वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 200, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ३४ ] अध्याय २ १९७ हो)। इस तरह वे प्रत्येक पदार्थके विषयमें विकल्प रखते हैं। सूत्रकारने इस सूत्रके द्वारा इसीका निराकरण किया है। उनका कहना है कि जो एक सत्य पदार्थ है, उसके प्रकार-भेद तो हो सकते हैं; परंतु उसमें विरोधी धर्म नहीं हो सकते। जो वस्तु है, उसका अभाव नहीं हो सकता। जो नहीं है, उसकी विद्यमानता नहीं हो सकती। जो नित्य पदार्थ है, वह नित्य ही है, अनित्य नहीं है। जो अनित्य है, वह अनित्य ही है, नित्य नहीं है। इसी प्रकार समझ लेना चाहिये। अतः जैनियोंका प्रत्येक वस्तुको विरुद्ध धर्मोंसे युक्त मानना युक्तिसंगत नहीं है। सम्बन्ध—जैनीलोगोंकी दूसरी मान्यता यह है कि आत्माका माप शरीरके बराबर है, उसमें दोष दिखाते हुए सूत्रकार कहते हैं— एवं चात्माकात्स्न्र्यम्॥ २।२।३४॥ एवं च=इसी प्रकार; आत्माकात्स्न्र्यम्=आत्माको अपूर्ण—एकदेशीय अर्थात् शरीरके बराबर मापवाला मानना भी युक्तिसंगत नहीं है। व्याख्या—जिस प्रकार एक पदार्थमें विरुद्ध धर्मोंको मानना युक्तिसंगत नहीं है, उसी प्रकार आत्माको एकदेशीय अर्थात् शरीरके बराबर मापवाला मानना भी युक्तिसंगत नहीं है; क्योंकि किसी मनुष्यशरीरमें रहनेवाले आत्माको यदि उसके कर्मवश कभी चींटीका शरीर प्राप्त हो तो वह उसमें कैसे समायेगा? इसी तरह यदि उसे हाथीका शरीर मिले तो उसका माप हाथीके बराबर कैसे हो जायगा। इसके सिवा, मनुष्यका शरीर भी जन्मके समय बहुत छोटा-सा होता है, पीछे बहुत बड़ा हो जाता है, तो आत्माका माप किस अवस्थाके शरीरके बराबर मानेंगे? शरीरका हाथ या पैर आदि कोई अंग कट जानेसे आत्मा नहीं कट जाता। इस प्रकार विचार करनेसे आत्माको शरीरके बराबर माननेकी बात भी सर्वथा दोषपूर्ण प्रतीत होती है; अतः जैनमत भी अनुपपन्न होनेके कारण अमान्य है। सम्बन्ध—यदि जैनीलोग यह कहें कि आत्मा छोटे शरीरमें छोटा और