वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
सूत्र ३७ ] अध्याय २ १९९
सूत्र ३७ ] अध्याय २ १९९ जो जीवका परिमाण है, उसकी नित्यस्थिति है। यह घटता-बढ़ता नहीं है। इस कारण आदि और मध्यकी अवस्थामें भी जो उसका परिमाण है, उसको भी उसी प्रकार नित्य मानना हो जाता है, क्योंकि पहलेका माप अनित्य मान लेनेपर अन्तिम मापको भी नित्य नहीं माना जा सकता। जो नित्य है, वह सदासे ही एक-सा रहता है। बीचमें घटता-बढ़ता नहीं है। इसलिये पहले या बीचकी अवस्थाओंमें जितने शरीर उसे प्राप्त होते हैं, उन सबमें उसका छोटा या बड़ा एक-सा ही माप मानना पड़ेगा। किसी प्रकारकी विशेषताका मानना युक्तिसंगत नहीं होगा। इस प्रकार पूर्वापरकी मान्यतामें विरोध होनेके कारण आत्माको प्रत्येक शरीरके मापवाला मानना सर्वथा असंगत है। अतएव जैन-सिद्धान्त माननेके योग्य नहीं है। सम्बन्ध—इस प्रकार अनीश्वरवादियोंके मतका निराकरण करके अब पाशुपत सिद्धान्तवालोंकी मान्यतामें दोष दिखानेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं— पत्युरसामंजस्यात्॥ २। २। ३७॥ पत्युः = पशुपतिका मत भी आदरणीय नहीं है; असामंजस्यात् = क्योंकि वह युक्तिविरुद्ध है। व्याख्या—पशुपति-मतको माननेवालोंकी कल्पना बड़ी विचित्र है। इनके मतमें तत्त्वोंकी कल्पना वेदविरुद्ध है तथा मुक्तिके साधन भी ये लोग वेदविरुद्ध ही मानते हैं। उनका कथन है कि कण्ठी, रुचिका, कुण्डल, जटा, भस्म और यज्ञोपवीत—ये छः मुद्राएँ हैं। इनके द्वारा जो अपने शरीरको मुद्रित अर्थात् चिह्नित कर लेता है, वह इस संसारमें पुनः जन्म नहीं धारण करता। हाथमें रुद्राक्षका कंकण पहनना, मस्तकपर जटा धारण करना, मुर्देकी खोपड़ी लिये रहना तथा शरीरमें भस्म लगाना—इन सबसे मुक्ति मिलती है। इत्यादि प्रकारसे वे चिह्न धारण करनेमात्रसे भी मोक्ष होना मानते हैं। इसके सिवा, वे महेश्वरको केवल निमित्त कारण तथा प्रधानको उपादान कारण मानते हैं। ये सब बातें युक्तिसंगत नहीं हैं; इसलिये यह मत माननेयोग्य नहीं है।
२०० वेदान्त-दर्शन [ पाद २
२०० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ सम्बन्ध—अब पाशुपतोंके दार्शनिक मत निमित्तकारणवादका खण्डन करते हैं— सम्बन्धानुपपत्तेश्च ॥ २।२।३८ ॥ सम्बन्धानुपपत्तेः = सम्बन्धकी सिद्धि न होनेसे; च = भी (यह मान्यता असंगत है)। व्याख्या—पाशुपतोंकी मान्यताके अनुसार यदि ईश्वरको केवल निमित्त कारण माना जाय तो उपादान कारणके साथ उसका किस प्रकार सम्बन्ध होगा, यह बताना आवश्यक है। लोकमें यह देखा जाता है कि शरीरधारी निमित्त कारण कुम्भकार आदि ही घट आदि कार्यके लिये मृत्तिका आदि साधनोंके साथ अपना संयोगसम्बन्ध स्थापित करते हैं; किंतु ईश्वर शरीरादिसे रहित निराकार है, अतः उसका प्रधान आदिके साथ संयोगरूप सम्बन्ध नहीं हो सकता। अतएव उसके द्वारा सृष्टिरचना भी नहीं हो सकेगी। जो लोग वेदको प्रमाण मानते हैं, उनको तो सब बातें युक्तिसे सिद्ध करनेकी आवश्यकता नहीं पड़ती, क्योंकि वे परब्रह्म परमेश्वरको वेदके कथनानुसार सर्वशक्तिमान् मानते हैं, अतः वह शक्तिशाली परमेश्वर स्वयं ही निमित्त और उपादान कारण हो सकता है। वेदोंके प्रति जिनकी निष्ठा है, उनके लिये युक्तिका कोई मूल्य नहीं है। वेदमें जो कुछ कहा गया है, वह निर्भ्रान्त सत्य है; युक्ति उसके साथ रहे तो ठीक है, न रहे तो भी कोई चिन्ता नहीं है; किंतु जिनका मत केवल तर्कपर ही अवलम्बित है उनको तो अपनी प्रत्येक बात तर्कसे सिद्ध करनी ही चाहिये। परंतु पाशुपतोंकी उपर्युक्त मान्यता न वेदसे सिद्ध होती है, न तर्कसे ही। अतः वह सर्वथा अमान्य है। सम्बन्ध—अब उक्त मतमें दूसरी अनुपपत्ति दिखलाते हैं— अधिष्ठानानुपपत्तेश्च ॥ २।२।३९ ॥ अधिष्ठानानुपपत्तेः = अधिष्ठानकी उपपत्ति न होनेके कारण; च = भी (ईश्वरको केवल निमित्त कारण मानना उचित नहीं है)।
