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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

सूत्र २५ ] अध्याय २ १९१

सूत्र २५ ] अध्याय २ १९१ होता है। पृथिवी गन्धका, जल रसका, तेज रूपका तथा वायु स्पर्शका आश्रय है; इसी प्रकार शब्दका भी कोई आश्रय होना चाहिये। आकाश ही उसका आश्रय है; आकाशमें ही शब्दका श्रवण होता है। यदि आकाश न हो तो शब्दका श्रवण ही नहीं हो सकता। प्रत्येक वस्तुके लिये आधार और अवकाश (स्थान) चाहिये। आकाश ही शेष चार भूतोंका आधार है तथा वही सम्पूर्ण जगत्को अवकाश देता है। इससे भी आकाशकी सत्ता प्रत्यक्ष है। पक्षी आकाशमें चलनेके कारण ही खग या विहंग कहलाते हैं। कोई भी भाव-पदार्थ अभावमें नहीं विचरण करता है। श्रुतिने परमात्मासे आकाशकी उत्पत्ति स्पष्ट शब्दोंमें स्वीकार की है—‘आत्मन आकाशः सम्भूतः।' (तै० उ० २। १) इस प्रकार युक्ति तथा प्रमाणसे भी आकाशकी सत्ता सिद्ध है; कोई ऐसा विशेष कारण नहीं है, जिससे आकाशको भावरूप न माना जा सके। अतः आकाशकी अभावरूपता किसी प्रकार सिद्ध न होनेके कारण बौद्धोंकी मान्यता युक्तिसंगत नहीं है। सम्बन्ध— बौद्धोंके मतमें 'आत्मा' भी नित्य वस्तु नहीं, क्षणिक है; अतः उनकी इस मान्यताका खण्डन करते हुए कहते हैं— अनुस्मृतेश्च ॥ २। २। २५ ॥ अनुस्मृतेः = पहलेके अनुभवोंका बारम्बार स्मरण होता है, (इसलिये अनुभव करनेवाला आत्मा क्षणिक नहीं है) इस युक्तिसे; च= भी (बौद्धमत असंगत सिद्ध होता है)। व्याख्या—सभी मनुष्योंको अपने पहले किये हुए अनुभवोंका बारम्बार स्मरण होता है। जैसे 'मैंने अमुक दिन अमुक ग्राममें अमुक वस्तु देखी थी, मैं बालकपनमें अमुक खेल खेला करता था। मैंने आजसे बीस वर्ष पहले जिसे देखा था, वही यह है' इत्यादि। इस प्रकार पूर्व अनुभवोंका जो बारम्बार स्मरण होता है, उसे 'अनुस्मृति' कहते हैं। यह तभी हो सकती है, जब कि अनुभव करनेवाला आत्मा नित्य माना जाय। उसे क्षणिक माननेसे यह स्मरण

१९२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

१९२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ नहीं बन सकता; क्योंकि एक क्षण पहले जो अनुभव करनेवाला था, वह दूसरे क्षणमें नहीं रहता। बहुत वर्षोंमें तो असंख्य क्षणोंके भीतर असंख्य बार आत्माका परिवर्तन हो जायगा। अतः उक्त अनुस्मृति होनेके कारण यही सिद्ध होता है कि आत्मा क्षणिक नहीं, किंतु नित्य है। इसीलिये बौद्धोंका क्षणिकवाद सर्वथा अनुपपन्न है। सम्बन्ध—बौद्धोंका यह कथन है कि 'जब बोया हुआ बीज स्वयं नष्ट होता है, तभी उससे अंकुर उत्पन्न होता है। दूधको मिटाकर दही बनता है, इसी प्रकार कारण स्वयं नष्ट होकर ही कार्य उत्पन्न करता है।' इस तरह अभावसे ही भावकी उत्पत्ति होती है। उनकी इस धारणाका खण्डन करनेके लिये सूत्रकार कहते हैं— नासतोऽदृष्टत्वात् ॥ २।२।२६ ॥ असतः=असत्‌से (कार्यकी उत्पत्ति); न=नहीं हो सकती; अदृष्टत्वात्=क्योंकि ऐसा देखा नहीं गया है। व्याख्या—खरगोशके सींग, आकाशके फूल और वन्ध्या-पुत्र आदि केवल वाणीसे ही कहे जाते हैं, वास्तवमें हैं नहीं; तथा आकाशमें नीलापन और तिरवरे आदि बिना हुए ही प्रतीत होते हैं; ऐसे असत् पदार्थोंमें किसी कार्यकी उत्पत्ति या सिद्धि नहीं देखी जाती है। उनसे विपरीत जो मिट्टी, जल आदि सत् पदार्थ हैं, उनसे घट और बर्फ आदि कार्योंकी उत्पत्ति प्रत्यक्ष देखी जाती है। इससे यही सिद्ध होता है कि जो वास्तवमें नहीं है, केवल वाणीसे जिसका कथनमात्र होता है, अथवा जो बिना हुए ही प्रतीत हो रहा है, उससे कार्यकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। बीज और दूधका अभाव नहीं होता। किंतु रूपान्तरमात्र होता है; अतः जगत्‌का कारण सत् है और वह सर्वथा सत्य है। इसलिये बौद्धोंकी उपर्युक्त मान्यता असंगत है। सम्बन्ध—किसी नित्य चेतन कर्ताके बिना क्षणिक पदार्थोंसे अपने- आप कार्य उत्पन्न होते हैं, इस मान्यताका खण्डन दूसरी युक्तिके द्वारा करते हैं—

