वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 63, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें६० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ व्याख्या—उक्त प्रसंगमें यह कहा गया है कि 'यह नेत्रमें दीखनेवाला पुरुष ही अमृत, अभय और ब्रह्म है।' इस कथनमें निर्भयता और अमृतत्व— ये दोनों ही सुखके सूचक हैं। तथा जब अग्नियोंने एकत्र होकर पहले-पहल उपदेश दिया है, वहाँ कहा गया है कि जो 'क' अर्थात् सुख है, वही 'ख' अर्थात् 'आकाश' है। भाव यह है कि वह ब्रह्म आकाशकी भाँति अत्यन्त सूक्ष्म, सर्वव्यापी और आनन्दस्वरूप है। इस प्रकार उसे आनन्दयुक्त बतलाया जानेके कारण वह ब्रह्म ही है। सम्बन्ध—इसके सिवा, श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानाच्च ॥ १ । २ । १६ ॥ श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानात् = उपनिषद् अर्थात् रहस्य-विज्ञानका श्रवण कर लेनेवाले ब्रह्मवेत्ताकी जो गति बतलायी है, वही गति इस पुरुषको जाननेवालेकी भी कही गयी है, इससे; च = भी (यही ज्ञात होता है कि नेत्रमें दीखनेवाला पुरुष यहाँ ब्रह्म ही है)। व्याख्या—इस प्रसंगके अन्तमें इस नेत्रान्तर्वर्ती पुरुषको जाननेवालेकी वही पुनरावृत्तिरहित गति अर्थात् देवयानमार्गसे जाकर ब्रह्मलोकमें ब्रह्मको प्राप्त होने और वहाँसे पुनः इस संसारमें न लौटनेकी बात बतलायी गयी है; जो अन्यत्र ब्रह्मवेत्ताके लिये कही गयी है (प्र० उ० १ । १०)*। इससे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ नेत्रमें दीखनेवाला पुरुष ब्रह्म ही है।
- अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽत्मानमन्विष्यादित्यमभिजायन्ते । एतद् वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधः ॥ 'किंतु जो तपस्याके साथ ब्रह्मचर्यपूर्वक और श्रद्धासे युक्त होकर अध्यात्मविद्याके द्वारा परमात्माकी खोज करके जीवन सार्थक कर लेते हैं, वे उत्तरायण-मार्गसे सूर्यलोकको जीत लेते (प्राप्त कर लेते) हैं। यही प्राणोंका केन्द्र है। यह अमृत और निर्भय पद है। यह परम गति है। इससे पुनः लौटकर नहीं आते। इस प्रकार यह निरोध—पुनरावृत्ति-निवारक है।'