सूत्र ४०-४१ ] अध्याय २ २०१ व्याख्या—उनकी मान्यताके अनुसार जैसे कुम्भकार मृत्तिका आदि साधन-सामग्रीका अधिष्ठाता होकर घट आदिका कार्य करता है, उसी प्रकार सृष्टिकर्ता ईश्वर भी प्रधान आदि साधनोंका अधिष्ठाता होकर ही सृष्टिकार्य कर सकेगा; परंतु न तो ईश्वर ही कुम्भकारकी भाँति सशरीर है और न प्रधान ही मिट्टी आदिकी भाँति साकार है, अतः रूपादिसे रहित प्रधान निराकार ईश्वरका अधिष्ठेय कैसे हो सकता है ? इसलिये ईश्वरको केवल निमित्त कारण माननेवाला पाशुपतमत युक्तिविरुद्ध होनेके कारण मान्य नहीं है। सम्बन्ध—यदि ऐसी बात है तो ईश्वरको शरीर और इन्द्रियोंसे युक्त क्यों न मान लिया जाय ? इसपर कहते हैं— करणवच्चेन्न भोगादिभ्यः ॥ २ । २ । ४० ॥ चेत्=यदि, करणवत्=ईश्वरको शरीर, इन्द्रिय आदि करणोंसे युक्त मान लिया जाय तो; न=यह ठीक नहीं है; भोगादिभ्यः=क्योंकि भोग आदिसे उसका सम्बन्ध सिद्ध हो जायगा। व्याख्या—यदि यह मान लिया जाय कि ईश्वर अपने संकल्पसे ही मन, बुद्धि और इन्द्रिय आदिसहित शरीर धारण करके लौकिक दृष्टान्तके अनुसार निमित्त कारण बन जाता है, तो यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि शरीरधारी होनेपर साधारण जीवोंकी भाँति उसे कर्मानुसार भोगोंकी प्राप्ति होनेका प्रसंग आ जायगा। उस दशामें उसकी ईश्वरता ही सिद्ध नहीं होगी। अतः ईश्वरको केवल निमित्त कारण मानना युक्तिसंगत नहीं है। सम्बन्ध—उपर्युक्त पाशुपतमतमें अन्य दोषोंकी उद्भावना करते हुए कहते हैं— अन्तवत्त्वमसर्वज्ञता वा ॥ २ । २ । ४१ ॥ अन्तवत्त्वम् = (पाशुपतमतमें) ईश्वरके अन्तवाला होनेका; वा = अथवा, असर्वज्ञता = सर्वज्ञ न होनेका दोष उपस्थित होता है। व्याख्या—पाशुपत-सिद्धान्तके अनुसार ईश्वर अनन्त एवं सर्वज्ञ है। साथ
२०२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
२०२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ ही वे प्रधान (प्रकृति) और जीवोंको भी अनन्त मानते हैं। अतः यह प्रश्न उठता है कि उनका माना हुआ ईश्वर यह बात जानता है या नहीं कि ‘जीव कितने और कैसे हैं? प्रधानका स्वरूप क्या और कैसा है? तथा मैं (ईश्वर) कौन और कैसा हूँ?’ इसके उत्तरमें यदि पाशुपतमतवाले यह कहें कि ईश्वर यह सब कुछ जानता है, तब तो जाननेमें आ जानेवाले पदार्थोंको अनन्त (असीम) मानना या कहना अयुक्त सिद्ध होता है और यदि कहें, वह नहीं जानता तो ईश्वरको सर्वज्ञ मानना नहीं बन सकता। अतः या तो ईश्वर, जीवात्मा और प्रकृतिको सान्त मानना पड़ेगा या ईश्वरको अल्पज्ञ स्वीकार करना पड़ेगा। इस प्रकार पूर्वोक्त सिद्धान्त दोषयुक्त एवं वेदविरुद्ध होनेके कारण माननेयोग्य नहीं है। सम्बन्ध— यहाँतक वेदविरुद्ध मतोंका खण्डन किया गया। अब वेदप्रमाण माननेवाले पांचरात्र आगममें जो आंशिक अनुपपत्तिकी शंका उठायी जाती है, उसका समाधान करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं। भागवत- शास्त्र, पांचरात्र आदिकी प्रक्रिया इस प्रकार है—‘परम कारण परब्रह्मस्वरूप ‘वासुदेव’ से ‘संकर्षण’ नामक जीवकी उत्पत्ति होती है; संकर्षणसे ‘प्रद्युम्न’ संज्ञक मन उत्पन्न होता है और उस प्रद्युम्नसे ‘अनिरुद्ध’ नामधारी अहंकारकी उत्पत्ति होती है। इसमें दोषकी उद्भावना करते हुए पूर्वपक्षी कहता है— उत्पत्त्यसम्भवात् ॥ २ । २ । ४२ ॥ उत्पत्त्यसम्भवात् = जीवकी उत्पत्ति सम्भव नहीं है, इसलिये (वासुदेवसे संकर्षणकी उत्पत्ति मानना वेदविरुद्ध प्रतीत होता है)। व्याख्या— भागवत-शास्त्र या पांचरात्र-आगम जो यह मानता है कि ‘इस जगत्के परम कारण परब्रह्म पुरुषोत्तम श्री ‘वासुदेव’ हैं, वे ही इसके निमित्त और उपादान भी हैं;’ यह वैदिक मान्यताके सर्वथा अनुकूल है। परंतु उसमें भगवान् वासुदेवसे जो ‘संकर्षण’ नामक जीवकी उत्पत्ति बतायी गयी है, यह कथन वेदविरुद्ध जान पड़ता है, क्योंकि श्रुतिमें जीवको जन्म-मरणसे रहित और नित्य कहा गया है (क० उ० १।२।१८)। उत्पन्न होनेवाली वस्तु