सूत्र २७-२८ ] अध्याय २ १९३ उदासीनानामपि चैवं सिद्धिः ॥ २ । २ । २७ ॥ च=इसके सिवा; एवम्=इस प्रकार (बिना कर्ताके स्वतः कार्यकी उत्पत्ति) माननेपर; उदासीनानाम्=उदासीन (कार्य-सिद्धिके लिये चेष्टा न करनेवाले) पुरुषोंका; अपि=भी; सिद्धिः=कार्य सिद्ध हो सकता है। व्याख्या—यदि ऐसा माना जाय कि 'कार्यकी उत्पत्ति होनेमें किसी नित्य चेतन कर्ताकी आवश्यकता नहीं है, क्षणिक पदार्थोंके समुदायसे अपने- आप कार्य उत्पन्न हो जाता है,' तब तो जो लोग उदासीन रहते हैं, कार्य आरम्भ नहीं करते या उसकी सिद्धिकी चेष्टासे विरत रहते हैं, उनके कार्य भी पदार्थगत शक्तिसे अपने-आप सिद्ध हो जाने चाहिये। परंतु ऐसा नहीं देखा जाता। इससे यही सिद्ध होता है कि उपर्युक्त मान्यता समीचीन नहीं है। सम्बन्ध—यहाँतक बौद्धोंके क्षणिकवादका खण्डन किया गया। अब विज्ञानवादका खण्डन करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। विज्ञानवादी बौद्ध (योगाचार) मानते हैं कि प्रतीत होनेवाला बाह्य पदार्थ वास्तवमें कुछ नहीं है, केवलमात्र स्वप्नकी भाँति बुद्धिकी कल्पना है; इस मान्यताका खण्डन करते हैं— नाभाव उपलब्धेः ॥ २ । २ । २८ ॥ अभावः=जाननेमें आनेवाले पदार्थोंका अभाव; न=नहीं है; उपलब्धेः= क्योंकि उनकी उपलब्धि होती है। व्याख्या—जाननेमें आनेवाले बाह्य पदार्थ मिथ्या नहीं हैं, वे कारणरूपमें तथा कार्यरूपमें भी सदा ही सत्य हैं। इसलिये उनकी प्रत्यक्ष उपलब्धि होती है। यदि वे स्वप्नगत पदार्थों तथा आकाशमें दीखनेवाली नीलिमा आदिकी भाँति सर्वथा मिथ्या होते तो इनकी उपलब्धि नहीं होती। सम्बन्ध—विज्ञानवादियोंकी ओरसे यह कहा जा सकता है कि 'उपलब्धिमात्रसे पदार्थकी सत्ता सिद्ध नहीं हो सकती; क्योंकि स्वप्नमें प्रतीत होनेवाले तथा बाजीगरद्वारा उपस्थित किये जानेवाले पदार्थ यद्यपि सत्य नहीं होते तो भी इनकी उपलब्धि देखी जाती है, इसपर कहते हैं—

१९४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ वैधर्म्याच्च न स्वप्नादिवत् ॥ २।२।२९॥ वैधर्म्यात् = जाग्रत् अवस्थामें उपलब्ध होनेवाले पदार्थोंसे स्वप्न आदिमें प्रतीत होनेवाले पदार्थोंके धर्ममें भेद होनेके कारण; च = भी; (जाग्रत्में उपलब्ध होनेवाले पदार्थ) स्वप्नादिवत् = स्वप्नादिमें उपलब्ध पदार्थोंकी भाँति; न = मिथ्या नहीं हैं। व्याख्या - स्वप्नावस्था में प्रतीत होनेवाले पदार्थ पहलेके देखे, सुने और अनुभव किये हुए ही होते हैं, तथा वे जागनेपर उपलब्ध नहीं होते। एकके स्वप्नकी घटना दूसरेको नहीं दीखती। उसी प्रकार बाजीगरद्वारा कल्पित पदार्थ भी थोड़ी देरके बाद नहीं उपलब्ध होते। मरुभूमिकी तप्त बालुकाराशिमें प्रतीत होनेवाले जल, सीपमें दीखनेवाली चाँदी तथा भ्रमवश प्रतीत होनेवाली दूसरी किसी वस्तुकी भी सत्तारूपसे उपलब्धि नहीं होती है। परंतु जो जाग्रत्-कालमें प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाली वस्तुएँ हैं, उनके विषयमें ऐसी बात नहीं है। वे एक ही समय बहुतोंको समानरूपसे उपलब्ध होती हैं, कालान्तरमें भी उनकी उपलब्धि देखी जाती है। एक प्रकारका आकार नष्ट कर दिया जानेपर भी दूसरे आकारमें उनकी सत्ता विद्यमान रहती है। इस प्रकार स्वप्नादिमें भ्रान्तिसे प्रतीत होनेवाले पदार्थोंके और सत्पदार्थोंके धर्मोंमें बहुत अन्तर है। इसलिये स्वप्नादिके दृष्टान्तके बलपर यह कहना उपयुक्त नहीं है कि 'उपलब्धिमात्रसे पदार्थकी सत्ता सिद्ध नहीं होती।' सम्बन्ध - विज्ञानवादी ऐसा कहते हैं कि बाह्य पदार्थ न होनेपर भी पूर्ववासनाके कारण बुद्धिद्वारा उन विचित्र पदार्थोंका उपलब्ध होना सम्भव है, अतः इसका खण्डन करते हैं- न भावोऽनुपलब्धेः ॥ २।२।३०॥ भावः = विज्ञानवादियोंद्वारा कल्पित वासनाकी सत्ता; न = सिद्ध नहीं होती; अनुपलब्धेः = क्योंकि उनके मतके अनुसार बाह्य पदार्थोंकी उपलब्धि ही नहीं हो सकती।

सूत्र ३१-३२ ] अध्याय २ १९५

सूत्र ३१-३२ ] अध्याय २ १९५ व्याख्या—जो वस्तु पहले उपलब्ध हो चुकी है, उसीके संस्कार बुद्धिमें जमते हैं और वे ही वासनारूपसे स्फुरित होते हैं। पदार्थोंकी सत्ता स्वीकार न करनेसे उनकी उपलब्धि नहीं होगी और उपलब्धि सिद्ध हुए बिना पूर्व अनुभवके अनुसार वासनाका होना सिद्ध नहीं होगा। इसलिये विज्ञानवादियोंकी मान्यता ठीक नहीं है। बाह्य पदार्थोंको सत्य मानना ही युक्तिसंगत है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे वासनाका खण्डन करते हैं— क्षणिकत्वाच्च ॥ २।२।३१ ॥ क्षणिकत्वात्=बौद्धमतके अनुसार वासनाकी आधारभूता बुद्धि भी क्षणिक है, इसलिये; च=भी (वासनाकी सत्ता सिद्ध नहीं होती)। व्याख्या—वासनाकी आधारभूत जो बुद्धि है, उसे भी विज्ञानवादी क्षणिक मानते हैं। इसलिये वासनाके आधारकी स्थिर सत्ता न होनेके कारण निराधार वासनाका अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता, इसलिये भी बौद्धमत भ्रान्तिपूर्ण है। सम्बन्ध—अब सूत्रकार बौद्धमतमें सब प्रकारकी अनुपपत्ति होनेके कारण उसकी अनुपयोगिता सूचित करते हुए इस प्रकरणका उपसंहार करते हैं— सर्वथानुपपत्तेश्च ॥ २।२।३२ ॥ (विचार करनेपर बौद्धमतमें) सर्वथा=सब प्रकारसे; अनुपपत्तेः= अनुपपत्ति (असंगति) दिखायी देती है; इसलिये; च=भी (बौद्धमत उपादेय नहीं है)। व्याख्या—बौद्धमतकी मान्यताओंपर जितना ही विचार किया जाता है, उतना ही उनकी प्रत्येक बात युक्तिविरुद्ध जान पड़ती है। बौद्धोंकी प्रत्येक मान्यताका युक्तियोंसे खण्डन हो जाता है, अतः वह कदापि उपादेय नहीं है। यहाँ सूत्रकारने प्रसंगका उपसंहार करते हुए माध्यमिक बौद्धोंके सर्वशून्यवादका भी खण्डन कर दिया—यह बात इसीके अन्तर्गत समझ लेनी

