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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

सूत्र २८ ] अध्याय १ ४३

सूत्र २८ ] अध्याय १ ४३

नामसे वर्णित ब्रह्मको उस दिव्यलोकसे परे बताया है। इस प्रकार पूर्वापरके वर्णनमें भेद होनेके कारण गायत्रीको ब्रह्मका वाचक बताना संगत नहीं है, तो यह कथन ठीक नहीं है; क्योंकि दोनों जगहके वर्णनकी शैलीमें किंचित् भेद होनेपर भी वास्तवमें कोई विरोध नहीं है। दोनों स्थलोंमें श्रुतिका उद्देश्य गायत्रीशब्दवाच्य तथा ज्योतिःशब्दवाच्य ब्रह्मको सर्वोपरि परम धाममें स्थित बतलाना ही है। सम्बन्ध — 'अत एव प्राणः' (१।१।२३) इस सूत्रमें यह सिद्ध किया गया है कि उस श्रुतिमें 'प्राण' नामसे ब्रह्मका ही वर्णन है; किंतु कौषीतकि- उपनिषद् (३।२)-में प्रतर्दनके प्रति इन्द्रने कहा है कि 'मैं ज्ञानस्वरूप प्राण हूँ, तू आयु तथा अमृतरूपसे मेरी उपासना कर।' इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि इस प्रकरणमें आया हुआ 'प्राण' शब्द किसका वाचक है? इन्द्रका? प्राणवायुका? जीवात्माका? अथवा ब्रह्मका? इसपर कहते हैं— प्राणस्तथानुगमात् ॥ १।१।२८॥ प्राणः = प्राणशब्द (यहाँ भी ब्रह्मका ही वाचक है); तथानुगमात् = क्योंकि पूर्वापरके प्रसंगपर विचार करनेसे ऐसा ही ज्ञात होता है। व्याख्या — इस प्रकरणमें पूर्वापर प्रसंगपर भलीभाँति विचार करनेसे 'प्राण' शब्द ब्रह्मका ही वाचक सिद्ध होता है, अन्य किसीका नहीं; क्योंकि आरम्भमें प्रतर्दनने परम पुरुषार्थरूप वर माँगा है। उसके लिये परम हितपूर्ण इन्द्रके उपदेशमें कहा हुआ 'प्राण', 'ब्रह्म' ही होना चाहिये। ब्रह्मज्ञानसे बढ़कर दूसरा कोई हितपूर्ण उपदेश नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त उक्त प्राणको वहाँ प्रज्ञान-स्वरूप बतलाया गया है जो कि ब्रह्मके ही अनुरूप है तथा अन्तमें उसीको आनन्दस्वरूप अजर एवं अमर कहा गया है। फिर उसीको समस्त लोकोंका पालक, अधिपति एवं सर्वेश्वर बताया गया है।* ये सब बातें

  • कौषीतकि-उपनिषद्में यह प्रसंग इस प्रकार है—

४४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १

४४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ ब्रह्मके ही उपयुक्त हैं। प्रसिद्ध प्राणवायु, इन्द्र अथवा जीवात्माके लिये ऐसा कहना उपयुक्त नहीं हो सकता। इसलिये यही समझना चाहिये कि यहाँ 'प्राण' शब्द ब्रह्मका ही वाचक है। सम्बन्ध—उक्त प्रकरणमें इन्द्रने स्पष्ट शब्दोंमें स्वयं अपनेको ही प्राण कहा है। इन्द्र एक प्रभावशाली देवता तथा अजर, अमर हैं ही; फिर वहाँ 'प्राण' शब्दको इन्द्रका ही वाचक क्यों न मान लिया जाय ? इसपर कहते हैं— न वक्तुरात्मोपदेशादिति चेदध्यात्मसम्बन्धभूमा ह्यस्मिन् ॥१। १। २९॥ चेत्=यदि कहो; वक्तुः=वक्ता (इन्द्र)-का (उद्देश्य); आत्मोप- देशात्=अपनेको ही 'प्राण' नामसे बतलाना है, इसलिये; न=प्राणशब्द ब्रह्मका वाचक नहीं हो सकता; इति=(तो) यह कथन; (न)=ठीक नहीं है; हि=क्योंकि; अस्मिन्=इस प्रकरणमें, अध्यात्मसम्बन्धभूमा= अध्यात्मसम्बन्धी उपदेशकी बहुलता है। व्याख्या—यदि कहो कि इस प्रकरणमें इन्द्रने स्पष्टरूपसे अपने- आपको ही प्राण बतलाया है, ऐसी परिस्थितिमें 'प्राण' शब्दको इन्द्रका वाचक न मानकर ब्रह्मका वाचक मानना ठीक नहीं है; तो ऐसा कहना उचित नहीं है; क्योंकि इस प्रकरणमें अध्यात्मसम्बन्धी वर्णनकी बहुलता है।* यहाँ आधिदैविक वर्णन नहीं है; अतः उपास्यरूपसे बतलाया हुआ तत्त्व इन्द्र नहीं हो सकता। इसलिये यहाँ 'प्राण' शब्दको ब्रह्मका ही वाचक समझना चाहिये। सम्बन्ध—यहाँ यह प्रश्न उठता है कि यदि 'प्राण' शब्द इन्द्रका वाचक 'स होवाच प्रतर्दनस्त्वमेव वृणीष्व यं त्वं मनुष्याय हिततमं मन्यस इति....।' (कौ० उ० ३।१) 'स होवाच प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा।' (कौ० उ० ३। २) 'एष प्राण एव प्रज्ञात्मा- ऽऽनन्दोऽजरोऽमृत..... एष लोकपाल एष लोकाधिपतिरेष सर्वेश्वरः।' (कौ० उ० ३। ९)

  • इस प्रसंगमें अध्यात्मसम्बन्धी वर्णनकी बहुलता किस प्रकार है, यह पूर्वसूत्रकी टिप्पणीमें देखें।

