भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 49, कुल 486 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 49

४६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १

उपासात्रैविध्यात् = क्योंकि ऐसा माननेपर त्रिविध उपासनाका प्रसंग उपस्थित होगा; आश्रितत्वात् = (इसके सिवा) सब लक्षण ब्रह्मके आश्रित हैं (तथा); इह तद्योगात् = इस प्रसंगमें ब्रह्मके लक्षणोंका भी कथन है इसलिये (यहाँ 'प्राण' शब्द ब्रह्मका ही वाचक है) । व्याख्या—कौषीतकि-उपनिषद् (३।८)-के उक्त प्रसंगमें जीवके लक्षणोंका इस प्रकार वर्णन हुआ है—'न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्यात्।' अर्थात् 'वाणीको जाननेकी इच्छा न करे। वक्ताको जानना चाहिये।' यहाँ वाणी आदि कार्य और करणके अध्यक्ष जीवात्माको जाननेके लिये कहा है। इसी प्रकार प्रसिद्ध प्राणके लक्षणका भी वर्णन मिलता है—'अथ खलु प्राण एव प्रज्ञात्मेदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति।' (३। ३) अर्थात् 'निस्संदेह प्रज्ञानात्मा प्राण ही इस शरीरको ग्रहण करके उठाता है।' शरीरको धारण करना मुख्य प्राणका ही धर्म है; इस कथनको लेकर यदि यह कहो कि 'प्राण' शब्द ब्रह्म-वाचक नहीं होना चाहिये, तो यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि ब्रह्मके अतिरिक्त जीव और प्राणको भी उपास्य माननेसे त्रिविध उपासनाका प्रसंग उपस्थित होगा, जो उचित नहीं है। इसके सिवा, जीव और प्राण आदिके धर्मोंका आश्रय भी ब्रह्म ही है, इसलिये ब्रह्मके वर्णनमें उनके धर्मोंका आना अनुचित नहीं है। यहाँ ब्रह्मके लोकाधिपति, लोकपाल आदि लक्षणोंका भी स्पष्ट वर्णन मिलता है। इन सब कारणोंसे यहाँ 'प्राण' शब्द ब्रह्मका ही वाचक है। इन्द्र, जीवात्मा अथवा प्रसिद्ध प्राणका नहीं—यही मानना ठीक है।

पहला पाद सम्पूर्ण