगुष्ठमात्र पुरुषके स्वरूपपर विचार चल पड़ा; क्योंकि दहराकाशकी भाँति वह भी हृदयमें ही स्थित बताया गया है। उसी प्रकरणमें देवादिके वेदविद्यामें अधिकार-सम्बन्धी प्रासंगिक विषयपर विचार चल पड़ा और अड़तीसवें सूत्रमें वह प्रसंग समाप्त हुआ। फिर उनतालीसवें सूत्रमें पहलेके छोड़े हुए अंगुष्ठमात्र पुरुषके स्वरूपपर विचार किया गया। इस प्रकार बीचमें आये हुए प्रसंगान्तरोंपर विचार करके अब पुनः दहराकाशविषयक छूटे हुए प्रकरणपर विचार आरम्भ किया जाता है— ज्योतिर्दर्शनात् ॥ १। ३। ४० ॥ ज्योतिः = यहाँ 'ज्योति' शब्द परब्रह्मका ही वाचक है; दर्शनात् = क्योंकि श्रुतिमें (अनेक स्थलोंपर) ब्रह्मके अर्थमें 'ज्योतिः' शब्दका प्रयोग देखा जाता है।

१०८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

१०८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ व्याख्या-छान्दोग्योपनिषद्के अन्तर्गत दहराकाशविषयक प्रकरणमें यह कहा गया है कि 'य एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते।' (८।३।४) अर्थात् 'यह जो सम्प्रसाद (जीवात्मा) है, वह शरीरसे निकलकर परम ज्योतिको प्राप्त हो अपने स्वरूपसे सम्पन्न हो जाता है।' इस वर्णनमें जो 'ज्योतिः' शब्द आया है, वह परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है, क्योंकि श्रुतिमें अनेक स्थलोंपर ब्रह्मके अर्थमें 'ज्योतिः' शब्दका प्रयोग देखा जाता है। उदाहरणके लिये यह श्रुति उद्धृत की जाती है- 'अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते।' (छा० उ० ३।१३।७) अर्थात् 'इस द्युलोकसे परे जो परम ज्योति प्रकाशित हो रही है।' इसमें 'ज्योतिः' पद परमात्माके ही अर्थमें है; इसका निर्णय पहले किया जा चुका है। ऊपर दी हुई (८।३।४) श्रुतिमें 'ज्योतिः' पदका 'परम' विशेषण आया है; इससे भी यही सिद्ध होता है कि परब्रह्मको ही वहाँ 'परम ज्योति' कहा गया है। सम्बन्ध - उपर्युक्त सूत्रमें 'दहर' के प्रकरणमें आये हुए 'ज्योतिः' पदको परब्रह्मका वाचक बताकर उस प्रसंगको वहीं समाप्त कर दिया गया। अब यह जिज्ञासा होती है कि 'दहराकाश' के प्रकरणमें आया हुआ 'आकाश' शब्द परब्रह्मका वाचक हो, परंतु छान्दोग्य० (८।१४।१) - में जो 'आकाश' शब्द आया है, वह किस अर्थमें है? अतः इसका निर्णय करनेके लिये आगेका सूत्र प्रारम्भ करते हैं- आकाशोऽर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात् ॥ १ । ३ । ४१ ॥ आकाशः=(वहाँ) 'आकाश' शब्द परब्रह्मका ही वाचक है; अर्थान्तर- त्वादिव्यपदेशात्=क्योंकि उसे नाम-रूपमय जगत्से भिन्न वस्तु बताया गया है। व्याख्या - छान्दोग्योपनिषद् (८।१४।१)-में कहा गया है कि 'आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्ब्रह्म तदमृत ँस आत्मा।' अर्थात् 'आकाश नामसे प्रसिद्ध तत्त्व नाम और रूपका निर्वाह करनेवाला है, वे दोनों जिसके भीतर हैं, वह ब्रह्म है, वह अमृत है और वही आत्मा है।' इस प्रसंगमें 'आकाश' को नाम-रूपसे भिन्न तथा नाम-