सूत्र ३०-३१ ] अध्याय १ ४५ नहीं है तो इन्द्रने जो यह कहा कि 'मैं ही प्रज्ञानस्वरूप प्राण हूँ, तू मेरी उपासना कर।' इस कथनकी क्या गति होगी? इसपर कहते हैं— शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत् ॥ १। १। ३०॥ उपदेशः = (यहाँ) इन्द्रका अपनेको प्राण बतलाना; तू = तो; वामदेववत् = वामदेवकी भाँति; शास्त्रदृष्ट्या = (केवल) शास्त्र-दृष्टिसे है। व्याख्या—बृहदारण्यकोपनिषद् (१। ४। १०)-में यह वर्णन आया है कि 'तद् यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तद्भवत्तथर्षीणां तथा मनुष्याणां तद्वैतत्पश्यन्नृषिर्वामदेवः प्रतिपेदेऽह मनुरभवँ_सूर्यश्चेति।' अर्थात् 'उस ब्रह्मको देवताओंमें जिसने जाना, वही ब्रह्मरूप हो गया। इसी प्रकार ऋषियों और मनुष्योंमें भी जिसने उसे जाना, वह तद्रूप हो गया। उसे आत्मरूपसे देखते हुए ऋषि वामदेवने जाना कि 'मैं मनु हुआ और मैं ही सूर्य हुआ।' इससे यह बात सिद्ध होती है कि जो महापुरुष उस परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है, वह उसके साथ एकताका अनुभव करता हुआ ब्रह्मभावापन्न होकर ऐसा कह सकता है। अतएव उस वामदेव ऋषिकी भाँति ही इन्द्रका ब्रह्मभावापन्न-अवस्थामें शास्त्र-दृष्टिसे यह कहना है कि 'मैं ही ज्ञानस्वरूप प्राण हूँ अर्थात् परब्रह्म परमात्मा हूँ। तू मुझ परमात्माकी उपासना कर।' अतः 'प्राण' शब्दको ब्रह्मका वाचक माननेमें कोई आपत्ति नहीं रह जाती। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे शंका उपस्थित करके उसके समाधानद्वारा प्राणको ब्रह्मका वाचक सिद्ध करते हुए इस प्रकरणका उपसंहार करते हैं— जीवमुख्यप्राणलिंगान्नेति चेन्नोपासात्रैविध्यादाश्रित- त्वादिह तद्योगात् ॥ १। १। ३१॥ चेत् = यदि कहो; जीवमुख्यप्राणलिंगात् = (इस प्रसंगके वर्णनमें) जीवात्मा तथा प्रसिद्ध प्राणके लक्षण पाये जाते हैं, इसलिये; न = प्राण शब्द ब्रह्मका वाचक नहीं है; इति न = तो यह कहना ठीक नहीं है;

४६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १

४६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १

उपासात्रैविध्यात् = क्योंकि ऐसा माननेपर त्रिविध उपासनाका प्रसंग उपस्थित होगा; आश्रितत्वात् = (इसके सिवा) सब लक्षण ब्रह्मके आश्रित हैं (तथा); इह तद्योगात् = इस प्रसंगमें ब्रह्मके लक्षणोंका भी कथन है इसलिये (यहाँ 'प्राण' शब्द ब्रह्मका ही वाचक है) । व्याख्या—कौषीतकि-उपनिषद् (३।८)-के उक्त प्रसंगमें जीवके लक्षणोंका इस प्रकार वर्णन हुआ है—'न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्यात्।' अर्थात् 'वाणीको जाननेकी इच्छा न करे। वक्ताको जानना चाहिये।' यहाँ वाणी आदि कार्य और करणके अध्यक्ष जीवात्माको जाननेके लिये कहा है। इसी प्रकार प्रसिद्ध प्राणके लक्षणका भी वर्णन मिलता है—'अथ खलु प्राण एव प्रज्ञात्मेदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति।' (३। ३) अर्थात् 'निस्संदेह प्रज्ञानात्मा प्राण ही इस शरीरको ग्रहण करके उठाता है।' शरीरको धारण करना मुख्य प्राणका ही धर्म है; इस कथनको लेकर यदि यह कहो कि 'प्राण' शब्द ब्रह्म-वाचक नहीं होना चाहिये, तो यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि ब्रह्मके अतिरिक्त जीव और प्राणको भी उपास्य माननेसे त्रिविध उपासनाका प्रसंग उपस्थित होगा, जो उचित नहीं है। इसके सिवा, जीव और प्राण आदिके धर्मोंका आश्रय भी ब्रह्म ही है, इसलिये ब्रह्मके वर्णनमें उनके धर्मोंका आना अनुचित नहीं है। यहाँ ब्रह्मके लोकाधिपति, लोकपाल आदि लक्षणोंका भी स्पष्ट वर्णन मिलता है। इन सब कारणोंसे यहाँ 'प्राण' शब्द ब्रह्मका ही वाचक है। इन्द्र, जीवात्मा अथवा प्रसिद्ध प्राणका नहीं—यही मानना ठीक है।

पहला पाद सम्पूर्ण

दूसरा पाद

दूसरा पाद प्रथम पादमें यह निर्णय किया गया कि 'आनन्दमय', 'आकाश', 'ज्योति' तथा 'प्राण' आदि नामोंसे उपनिषद्में जो जगत्के कारणका और उपास्यदेवका वर्णन आया है, वह परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन है। 'प्राण' शब्दका प्रसंग आनेसे छान्दोग्योपनिषद् (३। १४। २)-में आये हुए 'मनोमयः प्राणशरीरः' आदि वचनोंका स्मरण हो आया। अतः उक्त उपनिषद्के तीसरे अध्यायके चौदहवें खण्डपर विचार करनेके लिये द्वितीय पाद प्रारम्भ करते हैं। इस पादमें यह पहला प्रकरण आठ सूत्रोंका है। छान्दोग्योपनिषद् (३। १४। १)-में पहले तो सम्पूर्ण जगत्को ब्रह्मरूप समझकर उसकी उपासना करनेके लिये कहा गया है। उसके बाद उसके लिये 'सत्यसंकल्प', 'आकाशात्मा' और 'सर्वकर्मा' आदि विशेषण दिये गये हैं (३। १४। २), जो कि ब्रह्मके प्रतीत होते हैं। तत्पश्चात् उसको 'अणीयान्' अर्थात् अत्यन्त छोटा और 'ज्यायान्' अर्थात् सबसे बड़ा बताकर हृदयके भीतर रहनेवाला अपना आत्मा और ब्रह्म भी कहा है (३। १४। ३-४) इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि उक्त उपास्यदेव कौन है? जीवात्मा या परमात्मा अथवा कोई दूसरा ही? इसका निर्णय करनेके लिये यह प्रकरण आरम्भ किया जाता है— सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात्॥ १। २। १॥ सर्वत्र=सम्पूर्ण वेदान्त-वाक्योंमें; प्रसिद्धोपदेशात्=(जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और लयके कारणरूपसे) प्रसिद्ध परब्रह्मका ही उपास्यदेवके रूपमें उपदेश हुआ है, इसलिये (छान्दोग्यश्रुति ३। १४ में बताया हुआ उपास्यदेव ब्रह्म ही है)। व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद् अध्याय ३ के चौदहवें खण्डके आरम्भमें सबसे पहले यह मन्त्र आया है—'सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त

