वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 66, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र १९-२० ] अध्याय १ ६३ सम्बन्ध- पूर्वसूत्रमें विधि-मुखसे यह बात सिद्ध की गयी कि अन्तर्यामी ब्रह्म ही है। अब निषेधमुखसे यह सिद्ध करते हैं कि अव्यक्त जड प्रकृति अन्तर्यामी नहीं हो सकती— न च स्मार्तमतद्धर्माभिलापात् ॥ १ । २ । १९ ॥ स्मार्तम् = सांख्यस्मृतिद्वारा प्रतिपादित प्रधान (जड प्रकृति); च = भी; न = अन्तर्यामी नहीं है; अतद्धर्माभिलापात् = क्योंकि इस प्रकरणमें बताये हुए द्रष्टापन आदि धर्म प्रकृतिके नहीं हैं। व्याख्या-सांख्य-स्मृतिद्वारा प्रतिपादित जड प्रकृतिके धर्मोंका वर्णन वहाँ अन्तर्यामीके लिये नहीं हुआ है; अपितु चेतन परब्रह्मके धर्मोंका ही विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इस कारण वहाँ कहा हुआ अन्तर्यामी प्रकृति नहीं हो सकती। अतः यही सिद्ध होता है कि इस प्रकरणमें 'अन्तर्यामी'- के नामसे परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन हुआ है। सम्बन्ध- यह ठीक है कि जड होनेके कारण प्रकृतिको अन्तर्यामी नहीं कहा जा सकता, परंतु जीवात्मा तो चेतन है तथा वह शरीर और इन्द्रियोंके भीतर रहनेवाला और उनका नियमन करनेवाला भी प्रत्यक्ष है, अतः उसीको अन्तर्यामी मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है? इसपर कहते हैं— शारीरश्चोभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते ॥ १ । २ । २० ॥ शारीरः = शरीरमें रहनेवाला जीवात्मा; च = भी; ( न = ) अन्तर्यामी नहीं है; हि = क्योंकि; उभयेऽपि = माध्यन्दिनी तथा काण्व दोनों ही शाखावाले; एनम् = इस जीवात्माको; भेदेन = अन्तर्यामीसे भिन्न मानकर; अधीयते = अध्ययन करते हैं। व्याख्या-माध्यन्दिनी१ और काण्व२-दोनों शाखाओंवाले विद्वान् १. 'य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्यात्मा शरीरं य आत्मानमन्तरो यमयति स त आत्मान्तर्याम्यमृतः।' (शतपथब्रा० १४। ५। ३०) २. 'यो विज्ञाने तिष्ठन् विज्ञानादन्तरो यं विज्ञानं न वेद यस्य विज्ञानँशरीरं यो विज्ञान-