१९६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

१९६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ चाहिये। तात्पर्य यह कि क्षणिकवाद और विज्ञानवादका जिन युक्तियोंसे खण्डन किया गया है, उन्हींके द्वारा सर्वशून्यवादका भी खण्डन हो गया; ऐसा मानना चाहिये। सम्बन्ध—यहाँतक बौद्धमतका निराकरण करके अब जैनमतका खण्डन करनेके लिये नया प्रकरण आरम्भ करते हैं। जैनीलोग सप्तभंगी-न्यायके अनुसार एक ही पदार्थकी सत्ता और असत्ता दोनों स्वीकार करते हैं, उनकी इस मान्यताका निराकरण करनेके लिये सूत्रकार कहते हैं— नैकस्मिन्नसम्भवात् ॥ २ । २ । ३३ ॥ एकस्मिन् = एक सत्य पदार्थमें; न = परस्पर-विरुद्ध अनेक धर्म नहीं रह सकते; असम्भवात् = क्योंकि यह असम्भव है। व्याख्या—जैनीलोग सात पदार्थ १ और पंच अस्तिकाय २ मानते हैं और सर्वत्र सप्तभंगी-न्यायकी अवतारणा करते हैं। उनकी मान्यताके अनुसार सप्तभंगी-न्यायका स्वरूप इस प्रकार है—१ स्यादस्ति (पदार्थकी सत्ता है), २ स्यान्नास्ति (प्रकारान्तरसे पदार्थकी सत्ता नहीं है), ३ स्यादस्ति च नास्ति च (हो सकता है कि पदार्थकी सत्ता हो भी और न भी हो), ४ स्यादवक्तव्यः (सम्भव है, वस्तुका स्वरूप कहने या वर्णन करनेयोग्य न हो), ५ स्यादस्ति चावक्तव्यश्च (सम्भव है, वस्तुकी सत्ता हो, पर वह वर्णन करनेयोग्य न हो), ६ स्यान्नास्ति चावक्तव्यश्च (सम्भव है, वस्तुकी सत्ता भी न हो और वह वर्णन करनेयोग्य भी न हो) तथा ७ स्यादस्ति च नास्ति चावक्तव्यश्च (सम्भव है, वस्तुकी सत्ता हो, न भी हो और वह वर्णन करनेयोग्य भी न १-उनके बताये हुए सात पदार्थ इस प्रकार हैं—जीव, अजीव, आस्रव, संवर, निर्जन, बन्ध और मोक्ष। २-पाँच अस्तिकाय इस प्रकार हैं—जीवास्तिकाय, पुद्गलास्तिकाय, धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय तथा आकाशास्तिकाय।

सूत्र ३४ ] अध्याय २ १९७

सूत्र ३४ ] अध्याय २ १९७ हो)। इस तरह वे प्रत्येक पदार्थके विषयमें विकल्प रखते हैं। सूत्रकारने इस सूत्रके द्वारा इसीका निराकरण किया है। उनका कहना है कि जो एक सत्य पदार्थ है, उसके प्रकार-भेद तो हो सकते हैं; परंतु उसमें विरोधी धर्म नहीं हो सकते। जो वस्तु है, उसका अभाव नहीं हो सकता। जो नहीं है, उसकी विद्यमानता नहीं हो सकती। जो नित्य पदार्थ है, वह नित्य ही है, अनित्य नहीं है। जो अनित्य है, वह अनित्य ही है, नित्य नहीं है। इसी प्रकार समझ लेना चाहिये। अतः जैनियोंका प्रत्येक वस्तुको विरुद्ध धर्मोंसे युक्त मानना युक्तिसंगत नहीं है। सम्बन्ध—जैनीलोगोंकी दूसरी मान्यता यह है कि आत्माका माप शरीरके बराबर है, उसमें दोष दिखाते हुए सूत्रकार कहते हैं— एवं चात्माकात्स्न्र्यम्॥ २।२।३४॥ एवं च=इसी प्रकार; आत्माकात्स्न्र्यम्=आत्माको अपूर्ण—एकदेशीय अर्थात् शरीरके बराबर मापवाला मानना भी युक्तिसंगत नहीं है। व्याख्या—जिस प्रकार एक पदार्थमें विरुद्ध धर्मोंको मानना युक्तिसंगत नहीं है, उसी प्रकार आत्माको एकदेशीय अर्थात् शरीरके बराबर मापवाला मानना भी युक्तिसंगत नहीं है; क्योंकि किसी मनुष्यशरीरमें रहनेवाले आत्माको यदि उसके कर्मवश कभी चींटीका शरीर प्राप्त हो तो वह उसमें कैसे समायेगा? इसी तरह यदि उसे हाथीका शरीर मिले तो उसका माप हाथीके बराबर कैसे हो जायगा। इसके सिवा, मनुष्यका शरीर भी जन्मके समय बहुत छोटा-सा होता है, पीछे बहुत बड़ा हो जाता है, तो आत्माका माप किस अवस्थाके शरीरके बराबर मानेंगे? शरीरका हाथ या पैर आदि कोई अंग कट जानेसे आत्मा नहीं कट जाता। इस प्रकार विचार करनेसे आत्माको शरीरके बराबर माननेकी बात भी सर्वथा दोषपूर्ण प्रतीत होती है; अतः जैनमत भी अनुपपन्न होनेके कारण अमान्य है। सम्बन्ध—यदि जैनीलोग यह कहें कि आत्मा छोटे शरीरमें छोटा और

