भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 65, कुल 486 में से

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पृष्ठ 65

६२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ अन्तर्याम्यधिदैवादिषु तद्धर्मव्यपदेशात् ॥ १ । २ । १८ ॥ अधिदैवादिषु = आधिदैविक और आध्यात्मिक आदि समस्त वस्तुओंमें; अन्तर्यामी = जिसे अन्तर्यामी बतलाया गया है (वह परब्रह्म ही है); तद्धर्मव्यपदेशात् = क्योंकि वहाँ उसीके धर्मोंका वर्णन है। व्याख्या—बृहदारण्यकोपनिषद् (३। ७)-में यह प्रसंग आया है। वहाँ उद्दालक ऋषिने याज्ञवल्क्य मुनिसे पहले तो सूत्रात्माके विषयमें प्रश्न किया है; फिर उस अन्तर्यामीके सम्बन्धमें पूछा है, जो इस लोक और परलोकको तथा समस्त भूत-प्राणियोंको उनके भीतर रहकर नियन्त्रणमें रखता है। इसके उत्तरमें याज्ञवल्क्यने सूत्रात्मा तो वायुको बताया है और अन्तर्यामीका विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए उसे जड- चेतनात्मक समस्त भूतों, सब इन्द्रियों और सम्पूर्ण जीवोंका नियन्ता बताकर अन्तमें इस प्रकार कहा है—'एष त आत्मान्तर्याम्यमृतोऽदृष्टो द्रष्टाश्रुतः श्रोतामतो मन्ताविज्ञातो विज्ञाता नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा नान्योऽतोऽस्ति श्रोता नान्योऽतोऽस्ति मन्ता नान्योऽतोऽस्ति विज्ञातैष त आत्मान्तर्याम्यमृतोऽतोऽन्यदार्तम्' अर्थात् 'यह तुम्हारा अन्तर्यामी अमृतस्वरूप आत्मा देखनेमें न आनेवाला किंतु स्वयं सबको देखनेवाला है, सुननेमें न आनेवाला किंतु स्वयं सब कुछ सुननेवाला है और मनन करनेमें न आनेवाला किंतु स्वयं सबका मनन करनेवाला है। वह विशेषरूपसे किसीके जाननेमें नहीं आता, किंतु स्वयं सबको विशेषरूपसे भलीभाँति जानता है। ऐसा यह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। इससे भिन्न सब कुछ विनाशशील है।' इस वर्णनमें आये हुए महत्त्वसूचक विशेषण परब्रह्ममें ही संगत हो सकते हैं। जीवात्माका अन्तर्यामी आत्मा ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई नहीं हो सकता। अतः इस प्रसंगमें ब्रह्मको ही अन्तर्यामी बताया गया है—यही मानना ठीक है।*

  • यह प्रसंग सूत्र ३। ३। ३५ से ३। ३। ४१ की व्याख्यामें भी आया है, वहाँ देखना चाहिये।