४८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ उपासीत। अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतुरस्मँल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत॥' अर्थात् 'यह सम्पूर्ण चराचर जगत् निश्चय ब्रह्म ही है; क्योंकि यह उसीसे उत्पन्न हुआ है, स्थितिके समय उसीमें चेष्टा करता है और अन्तमें उसीमें लीन हो जाता है। साधकको राग-द्वेषरहित शान्तचित्त होकर इस प्रकार उपासना करनी चाहिये। अर्थात् ऐसा ही निश्चयात्मक भाव धारण करना चाहिये; क्योंकि यह मनुष्य संकल्पमय है। इस लोकमें यह जैसे संकल्पसे युक्त होता है, यहाँसे चले जानेपर परलोकमें यह वैसा ही बन जाता है। अतः उसे उपर्युक्त निश्चय करना चाहिये।' इस मन्त्र-वाक्यमें उसी परब्रह्मकी उपासना करनेके लिये कहा गया है, जिससे इस जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होते हैं तथा जो समस्त वेदान्त-वाक्योंमें जगत्के महाकारणरूपसे प्रसिद्ध है। अतः इस प्रकरणमें बताया हुआ उपास्यदेव परब्रह्म परमात्मा ही है, दूसरा नहीं। सम्बन्ध— यहाँ यह प्रश्न उठता है कि (छा० उ० ३।१४।२ में) उपास्यदेवको मनोमय और प्राणरूप शरीरवाला कहा गया है। ये विशेषण जीवात्माके हैं, अतः उसको ब्रह्म मान लेनेसे उस वर्णनकी संगति कैसे लगेगी? इसपर कहते हैं— विवक्षितगुणोपपत्तेश्च ॥ १। २। २॥ च = तथा; विवक्षितगुणोपपत्तेः = श्रुतिद्वारा वर्णित गुणोंकी संगति उस परब्रह्ममें ही होती है; इसलिये (इस प्रकरणमें कथित उपास्यदेव ब्रह्म ही है)। व्याख्या—छा० उ० (३।१४।२)-में उपास्यदेवका वर्णन इस प्रकार उपलब्ध होता है—'मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः सत्यसंकल्प आकाशात्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः॥' अर्थात् 'वह उपास्यदेव मनोमय, प्राणरूप शरीरवाला, प्रकाशस्वरूप, सत्यसंकल्प, आकाशके सदृश व्यापक, सम्पूर्ण जगत्का कर्ता, पूर्णकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, इस समस्त जगत्को सब ओरसे व्याप्त करनेवाला,

सूत्र ३-४ ] अध्याय १ ४९

सूत्र ३-४ ] अध्याय १ ४९ वाणीरहित तथा सम्भ्रमशून्य है।' इस वर्णनमें उपास्यदेवके जो उपादेय गुण बताये गये हैं, वे सब ब्रह्ममें ही संगत होते हैं। ब्रह्मको 'मनोमय' तथा 'प्राणरूप शरीरवाला' कहना भी अनुचित नहीं है; क्योंकि वह सबका अन्तर्यामी आत्मा है। केनोपनिषद्में उसको मनका भी मन तथा प्राणका भी प्राण बताया है *। इसलिये इस प्रकरणमें बतलाया हुआ उपास्यदेव परब्रह्म परमेश्वर ही है। सम्बन्ध— उपर्युक्त सूत्रमें श्रुतिवर्णित गुणोंकी उपपत्ति (संगति) ब्रह्ममें बतायी गयी, अब जीवात्मामें उन गुणोंको अनुपपत्ति बताकर पूर्वोक्त सिद्धान्तकी पुष्टि की जाती है— अनुपपत्तेस्तु न शारीरः ॥ १ । २ । ३ ॥ तु=परंतु; अनुपपत्तेः=जीवात्मामें श्रुतिवर्णित गुणोंकी संगति न होनेके कारण; शारीरः=जीवात्मा; न=(इस प्रकरणमें कहा हुआ उपास्यदेव) नहीं है। व्याख्या—उपासनाके लिये श्रुतिमें जो सत्य-संकल्पता, सर्वव्यापकता, सर्वात्मकता, सर्वशक्तिमत्ता आदि गुण बताये गये हैं, वे जीवात्मामें नहीं पाये जाते; इस कारण इस प्रसंगमें बताया हुआ उपास्यदेव जीवात्मा नहीं है; ऐसा मानना ही ठीक है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे उसी बातको सिद्ध किया जाता है— कर्मकर्तृव्यपदेशाच्च ॥ १ । २ । ४ ॥ कर्मकर्तृव्यपदेशात्=उक्त प्रकरणमें उपास्यदेवको प्राप्तिक्रियाका कर्म अर्थात् प्राप्त होनेयोग्य कहा है और जीवात्माको प्राप्तिक्रियाका कर्ता अर्थात् उस ब्रह्मको प्राप्त करनेवाला बताया है, इसलिये; च=भी (जीवात्मा उपास्य नहीं हो सकता)।

  • श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद् वाचो ह वाचँ स उ प्राणस्य प्राणः। (के० उ० १ । २)

५० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ व्याख्या—छा० उ० (३।१४।४)-में कहा गया है कि 'सर्व-कर्मा' आदि विशेषणोंसे युक्त ब्रह्म ही मेरे हृदयमें रहनेवाला मेरा आत्मा है; मरनेके बाद यहाँसे जाकर परलोकमें मैं इसीको प्राप्त होऊँगा।'१ इस प्रकार यहाँ पूर्वोक्त उपास्यदेवको प्राप्त होनेयोग्य तथा जीवात्माको उसे पानेवाला कहा गया है। अतः यहाँ उपास्यदेव परब्रह्म परमात्मा है और उपासक जीवात्मा। यही मानना उचित है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे पुनः उक्त बातकी ही पुष्टि करते हैं— शब्दविशेषात् ॥ १ । २ । ५ ॥ शब्दविशेषात्=(उपास्य और उपासकके लिये) शब्दका भेद होनेके कारण भी (यह सिद्ध होता है कि यहाँ उपास्यदेव जीवात्मा नहीं है)। व्याख्या—छा० उ० (३।१४)-के तीसरे और चौथे मन्त्रमें कहा गया है२ कि 'यह मेरे हृदयके अंदर रहनेवाला अन्तर्यामी आत्मा है। यह ब्रह्म है।' इस कथनमें 'एषः' (यह) 'आत्मा' तथा 'ब्रह्म'—ये प्रथमान्त शब्द उपास्यदेवके लिये प्रयुक्त हुए हैं और 'मे' अर्थात् 'मेरा' यह षष्ठ्यन्त पद भिन्नरूपसे उपासक जीवात्माके लिये प्रयुक्त हुआ है। इस प्रकार दोनोंके लिये प्रयुक्त हुए शब्दोंमें भेद होनेके कारण उपास्यदेव जीवात्मासे भिन्न सिद्ध होता है। अतः जीवात्माको उपास्यदेव नहीं माना जा सकता। १-'एष म आत्मान्तर्हृदयेऽणीयान् व्रीहेर्वा यवाद् वा सर्षपाद् वा श्यामाकाद् वा श्यामाकतण्डुलाद् वैष म आत्मान्तर्हृदये ज्यायान् पृथिव्या ज्यायानन्तरिक्षाज्ज्यायान् दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः ॥' (छा० उ० ३।१४।३) 'सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादर एष म आत्मान्तर्हृदय एतद् ब्रह्मैतमितः प्रेत्याभिसम्भवितास्मि।' (छा० उ० ३।१४।४)। २-ये दोनों मन्त्र चौथे सूत्रकी टिप्पणीमें देखें।

