वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१९८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
बड़ेमें बड़ा हो जाता है, इसलिये हमारी मान्यतामें कोई दोष नहीं है, तो इसके उत्तरमें कहते हैं— न च पर्यायादप्यविरोधो विकारादिभ्यः ॥ २।२।३५ ॥ च=इसके सिवा; पर्यायात् = आत्माको घटने-बढ़नेवाला मान लेनेसे; अपि=भी; अविरोधः = विरोधका निवारण; न =नहीं हो सकता; विकारादिभ्यः = क्योंकि ऐसा माननेपर आत्मामें विकार आदि दोष प्राप्त होंगे। व्याख्या—यदि यह मान लिया जाय कि आत्माको जब-जब जैसा मापवाला छोटा-बड़ा शरीर मिलता है, तब-तब वह भी वैसे ही मापवाला हो जाता है, तो भी आत्मा निर्दोष नहीं ठहरता, क्योंकि ऐसा मान लेनेपर उसको विकारी, अवयवयुक्त, अनित्य तथा इसी प्रकार अन्य अनेक दोषोंसे युक्त मानना हो जायगा। जो पदार्थ घटता-बढ़ता है, वह अवयवयुक्त होता है, किंतु आत्मा अवयवयुक्त नहीं माना गया है। घटने-बढ़नेवाला पदार्थ नित्य नहीं हो सकता परंतु आत्माको नित्य माना गया है। घटना और बढ़ना विकार है, यह आत्मामें सम्भव नहीं है; क्योंकि उसे निर्विकार माना गया है। इस प्रकार घटना-बढ़ना माननेसे अनेक दोष आत्मामें प्राप्त हो सकते हैं; अतः जैनियोंकी उपर्युक्त मान्यता युक्तिसंगत नहीं है। सम्बन्ध—जीवात्माको शरीरके बराबर मापवाला मानना सर्वथा असंगत है, इस बातको प्रकारान्तरसे सिद्ध करते हैं— अन्त्यावस्थितेश्चोभयनित्यत्वादविशेषः ॥ २।२।३६ ॥ च=और; अन्त्यावस्थितेः=अन्तिम अर्थात् मोक्षावस्थामें जो जीवका परिमाण है, उसकी नित्य स्थिति स्वीकार की गयी है, इसलिये; उभयनित्य- त्वात् = आदि और मध्य-अवस्थामें जो उसका परिमाण (माप) रहा है, उसको भी नित्य मानना हो जाता है, अतः, अविशेषः=कोई विशेषता नहीं रह जाती (सब शरीरोंमें उसका एक-सा माप सिद्ध हो जाता है)। व्याख्या—जैन-सिद्धान्तमें यह स्वीकार किया गया है कि मोक्षावस्थामें