भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 47, कुल 486 में से

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पृष्ठ 47

४४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ ब्रह्मके ही उपयुक्त हैं। प्रसिद्ध प्राणवायु, इन्द्र अथवा जीवात्माके लिये ऐसा कहना उपयुक्त नहीं हो सकता। इसलिये यही समझना चाहिये कि यहाँ 'प्राण' शब्द ब्रह्मका ही वाचक है। सम्बन्ध—उक्त प्रकरणमें इन्द्रने स्पष्ट शब्दोंमें स्वयं अपनेको ही प्राण कहा है। इन्द्र एक प्रभावशाली देवता तथा अजर, अमर हैं ही; फिर वहाँ 'प्राण' शब्दको इन्द्रका ही वाचक क्यों न मान लिया जाय ? इसपर कहते हैं— न वक्तुरात्मोपदेशादिति चेदध्यात्मसम्बन्धभूमा ह्यस्मिन् ॥१। १। २९॥ चेत्=यदि कहो; वक्तुः=वक्ता (इन्द्र)-का (उद्देश्य); आत्मोप- देशात्=अपनेको ही 'प्राण' नामसे बतलाना है, इसलिये; न=प्राणशब्द ब्रह्मका वाचक नहीं हो सकता; इति=(तो) यह कथन; (न)=ठीक नहीं है; हि=क्योंकि; अस्मिन्=इस प्रकरणमें, अध्यात्मसम्बन्धभूमा= अध्यात्मसम्बन्धी उपदेशकी बहुलता है। व्याख्या—यदि कहो कि इस प्रकरणमें इन्द्रने स्पष्टरूपसे अपने- आपको ही प्राण बतलाया है, ऐसी परिस्थितिमें 'प्राण' शब्दको इन्द्रका वाचक न मानकर ब्रह्मका वाचक मानना ठीक नहीं है; तो ऐसा कहना उचित नहीं है; क्योंकि इस प्रकरणमें अध्यात्मसम्बन्धी वर्णनकी बहुलता है।* यहाँ आधिदैविक वर्णन नहीं है; अतः उपास्यरूपसे बतलाया हुआ तत्त्व इन्द्र नहीं हो सकता। इसलिये यहाँ 'प्राण' शब्दको ब्रह्मका ही वाचक समझना चाहिये। सम्बन्ध—यहाँ यह प्रश्न उठता है कि यदि 'प्राण' शब्द इन्द्रका वाचक 'स होवाच प्रतर्दनस्त्वमेव वृणीष्व यं त्वं मनुष्याय हिततमं मन्यस इति....।' (कौ० उ० ३।१) 'स होवाच प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा।' (कौ० उ० ३। २) 'एष प्राण एव प्रज्ञात्मा- ऽऽनन्दोऽजरोऽमृत..... एष लोकपाल एष लोकाधिपतिरेष सर्वेश्वरः।' (कौ० उ० ३। ९)

  • इस प्रसंगमें अध्यात्मसम्बन्धी वर्णनकी बहुलता किस प्रकार है, यह पूर्वसूत्रकी टिप्पणीमें देखें।