सूत्र ६-७ ] अध्याय १ ५१ सम्बन्ध—इसके सिवा— स्मृतेश्च ॥ १ । २ । ६ ॥ स्मृतेः=स्मृति-प्रमाणसे; च=भी (उपास्य और उपासकका भेद सिद्ध होता है)। व्याख्या—श्रीमद्भगवद्गीता आदि स्मृतिग्रन्थसे भी उपास्य और उपासकका भेद सिद्ध होता है। जैसे— मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय। निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥ (गीता १२।८) 'मुझमें ही मनको लगा और मुझमें ही बुद्धिको लगा; इसके पश्चात् तू मुझमें ही निवास करेगा अर्थात् मुझे ही प्राप्त करेगा; इसमें कुछ भी संशय नहीं है।' अन्तकाले च मामेव स्मरन् मुक्त्वा कलेवरम्। यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥ (गीता ८।५) 'और जो पुरुष अन्तकालमें मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीरको त्यागकर जाता है, वह मेरे स्वरूपको प्राप्त होता है; इसमें कुछ भी संशय नहीं है।' अतः इस प्रसंगके वर्णनमें उपास्यदेव परब्रह्म परमात्मा ही है, आत्मा या अन्य कोई नहीं। यही मानना ठीक है। सम्बन्ध—छा० उ० (३।१४)-के तीसरे और चौथे मन्त्रोंमें उपास्यदेवको हृदयमें स्थित—एकदेशीय बतलाया है तथा तीसरे मन्त्रमें उसे सरसों और सावाँसे भी छोटा बताया है; इस अवस्थामें उसे परब्रह्म कैसे माना जा सकता है? इसपर कहते हैं— अर्भकौकस्त्वात्तद्व्यपदेशाच्च नेति चेन्न निचाय्य- त्वादेवं व्योमवच्च ॥ १ । २ । ७ ॥ चेत्=यदि कहो; अर्भकौकस्त्वात्=उपास्यदेव हृदयरूप छोटे स्थानवाला है, इसलिये; च=तथा; तद्व्यपदेशात्=उसे अत्यन्त छोटा बताया गया है, इस कारण; न=वह ब्रह्म नहीं हो सकता; इति न=तो यह कहना ठीक नहीं है;

५२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

५२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ निचाय्यत्वात् = क्योंकि (वह) हृदयदेशमें द्रष्टव्य है, इसलिये; एवम् = उसके विषयमें ऐसा कहा गया है; च = तथा; व्योमवत् = वह आकाशकी भाँति सर्वत्र व्यापक है (इस दृष्टिसे भी ऐसा कहना उचित है)। व्याख्या - यदि कोई यह शंका करे कि छा० उ० (३ । १४) - के तीसरे और चौथे मन्त्रोंमें उपास्यदेवका स्थान हृदय बताया गया है, जो बहुत छोटा है तथा तीसरे मन्त्रमें उसे धान, जौ, सरसों तथा सावाँसे भी अत्यन्त छोटा कहा गया है। इस प्रकार एकदेशीय और अत्यन्त लघु बताया जानेके कारण यहाँ उपास्यदेव परब्रह्म नहीं हो सकता; क्योंकि परब्रह्म परमात्माको सबसे बड़ा, सर्वव्यापी तथा सर्वशक्तिमान् बताया गया है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; क्योंकि उक्त मन्त्रमें जो परब्रह्म परमात्माको हृदयमें स्थित बताया गया है, वह उसके उपलब्धिस्थानकी अपेक्षासे है। भाव यह है कि परब्रह्म परमात्माका स्वरूप आकाशकी भाँति सूक्ष्म और व्यापक है। अतः वह सर्वत्र है। प्रत्येक प्राणीके हृदयमें भी है और उसके बाहर भी १ (ईशा० ५)। (गीता १३ । १५) २ अतएव उसे हृदयस्थ बता देनेमात्रसे उसका एकदेशीय होना सिद्ध नहीं होता तथा जो उसे धान, जौ, सरसों और सावाँसे भी छोटा बताया गया है, इससे श्रुतिका उद्देश्य उसे छोटे आकारवाला बताना नहीं है, अपितु अत्यन्त सूक्ष्म और इन्द्रियोंद्वारा अग्राह्य (ग्रहण करनेमें न आनेवाला) बतलाना है। इसीलिये उसी मन्त्रमें यह भी कहा गया है कि वह पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्युलोक और समस्त लोकोंसे भी बड़ा है। भाव यह है कि वह इतना सूक्ष्म होते हुए भी समस्त लोकोंके बाहर-भीतर व्याप्त और उनसे परे भी है। सर्वत्र वही है। इसलिये यहाँ उपास्यदेव परब्रह्म परमात्मा ही है, दूसरा कोई नहीं। १-तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः ॥ (ईशा० ५) २-बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च। सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥ (गीता १३ । १५) 'वह परमात्मा चराचर सब भूतोंके बाहर-भीतर परिपूर्ण है तथा चर और अचर भी है तथा वह सूक्ष्म होनेसे अविज्ञेय है और अत्यन्त समीप एवं दूरमें भी स्थित वही है।'

