भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 50, कुल 486 में से

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दूसरा पाद प्रथम पादमें यह निर्णय किया गया कि 'आनन्दमय', 'आकाश', 'ज्योति' तथा 'प्राण' आदि नामोंसे उपनिषद्में जो जगत्के कारणका और उपास्यदेवका वर्णन आया है, वह परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन है। 'प्राण' शब्दका प्रसंग आनेसे छान्दोग्योपनिषद् (३। १४। २)-में आये हुए 'मनोमयः प्राणशरीरः' आदि वचनोंका स्मरण हो आया। अतः उक्त उपनिषद्के तीसरे अध्यायके चौदहवें खण्डपर विचार करनेके लिये द्वितीय पाद प्रारम्भ करते हैं। इस पादमें यह पहला प्रकरण आठ सूत्रोंका है। छान्दोग्योपनिषद् (३। १४। १)-में पहले तो सम्पूर्ण जगत्को ब्रह्मरूप समझकर उसकी उपासना करनेके लिये कहा गया है। उसके बाद उसके लिये 'सत्यसंकल्प', 'आकाशात्मा' और 'सर्वकर्मा' आदि विशेषण दिये गये हैं (३। १४। २), जो कि ब्रह्मके प्रतीत होते हैं। तत्पश्चात् उसको 'अणीयान्' अर्थात् अत्यन्त छोटा और 'ज्यायान्' अर्थात् सबसे बड़ा बताकर हृदयके भीतर रहनेवाला अपना आत्मा और ब्रह्म भी कहा है (३। १४। ३-४) इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि उक्त उपास्यदेव कौन है? जीवात्मा या परमात्मा अथवा कोई दूसरा ही? इसका निर्णय करनेके लिये यह प्रकरण आरम्भ किया जाता है— सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात्॥ १। २। १॥ सर्वत्र=सम्पूर्ण वेदान्त-वाक्योंमें; प्रसिद्धोपदेशात्=(जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और लयके कारणरूपसे) प्रसिद्ध परब्रह्मका ही उपास्यदेवके रूपमें उपदेश हुआ है, इसलिये (छान्दोग्यश्रुति ३। १४ में बताया हुआ उपास्यदेव ब्रह्म ही है)। व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद् अध्याय ३ के चौदहवें खण्डके आरम्भमें सबसे पहले यह मन्त्र आया है—'सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त