सूत्र ४३-४४ ] अध्याय २ २०३
सूत्र ४३-४४ ] अध्याय २ २०३ कभी नित्य नहीं हो सकती; अतः जीवकी उत्पत्ति असम्भव है। यदि जीवको उत्पत्ति-विनाशशील एवं अनित्य मान लिया जाय तो वेद- शास्त्रोंमें जो उसकी बद्ध-मुक्त अवस्थाका वर्णन है, वह व्यर्थ होगा। इसके सिवा, जन्म-मरणरूप बन्धनसे छूटने और परमात्माको प्राप्त करनेके लिये जो वेदोंमें साधन बताये गये हैं, वे सब भी व्यर्थ सिद्ध होते हैं। अतः जीवकी उत्पत्ति मानना उचित नहीं है। सम्बन्ध—अब पूर्वपक्षकी दूसरी शंकाका उल्लेख करते हैं— न च कर्तुः करणम् ॥ २।२।४३ ॥ च=तथा; कर्तुः=कर्ता (जीवात्मा)-से; करणम्=करण (मन और मनसे अहंकार)-की उत्पत्ति भी; न=सम्भव नहीं है। व्याख्या—जिस प्रकार परब्रह्म भगवान् वासुदेवसे जीवकी उत्पत्ति असम्भव है, उसी प्रकार संकर्षण नामसे कहे जानेवाले चेतन जीवात्मासे 'प्रद्युम्न' नामक मनस्तत्त्वकी और उससे 'अनिरुद्ध' नामक अहंकारतत्त्वकी उत्पत्ति भी सम्भव नहीं है; क्योंकि जीवात्मा कर्ता और चेतन है, मन करण है। अतः कर्तासे करणकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। सम्बन्ध—इस प्रकार पांचरात्र नामक भक्तिशास्त्रमें अन्य सब मान्यता वेदानुकूल होनेपर भी उपर्युक्त स्थलोंमें श्रुतिसे कुछ विरोध-सा प्रतीत होता है; उसे पूर्वपक्षके रूपमें उठाकर सूत्रकार अगले दो सूत्रोंद्वारा उस विरोधका परिहार करते हुए कहते हैं— विज्ञानादिभावे वा तदप्रतिषेधः ॥ २।२।४४॥ वा=निःसंदेह, विज्ञानादिभावे=(पांचरात्रशास्त्रद्वारा) भगवान्के विज्ञानादि षड्विध गुणोंका संकर्षण आदिमें भाव (होना) सूचित किया गया है। इस मान्यताके अनुसार उनका भगवत्स्वरूप होना सिद्ध होता है, इसलिये; तदप्रतिषेधः =उनकी उत्पत्तिका वेदमें निषेध नहीं है। व्याख्या—पूर्वपक्षीने जो यह कहा कि 'श्रुतिमें जीवात्माकी उत्पत्तिका
२०४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
२०४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
विरोध है तथा कर्तासे करणकी उत्पत्ति नहीं हो सकती' इसके उत्तरमें सिद्धान्तपक्षका कहना है कि उक्त पांचरात्रशास्त्रमें जीवकी उत्पत्ति या कर्तासे करणकी उत्पत्ति नहीं बतायी गयी है, अपितु संकर्षण जीव- तत्त्वके, प्रद्युम्न मनस्तत्त्वके और अनिरुद्ध अहंकारतत्त्वके अधिष्ठाता बताये गये हैं, जो भगवान् वासुदेवके ही अंगभूत हैं; क्योंकि वहाँ संकर्षणको भगवान्का प्राण, प्रद्युम्नको मन और अनिरुद्धको अहंकार माना गया है। अतः वहाँ जो इनकी उत्पत्तिका वर्णन है, वह भगवान्के ही अंशोंका उन-उन रूपोंमें प्राकट्य बतानेवाला है। श्रुतिमें भी भगवान्के अजन्मा होते हुए भी विविधरूपोंमें प्रकट होनेका वर्णन इस प्रकार मिलता है—"अजायमानो बहुधा वि जायते।' (यजु० ३१।१९) इसलिये भगवान् वासुदेवका संकर्षण आदि व्यूहोंके रूपमें प्रकट होना वेदविरुद्ध नहीं है। जिस प्रकार भगवान् अपने भक्तोंपर दया करके श्रीराम आदिके रूपमें प्रकट होते हैं, उसी प्रकार साक्षात् परब्रह्म परमेश्वर भगवान् वासुदेव अपने भक्तजनोंपर कृपा करके स्वेच्छासे ही चतुर्व्यूहके रूपमें प्रकट होते हैं। भागवत-शास्त्रमें इन चारोंकी उपासना भगवान् वासुदेवकी ही उपासना मानी गयी है। भगवान् वासुदेव विभिन्न अधिकारियोंके लिये विभिन्न रूपोंमें उपास्य होते हैं, इसलिये उनके चार व्यूह माने गये हैं। इन व्यूहोंकी पूजा-उपासनासे परब्रह्म परमात्माकी ही प्राप्ति मानी गयी है। उन संकर्षण आदिका जन्म साधारण जीवोंकी भाँति नहीं है; क्योंकि वे चारों ही चेतन तथा ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेज आदि समस्त भगवद्भावोंसे सम्पन्न माने गये हैं। अतः संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—ये तीनों उन परब्रह्म परमेश्वर भगवान् वासुदेवसे भिन्न तत्त्व नहीं हैं। अतः इनकी उत्पत्तिका वर्णन वेदविरुद्ध नहीं है। सम्बन्ध—यह पांचरात्र-आगम वेदानुकूल है, किसी अंशमें भी इसका वेदसे विरोध नहीं है; इस बातको पुनः दृढ़ करते हैं—