१९८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

१९८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

बड़ेमें बड़ा हो जाता है, इसलिये हमारी मान्यतामें कोई दोष नहीं है, तो इसके उत्तरमें कहते हैं— न च पर्यायादप्यविरोधो विकारादिभ्यः ॥ २।२।३५ ॥ च=इसके सिवा; पर्यायात् = आत्माको घटने-बढ़नेवाला मान लेनेसे; अपि=भी; अविरोधः = विरोधका निवारण; न =नहीं हो सकता; विकारादिभ्यः = क्योंकि ऐसा माननेपर आत्मामें विकार आदि दोष प्राप्त होंगे। व्याख्या—यदि यह मान लिया जाय कि आत्माको जब-जब जैसा मापवाला छोटा-बड़ा शरीर मिलता है, तब-तब वह भी वैसे ही मापवाला हो जाता है, तो भी आत्मा निर्दोष नहीं ठहरता, क्योंकि ऐसा मान लेनेपर उसको विकारी, अवयवयुक्त, अनित्य तथा इसी प्रकार अन्य अनेक दोषोंसे युक्त मानना हो जायगा। जो पदार्थ घटता-बढ़ता है, वह अवयवयुक्त होता है, किंतु आत्मा अवयवयुक्त नहीं माना गया है। घटने-बढ़नेवाला पदार्थ नित्य नहीं हो सकता परंतु आत्माको नित्य माना गया है। घटना और बढ़ना विकार है, यह आत्मामें सम्भव नहीं है; क्योंकि उसे निर्विकार माना गया है। इस प्रकार घटना-बढ़ना माननेसे अनेक दोष आत्मामें प्राप्त हो सकते हैं; अतः जैनियोंकी उपर्युक्त मान्यता युक्तिसंगत नहीं है। सम्बन्ध—जीवात्माको शरीरके बराबर मापवाला मानना सर्वथा असंगत है, इस बातको प्रकारान्तरसे सिद्ध करते हैं— अन्त्यावस्थितेश्चोभयनित्यत्वादविशेषः ॥ २।२।३६ ॥ च=और; अन्त्यावस्थितेः=अन्तिम अर्थात् मोक्षावस्थामें जो जीवका परिमाण है, उसकी नित्य स्थिति स्वीकार की गयी है, इसलिये; उभयनित्य- त्वात् = आदि और मध्य-अवस्थामें जो उसका परिमाण (माप) रहा है, उसको भी नित्य मानना हो जाता है, अतः, अविशेषः=कोई विशेषता नहीं रह जाती (सब शरीरोंमें उसका एक-सा माप सिद्ध हो जाता है)। व्याख्या—जैन-सिद्धान्तमें यह स्वीकार किया गया है कि मोक्षावस्थामें

सूत्र ३७ ] अध्याय २ १९९

सूत्र ३७ ] अध्याय २ १९९ जो जीवका परिमाण है, उसकी नित्यस्थिति है। यह घटता-बढ़ता नहीं है। इस कारण आदि और मध्यकी अवस्थामें भी जो उसका परिमाण है, उसको भी उसी प्रकार नित्य मानना हो जाता है, क्योंकि पहलेका माप अनित्य मान लेनेपर अन्तिम मापको भी नित्य नहीं माना जा सकता। जो नित्य है, वह सदासे ही एक-सा रहता है। बीचमें घटता-बढ़ता नहीं है। इसलिये पहले या बीचकी अवस्थाओंमें जितने शरीर उसे प्राप्त होते हैं, उन सबमें उसका छोटा या बड़ा एक-सा ही माप मानना पड़ेगा। किसी प्रकारकी विशेषताका मानना युक्तिसंगत नहीं होगा। इस प्रकार पूर्वापरकी मान्यतामें विरोध होनेके कारण आत्माको प्रत्येक शरीरके मापवाला मानना सर्वथा असंगत है। अतएव जैन-सिद्धान्त माननेके योग्य नहीं है। सम्बन्ध—इस प्रकार अनीश्वरवादियोंके मतका निराकरण करके अब पाशुपत सिद्धान्तवालोंकी मान्यतामें दोष दिखानेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं— पत्युरसामंजस्यात्॥ २। २। ३७॥ पत्युः = पशुपतिका मत भी आदरणीय नहीं है; असामंजस्यात् = क्योंकि वह युक्तिविरुद्ध है। व्याख्या—पशुपति-मतको माननेवालोंकी कल्पना बड़ी विचित्र है। इनके मतमें तत्त्वोंकी कल्पना वेदविरुद्ध है तथा मुक्तिके साधन भी ये लोग वेदविरुद्ध ही मानते हैं। उनका कथन है कि कण्ठी, रुचिका, कुण्डल, जटा, भस्म और यज्ञोपवीत—ये छः मुद्राएँ हैं। इनके द्वारा जो अपने शरीरको मुद्रित अर्थात् चिह्नित कर लेता है, वह इस संसारमें पुनः जन्म नहीं धारण करता। हाथमें रुद्राक्षका कंकण पहनना, मस्तकपर जटा धारण करना, मुर्देकी खोपड़ी लिये रहना तथा शरीरमें भस्म लगाना—इन सबसे मुक्ति मिलती है। इत्यादि प्रकारसे वे चिह्न धारण करनेमात्रसे भी मोक्ष होना मानते हैं। इसके सिवा, वे महेश्वरको केवल निमित्त कारण तथा प्रधानको उपादान कारण मानते हैं। ये सब बातें युक्तिसंगत नहीं हैं; इसलिये यह मत माननेयोग्य नहीं है।

२०० वेदान्त-दर्शन [ पाद २

२०० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ सम्बन्ध—अब पाशुपतोंके दार्शनिक मत निमित्तकारणवादका खण्डन करते हैं— सम्बन्धानुपपत्तेश्च ॥ २।२।३८ ॥ सम्बन्धानुपपत्तेः = सम्बन्धकी सिद्धि न होनेसे; च = भी (यह मान्यता असंगत है)। व्याख्या—पाशुपतोंकी मान्यताके अनुसार यदि ईश्वरको केवल निमित्त कारण माना जाय तो उपादान कारणके साथ उसका किस प्रकार सम्बन्ध होगा, यह बताना आवश्यक है। लोकमें यह देखा जाता है कि शरीरधारी निमित्त कारण कुम्भकार आदि ही घट आदि कार्यके लिये मृत्तिका आदि साधनोंके साथ अपना संयोगसम्बन्ध स्थापित करते हैं; किंतु ईश्वर शरीरादिसे रहित निराकार है, अतः उसका प्रधान आदिके साथ संयोगरूप सम्बन्ध नहीं हो सकता। अतएव उसके द्वारा सृष्टिरचना भी नहीं हो सकेगी। जो लोग वेदको प्रमाण मानते हैं, उनको तो सब बातें युक्तिसे सिद्ध करनेकी आवश्यकता नहीं पड़ती, क्योंकि वे परब्रह्म परमेश्वरको वेदके कथनानुसार सर्वशक्तिमान् मानते हैं, अतः वह शक्तिशाली परमेश्वर स्वयं ही निमित्त और उपादान कारण हो सकता है। वेदोंके प्रति जिनकी निष्ठा है, उनके लिये युक्तिका कोई मूल्य नहीं है। वेदमें जो कुछ कहा गया है, वह निर्भ्रान्त सत्य है; युक्ति उसके साथ रहे तो ठीक है, न रहे तो भी कोई चिन्ता नहीं है; किंतु जिनका मत केवल तर्कपर ही अवलम्बित है उनको तो अपनी प्रत्येक बात तर्कसे सिद्ध करनी ही चाहिये। परंतु पाशुपतोंकी उपर्युक्त मान्यता न वेदसे सिद्ध होती है, न तर्कसे ही। अतः वह सर्वथा अमान्य है। सम्बन्ध—अब उक्त मतमें दूसरी अनुपपत्ति दिखलाते हैं— अधिष्ठानानुपपत्तेश्च ॥ २।२।३९ ॥ अधिष्ठानानुपपत्तेः = अधिष्ठानकी उपपत्ति न होनेके कारण; च = भी (ईश्वरको केवल निमित्त कारण मानना उचित नहीं है)।