सूत्र ८-९ ] अध्याय १ ५३ सम्बन्ध— परब्रह्म परमात्मा सबके हृदयमें स्थित होकर भी उनके सुख- दु:खसे अभिभूत नहीं होता; उसकी इस विशेषताको बतानेके लिये कहते हैं— सम्भोगप्राप्तिरिति चेन्न वैशेष्यात् ॥ १।२।८॥ चेत्=यदि कहो; सम्भोगप्राप्तिः=(सबके हृदयमें स्थित होनेसे चेतन होनेके कारण उसको) सुख-दुःखोंका भोग भी प्राप्त होता होगा; इति न=तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; वैशेष्यात्=क्योंकि जीवात्माकी अपेक्षा उस परब्रह्ममें विशेषता है। व्याख्या—यदि कोई यह शंका करे कि आकाशकी भाँति सर्वव्यापक परमात्मा समस्त प्राणियोंके हृदयमें स्थित होनेके कारण उन जीवोंके सुख- दुःखोंका भोग भी करता ही होगा; क्योंकि वह आकाशकी भाँति जड नहीं, चेतन है और चेतनमें सुख-दुःखकी अनुभूति स्वाभाविक है तो यह कथन ठीक नहीं है; क्योंकि परमात्मामें कर्तापनका अभिमान और भोक्तापन नहीं है। वह सबके हृदयमें रहता हुआ भी उनके गुण-दोषोंसे सर्वथा असंग है। यही जीवोंकी अपेक्षा उसमें विशेषता है। जीवात्मा तो अज्ञानके कारण कर्ता और भोक्ता है; किंतु परमात्मा सर्वथा निर्विकार है। वह केवलमात्र साक्षी है, भोक्ता नहीं (मु० उ० ३।१।१)*। इसलिये जीवोंके कर्मफलरूप सुख- दुःखादिसे उसका सम्बन्ध होना सम्भव नहीं है। सम्बन्ध— ऊपर कहे हुए प्रकरणमें यह सिद्ध किया गया कि सबके हृदयमें निवास करते हुए भी परब्रह्म भोक्ता नहीं है, परंतु वेदान्तमें कहीं-कहीं परमात्माको भोक्ता भी बताया गया है (क० उ० १।२।२५)। फिर यह वचन किसी अन्यके विषयमें है या उसका कोई दूसरा ही अर्थ है? यह निर्णय करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं— अत्ता चराचरग्रहणात् ॥ १।२।९॥ चराचरग्रहणात्=चर और अचर सबको ग्रहण करनेके कारण यहाँ;

  • तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥ (मु० उ० ३।१।१)

५४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

५४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ अत्ता=भोजन करनेवाला अर्थात् प्रलयकालमें सबको अपनेमें विलीन करनेवाला (परब्रह्म परमेश्वर ही है)। व्याख्या—कठोपनिषद् (१।२।२५)-में कहा गया है कि 'यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः। मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः॥' अर्थात् (संहारकालमें) जिस परमेश्वरके ब्राह्मण और क्षत्रिय अर्थात् समस्त स्थावर-जंगम प्राणिमात्र भोजन बन जाते हैं तथा सबका संहार करनेवाला मृत्यु उपसेचन (व्यंजन—शाक आदि) बन जाता है, वह परमेश्वर जहाँ और जैसा है, यह कौन जान सकता है।' इस श्रुतिमें जिस भोक्ताका वर्णन है, वह कर्मफलरूप सुख-दुःख आदिका भोगनेवाला नहीं है। अपितु संहारकालमें मृत्युसहित समस्त चराचर जगत्‌को अपनेमें विलीन कर लेना ही यहाँ उसका भोक्तापन है। इसलिये परब्रह्म परमात्माको ही यहाँ अत्ता या भोक्ता कहा गया है, अन्य किसीको नहीं। सम्बन्ध—इसी बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं— प्रकरणाच्च ॥ १।२।१०॥ प्रकरणात्=प्रकरणसे; च=भी (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—उपर्युक्त मन्त्रके पूर्व बीसवेंसे चौबीसवेंतक परब्रह्म परमेश्वरका ही प्रकरण है। उसीके स्वरूपका वर्णन करके उसे जाननेका महत्त्व तथा उसकी कृपाको ही उसे जाननेका उपाय बताया गया है। उक्त मन्त्रमें भी उस परमेश्वरको जानना अत्यन्त दुर्लभ बतलाया गया है, जो कि पहलेसे चले आते हुए प्रकरणके अनुरूप हैं। अतः पूर्वापरके प्रसंगको देखनेसे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ परब्रह्म परमेश्वरको ही अत्ता (भोजन करनेवाला) कहा गया है। सम्बन्ध—अब यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि इसके बादवाली श्रुति (१।३।१)-में (कर्मफलरूप) 'ऋत' को पीनेवाले छाया और धूपके सदृश दो भोक्ताओंका वर्णन है। यदि परमात्मा कर्मफलका भोक्ता नहीं है तो उक्त दो भोक्ता कौन-कौन-से हैं? इसपर कहते हैं—

सूत्र ११] अध्याय १ ५५ गुहां प्रविष्टावात्मानौ हि तद्दर्शनात् ॥ १।२।११॥ गुहाम् = हृदयरूप गुहामें; प्रविष्टौ = प्रविष्ट हुए दोनों; आत्मानौ = जीवात्मा और परमात्मा; हि = ही हैं; तद्दर्शनात् = क्योंकि (दूसरी श्रुतिमें भी) ऐसा ही देखा जाता है। व्याख्या-कठोपनिषद् (१।३।१)-में कहा है-'ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे। छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥' अर्थात् 'शुभ कर्मोंके फलस्वरूप मनुष्य-शरीरके भीतर परब्रह्मके उत्तम निवास-स्थान (हृदयाकाश)-में बुद्धिरूप गुहामें छिपे हुए तथा 'सत्य' का पान करनेवाले दो हैं, वे दोनों छाया और धूपकी भाँति परस्पर विरुद्ध स्वभाववाले हैं। यह बात ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी कहते हैं। तथा जो तीन बार नाचिकेत अग्निका चयन करनेवाले पंचाग्नि-सम्पन्न गृहस्थ हैं, वे भी कहते हैं।' इस मन्त्रमें कहे हुए दोनों भोक्ता जीवात्मा और परमात्मा ही हैं। उन्हींका वर्णन छाया और धूपके रूपमें हुआ है। परमात्मा सर्वज्ञ, पूर्ण ज्ञानस्वरूप एवं स्वप्रकाश है, अतः उसका धूपके नामसे वर्णन किया गया है और जीवात्मा अल्पज्ञ है। उसमें जो कुछ स्वल्प ज्ञान है, वह भी परमात्माका ही है। जैसे छायामें जो थोड़ा प्रकाश होता है, वह धूपका ही अंश होता है। इसलिये जीवात्माको छायाके नामसे कहा गया है। दूसरी श्रुतिमें भी जीवात्मा और परमात्माका एक साथ मनुष्य-शरीरमें प्रविष्ट होना इस प्रकार कहा है-'सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि' (छा० उ० ६।३।२) अर्थात् 'उस देवता (परमात्मा)- ने ईक्षण (संकल्प) किया कि मैं इस जीवात्माके सहित इन तेज आदि तीनों देवताओंमें अर्थात् इनके कार्यरूप शरीरमें प्रविष्ट होकर नाम और रूपको प्रकट करूँ।' इससे भी यही सिद्ध होता है कि उपर्युक्त कठोपनिषद्के मन्त्रमें कहे हुए छाया और धूप-सदृश दो भोक्ता जीवात्मा और परमात्मा ही हैं। यहाँ जो जीवात्माके साथ-साथ परमात्माको सत्य अर्थात् श्रेष्ठ