सूत्र ४२ ] अध्याय १ १०९

सूत्र ४२ ] अध्याय १ १०९ रूपात्मक जगत्‌को धारण करनेवाला बताया गया है; इसलिये वह भूताकाश अथवा जीवात्माका वाचक नहीं हो सकता; क्योंकि भूताकाश तो स्वयं नाम-रूपात्मक प्रपंचके अन्तर्गत है और जीवात्मा सबको धारण करनेमें समर्थ नहीं है। इसलिये जो भूताकाशसहित समस्त जड-चेतनात्मक जगत्‌को अपनेमें धारण करनेवाला है, वह परब्रह्म परमात्मा ही यहाँ 'आकाश' नामसे कहा गया है। वहाँ जो ब्रह्म, अमृत और आत्मा- ये विशेषण दिये गये हैं, वे भी भूताकाश अथवा जीवात्माके उपयुक्त नहीं हैं; इसलिये उनसे भिन्न परब्रह्म परमात्माका ही वहाँ 'आकाश' नामसे वर्णन हुआ है। सम्बन्ध - यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि मुक्तात्मा जब ब्रह्मको प्राप्त होता है, उस समय उसमें ब्रह्मके सभी लक्षण आ जाते हैं। अतः यहाँ उसीको आकाश नामसे कहा गया है; ऐसा मान लें तो क्या हानि है? इसपर कहते हैं- सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर्भेदेन ॥ १। ३ । ४२ ॥ सुषुप्त्युत्क्रान्त्योः = सुषुप्ति तथा मृत्युकालमें भी; भेदेन = (जीवात्मा और परमात्माका) भेदपूर्वक वर्णन है (इसलिये 'आकाश' शब्द यहाँ परमात्माका ही बोधक है)। व्याख्या - छान्दोग्योपनिषद् (६।८।१)-में कहा है कि जिस अवस्थामें यह पुरुष सोता है, उस समय यह सत् (अपने कारण) -से सम्पन्न (संयुक्त) होता है। १ यह वर्णन सुषुप्तिकालका है। इसमें जीवात्माका 'पुरुष' नामसे और कारणभूत परमात्माका 'सत्' नामसे भेदपूर्वक उल्लेख हुआ है। इसी तरह उत्क्रान्तिका भी इस प्रकार वर्णन मिलता है - 'यह जीवात्मा इस शरीरसे निकलकर परमज्योतिः स्वरूप परमात्माको प्राप्त हो अपने शुद्धरूपसे सम्पन्न हो जाता है।' (छा० उ० ८।३।४) २ इसमें भी सम्प्रसाद नामसे जीवात्माका १-यह मन्त्र अर्थसहित पृष्ठ २९ में सूत्र १।१।९ की व्याख्यामें आ गया है। २-यह मन्त्र सूत्र १। ३। १९ की व्याख्या (पृष्ठ ९०) में आ गया है।

११० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ और 'परमज्योति' नामसे परमात्माका भेदपूर्वक निरूपण है। इस प्रकार सुषुप्ति और उत्क्रान्तिकालमें भी जीवात्मा और परमात्माका भेदपूर्वक वर्णन होनेसे उपर्युक्त 'आकाश' शब्द मुक्तात्माका वाचक नहीं हो सकता; क्योंकि मुक्तात्मामें ब्रह्मके सदृश कुछ सद्गुणोंका आविर्भाव होनेपर भी उसमें नाम-रूपात्मक जगत्को धारण करनेकी शक्ति नहीं आती। सम्बन्ध—उपर्युक्त कथनकी पुष्टिके लिये ही दूसरा हेतु उपस्थित करते हैं— पत्यादिशब्देभ्यः ॥ १ । ३ । ४३ ॥ पत्यादिशब्देभ्यः = उस परब्रह्मके लिये श्रुतिमें पति, परमपति, परममहेश्वर आदि विशेष शब्दोंका प्रयोग होनेसे भी (यह सिद्ध होता है कि जीवात्मा और परमात्मामें भेद है)। व्याख्या—श्वेताश्वतरोपनिषद् (६।७)-में परमात्माके स्वरूपका इस प्रकार वर्णन आया है— तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम्। पतिं पतीनां परमं परस्ताद् विदाम देवं भुवनेशमीड्यम्॥ 'ईश्वरोंके भी परम महेश्वर, देवताओंके भी परम देवता तथा पतियोंके भी परम पति, अखिल ब्रह्माण्डके स्वामी एवं स्तवन करनेयोग्य उस प्रकाशस्वरूप परमात्माको हमलोग सबसे परे जानते हैं।' इस मन्त्रमें देवता आदिकी कोटिमें जीवात्मा हैं और परम देवता, परम महेश्वर एवं परम पतिके नामसे परमात्माका वर्णन किया गया है। इससे भी यही निश्चय होता है कि जीवात्मा और परमात्मामें भेद है। इसलिये 'आकाश' शब्द परमात्माका ही वाचक है, मुक्त जीवका नहीं। तीसरा पाद सम्पूर्ण