सूत्र ४५ ] अध्याय २ २०५
सूत्र ४५ ] अध्याय २ २०५ विप्रतिषेधाच्च ॥ २ । २ । ४५ ॥ विप्रतिषेधात् = इस शास्त्रमें विशेषरूपसे जीवकी उत्पत्तिका निषेध किया गया है, इसलिये; च=भी (यह वेदके प्रतिकूल नहीं है)। व्याख्या—उक्त शास्त्रमें जीवको अनादि, नित्य, चेतन और अविनाशी माना गया है तथा उसके जन्म-मरणका निषेध किया गया है, इसलिये भी यह सिद्ध होता है कि इसका वैदिक प्रक्रियासे कोई विरोध नहीं है। इसमें जो यह कहा गया है कि 'शाण्डिल्य मुनिने अंगोंसहित चारों वेदोंमें निष्ठा (निश्चल स्थिति)-को न पाकर इस भक्तिशास्त्रका अध्ययन किया।' यह वेदोंकी निन्दा या प्रतिषेध नहीं है, जिससे कि इसे वेदविरोधी शास्त्र कहा जा सके। इस प्रसंगद्वारा भक्तिशास्त्रकी महिमाका ही प्रतिपादन किया गया है। छान्दोग्योपनिषद् (७। १। २-३)-में नारदजीके विषयमें भी ऐसा ही प्रसंग आया है। नारदजीने सनत्कुमारजीसे कहा है, 'मैंने समस्त वेद, वेदांग, इतिहास, पुराण आदि पढ़ लिये तो भी मुझे आत्मतत्त्वका अनुभव नहीं हुआ।' यह कथन जैसे वेदादि शास्त्रोंको तुच्छ बतानेके लिये नहीं, आत्मज्ञानकी महत्ता सूचित करनेके लिये है, उसी प्रकार पांचरात्रमें शाण्डिल्यका प्रसंग भी वेदोंकी तुच्छता बतानेके लिये नहीं, अपितु भक्तिशास्त्रकी महिमा प्रकट करनेके लिये आया है; अतः वह शास्त्र सर्वथा निर्दोष एवं वेदानुकूल है। दूसरा पाद सम्पूर्ण
तीसरा पाद
तीसरा पाद सम्बन्ध— इस शास्त्रमें जो ब्रह्मके लक्षण बताये गये हैं, उनमें स्मृति और न्यायसे जो विरोध प्रतीत होता है, उसका निर्णयपूर्वक समाधान तो इस अध्यायके पहले पादमें किया गया, उसके बाद दूसरे पादमें अपने सिद्धान्तकी सिद्धिके लिये अनीश्वरवादी नास्तिकोंके सिद्धान्तका तथा ईश्वरको मानते हुए भी उसको उपादान कारण न माननेवालोंके सिद्धान्तका युक्तियोंद्वारा निराकरण किया गया। साथ ही भागवतमतमें जो इस ग्रन्थके सिद्धान्तसे विरोध प्रतीत होता था, उसका समाधान करके उस पादकी समाप्ति की गयी। अब पूर्व प्रतिज्ञानुसार परब्रह्मको समस्त प्रपंचका अभिन्ननिमित्तोपादान कारण माननेमें जो श्रुतियोंके वाक्योंसे विरोध प्रतीत होता है, उसका समाधान करनेके लिये तथा जीवात्माके स्वरूपका निर्णय करनेके लिये तीसरा पाद आरम्भ किया जाता है— श्रुतियोंमें कहीं तो कहा है कि परमेश्वरने पहले-पहल तेजकी रचना की, उसके बाद तेजसे जल और जलसे अन्न—इस क्रमसे जगत्की रचना हुई। कहीं कहा कि पहले-पहल आकाशकी रचना हुई, उससे वायु आदिके क्रमसे जगत्की उत्पत्ति हुई। इस प्रकारके विकल्पोंकी एकता करके समाधान करनेके लिये पूर्वपक्षकी उत्थापना करते हैं— न वियदश्रुतेः॥ २।३।१॥ वियत्=आकाश; न=उत्पन्न नहीं होता; अश्रुतेः=क्योंकि (छान्दोग्योप- निषद्के सृष्टि-प्रकरणमें) उसकी उत्पत्ति नहीं सुनी गयी है। व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद्में जहाँ जगत्की उत्पत्तिका वर्णन किया है; वहाँ पहले-पहल तेजकी रचना बतायी गयी है।* फिर तेज, जल और अन्न— इन तीनोंके सम्मेलनसे जगत्की रचनाका वर्णन है (छा० उ० ६।२।१ से ६।३।४ तक), वहाँ आकाशकी उत्पत्तिका कोई प्रसंग नहीं है तथा
- 'तत्तेजोऽसृजत।' (छा० उ० ६।२।३)
सूत्र २—४ ] अध्याय २ २०७