५६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

५६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ कर्मोंके फलका भोगनेवाला बताया गया है, उसका यह भाव है कि परब्रह्म परमेश्वर ही समस्त देवता आदिके रूपमें प्रकारान्तरसे समस्त यज्ञ और तपरूप शुभ कर्मोंके भोक्ता हैं।१ परंतु उनका भोक्तापन सर्वथा निर्दोष है, इसलिये वे भोक्ता होते हुए भी अभोक्ता ही हैं।२ सम्बन्ध—उपर्युक्त कथनकी सिद्धिके लिये ही दूसरा हेतु उपस्थित करते हैं— विशेषणाच्च ॥ १ । २ । १२ ॥ विशेषणात्=(आगेके मन्त्रोंमें) दोनोंके लिये अलग-अलग विशेषण दिये गये हैं, इसलिये; च=भी (उपर्युक्त दोनों भोक्ताओंको जीवात्मा और परमात्मा मानना ही ठीक है)। व्याख्या—इसी अध्यायके दूसरे मन्त्रमें उस परम अक्षर ब्रह्मको संसारसे पार होनेकी इच्छावालोंके लिये 'अभयपद' बताया गया है। तथा उसके बाद रथके दृष्टान्तमें जीवात्माको रथी और उस परब्रह्म परमेश्वरको प्राप्तव्य परमधामके नामसे कहा गया है। इस प्रकार उन दोनोंके लिये पृथक्-पृथक् विशेषण होनेसे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ जिनको गुहामें प्रविष्ट बताया गया है, वे जीवात्मा और परमात्मा ही हैं। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि परमात्माकी उपलब्धि हृदयमें होती है, इसलिये उसे हृदयमें स्थित बताना तो ठीक है, परंतु छान्दोग्योपनिषद् (४। १५। १)-में ऐसा कहा है कि 'यह जो नेत्रमें पुरुष दीखता है, यह आत्मा है, यही अमृत है, यही अभय और ब्रह्म है।' अतः यहाँ नेत्रमें स्थित पुरुष कौन है? इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— १-भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्। सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥ (गीता ५।२९) अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च। (गीता ९।२४) २-सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्। असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च॥ (गीता १३।१४)

सूत्र १३] अध्याय १ ५७

सूत्र १३] अध्याय १ ५७ अन्तर उपपत्तेः ॥ १।२।१३ ॥ अन्तरे = जो नेत्रके भीतर दिखायी देनेवाला कहा गया है, वह ब्रह्म ही है; उपपत्तेः = क्योंकि ऐसा माननेसे ही पूर्वापर प्रसंगकी संगति बैठती है। व्याख्या - यह प्रसंग छान्दोग्योपनिषद्में चौथे अध्यायके दशम खण्डसे आरम्भ होकर पंद्रहवें खण्डमें समाप्त हुआ है। प्रसंग यह है कि उपकोसल नामका ब्रह्मचारी सत्यकाम नामक ऋषिके आश्रममें रहकर ब्रह्मचर्यका पालन करता हुआ गुरु और अग्नियोंकी सेवा करता था। सेवा करते-करते उसे बारह वर्ष व्यतीत हो गये, परंतु गुरुने उसे न तो उपदेश दिया और न स्नातक ही बनाया। इसके विपरीत उसीके साथ आश्रममें प्रविष्ट होनेवाले दूसरे शिष्योंको स्नातक बनाकर घर भेज दिया। तब आचार्यसे उनकी पत्नीने कहा - 'भगवन्! इस ब्रह्मचारीने अग्नियोंकी अच्छी प्रकार सेवा की है। तपस्या भी इसने की ही है। अब इसे उपदेश देनेकी कृपा करें।' परंतु अपनी भार्याकी बातको अनसुनी करके सत्यकाम ऋषि उपकोसलको उपदेश दिये बिना ही बाहर चले गये। तब मनमें दुःखी होकर उपकोसलने अनशन व्रत करनेका निश्चय कर लिया। यह देख आचार्य-पत्नीने पूछा - 'ब्रह्मचारी! तू भोजन क्यों नहीं करता है?' उसने कहा - 'मनुष्यके मनमें बहुत-सी कामनाएँ रहती हैं। मेरे मनमें बड़ा दुःख है, इसलिये मैं भोजन नहीं करूँगा।' तब अग्नियोंने एकत्र होकर विचार किया कि 'इसने हमारी अच्छी तरह सेवा की है, अतः उचित है कि हम इसे उपदेश करें।' ऐसा विचार करके अग्नियोंने कहा - 'प्राण ब्रह्म है, 'क' ब्रह्म है, 'ख' ब्रह्म है।' उपकोसल बोला - 'यह बात तो मैं जानता हूँ कि प्राण ब्रह्म है; परंतु 'क' और 'ख' को नहीं जानता।' अग्नियोंने कहा - 'यद्वाव कं तदेव खं यदेव खं तदेव कमिति प्राणं च' (छा० उ० ४। १०। ५) अर्थात् 'निस्संदेह जो 'क' है वही 'ख' है और जो 'ख' है वही 'क' है तथा प्राण भी वही है।' इस प्रकार उन्होंने ब्रह्मको 'क' सुख-स्वरूप और 'ख' आकाशकी भाँति सूक्ष्म एवं व्यापक