चौथा पाद

चौथा पाद सम्बन्ध — पहलेके तीन पादोंमें ब्रह्मको जगत्के जन्म आदिका कारण बताकर वेदवाक्योंद्वारा वह बात प्रमाणित की गयी। श्रुतियोंमें जहाँ- जहाँ संदेह होता था, उन स्थलोंपर विचार करके उस संदेहका निवारण किया गया। आकाश, आनन्दमय, ज्योति, प्राण आदि जो शब्द या नाम ब्रह्मपरक नहीं प्रतीत होते थे; जीवात्मा या जडप्रकृतिके बोधक जान पड़ते थे, उन सबको परब्रह्म परमात्माका वाचक सिद्ध किया गया। प्रसंगवश आयी हुई दूसरी-दूसरी बातोंका भी निर्णय किया गया। अब यह जिज्ञासा होती है कि वेदमें कहीं प्रकृतिका वर्णन है या नहीं? यदि है तो उसका स्वरूप क्या माना गया है? इत्यादि। इन्हीं सब ज्ञातव्य विषयोंपर विचार करनेके लिये चतुर्थ पाद आरम्भ किया जाता है। कठोपनिषद्में 'अव्यक्त' नाम आया है; वहाँ 'अव्यक्तम्' पद प्रकृतिका वाचक है या अन्य किसीका? इस शंकाका निवारण करनेके लिये सूत्रकार कहते हैं— आनुमानिकमप्येकेषामिति चेन्न शरीररूपकविन्यस्त- गृहीतेर्दर्शयति च॥ १। ४। १॥ चेत्=यदि कहो; आनुमानिकम् = अनुमानकल्पित जडप्रकृति; अपि = भी; एकेषाम्=एक शाखावालोंके मतमें वेदप्रतिपादित है; इति न=तो यह कथन ठीक नहीं है; शरीररूपकविन्यस्तगृहीतेः = क्योंकि शरीर ही यहाँ रथके रूपकमें पड़कर 'अव्यक्त' शब्दसे गृहीत होता है; दर्शयति च=यही बात श्रुति दिखाती भी है। व्याख्या—यदि कहो कि कठोपनिषद् (१।३।११)-में जो 'अव्यक्तम्' पद आया है, वह अनुमानकल्पित या सांख्यप्रतिपादित प्रकृतिका वाचक है, तो यह ठीक नहीं है; क्योंकि आत्मा, शरीर, बुद्धि, मन, इन्द्रिय और विषय आदिकी जो रथ, रथी एवं सारथि आदिके रूपमें कल्पना की गयी है, उस कल्पनामें रथके स्थानपर शरीरको रखा गया है। उसीका नाम यहाँ