सूत्र ४०-४१ ] अध्याय २ २०१ व्याख्या—उनकी मान्यताके अनुसार जैसे कुम्भकार मृत्तिका आदि साधन-सामग्रीका अधिष्ठाता होकर घट आदिका कार्य करता है, उसी प्रकार सृष्टिकर्ता ईश्वर भी प्रधान आदि साधनोंका अधिष्ठाता होकर ही सृष्टिकार्य कर सकेगा; परंतु न तो ईश्वर ही कुम्भकारकी भाँति सशरीर है और न प्रधान ही मिट्टी आदिकी भाँति साकार है, अतः रूपादिसे रहित प्रधान निराकार ईश्वरका अधिष्ठेय कैसे हो सकता है ? इसलिये ईश्वरको केवल निमित्त कारण माननेवाला पाशुपतमत युक्तिविरुद्ध होनेके कारण मान्य नहीं है। सम्बन्ध—यदि ऐसी बात है तो ईश्वरको शरीर और इन्द्रियोंसे युक्त क्यों न मान लिया जाय ? इसपर कहते हैं— करणवच्चेन्न भोगादिभ्यः ॥ २ । २ । ४० ॥ चेत्=यदि, करणवत्=ईश्वरको शरीर, इन्द्रिय आदि करणोंसे युक्त मान लिया जाय तो; न=यह ठीक नहीं है; भोगादिभ्यः=क्योंकि भोग आदिसे उसका सम्बन्ध सिद्ध हो जायगा। व्याख्या—यदि यह मान लिया जाय कि ईश्वर अपने संकल्पसे ही मन, बुद्धि और इन्द्रिय आदिसहित शरीर धारण करके लौकिक दृष्टान्तके अनुसार निमित्त कारण बन जाता है, तो यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि शरीरधारी होनेपर साधारण जीवोंकी भाँति उसे कर्मानुसार भोगोंकी प्राप्ति होनेका प्रसंग आ जायगा। उस दशामें उसकी ईश्वरता ही सिद्ध नहीं होगी। अतः ईश्वरको केवल निमित्त कारण मानना युक्तिसंगत नहीं है। सम्बन्ध—उपर्युक्त पाशुपतमतमें अन्य दोषोंकी उद्भावना करते हुए कहते हैं— अन्तवत्त्वमसर्वज्ञता वा ॥ २ । २ । ४१ ॥ अन्तवत्त्वम् = (पाशुपतमतमें) ईश्वरके अन्तवाला होनेका; वा = अथवा, असर्वज्ञता = सर्वज्ञ न होनेका दोष उपस्थित होता है। व्याख्या—पाशुपत-सिद्धान्तके अनुसार ईश्वर अनन्त एवं सर्वज्ञ है। साथ

२०२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

२०२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ ही वे प्रधान (प्रकृति) और जीवोंको भी अनन्त मानते हैं। अतः यह प्रश्न उठता है कि उनका माना हुआ ईश्वर यह बात जानता है या नहीं कि ‘जीव कितने और कैसे हैं? प्रधानका स्वरूप क्या और कैसा है? तथा मैं (ईश्वर) कौन और कैसा हूँ?’ इसके उत्तरमें यदि पाशुपतमतवाले यह कहें कि ईश्वर यह सब कुछ जानता है, तब तो जाननेमें आ जानेवाले पदार्थोंको अनन्त (असीम) मानना या कहना अयुक्त सिद्ध होता है और यदि कहें, वह नहीं जानता तो ईश्वरको सर्वज्ञ मानना नहीं बन सकता। अतः या तो ईश्वर, जीवात्मा और प्रकृतिको सान्त मानना पड़ेगा या ईश्वरको अल्पज्ञ स्वीकार करना पड़ेगा। इस प्रकार पूर्वोक्त सिद्धान्त दोषयुक्त एवं वेदविरुद्ध होनेके कारण माननेयोग्य नहीं है। सम्बन्ध— यहाँतक वेदविरुद्ध मतोंका खण्डन किया गया। अब वेदप्रमाण माननेवाले पांचरात्र आगममें जो आंशिक अनुपपत्तिकी शंका उठायी जाती है, उसका समाधान करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं। भागवत- शास्त्र, पांचरात्र आदिकी प्रक्रिया इस प्रकार है—‘परम कारण परब्रह्मस्वरूप ‘वासुदेव’ से ‘संकर्षण’ नामक जीवकी उत्पत्ति होती है; संकर्षणसे ‘प्रद्युम्न’ संज्ञक मन उत्पन्न होता है और उस प्रद्युम्नसे ‘अनिरुद्ध’ नामधारी अहंकारकी उत्पत्ति होती है। इसमें दोषकी उद्भावना करते हुए पूर्वपक्षी कहता है— उत्पत्त्यसम्भवात् ॥ २ । २ । ४२ ॥ उत्पत्त्यसम्भवात् = जीवकी उत्पत्ति सम्भव नहीं है, इसलिये (वासुदेवसे संकर्षणकी उत्पत्ति मानना वेदविरुद्ध प्रतीत होता है)। व्याख्या— भागवत-शास्त्र या पांचरात्र-आगम जो यह मानता है कि ‘इस जगत्के परम कारण परब्रह्म पुरुषोत्तम श्री ‘वासुदेव’ हैं, वे ही इसके निमित्त और उपादान भी हैं;’ यह वैदिक मान्यताके सर्वथा अनुकूल है। परंतु उसमें भगवान् वासुदेवसे जो ‘संकर्षण’ नामक जीवकी उत्पत्ति बतायी गयी है, यह कथन वेदविरुद्ध जान पड़ता है, क्योंकि श्रुतिमें जीवको जन्म-मरणसे रहित और नित्य कहा गया है (क० उ० १।२।१८)। उत्पन्न होनेवाली वस्तु