५८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

५८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ बताया तथा वही प्राणरूपसे सबको सत्ता-स्फूर्ति देनेवाला है; इस प्रकार संकेतसे ब्रह्मका परिचय कराया। उसके बाद गार्हपत्य अग्निने प्रकट होकर कहा— 'सूर्यमें जो यह पुरुष दीखता है, वह मैं हूँ; जो उपासक इस प्रकार जानकर उपासना करता है, वह पापोंका नाश करके अच्छे लोकोंका अधिकारी होता है तथा पूर्ण आयुष्मन् और उज्ज्वल जीवनसे युक्त होता है। उसका वंश कभी नष्ट नहीं होता।' इसके बाद 'अन्वाहार्यपचन' अग्निने प्रकट होकर कहा, 'चन्द्रमामें जो यह पुरुष दिखायी देता है, वह मैं हूँ। जो मनुष्य इस रहस्यको समझकर उपासना करता है, वह अच्छे लोकोंका अधिकारी होता है।' इत्यादि। तत्पश्चात् आहवनीय अग्निने प्रकट होकर कहा, 'बिजलीमें जो यह पुरुष दीखता है, वह मैं हूँ।' इसको जानकर उपासना करनेका फल भी उन्होंने दूसरी अग्नियोंकी भाँति ही बतलाया। तदनन्तर सब अग्नियोंने एक साथ कहा, 'हे उपकोसल ! हमने तुमको हमारी विद्या (अग्नि-विद्या) और आत्म- विद्या दोनों ही बतलायी हैं। आचार्य तुमको इनका मार्ग दिखलावेंगे।' इतनेमें ही उसके गुरु सत्यकाम आ गये। आचार्यने पूछा, 'सौम्य ! तेरा मुख ब्रह्मवेत्ताकी भाँति चमकता है, तुझे किसने उपदेश दिया है!' उपकोसलने अग्नियोंकी ओर संकेत किया। आचार्यने पूछा, 'इन्होंने तुझे क्या बतलाया है?' तब उपकोसलने अग्नियोंसे सुनी हुई सब बातें बता दीं। तत्पश्चात् आचार्यने कहा, 'हे सौम्य ! इन्होंने तुझे केवल उत्तम लोकप्राप्तिके साधनका उपदेश दिया है, अब मैं तुझे वह उपदेश देता हूँ, जिसे जान लेनेवालेको पाप उसी प्रकार स्पर्श नहीं कर सकते, जैसे कमलके पत्तेको जल।' उपकोसलने कहा, 'भगवन्! बतलानेकी कृपा कीजिये।' इसके उत्तरमें आचार्यने कहा, 'य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति' अर्थात् 'जो नेत्रमें यह पुरुष दिखलायी देता है, यही आत्मा है, यही अमृत है, यही अभय है और ब्रह्म है।' उसके बाद उसीको 'संयद्वाम्', 'वामनी' और 'भामनी' बतलाकर अन्तमें इन विद्याओंका फल अर्चिर्मागसे ब्रह्मको प्राप्त होना बताया है।

सूत्र १४-१५ ] अध्याय १ ५९

सूत्र १४-१५ ] अध्याय १ ५९ इस प्रकरणको देखनेसे मालूम होता है कि आँखके भीतर दीखनेवाला पुरुष परब्रह्म ही है, जीवात्मा या प्रतिबिम्बके लिये यह कथन नहीं है, क्योंकि ब्रह्मविद्याके प्रसंगमें उसका वर्णन करके उसे आत्मा, अमृत, अभय और ब्रह्म कहा है। इन विशेषणोंकी उपपत्ति ब्रह्ममें ही लग सकती है, अन्य किसीमें नहीं। सम्बन्ध — अब यह जिज्ञासा होती है कि यहाँ ब्रह्मको आँखमें दीखनेवाला पुरुष क्यों कहा गया ? वह किसी स्थानविशेषमें रहनेवाला थोड़े ही है ? इसपर कहते हैं— स्थानादिव्यपदेशाच्च ॥ १ । २ । १४ ॥ स्थानादिव्यपदेशात् = श्रुतिमें अनेक स्थलोंपर ब्रह्मके लिये स्थान आदिका निर्देश किया गया है, इसलिये; च = भी (नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष यहाँ ब्रह्म ही है)। व्याख्या — श्रुतिमें जगह-जगह ब्रह्मको समझानेके लिये उसके स्थान तथा नाम, रूप आदिका वर्णन किया गया है। जैसे अन्तर्यामि- ब्राह्मण (बृह० उ० ३ । ७ । ३—२३) - में ब्रह्मको पृथ्वी आदि अनेक स्थानोंमें स्थित बताया गया है। इसी प्रकार अन्य श्रुतियोंमें भी वर्णन आया है। अतः यहाँ ब्रह्मको नेत्रमें दीखनेवाला कहना अयुक्त नहीं है; क्योंकि ब्रह्म निर्लिप्त है और आँखमें दीखनेवाला पुरुष भी आँखके दोषोंसे सर्वथा निर्लिप्त रहता है। इस समानताको लेकर ब्रह्मका तत्त्व समझानेके लिये ऐसा कहना उचित ही है। इसलिये यहाँ यह भी कहा है कि ‘आँखमें घी या पानी आदि जो भी वस्तु डाली जाती है, वह आँखकी पलकोंमें ही रहती है, द्रष्टा पुरुषका स्पर्श नहीं कर सकती।' सम्बन्ध — उक्त सिद्धान्तको दृढ़ करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं— सुखविशिष्टाभिधानादेव च ॥ १ । २ । १५ ॥ च = तथा; सुखविशिष्टाभिधानात् = नेत्रान्तर्वर्ती पुरुषको आनन्दयुक्त बताया गया है, इसलिये; एव = भी (यही सिद्ध होता है कि वह ब्रह्म ही है)।

६० वेदान्त-दर्शन [ पाद २

६० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ व्याख्या—उक्त प्रसंगमें यह कहा गया है कि 'यह नेत्रमें दीखनेवाला पुरुष ही अमृत, अभय और ब्रह्म है।' इस कथनमें निर्भयता और अमृतत्व— ये दोनों ही सुखके सूचक हैं। तथा जब अग्नियोंने एकत्र होकर पहले-पहल उपदेश दिया है, वहाँ कहा गया है कि जो 'क' अर्थात् सुख है, वही 'ख' अर्थात् 'आकाश' है। भाव यह है कि वह ब्रह्म आकाशकी भाँति अत्यन्त सूक्ष्म, सर्वव्यापी और आनन्दस्वरूप है। इस प्रकार उसे आनन्दयुक्त बतलाया जानेके कारण वह ब्रह्म ही है। सम्बन्ध—इसके सिवा, श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानाच्च ॥ १ । २ । १६ ॥ श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानात् = उपनिषद् अर्थात् रहस्य-विज्ञानका श्रवण कर लेनेवाले ब्रह्मवेत्ताकी जो गति बतलायी है, वही गति इस पुरुषको जाननेवालेकी भी कही गयी है, इससे; च = भी (यही ज्ञात होता है कि नेत्रमें दीखनेवाला पुरुष यहाँ ब्रह्म ही है)। व्याख्या—इस प्रसंगके अन्तमें इस नेत्रान्तर्वर्ती पुरुषको जाननेवालेकी वही पुनरावृत्तिरहित गति अर्थात् देवयानमार्गसे जाकर ब्रह्मलोकमें ब्रह्मको प्राप्त होने और वहाँसे पुनः इस संसारमें न लौटनेकी बात बतलायी गयी है; जो अन्यत्र ब्रह्मवेत्ताके लिये कही गयी है (प्र० उ० १ । १०)*। इससे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ नेत्रमें दीखनेवाला पुरुष ब्रह्म ही है।

  • अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽत्मानमन्विष्यादित्यमभिजायन्ते । एतद् वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधः ॥ 'किंतु जो तपस्याके साथ ब्रह्मचर्यपूर्वक और श्रद्धासे युक्त होकर अध्यात्मविद्याके द्वारा परमात्माकी खोज करके जीवन सार्थक कर लेते हैं, वे उत्तरायण-मार्गसे सूर्यलोकको जीत लेते (प्राप्त कर लेते) हैं। यही प्राणोंका केन्द्र है। यह अमृत और निर्भय पद है। यह परम गति है। इससे पुनः लौटकर नहीं आते। इस प्रकार यह निरोध—पुनरावृत्ति-निवारक है।'

सूत्र १७ ] अध्याय १ ६१

सूत्र १७ ] अध्याय १ ६१ सम्बन्ध - यदि इस प्रकरणमें नेत्रके भीतर दिखायी देनेवाले प्रतिबिम्ब, नेत्रेन्द्रियके अधिष्ठाता देवता अथवा जीवात्मा - इनमेंसे किसी एकको नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है? इसपर कहते हैं - अनवस्थितेरसम्भवाच्च नेतरः ॥ १।२।१७॥ अनवस्थितेः = अन्य किसीकी नेत्रमें निरन्तर स्थिति न होनेके कारण; च= तथा; असम्भवात् = ( श्रुतिमें बताये हुए अमृतत्व आदि गुण) दूसरे किसीमें सम्भव न होनेसे; इतरः = ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई भी; न=नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष नहीं है। व्याख्या - छाया- पुरुष या प्रतिबिम्ब नेत्रेन्द्रियमें सदा नहीं रहता; जब कोई पुरुष सामने आता है, तब उसका प्रतिबिम्ब नेत्रमें दिखायी देता है और उसके हटते ही अदृश्य हो जाता है। इन्द्रियानुग्राहक देवताकी स्थिति भी नेत्रमें सदा नहीं रहती; जिस समय वह इन्द्रिय अपने विषयको ग्रहण करती है, उसी समय वह उसके सहायकके रूपसे उसमें स्थित माना जाता है। इसी प्रकार जीवात्मा भी मनके द्वारा एक समय किसी एक इन्द्रियके विषयको ग्रहण करता है तो दूसरे समय दूसरी ही इन्द्रियके विषयको; और सुषुप्तिमें तो किसीके भी विषयको नहीं ग्रहण करता। अतः निरन्तर एक-सी स्थिति आँखमें न रहनेके कारण इन तीनोंमेंसे किसीको नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष नहीं कहा जा सकता। इसके सिवा, नेत्रमें दिखायी देनेवाले पुरुषके जो अमृतत्व और निर्भयता आदि गुण श्रुतिने बताये हैं वे ब्रह्मके अतिरिक्त और किसीमें सम्भव नहीं हैं; इस कारण भी उपर्युक्त तीनोंमेंसे किसीको नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष नहीं माना जा सकता। इसलिये परब्रह्म परमेश्वरको ही यहाँ नेत्रमें दिखायी देनेवाला पुरुष कहा गया है; यही मानना ठीक है। सम्बन्ध - पूर्वप्रकरणमें यह बात बतायी गयी है कि श्रुतिमें जगह- जगह ब्रह्मके लिये भिन्न-भिन्न स्थान आदिका निर्देश किया गया है। अब पुनः अधिदैव, अधिभूत आदिमें उस ब्रह्मकी व्याप्ति बतलाकर उसी बातका समर्थन करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है -

६२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

६२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ अन्तर्याम्यधिदैवादिषु तद्धर्मव्यपदेशात् ॥ १ । २ । १८ ॥ अधिदैवादिषु = आधिदैविक और आध्यात्मिक आदि समस्त वस्तुओंमें; अन्तर्यामी = जिसे अन्तर्यामी बतलाया गया है (वह परब्रह्म ही है); तद्धर्मव्यपदेशात् = क्योंकि वहाँ उसीके धर्मोंका वर्णन है। व्याख्या—बृहदारण्यकोपनिषद् (३। ७)-में यह प्रसंग आया है। वहाँ उद्दालक ऋषिने याज्ञवल्क्य मुनिसे पहले तो सूत्रात्माके विषयमें प्रश्न किया है; फिर उस अन्तर्यामीके सम्बन्धमें पूछा है, जो इस लोक और परलोकको तथा समस्त भूत-प्राणियोंको उनके भीतर रहकर नियन्त्रणमें रखता है। इसके उत्तरमें याज्ञवल्क्यने सूत्रात्मा तो वायुको बताया है और अन्तर्यामीका विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए उसे जड- चेतनात्मक समस्त भूतों, सब इन्द्रियों और सम्पूर्ण जीवोंका नियन्ता बताकर अन्तमें इस प्रकार कहा है—'एष त आत्मान्तर्याम्यमृतोऽदृष्टो द्रष्टाश्रुतः श्रोतामतो मन्ताविज्ञातो विज्ञाता नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा नान्योऽतोऽस्ति श्रोता नान्योऽतोऽस्ति मन्ता नान्योऽतोऽस्ति विज्ञातैष त आत्मान्तर्याम्यमृतोऽतोऽन्यदार्तम्' अर्थात् 'यह तुम्हारा अन्तर्यामी अमृतस्वरूप आत्मा देखनेमें न आनेवाला किंतु स्वयं सबको देखनेवाला है, सुननेमें न आनेवाला किंतु स्वयं सब कुछ सुननेवाला है और मनन करनेमें न आनेवाला किंतु स्वयं सबका मनन करनेवाला है। वह विशेषरूपसे किसीके जाननेमें नहीं आता, किंतु स्वयं सबको विशेषरूपसे भलीभाँति जानता है। ऐसा यह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। इससे भिन्न सब कुछ विनाशशील है।' इस वर्णनमें आये हुए महत्त्वसूचक विशेषण परब्रह्ममें ही संगत हो सकते हैं। जीवात्माका अन्तर्यामी आत्मा ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई नहीं हो सकता। अतः इस प्रसंगमें ब्रह्मको ही अन्तर्यामी बताया गया है—यही मानना ठीक है।*

  • यह प्रसंग सूत्र ३। ३। ३५ से ३। ३। ४१ की व्याख्यामें भी आया है, वहाँ देखना चाहिये।