सूत्र २—४ ] अध्याय २ २०७ आकाशको विभु (व्यापक) माना गया है (गीता १३।३२)। इसलिये यह सिद्ध होता है कि आकाश नित्य है, वह उत्पन्न नहीं होता। सम्बन्ध—इस शंकाके उत्तरमें कहते हैं— अस्ति तु॥ २।३।२॥ तु=किंतु; अस्ति=आकाशकी उत्पत्तिका वर्णन भी (दूसरी श्रुतिमें) है। व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद्में 'ब्रह्म सत्य, ज्ञानस्वरूप और अनन्त है' इस प्रकार ब्रह्मके लक्षण बताकर फिर उसी ब्रह्मसे आकाशकी उत्पत्ति बतायी गयी है;* इसलिये यह कहना ठीक नहीं कि वेदमें आकाशकी उत्पत्तिका वर्णन नहीं है। सम्बन्ध—उक्त विषयको स्पष्ट करनेके लिये पुनः पूर्वपक्षको उठाया जाता है— गौण्यसम्भवात् ॥ २।३।३॥ असम्भवात्=आकाशकी उत्पत्ति असम्भव होनेके कारण; गौणी=यह श्रुति गौणी है। व्याख्या—अवयवरहित और विभु होनेके कारण आकाशका उत्पन्न होना नहीं बन सकता, अतः तैत्तिरीयोपनिषद्में जो आकाशकी उत्पत्ति बतायी गयी है, उस कथनको गौण समझना चाहिये, वहाँ किसी दूसरे अभिप्रायसे आकाशकी उत्पत्ति कही गयी होगी। सम्बन्ध—पूर्वपक्षकी ओरसे अपने पक्षको दृढ़ करनेके लिये दूसरा हेतु दिया जाता है— शब्दाच्च ॥ २।३।४॥ शब्दात्=शब्दप्रमाणसे; च=भी (यह सिद्ध होता है कि आकाश उत्पन्न नहीं हो सकता)।
- तस्माद् वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः। आकाशाद्वायुः। वायोरग्निः। अग्नेरापः। अद्भ्यः पृथिवी इत्यादि। (तै० उ० २।१।१)
२०८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ व्याख्या—बृहदारण्यकमें कहा है कि ‘वायुश्चान्तरिक्षं चैतदमृतम्’— ‘वायु और अन्तरिक्ष—यह अमृत है’ (बृह० उ० २।३।३), अतः जो अमृत हो, उसकी उत्पत्ति नहीं हो सकती; तथा यह भी कहा है कि ‘जिस प्रकार यह आकाश अनन्त है, उसी प्रकार आत्माको अनन्त समझना चाहिये।’ ‘आकाशशरीरं ब्रह्म’ ‘ब्रह्मका शरीर आकाश है’ (तै० उ० १। ६।२) इन श्रुति-वाक्योंसे आकाशकी अनन्तता सिद्ध होती है, इसलिये भी आकाशकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि उक्त श्रुतिमें जिस प्रकार आकाशकी उत्पत्ति बतानेवाले वाक्य हैं, उसी प्रकार वायु, अग्नि आदिकी उत्पत्ति बतानेवाले शब्द भी हैं; फिर यह कैसे माना जा सकता है कि आकाशके लिये तो कहना गौण है और दूसरोंके लिये मुख्य है, इसपर पूर्वपक्षकी ओरसे उत्तर दिया जाता है— स्याच्चैकस्य ब्रह्मशब्दवत्॥ २।३।५॥ च=तथा; ब्रह्मशब्दवत्=ब्रह्मशब्दकी भाँति; एकस्य=किसी एक शाखाके वर्णनमें; स्यात्=गौणरूपसे भी आकाशकी उत्पत्ति बतायी जा सकती है। व्याख्या—दूसरी जगह एक ही प्रकरणमें पहले तो कहा है कि ‘तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽन्नमभिजायते।’—‘ब्रह्म विज्ञानमय तपसे वृद्धिको प्राप्त होता है, उससे अन्न उत्पन्न होता है।’ (मु० उ० १।१।८) उसके बाद कहा है कि— यः सर्वज्ञः सर्वविद् यस्य ज्ञानमयं तपः। तस्मादेतद् ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते॥ (मु० उ० १।१।९) अर्थात् ‘जो सर्वज्ञ, सबको जाननेवाला है, जिसका ज्ञानमय तप है, उससे यह ब्रह्म और नाम, रूप एवं अन्न उत्पन्न होता है।’ इस प्रकरणमें जैसे पहले ब्रह्म शब्द मुख्य अर्थमें प्रयुक्त हुआ है और पीछे उसी ब्रह्म शब्दका
सूत्र ६-७ ] अध्याय २ २०९
सूत्र ६-७ ] अध्याय २ २०९ गौण अर्थमें प्रयोग किया गया है, उसी प्रकार किसी एक शाखामें गौण अर्थमें आकाशको उत्पत्तिशील बताया जा सकता है। सम्बन्ध — इस प्रकार पूर्वपक्षकी उत्थापना करके अब दो सूत्रोंद्वारा उसका समाधान करते हैं— प्रतिज्ञाहानिरव्यतिरेकाच्छब्देभ्यः ॥ २ । ३ । ६ ॥ अव्यतिरेकात् = ब्रह्मके कार्यसे आकाशको अलग न माननेसे ही; प्रतिज्ञाहानिः = एकके ज्ञानसे सबके ज्ञानसम्बन्धी प्रतिज्ञाकी रक्षा हो सकती है; शब्देभ्यः = श्रुतिके शब्दोंसे यही सिद्ध होता है। व्याख्या — उपनिषदोंमें जो एकको जाननेसे सबका ज्ञान हो जानेकी प्रतिज्ञा की गयी है और उस प्रसंगमें जो कारण-कार्यके उदाहरण दिये गये हैं, (छा० उ० ३।१।