११२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४

११२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ ‘अव्यक्त’ है। यही बात उक्त प्रकरणमें प्रदर्शित है। भाव यह है कि कठोपनिषद्के इस रूपक-प्रकरणमें आत्माको रथी, शरीरको रथ, बुद्धिको सारथि, मनको लगाम, इन्द्रियोंको घोड़ा और विषयोंको उन घोड़ोंका चारा बताया गया है। इन उपकरणोंद्वारा परमपदस्वरूप परमेश्वरको ही प्राप्त करनेयोग्य कहा गया है। इस प्रकार पूरे रूपकमें सात वस्तुओंकी कल्पना हुई है। उन्हीं सातोंका वर्णन एकसे दूसरेको बलवान् बतानेमें भी होना चाहिये। वहाँ इन्द्रियोंकी अपेक्षा विषयोंको बलवान् बताया गया है। जैसे घास या चारा-दाना देखकर घोड़े हठात् उस ओर आकृष्ट होते हैं, उसी प्रकार इन्द्रियाँ भी हठात् विषयोंकी ओर खिंच जाती हैं। फिर विषयोंसे परे मनकी स्थिति कही गयी है; क्योंकि यदि सारथि लगामको खींचे रखे तो घोड़े चारा-दानाकी ओर हठात् नहीं जा सकते हैं। उसके बाद मनसे परे बुद्धिका स्थान माना गया है, वही सारथि है। लगामकी अपेक्षा सारथिको श्रेष्ठ बतलाना उचित ही है; क्योंकि लगाम सारथिके ही अधीन रहती है। बुद्धिसे परे महान् आत्मा है; यह ‘रथी’ के रूपमें कहा हुआ जीवात्मा ही होना चाहिये। ‘महान् आत्मा’ का अर्थ महत्तत्त्व मान लें तो इस रूपकमें दो दोष आते हैं। एक तो बुद्धिरूप सारथिके स्वामी रथी आत्माको छोड़ देना और दूसरा जिसका रूपकमें वर्णन नहीं है, उस महत्तत्त्वकी व्यर्थ कल्पना करना। अतः महान् आत्मा यहाँ रथीके रूपमें बताया हुआ जीवात्मा ही है। फिर महान् आत्मासे परे जो अव्यक्त कहा गया है, वह है भगवान्की शक्तिरूप प्रकृति। उसीका अंश कारणशरीर है। उसे ही इस प्रसंगमें रथका रूप दिया गया है। अन्यथा रूपकमें रथकी जगह बताया हुआ शरीर एकसे दूसरेको श्रेष्ठ बतानेकी परम्परामें छूट जाता है और अव्यक्त नामसे किसी अन्य तत्त्वकी अप्रासंगिक कल्पना करनी पड़ती है। अतः कारणशरीर भगवान्की प्रकृतिका अंश होनेसे उसे ही ‘अव्यक्त’ नामसे कहा गया है— सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि शरीरको ‘अव्यक्त’ कहना कैसे ठीक होगा; क्योंकि वह तो प्रत्यक्ष ही व्यक्त है। इसपर कहते हैं—

सूत्र २-३ ] अध्याय १ ११३

सूत्र २-३ ] अध्याय १ ११३ सूक्ष्मं तु तदर्हत्वात् ॥ १ । ४ । २ ॥ तु = किंतु; सूक्ष्मम् = (इस प्रकरणमें ‘शरीर’ शब्दसे) सूक्ष्म शरीर गृहीत होता है; तदर्हत्वात् = क्योंकि परमधामकी यात्रामें रथके स्थानमें उसीको मानना उचित है। व्याख्या—परमात्माकी शक्तिरूप प्रकृति सूक्ष्म है, वह देखने और वर्णन करनेमें नहीं आती, उसीका अंश कारणशरीर है, अतः उसको अव्यक्त कहना उचित ही है। इसके सिवा परमधामकी यात्रामें रथके स्थानमें सूक्ष्म शरीर ही माना जा सकता है, क्योंकि स्थूल तो यहीं रह जाता है।* सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जब प्रकृतिके अंशको ‘अव्यक्त’ नामसे स्वीकार कर लिया, तब सांख्यशास्त्रमें कहे हुए प्रधानको स्वीकार करनेमें क्या आपत्ति है ? सांख्यशास्त्र भी तो भूतोंके कारणरूप सूक्ष्म तत्त्वको ही ‘प्रधान’ या ‘प्रकृति’ कहता है। इसपर कहते हैं— तदधीनत्वादर्थवत् ॥ १ । ४ । ३ ॥ तदधीनत्वात् = उस परमात्माके अधीन होनेके कारण; अर्थवत् = वह (शक्तिरूपा प्रकृति) सार्थक है। व्याख्या—सांख्यमतावलम्बी प्रकृतिको स्वतन्त्र और जगत्का कारण मानते हैं; परंतु वेदका ऐसा मत नहीं है, वेदमें उस प्रकृतिको परब्रह्म परमेश्वरके ही अधीन रहनेवाली उसीकी एक शक्ति बताया गया है। शक्ति शक्तिमान्‌से भिन्न नहीं होती, अतः उसका स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं माना जाता। इस प्रकार परमात्माके अधीन उसीकी एक शक्ति होनेके कारण उसकी सार्थकता है, क्योंकि शक्ति होनेसे ही शक्तिमान् परमेश्वरके द्वारा जगत्की सृष्टि आदि कार्योंका होना सम्भव है। यदि परब्रह्म परमेश्वरको शक्तिहीन मान लिया जाय, तब वह इस जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्का कर्ता-धर्ता और संहर्ता कैसे हो