सूत्र ४३-४४ ] अध्याय २ २०३

सूत्र ४३-४४ ] अध्याय २ २०३ कभी नित्य नहीं हो सकती; अतः जीवकी उत्पत्ति असम्भव है। यदि जीवको उत्पत्ति-विनाशशील एवं अनित्य मान लिया जाय तो वेद- शास्त्रोंमें जो उसकी बद्ध-मुक्त अवस्थाका वर्णन है, वह व्यर्थ होगा। इसके सिवा, जन्म-मरणरूप बन्धनसे छूटने और परमात्माको प्राप्त करनेके लिये जो वेदोंमें साधन बताये गये हैं, वे सब भी व्यर्थ सिद्ध होते हैं। अतः जीवकी उत्पत्ति मानना उचित नहीं है। सम्बन्ध—अब पूर्वपक्षकी दूसरी शंकाका उल्लेख करते हैं— न च कर्तुः करणम् ॥ २।२।४३ ॥ च=तथा; कर्तुः=कर्ता (जीवात्मा)-से; करणम्=करण (मन और मनसे अहंकार)-की उत्पत्ति भी; न=सम्भव नहीं है। व्याख्या—जिस प्रकार परब्रह्म भगवान् वासुदेवसे जीवकी उत्पत्ति असम्भव है, उसी प्रकार संकर्षण नामसे कहे जानेवाले चेतन जीवात्मासे 'प्रद्युम्न' नामक मनस्तत्त्वकी और उससे 'अनिरुद्ध' नामक अहंकारतत्त्वकी उत्पत्ति भी सम्भव नहीं है; क्योंकि जीवात्मा कर्ता और चेतन है, मन करण है। अतः कर्तासे करणकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। सम्बन्ध—इस प्रकार पांचरात्र नामक भक्तिशास्त्रमें अन्य सब मान्यता वेदानुकूल होनेपर भी उपर्युक्त स्थलोंमें श्रुतिसे कुछ विरोध-सा प्रतीत होता है; उसे पूर्वपक्षके रूपमें उठाकर सूत्रकार अगले दो सूत्रोंद्वारा उस विरोधका परिहार करते हुए कहते हैं— विज्ञानादिभावे वा तदप्रतिषेधः ॥ २।२।४४॥ वा=निःसंदेह, विज्ञानादिभावे=(पांचरात्रशास्त्रद्वारा) भगवान्के विज्ञानादि षड्विध गुणोंका संकर्षण आदिमें भाव (होना) सूचित किया गया है। इस मान्यताके अनुसार उनका भगवत्स्वरूप होना सिद्ध होता है, इसलिये; तदप्रतिषेधः =उनकी उत्पत्तिका वेदमें निषेध नहीं है। व्याख्या—पूर्वपक्षीने जो यह कहा कि 'श्रुतिमें जीवात्माकी उत्पत्तिका

२०४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

२०४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

विरोध है तथा कर्तासे करणकी उत्पत्ति नहीं हो सकती' इसके उत्तरमें सिद्धान्तपक्षका कहना है कि उक्त पांचरात्रशास्त्रमें जीवकी उत्पत्ति या कर्तासे करणकी उत्पत्ति नहीं बतायी गयी है, अपितु संकर्षण जीव- तत्त्वके, प्रद्युम्न मनस्तत्त्वके और अनिरुद्ध अहंकारतत्त्वके अधिष्ठाता बताये गये हैं, जो भगवान् वासुदेवके ही अंगभूत हैं; क्योंकि वहाँ संकर्षणको भगवान्‌का प्राण, प्रद्युम्नको मन और अनिरुद्धको अहंकार माना गया है। अतः वहाँ जो इनकी उत्पत्तिका वर्णन है, वह भगवान्‌के ही अंशोंका उन-उन रूपोंमें प्राकट्य बतानेवाला है। श्रुतिमें भी भगवान्‌के अजन्मा होते हुए भी विविधरूपोंमें प्रकट होनेका वर्णन इस प्रकार मिलता है—"अजायमानो बहुधा वि जायते।' (यजु० ३१।१९) इसलिये भगवान् वासुदेवका संकर्षण आदि व्यूहोंके रूपमें प्रकट होना वेदविरुद्ध नहीं है। जिस प्रकार भगवान् अपने भक्तोंपर दया करके श्रीराम आदिके रूपमें प्रकट होते हैं, उसी प्रकार साक्षात् परब्रह्म परमेश्वर भगवान् वासुदेव अपने भक्तजनोंपर कृपा करके स्वेच्छासे ही चतुर्व्यूहके रूपमें प्रकट होते हैं। भागवत-शास्त्रमें इन चारोंकी उपासना भगवान् वासुदेवकी ही उपासना मानी गयी है। भगवान् वासुदेव विभिन्न अधिकारियोंके लिये विभिन्न रूपोंमें उपास्य होते हैं, इसलिये उनके चार व्यूह माने गये हैं। इन व्यूहोंकी पूजा-उपासनासे परब्रह्म परमात्माकी ही प्राप्ति मानी गयी है। उन संकर्षण आदिका जन्म साधारण जीवोंकी भाँति नहीं है; क्योंकि वे चारों ही चेतन तथा ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेज आदि समस्त भगवद्भावोंसे सम्पन्न माने गये हैं। अतः संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—ये तीनों उन परब्रह्म परमेश्वर भगवान् वासुदेवसे भिन्न तत्त्व नहीं हैं। अतः इनकी उत्पत्तिका वर्णन वेदविरुद्ध नहीं है। सम्बन्ध—यह पांचरात्र-आगम वेदानुकूल है, किसी अंशमें भी इसका वेदसे विरोध नहीं है; इस बातको पुनः दृढ़ करते हैं—

सूत्र ४५ ] अध्याय २ २०५

सूत्र ४५ ] अध्याय २ २०५ विप्रतिषेधाच्च ॥ २ । २ । ४५ ॥ विप्रतिषेधात् = इस शास्त्रमें विशेषरूपसे जीवकी उत्पत्तिका निषेध किया गया है, इसलिये; च=भी (यह वेदके प्रतिकूल नहीं है)। व्याख्या—उक्त शास्त्रमें जीवको अनादि, नित्य, चेतन और अविनाशी माना गया है तथा उसके जन्म-मरणका निषेध किया गया है, इसलिये भी यह सिद्ध होता है कि इसका वैदिक प्रक्रियासे कोई विरोध नहीं है। इसमें जो यह कहा गया है कि 'शाण्डिल्य मुनिने अंगोंसहित चारों वेदोंमें निष्ठा (निश्चल स्थिति)-को न पाकर इस भक्तिशास्त्रका अध्ययन किया।' यह वेदोंकी निन्दा या प्रतिषेध नहीं है, जिससे कि इसे वेदविरोधी शास्त्र कहा जा सके। इस प्रसंगद्वारा भक्तिशास्त्रकी महिमाका ही प्रतिपादन किया गया है। छान्दोग्योपनिषद् (७। १। २-३)-में नारदजीके विषयमें भी ऐसा ही प्रसंग आया है। नारदजीने सनत्कुमारजीसे कहा है, 'मैंने समस्त वेद, वेदांग, इतिहास, पुराण आदि पढ़ लिये तो भी मुझे आत्मतत्त्वका अनुभव नहीं हुआ।' यह कथन जैसे वेदादि शास्त्रोंको तुच्छ बतानेके लिये नहीं, आत्मज्ञानकी महत्ता सूचित करनेके लिये है, उसी प्रकार पांचरात्रमें शाण्डिल्यका प्रसंग भी वेदोंकी तुच्छता बतानेके लिये नहीं, अपितु भक्तिशास्त्रकी महिमा प्रकट करनेके लिये आया है; अतः वह शास्त्र सर्वथा निर्दोष एवं वेदानुकूल है। दूसरा पाद सम्पूर्ण