१ से ६ तक) उन सबकी विरोधरहित सिद्धि आकाशको ब्रह्मके कार्यसे अलग न माननेपर ही हो सकती है, अन्यथा नहीं; क्योंकि वहाँ मिट्टी और सुवर्ण आदिका दृष्टान्त देकर उनके किसी एक कार्यके ज्ञानसे कारणके ज्ञानद्वारा सबका ज्ञान होना बताया है। अतः यदि आकाशको ब्रह्मका कार्य न मानकर ब्रह्मसे अलग मानेंगे तो कारणरूप ब्रह्मको जान लेनेपर भी आकाश जाना हुआ नहीं होगा; इससे प्रतिज्ञाकी हानि होगी। इतना ही नहीं, 'यह सब ब्रह्म ही है' (मु० उ० २।२।११) 'यह सब इस ब्रह्मका स्वरूप है' (छा० उ० ६।८।७) 'यह सब निःसंदेह ब्रह्म ही है; क्योंकि उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय उसीमें होते हैं' (छा० उ० ३।१४।१) इत्यादि श्रुतिवाक्योंसे भी यही सिद्ध होता है कि आकाश उस ब्रह्मका ही कार्य है। यावद्विकारं तु विभागो लोकवत् ॥ २ । ३ । ७ ॥ तु = तथा; लोकवत् = साधारण लौकिक व्यवहारकी भाँति; यावद्- विकारम् = विकारमात्र सब कुछ; विभागः = ब्रह्मका ही विभाग (कार्य) है। व्याख्या — जिस प्रकार लोकमें यह बात देखी जाती है कि कोई पुरुष
२१० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ देवदत्तके पुत्रोंका परिचय देते समय कहता है—‘ये सब-के-सब देवदत्तके पुत्र हैं।' फिर वह उनमेंसे किसी एक या दोका ही नाम लेकर यदि कहे कि ‘इनकी उत्पत्ति देवदत्तसे हुई है’ तो भी उन सबकी उत्पत्ति देवदत्तसे ही मानी जायगी, उसी प्रकार जब समस्त विकारात्मक जगत्को उस ब्रह्मका कार्य बता दिया गया, तब आकाश उससे अलग कैसे रह सकता है। अतः तेज आदिकी सृष्टि बताते समय यदि आकाशका नाम छूट गया तो भी यही सिद्ध होता है कि आकाश भी अन्य तत्त्वोंकी भाँति ब्रह्मका कार्य है और वह उससे उत्पन्न होता है। वायु और आकाशको अमृत कहनेका तात्पर्य देवताओंकी भाँति उन्हें अन्य तत्त्वोंकी अपेक्षा चिरस्थायी बतानामात्र है। सम्बन्ध— इस प्रकार आकाशका उत्पन्न होना सिद्ध करके उसीके उदाहरणसे यह निश्चय किया जाता है कि वायु भी उत्पन्न होता है— एतेन मातरिश्वा व्याख्यातः॥ २।३।८॥ एतेन = इससे अर्थात् आकाशकी उत्पत्ति सिद्ध करनेवाले कथनसे ही; मातरिश्वा = वायुका उत्पन्न होना; व्याख्यातः = बता दिया गया। व्याख्या— जिन युक्तियों और श्रुतिप्रमाणोंद्वारा पूर्वसूत्रोंमें ब्रह्मसे आकाशका उत्पन्न होना निश्चित किया गया, उन्हींसे यह कहना भी हो गया कि वायु भी उत्पन्न होता है, अतः उसके विषयमें अलग कहना आवश्यक नहीं समझा गया। सम्बन्ध— इस प्रकार आकाश और वायुको उत्पत्तिशील बतलाकर अब इस दृश्य-जगत्में जिन तत्त्वोंको दूसरे मतवाले नित्य मानते हैं तथा जिनकी उत्पत्तिका स्पष्ट वर्णन वेदमें नहीं आया है, उन सबको भी उत्पत्तिशील बतानेके लिये अगला सूत्र कहते हैं— असम्भवस्तु सतोऽनुपपत्तेः॥ २।३।९॥ सतः = ‘सत्’ शब्दवाच्य ब्रह्मके सिवा (अन्य किसीका उत्पन्न न होना);
सूत्र १०-११ ] अध्याय २ २११ तु=तो; असम्भवः = असम्भव है; अनुपपत्तेः = क्योंकि अन्य किसीका उत्पन्न न होना युक्ति और प्रमाणद्वारा सिद्ध नहीं हो सकता। व्याख्या—जिस पूर्णब्रह्म परमात्माका श्रुतिमें जगह-जगह सत् नामसे वर्णन आया है तथा जो इस जड-चेतनात्मक जगत्का परम कारण माना गया है, उसे छोड़कर इस जगत्में कोई भी तत्त्व ऐसा नहीं है, जो उत्पत्तिशील न हो। बुद्धि, अहंकार, काल तथा गुण और परमाणु आदि सभी उत्पत्तिशील हैं। क्योंकि वेदमें प्रलयके समय एकमात्र परब्रह्म परमेश्वरसे भिन्न किसीका अस्तित्व स्वीकार नहीं किया गया है इसलिये युक्ति या प्रमाणद्वारा कोई भी पदार्थ उत्पन्न न होनेवाला सिद्ध नहीं हो सकता। अतः ब्रह्मके सिवा सब कुछ उत्पत्तिशील है। सम्बन्ध— छान्दोग्योपनिषद्में यह कहा है कि ‘उस ब्रह्मने तेजको रचा’ और तैत्तिरीयोपनिषद्में बताया गया है कि ‘सर्वात्मा परमेश्वरसे आकाश उत्पन्न हुआ, आकाशसे वायु और वायुसे तेज।’ अतः यहाँ तेजको किससे उत्पन्न हुआ माना जाय? ब्रह्मसे या वायुसे? इस जिज्ञासापर कहते हैं— तेजोऽतस्तथा ह्याह॥ २।३।१०॥ तेजः=तेज; अतः=इस (वायु)-से (उत्पन्न हुआ); तथा हि=ऐसा ही; आह=अन्यत्र कहा है। व्याख्या—तेज-तत्त्व वायुसे उत्पन्न हुआ, यही मानना चाहिये; क्योंकि यही बात श्रुतिमें दूसरी जगह कही गयी है। भाव यह है कि उस ब्रह्मने वायुसे तेजकी रचना की अर्थात् आकाश और वायुको पहले उत्पन्न करके उसके बाद वायुसे तेजकी उत्पत्ति की; ऐसा माननेपर दोनों श्रुतियोंकी एकवाक्यता हो जायगी। सम्बन्ध— इसी प्रकार— आपः ॥ २।३।११॥ आपः = जल (तेजसे उत्पन्न हुआ)।