  • यह विषय सूत्र ४।२।५ से ४।२।११ तक विस्तारसे देखना चाहिये।

११४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४

११४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ सकता है? फिर तो उसे सर्वशक्तिमान् भी कैसे माना जा सकता है? श्वेताश्वतरोपनिषद्में स्पष्ट कहा गया है कि 'महर्षियोंने ध्यानयोगमें स्थित होकर परमात्मदेवकी स्वरूपभूता अचिन्त्य शक्तिका साक्षात्कार किया जो अपने गुणोंसे आवृत है।'१ वहीं यह भी कहा गया है कि उस परमेश्वरकी स्वाभाविक ज्ञान, बल और क्रियारूप शक्तियाँ नाना प्रकारकी सुनी जाती हैं।२ सम्बन्ध — वेदमें बतायी हुई प्रकृति सांख्योक्त प्रधान नहीं है, इस बातको दृढ़ करनेके लिये दूसरा कारण बताते हैं— ज्ञेयत्वावचनाच्च ॥ १ । ४ । ४ ॥ ज्ञेयत्वावचनात् = वेदमें प्रकृतिको ज्ञेय नहीं बताया गया है, इसलिये; च = भी (यह सांख्योक्त प्रधान नहीं है)। व्याख्या—सांख्यमतावलम्बी प्रकृतिको ज्ञेय मानते हैं। उनका कहना है कि 'गुणपुरुषान्तरज्ञानात् कैवल्यम्' अर्थात् 'गुणमयी प्रकृति और पुरुषका पार्थक्य जान लेनेसे कैवल्य (मोक्ष) प्राप्त होता है।' प्रकृतिके स्वरूपको अच्छी तरह जाने बिना उससे पुरुषका पार्थक्य (भेद) कैसे ज्ञात होगा, अतः उनके मतमें प्रकृति भी ज्ञेय है। परंतु वेदमें प्रकृतिको ज्ञेय अथवा उपास्य कहीं नहीं कहा गया है। वहाँ तो एकमात्र परब्रह्म परमेश्वरको ही जाननेयोग्य तथा उपास्य बताया गया है। इससे यही सिद्ध होता है कि वेदोक्त प्रकृति सांख्यवादियोंके माने हुए 'प्रधान' तत्त्वसे भिन्न है। सम्बन्ध — अपने मतकी पुष्टिके लिये सूत्रकार स्वयं ही शंका उठाकर उसका समाधान करते हैं— वदतीति चेन्न प्राज्ञो हि प्रकरणात् ॥ १ । ४ । ५ ॥ चेत् = यदि कहो; वदति = (वेद प्रकृतिको भी ज्ञेय) बताता है; इति न = तो १-'ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्।' (श्वेता० १।३) २-यह मन्त्र पृष्ठ २४ की टिप्पणीमें आ गया है।