तीसरा पाद

तीसरा पाद सम्बन्ध— इस शास्त्रमें जो ब्रह्मके लक्षण बताये गये हैं, उनमें स्मृति और न्यायसे जो विरोध प्रतीत होता है, उसका निर्णयपूर्वक समाधान तो इस अध्यायके पहले पादमें किया गया, उसके बाद दूसरे पादमें अपने सिद्धान्तकी सिद्धिके लिये अनीश्वरवादी नास्तिकोंके सिद्धान्तका तथा ईश्वरको मानते हुए भी उसको उपादान कारण न माननेवालोंके सिद्धान्तका युक्तियोंद्वारा निराकरण किया गया। साथ ही भागवतमतमें जो इस ग्रन्थके सिद्धान्तसे विरोध प्रतीत होता था, उसका समाधान करके उस पादकी समाप्ति की गयी। अब पूर्व प्रतिज्ञानुसार परब्रह्मको समस्त प्रपंचका अभिन्ननिमित्तोपादान कारण माननेमें जो श्रुतियोंके वाक्योंसे विरोध प्रतीत होता है, उसका समाधान करनेके लिये तथा जीवात्माके स्वरूपका निर्णय करनेके लिये तीसरा पाद आरम्भ किया जाता है— श्रुतियोंमें कहीं तो कहा है कि परमेश्वरने पहले-पहल तेजकी रचना की, उसके बाद तेजसे जल और जलसे अन्न—इस क्रमसे जगत्‌की रचना हुई। कहीं कहा कि पहले-पहल आकाशकी रचना हुई, उससे वायु आदिके क्रमसे जगत्‌की उत्पत्ति हुई। इस प्रकारके विकल्पोंकी एकता करके समाधान करनेके लिये पूर्वपक्षकी उत्थापना करते हैं— न वियदश्रुतेः॥ २।३।१॥ वियत्=आकाश; न=उत्पन्न नहीं होता; अश्रुतेः=क्योंकि (छान्दोग्योप- निषद्के सृष्टि-प्रकरणमें) उसकी उत्पत्ति नहीं सुनी गयी है। व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद्में जहाँ जगत्‌की उत्पत्तिका वर्णन किया है; वहाँ पहले-पहल तेजकी रचना बतायी गयी है।* फिर तेज, जल और अन्न— इन तीनोंके सम्मेलनसे जगत्‌की रचनाका वर्णन है (छा० उ० ६।२।१ से ६।३।४ तक), वहाँ आकाशकी उत्पत्तिका कोई प्रसंग नहीं है तथा

  • 'तत्तेजोऽसृजत।' (छा० उ० ६।२।३)

सूत्र २—४ ] अध्याय २ २०७

सूत्र २—४ ] अध्याय २ २०७ आकाशको विभु (व्यापक) माना गया है (गीता १३।३२)। इसलिये यह सिद्ध होता है कि आकाश नित्य है, वह उत्पन्न नहीं होता। सम्बन्ध—इस शंकाके उत्तरमें कहते हैं— अस्ति तु॥ २।३।२॥ तु=किंतु; अस्ति=आकाशकी उत्पत्तिका वर्णन भी (दूसरी श्रुतिमें) है। व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद्में 'ब्रह्म सत्य, ज्ञानस्वरूप और अनन्त है' इस प्रकार ब्रह्मके लक्षण बताकर फिर उसी ब्रह्मसे आकाशकी उत्पत्ति बतायी गयी है;* इसलिये यह कहना ठीक नहीं कि वेदमें आकाशकी उत्पत्तिका वर्णन नहीं है। सम्बन्ध—उक्त विषयको स्पष्ट करनेके लिये पुनः पूर्वपक्षको उठाया जाता है— गौण्यसम्भवात् ॥ २।३।३॥ असम्भवात्=आकाशकी उत्पत्ति असम्भव होनेके कारण; गौणी=यह श्रुति गौणी है। व्याख्या—अवयवरहित और विभु होनेके कारण आकाशका उत्पन्न होना नहीं बन सकता, अतः तैत्तिरीयोपनिषद्में जो आकाशकी उत्पत्ति बतायी गयी है, उस कथनको गौण समझना चाहिये, वहाँ किसी दूसरे अभिप्रायसे आकाशकी उत्पत्ति कही गयी होगी। सम्बन्ध—पूर्वपक्षकी ओरसे अपने पक्षको दृढ़ करनेके लिये दूसरा हेतु दिया जाता है— शब्दाच्च ॥ २।३।४॥ शब्दात्=शब्दप्रमाणसे; च=भी (यह सिद्ध होता है कि आकाश उत्पन्न नहीं हो सकता)।

  • तस्माद् वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः। आकाशाद्वायुः। वायोरग्निः। अग्नेरापः। अद्भ्यः पृथिवी इत्यादि। (तै० उ० २।१।१)