२१२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
२१२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ व्याख्या—उपर्युक्त प्रकारसे दोनों श्रुतियोंके कथनकी एकता होनेसे यह समझना चाहिये कि उक्त तेजसे जल उत्पन्न हुआ। सम्बन्ध—इस प्रकरणमें यह कहा गया है कि उस जलने अन्नको रचा, अतः यहाँ गेहूँ, जौ आदि अन्नकी उत्पत्ति जलसे हुई या पृथिवीसे ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— पृथिव्यधिकाररूपशब्दान्तरेभ्यः ॥ २ । ३ । १२ ॥ पृथिवी=(इस प्रकरणमें अन्नके नामसे) पृथिवी ही कही गयी है; अधिकाररूपशब्दान्तरेभ्यः=क्योंकि पाँचों तत्त्वोंकी उत्पत्तिका प्रकरण है, उसमें बताया हुआ काला रूप भी पृथिवीका ही माना गया है तथा दूसरी श्रुतिमें भी जलसे पृथिवीकी ही उत्पत्ति बतायी गयी है। व्याख्या—इस प्रकरणमें अन्न शब्द पृथिवीका ही बोधक है, ऐसा समझना ठीक है; क्योंकि यह तत्त्वोंकी उत्पत्तिका प्रकरण है तथा जो अन्नका रूप काला बताया गया है, वह भी अन्नका रूप नहीं है, पृथिवीका ही रूप काला माना गया है। इसके सिवा, तैत्तिरीयोपनिषद्में जहाँ इस क्रमका वर्णन है वहाँ भी जलसे पृथिवीका उत्पन्न होना बताया गया है, उसके बाद पृथिवीसे ओषधि और ओषधिसे अन्नकी उत्पत्तिका वर्णन है*। इसीलिये यहाँ सीधे जलसे ही अन्नकी उत्पत्ति मानना ठीक नहीं है। छान्दोग्यके उक्त प्रकरणमें जो यह बात कही गयी है कि ‘यत्र क्व च वर्षति तदेव भूयिष्ठमन्नं भवति।’ (६।२।४) अर्थात् ‘जहाँ-जहाँ जल अधिक बरसता है, वहीं अन्नकी उत्पत्ति अधिक होती है।’ इसका भी यही भाव है कि जलके सम्बन्धमें पृथिवीमें पहले ओषधि अर्थात् अन्नका पौधा उत्पन्न होता है और उससे अन्न उत्पन्न होता है; ऐसा माननेपर पूर्वापरमें कोई विरोध नहीं रहेगा। सम्बन्ध—इस प्रकरणमें आकाशकी उत्पत्ति साक्षात् ब्रह्मसे बतायी गयी है और अन्य चार तत्त्वोंमें एकसे दूसरेकी क्रमशः उत्पत्ति बतायी है। अतः यह जिज्ञासा होती है कि एक तत्त्वके बाद दूसरे तत्त्वकी रचना
- देखिये पृष्ठ २०७ की टिप्पणी।
सूत्र १३-१४] अध्याय २ २१३
सूत्र १३-१४] अध्याय २ २१३ साक्षात् परमेश्वर करता है या एक तत्त्व दूसरे तत्त्वको स्वयं उत्पन्न करता है? इसपर कहते हैं- तदभिध्यानादेव तु तल्लिङ्गात्सः ॥ २।३।१३ ॥ तदभिध्यानात् = उन तत्त्वोंके भलीभाँति चिन्तन करनेका कथन होनेसे; एव=ही; तु=तो (यह सिद्ध होता है कि); सः = वह परमात्मा ही उन सबकी रचना करता है; तल्लिङ्गात् = क्योंकि उक्त लक्षण उसीके अनुरूप है। व्याख्या - इस प्रकरणमें बार-बार कार्यके चिन्तनकी बात कही गयी है, यह चिन्तनरूप कर्म जडमें सम्भव नहीं है, चेतन परमात्मामें ही संगत हो सकता है, इसलिये यही सिद्ध होता है कि वह परमात्मा स्वयं ही उत्पन्न किये हुए पहले तत्त्वसे दूसरे तत्त्वको उत्पन्न करता है। इसी उद्देश्यसे एक तत्त्वसे दूसरे तत्त्वकी उत्पत्तिका कथन है। उन तत्त्वोंको स्वतन्त्ररूपसे एक-दूसरेके कार्य-कारण बतानेके उद्देश्यसे नहीं। इसलिये यही समझना चाहिये कि मुख्यरूपसे सबकी रचना करनेवाला वह पूर्ण ब्रह्म परमेश्वर ही है, अन्य कोई नहीं। सम्बन्ध - इस प्रकार जगत्की उत्पत्तिके वर्णनद्वारा ब्रह्मको जगत्का कारण बताकर अब प्रलयके वर्णनसे भी इसी बातकी पुष्टि करते हैं- विपर्ययेण तु क्रमोऽत उपपद्यते च ॥ २।३।१४ ॥ तु=किंतु; अतः = इस उत्पत्ति-क्रमसे; क्रमः = प्रलयका क्रम; विपर्ययेण = विपरीत होता है; उपपद्यते = ऐसा ही होना युक्तिसंगत है; च=तथा (स्मृतिमें भी ऐसा ही वर्णन है)। व्याख्या - उपनिषदोंमें जगत्की उत्पत्तिका जो क्रम बताया गया है, इससे विपरीत क्रम प्रलयकालमें होता है। प्रारम्भिक सृष्टिके समय ब्रह्मसे आकाश, वायु, तेज, जल और पृथिवी आदिके क्रमसे जगत्की उत्पत्ति होती है। फिर जब प्रलयकाल आता है, तब ठीक उसके विपरीत क्रमसे पृथिवी आदि तत्त्वोंका अपने कारणोंमें लय होता है। जैसे पृथिवी जलमें, जल