सूत्र ६ ] अध्याय १ ११५

सूत्र ६ ] अध्याय १ ११५ ऐसा कहना ठीक नहीं है; हि=क्योंकि (वहाँ ज्ञेयतत्त्व); प्राज्ञः=परमात्मा ही है; प्रकरणात्=प्रकरणसे (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—कठोपनिषद्में जहाँ 'अव्यक्त' की चर्चा आयी है; उस प्रकरणके अन्त (१।३।१५)-में कहा गया है कि— अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत्। अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते॥ 'जो शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धसे रहित, अविनाशी, नित्य, अनादि, अनन्त, महत्से परे तथा ध्रुव (निश्चल) है, उस तत्त्वको जानकर मनुष्य मृत्युके मुखसे छूट जाता है।' 'इस मन्त्रमें ज्ञेयतत्त्वके जो लक्षण बताये गये हैं, वे सब सांख्योक्त प्रधानमें भी संगत होते हैं; अतः यहाँ प्रधानको ही ज्ञेय बताना सिद्ध होता है।' ऐसी बात यदि कोई कहे तो उसका यह कथन ठीक नहीं है; क्योंकि यहाँ परब्रह्म परमेश्वरके स्वरूपवर्णनका ही प्रकरण है; आगे-पीछे सब जगह उसीको जानने और प्राप्त करनेयोग्य बताया गया है। ऊपर जो मन्त्र उद्धृत किया गया है, उसमें बताये हुए सभी लक्षण परमात्मामें ही यथार्थरूपसे संगत होते हैं; अतः उसमें परमात्माके ही स्वरूपका वर्णन तथा उसे जाननेके फलका प्रतिपादन है, यह मानना पड़ेगा। इसलिये इस प्रकरणसे यही सिद्ध होता है कि श्रुतिमें परमात्माको ही जाननेके योग्य कहा गया है तथा उसीको जाननेका फल मृत्युके मुखसे छूटना बताया गया है। यहाँ प्रकृतिका वर्णन नहीं है। सम्बन्ध—कठोपनिषद्में अग्नि, जीवात्मा तथा परमात्मा—इन तीनका प्रकरण तो है ही; इसी प्रकार चौथे 'प्रधान' तत्त्वका भी प्रकरण मान लिया जाय तो क्या हानि है? इसपर कहते हैं— त्रयाणामेव चैवमुपन्यासः प्रश्नश्च॥ १।४।६॥ त्रयाणाम्=(इस उपनिषद्में) तीनका; एव=ही; एवम्=इस प्रकार ज्ञेय- रूपसे; उपन्यासः=उल्लेख हुआ है; च=तथा (इन्हीं तीनोंके सम्बन्धमें); प्रश्नः=प्रश्न; च=भी (किया गया) है।

११६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४

११६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ व्याख्या—कठोपनिषद्के प्रकरणमें नचिकेताने अग्नि, जीवात्मा और परमात्मा—इन्हीं तीनोंको जाननेके लिये प्रश्न किया है। अग्निविषयक प्रश्न इस प्रकार है—'स त्वमग्निँ स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि त्वँ श्रद्दधानाय मह्यम्।' (क० उ० १। १। १३) अर्थात् 'हे यमराज! आप स्वर्गकी प्राप्तिके साधनरूप अग्निको जानते हैं; अतः मुझ श्रद्धालुके लिये वह अग्निविद्या भलीभाँति समझाकर कहिये।' तदनन्तर जीव-विषयक प्रश्न इस प्रकार किया गया है—'येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके। एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहम्।' (क० उ० १। १। २०) अर्थात् "मरे हुए मनुष्यके विषयमें कोई तो कहता है, 'यह रहता है' और कोई कहता है 'नहीं रहता।' इस प्रकारकी यह शंका है, इसका निर्णय मैं आपके द्वारा उपदेश पाकर जानना चाहता हूँ।" तत्पश्चात् आगे चलकर परमात्माके विषयमें इस प्रकार प्रश्न उपस्थित किया गया है— अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात् कृताकृतात्। अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत् पश्यसि तद् वद॥ (क० उ० १। २। १४) 'जो धर्म और अधर्म दोनोंसे, कार्य-कारणरूप समस्त जगत्से एवं भूत, वर्तमान और भविष्यत्—इन तीन भेदोंवाले कालसे तथा तत्त्वसम्बन्धी समस्त पदार्थोंसे अलग है, ऐसे जिस तत्त्वको आप जानते हैं, उसीका मुझे उपदेश कीजिये।' —इस प्रकार इन तीनोंके विषयमें नचिकेताका प्रश्न है और प्रश्नके अनुसार ही यमराजका क्रमशः उत्तर भी है। अग्निविषयक प्रश्नका उत्तर क्रमशः १। १। १४ से १९ तकके मन्त्रोंमें दिया गया है। जीवविषयक प्रश्नका उत्तर पहले तो १। २। १८, १९ में, फिर २। २। ७ में दिया गया है। परमात्म- विषयक प्रश्नका उत्तर १। २। २० से लेकर ग्रन्थकी समाप्तितक दिया गया है। बीच-बीचमें कहीं जीवके स्वरूपका भी वर्णन हुआ है। परंतु 'प्रधान' के

