वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ३७ ] अध्याय २ १९९ जो जीवका परिमाण है, उसकी नित्यस्थिति है। यह घटता-बढ़ता नहीं है। इस कारण आदि और मध्यकी अवस्थामें भी जो उसका परिमाण है, उसको भी उसी प्रकार नित्य मानना हो जाता है, क्योंकि पहलेका माप अनित्य मान लेनेपर अन्तिम मापको भी नित्य नहीं माना जा सकता। जो नित्य है, वह सदासे ही एक-सा रहता है। बीचमें घटता-बढ़ता नहीं है। इसलिये पहले या बीचकी अवस्थाओंमें जितने शरीर उसे प्राप्त होते हैं, उन सबमें उसका छोटा या बड़ा एक-सा ही माप मानना पड़ेगा। किसी प्रकारकी विशेषताका मानना युक्तिसंगत नहीं होगा। इस प्रकार पूर्वापरकी मान्यतामें विरोध होनेके कारण आत्माको प्रत्येक शरीरके मापवाला मानना सर्वथा असंगत है। अतएव जैन-सिद्धान्त माननेके योग्य नहीं है। सम्बन्ध—इस प्रकार अनीश्वरवादियोंके मतका निराकरण करके अब पाशुपत सिद्धान्तवालोंकी मान्यतामें दोष दिखानेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं— पत्युरसामंजस्यात्॥ २। २। ३७॥ पत्युः = पशुपतिका मत भी आदरणीय नहीं है; असामंजस्यात् = क्योंकि वह युक्तिविरुद्ध है। व्याख्या—पशुपति-मतको माननेवालोंकी कल्पना बड़ी विचित्र है। इनके मतमें तत्त्वोंकी कल्पना वेदविरुद्ध है तथा मुक्तिके साधन भी ये लोग वेदविरुद्ध ही मानते हैं। उनका कथन है कि कण्ठी, रुचिका, कुण्डल, जटा, भस्म और यज्ञोपवीत—ये छः मुद्राएँ हैं। इनके द्वारा जो अपने शरीरको मुद्रित अर्थात् चिह्नित कर लेता है, वह इस संसारमें पुनः जन्म नहीं धारण करता। हाथमें रुद्राक्षका कंकण पहनना, मस्तकपर जटा धारण करना, मुर्देकी खोपड़ी लिये रहना तथा शरीरमें भस्म लगाना—इन सबसे मुक्ति मिलती है। इत्यादि प्रकारसे वे चिह्न धारण करनेमात्रसे भी मोक्ष होना मानते हैं। इसके सिवा, वे महेश्वरको केवल निमित्त कारण तथा प्रधानको उपादान कारण मानते हैं। ये सब बातें युक्तिसंगत नहीं हैं; इसलिये यह मत माननेयोग्य नहीं है।