वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ३०-३१ ] अध्याय १ ४५ नहीं है तो इन्द्रने जो यह कहा कि 'मैं ही प्रज्ञानस्वरूप प्राण हूँ, तू मेरी उपासना कर।' इस कथनकी क्या गति होगी? इसपर कहते हैं— शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत् ॥ १। १। ३०॥ उपदेशः = (यहाँ) इन्द्रका अपनेको प्राण बतलाना; तू = तो; वामदेववत् = वामदेवकी भाँति; शास्त्रदृष्ट्या = (केवल) शास्त्र-दृष्टिसे है। व्याख्या—बृहदारण्यकोपनिषद् (१। ४। १०)-में यह वर्णन आया है कि 'तद् यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तद्भवत्तथर्षीणां तथा मनुष्याणां तद्वैतत्पश्यन्नृषिर्वामदेवः प्रतिपेदेऽह मनुरभवँ_सूर्यश्चेति।' अर्थात् 'उस ब्रह्मको देवताओंमें जिसने जाना, वही ब्रह्मरूप हो गया। इसी प्रकार ऋषियों और मनुष्योंमें भी जिसने उसे जाना, वह तद्रूप हो गया। उसे आत्मरूपसे देखते हुए ऋषि वामदेवने जाना कि 'मैं मनु हुआ और मैं ही सूर्य हुआ।' इससे यह बात सिद्ध होती है कि जो महापुरुष उस परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है, वह उसके साथ एकताका अनुभव करता हुआ ब्रह्मभावापन्न होकर ऐसा कह सकता है। अतएव उस वामदेव ऋषिकी भाँति ही इन्द्रका ब्रह्मभावापन्न-अवस्थामें शास्त्र-दृष्टिसे यह कहना है कि 'मैं ही ज्ञानस्वरूप प्राण हूँ अर्थात् परब्रह्म परमात्मा हूँ। तू मुझ परमात्माकी उपासना कर।' अतः 'प्राण' शब्दको ब्रह्मका वाचक माननेमें कोई आपत्ति नहीं रह जाती। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे शंका उपस्थित करके उसके समाधानद्वारा प्राणको ब्रह्मका वाचक सिद्ध करते हुए इस प्रकरणका उपसंहार करते हैं— जीवमुख्यप्राणलिंगान्नेति चेन्नोपासात्रैविध्यादाश्रित- त्वादिह तद्योगात् ॥ १। १। ३१॥ चेत् = यदि कहो; जीवमुख्यप्राणलिंगात् = (इस प्रसंगके वर्णनमें) जीवात्मा तथा प्रसिद्ध प्राणके लक्षण पाये जाते हैं, इसलिये; न = प्राण शब्द ब्रह्मका वाचक नहीं है; इति न = तो यह कहना ठीक नहीं है;