सूत्र ७-८ ] अध्याय १ ११७

सूत्र ७-८ ] अध्याय १ ११७ विषयमें न तो कोई प्रश्न है और न उत्तर ही। इससे यह निश्चित होता है कि यहाँ उक्त तीनोंके सिवा चौथेका प्रसंग ही नहीं है। सम्बन्ध— जब प्रधानका वाचक 'अव्यक्त' शब्द उस प्रकरणमें पड़ा है तो उसे दूसरे अर्थमें कैसे लगाया जा सकता है? इसपर कहते हैं— महद्वच्च ॥ १ । ४ । ७ ॥ महद्वत् = 'महत्' शब्दकी भाँति; च=ही इसको भी दूसरे अर्थमें लेना अयुक्त नहीं है। व्याख्या—जिस प्रकार 'महत्' शब्द सांख्यशास्त्रमें महत्तत्त्वके लिये प्रयुक्त हुआ है, किंतु कठोपनिषद्में वही शब्द आत्माके अर्थमें प्रयुक्त है, उसी प्रकार 'अव्यक्त' शब्द भी दूसरे अर्थमें माना जाय तो कोई विरोध नहीं है। 'महत्' शब्दका प्रयोग जीवात्माके अर्थमें इस प्रकार आया है—'बुद्धेरात्मा महान् परः' (क० उ० १।३।१०) 'बुद्धिसे महान् आत्मा पर है।' यहाँ इसको बुद्धिसे परे बताया गया है, किंतु सांख्यमतमें बुद्धिका ही नाम महत्तत्त्व है। इसलिये यहाँ 'महत्' शब्द जीवात्माका वाचक है। इस प्रकार वेदोंमें जगह-जगह 'महत्' शब्दका प्रयोग सांख्यमतके विपरीत देखा जाता है, उसी प्रकार 'अव्यक्त' शब्दका अर्थ भी सांख्यमतसे भिन्न मानना अनुचित नहीं है, प्रत्युत उचित ही है। सम्बन्ध— 'इस प्रकरणमें आया हुआ 'अव्यक्त' शब्द यदि दूसरे अर्थमें मान लिया जाय तो भी श्वेताश्वतरोपनिषद्में 'अजा' शब्दसे अनादि प्रकृतिका वर्णन उपलब्ध होता है। वहाँ उसे श्वेत, लाल और काला—इन तीन वर्णोंवाली कहा गया है। इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि सांख्यशास्त्रोक्त त्रिगुणात्मिका प्रकृतिको ही वेदमें जगत्का कारण माना गया है।' ऐसा संदेह उपस्थित होनेपर कहते हैं— चमसवदविशेषात् ॥ १ । ४ । ८ ॥ ('अजा' शब्द वहाँ सांख्यशास्त्रोक्त प्रकृतिका ही वाचक है, यह सिद्ध