भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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सूत्र १७ ] अध्याय १ ६१ सम्बन्ध - यदि इस प्रकरणमें नेत्रके भीतर दिखायी देनेवाले प्रतिबिम्ब, नेत्रेन्द्रियके अधिष्ठाता देवता अथवा जीवात्मा - इनमेंसे किसी एकको नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है? इसपर कहते हैं - अनवस्थितेरसम्भवाच्च नेतरः ॥ १।२।१७॥ अनवस्थितेः = अन्य किसीकी नेत्रमें निरन्तर स्थिति न होनेके कारण; च= तथा; असम्भवात् = ( श्रुतिमें बताये हुए अमृतत्व आदि गुण) दूसरे किसीमें सम्भव न होनेसे; इतरः = ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई भी; न=नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष नहीं है। व्याख्या - छाया- पुरुष या प्रतिबिम्ब नेत्रेन्द्रियमें सदा नहीं रहता; जब कोई पुरुष सामने आता है, तब उसका प्रतिबिम्ब नेत्रमें दिखायी देता है और उसके हटते ही अदृश्य हो जाता है। इन्द्रियानुग्राहक देवताकी स्थिति भी नेत्रमें सदा नहीं रहती; जिस समय वह इन्द्रिय अपने विषयको ग्रहण करती है, उसी समय वह उसके सहायकके रूपसे उसमें स्थित माना जाता है। इसी प्रकार जीवात्मा भी मनके द्वारा एक समय किसी एक इन्द्रियके विषयको ग्रहण करता है तो दूसरे समय दूसरी ही इन्द्रियके विषयको; और सुषुप्तिमें तो किसीके भी विषयको नहीं ग्रहण करता। अतः निरन्तर एक-सी स्थिति आँखमें न रहनेके कारण इन तीनोंमेंसे किसीको नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष नहीं कहा जा सकता। इसके सिवा, नेत्रमें दिखायी देनेवाले पुरुषके जो अमृतत्व और निर्भयता आदि गुण श्रुतिने बताये हैं वे ब्रह्मके अतिरिक्त और किसीमें सम्भव नहीं हैं; इस कारण भी उपर्युक्त तीनोंमेंसे किसीको नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष नहीं माना जा सकता। इसलिये परब्रह्म परमेश्वरको ही यहाँ नेत्रमें दिखायी देनेवाला पुरुष कहा गया है; यही मानना ठीक है। सम्बन्ध - पूर्वप्रकरणमें यह बात बतायी गयी है कि श्रुतिमें जगह- जगह ब्रह्मके लिये भिन्न-भिन्न स्थान आदिका निर्देश किया गया है। अब पुनः अधिदैव, अधिभूत आदिमें उस ब्रह्मकी व्याप्ति बतलाकर उसी बातका समर्थन करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है -