२०८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ व्याख्या—बृहदारण्यकमें कहा है कि ‘वायुश्चान्तरिक्षं चैतदमृतम्’— ‘वायु और अन्तरिक्ष—यह अमृत है’ (बृह० उ० २।३।३), अतः जो अमृत हो, उसकी उत्पत्ति नहीं हो सकती; तथा यह भी कहा है कि ‘जिस प्रकार यह आकाश अनन्त है, उसी प्रकार आत्माको अनन्त समझना चाहिये।’ ‘आकाशशरीरं ब्रह्म’ ‘ब्रह्मका शरीर आकाश है’ (तै० उ० १। ६।२) इन श्रुति-वाक्योंसे आकाशकी अनन्तता सिद्ध होती है, इसलिये भी आकाशकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि उक्त श्रुतिमें जिस प्रकार आकाशकी उत्पत्ति बतानेवाले वाक्य हैं, उसी प्रकार वायु, अग्नि आदिकी उत्पत्ति बतानेवाले शब्द भी हैं; फिर यह कैसे माना जा सकता है कि आकाशके लिये तो कहना गौण है और दूसरोंके लिये मुख्य है, इसपर पूर्वपक्षकी ओरसे उत्तर दिया जाता है— स्याच्चैकस्य ब्रह्मशब्दवत्॥ २।३।५॥ च=तथा; ब्रह्मशब्दवत्=ब्रह्मशब्दकी भाँति; एकस्य=किसी एक शाखाके वर्णनमें; स्यात्=गौणरूपसे भी आकाशकी उत्पत्ति बतायी जा सकती है। व्याख्या—दूसरी जगह एक ही प्रकरणमें पहले तो कहा है कि ‘तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽन्नमभिजायते।’—‘ब्रह्म विज्ञानमय तपसे वृद्धिको प्राप्त होता है, उससे अन्न उत्पन्न होता है।’ (मु० उ० १।१।८) उसके बाद कहा है कि— यः सर्वज्ञः सर्वविद् यस्य ज्ञानमयं तपः। तस्मादेतद् ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते॥ (मु० उ० १।१।९) अर्थात् ‘जो सर्वज्ञ, सबको जाननेवाला है, जिसका ज्ञानमय तप है, उससे यह ब्रह्म और नाम, रूप एवं अन्न उत्पन्न होता है।’ इस प्रकरणमें जैसे पहले ब्रह्म शब्द मुख्य अर्थमें प्रयुक्त हुआ है और पीछे उसी ब्रह्म शब्दका

सूत्र ६-७ ] अध्याय २ २०९

सूत्र ६-७ ] अध्याय २ २०९ गौण अर्थमें प्रयोग किया गया है, उसी प्रकार किसी एक शाखामें गौण अर्थमें आकाशको उत्पत्तिशील बताया जा सकता है। सम्बन्ध — इस प्रकार पूर्वपक्षकी उत्थापना करके अब दो सूत्रोंद्वारा उसका समाधान करते हैं— प्रतिज्ञाहानिरव्यतिरेकाच्छब्देभ्यः ॥ २ । ३ । ६ ॥ अव्यतिरेकात् = ब्रह्मके कार्यसे आकाशको अलग न माननेसे ही; प्रतिज्ञाहानिः = एकके ज्ञानसे सबके ज्ञानसम्बन्धी प्रतिज्ञाकी रक्षा हो सकती है; शब्देभ्यः = श्रुतिके शब्दोंसे यही सिद्ध होता है। व्याख्या — उपनिषदोंमें जो एकको जाननेसे सबका ज्ञान हो जानेकी प्रतिज्ञा की गयी है और उस प्रसंगमें जो कारण-कार्यके उदाहरण दिये गये हैं, (छा० उ० ३।१।१ से ६ तक) उन सबकी विरोधरहित सिद्धि आकाशको ब्रह्मके कार्यसे अलग न माननेपर ही हो सकती है, अन्यथा नहीं; क्योंकि वहाँ मिट्टी और सुवर्ण आदिका दृष्टान्त देकर उनके किसी एक कार्यके ज्ञानसे कारणके ज्ञानद्वारा सबका ज्ञान होना बताया है। अतः यदि आकाशको ब्रह्मका कार्य न मानकर ब्रह्मसे अलग मानेंगे तो कारणरूप ब्रह्मको जान लेनेपर भी आकाश जाना हुआ नहीं होगा; इससे प्रतिज्ञाकी हानि होगी। इतना ही नहीं, 'यह सब ब्रह्म ही है' (मु० उ० २।२।११) 'यह सब इस ब्रह्मका स्वरूप है' (छा० उ० ६।८।७) 'यह सब निःसंदेह ब्रह्म ही है; क्योंकि उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय उसीमें होते हैं' (छा० उ० ३।१४।१) इत्यादि श्रुतिवाक्योंसे भी यही सिद्ध होता है कि आकाश उस ब्रह्मका ही कार्य है। यावद्विकारं तु विभागो लोकवत् ॥ २ । ३ । ७ ॥ तु = तथा; लोकवत् = साधारण लौकिक व्यवहारकी भाँति; यावद्- विकारम् = विकारमात्र सब कुछ; विभागः = ब्रह्मका ही विभाग (कार्य) है। व्याख्या — जिस प्रकार लोकमें यह बात देखी जाती है कि कोई पुरुष

२१० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ देवदत्तके पुत्रोंका परिचय देते समय कहता है—‘ये सब-के-सब देवदत्तके पुत्र हैं।' फिर वह उनमेंसे किसी एक या दोका ही नाम लेकर यदि कहे कि ‘इनकी उत्पत्ति देवदत्तसे हुई है’ तो भी उन सबकी उत्पत्ति देवदत्तसे ही मानी जायगी, उसी प्रकार जब समस्त विकारात्मक जगत्‌को उस ब्रह्मका कार्य बता दिया गया, तब आकाश उससे अलग कैसे रह सकता है। अतः तेज आदिकी सृष्टि बताते समय यदि आकाशका नाम छूट गया तो भी यही सिद्ध होता है कि आकाश भी अन्य तत्त्वोंकी भाँति ब्रह्मका कार्य है और वह उससे उत्पन्न होता है। वायु और आकाशको अमृत कहनेका तात्पर्य देवताओंकी भाँति उन्हें अन्य तत्त्वोंकी अपेक्षा चिरस्थायी बतानामात्र है। सम्बन्ध— इस प्रकार आकाशका उत्पन्न होना सिद्ध करके उसीके उदाहरणसे यह निश्चय किया जाता है कि वायु भी उत्पन्न होता है— एतेन मातरिश्वा व्याख्यातः॥ २।३।८॥ एतेन = इससे अर्थात् आकाशकी उत्पत्ति सिद्ध करनेवाले कथनसे ही; मातरिश्वा = वायुका उत्पन्न होना; व्याख्यातः = बता दिया गया। व्याख्या— जिन युक्तियों और श्रुतिप्रमाणोंद्वारा पूर्वसूत्रोंमें ब्रह्मसे आकाशका उत्पन्न होना निश्चित किया गया, उन्हींसे यह कहना भी हो गया कि वायु भी उत्पन्न होता है, अतः उसके विषयमें अलग कहना आवश्यक नहीं समझा गया। सम्बन्ध— इस प्रकार आकाश और वायुको उत्पत्तिशील बतलाकर अब इस दृश्य-जगत्‌में जिन तत्त्वोंको दूसरे मतवाले नित्य मानते हैं तथा जिनकी उत्पत्तिका स्पष्ट वर्णन वेदमें नहीं आया है, उन सबको भी उत्पत्तिशील बतानेके लिये अगला सूत्र कहते हैं— असम्भवस्तु सतोऽनुपपत्तेः॥ २।३।९॥ सतः = ‘सत्’ शब्दवाच्य ब्रह्मके सिवा (अन्य किसीका उत्पन्न न होना);