विष्णुपुराण अंश ६, अध्याय ४, श्लोक १४ से ३८ तक)।
२९४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ अग्निमें, अग्नि वायुमें, वायु आकाशमें और आकाश परमात्मामें विलीन हो जाता है। युक्तिसे भी यही क्रम ठीक जान पड़ता है। प्रत्येक कार्य अपने उपादान कारणमें ही लीन होता है। जैसे जलसे बर्फ बनता है और जलमें ही उसका लय होता है। स्मृतियोंमें भी ऐसा ही वर्णन आता है। (देखिये विष्णुपुराण अंश ६, अध्याय ४, श्लोक १४ से ३८ तक)। सम्बन्ध—यहाँ भूतोंकी उत्पत्ति और प्रलयका क्रम तो बताया गया, परंतु मन, बुद्धि और इन्द्रियोंकी उत्पत्तिके विषयमें कोई निर्णय नहीं हुआ, अतः यह जिज्ञासा होती है कि इन सबकी उत्पत्ति भूतोंसे ही होती है या परमेश्वरसे ? यदि परमेश्वरसे होती है तो भूतोंके पहले होती है या पीछे ? अतः इसका निर्णय करनेके लिये कहते हैं— अन्तरा विज्ञानमनसी क्रमेण तल्लिंङ्गादिति चेन्नाविशेषात् ॥ २ । ३ । १५ ॥ चेत्=यदि कहो; विज्ञानमनसी=इन्द्रियाँ और मन; क्रमेण=उत्पत्ति- क्रमकी दृष्टिसे; अन्तरा (स्याताम्)=परमात्मा और आकाश आदि भूतोंके बीचमें होने चाहिये; तल्लिंङ्गात्=क्योंकि (श्रुतिमें) यही निश्चय करानेवाला लिंग (प्रमाण) प्राप्त होता है; इति न=तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; अविशेषात्=क्योंकि श्रुतिमें किसी क्रम-विशेषका वर्णन नहीं है। व्याख्या—मुण्डकोपनिषद्में पहले यह वर्णन आया है कि 'जैसे प्रज्वलित अग्निसे चिनगारियोंकी उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार ये नाना- रूपोंसे संयुक्त पदार्थ उस परमेश्वरसे उत्पन्न होते हैं और उसीमें विलीन हो जाते हैं।'* (मु० २।१।१) फिर जगत्के कारणरूप उस परमेश्वरके
- यथा सुदीप्तात् पावकाद् विस्फुलिंगाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः। तथाक्षराद् विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापि यन्ति॥ (मु० उ० २।१।१)
सूत्र १५ ] अध्याय २ २१५
सूत्र १५ ] अध्याय २ २१५ परात्पर स्वरूपका वर्णन करते हुए उसे अजन्मा, अविनाशी, दिव्य, निराकार, सब प्रकारसे परम शुद्ध और समस्त जगत्के बाहर-भीतर व्याप्त बताया गया है।१ तदनन्तर यह कहा गया है कि 'इसी परब्रह्म पुरुषोत्तमसे यह प्राण, मन, सब इन्द्रियाँ तथा आकाश, वायु, ज्योति, जल और सबको धारण करनेवाली पृथिवी उत्पन्न होती है।'२ इस वर्णनमें परमात्मासे पहले प्राण, मन और इन्द्रियोंके उत्पन्न होनेकी बात बताकर आकाश आदि भूतोंकी क्रमशः उत्पत्ति बतायी गयी है; अतः परमात्मा और आकाशके बीचमें मन-इन्द्रियोंका स्थान निश्चित होता है। तात्पर्य यह कि प्राण और इन्द्रियोंसहित मनकी उत्पत्तिके बाद ही आकाश आदि भूतोंकी सृष्टि माननी चाहिये; क्योंकि उपर्युक्त श्रुतिमें जैसा क्रम दिया गया है, वह इसी निश्चयपर पहुँचानेवाला है; ऐसा यदि कोई कहे तो उसका यह कथन ठीक नहीं है; क्योंकि इस वर्णनमें विशेषरूपसे कोई क्रम नहीं बताया गया है। इससे तो केवल यही बात सिद्ध होती है कि बुद्धि, मन और इन्द्रियोंकी उत्पत्ति भी परमेश्वरसे ही होती है; इतना ही क्यों, उक्त श्रुतिके पूरे प्रकरणको देखनेसे यह स्पष्ट हो जाता है कि श्रुतिका उद्देश्य किसी प्रकारके क्रमका प्रतिपादन करना नहीं है, उसे केवल यही बताना अभीष्ट है कि जगत्का उपादान और निमित्त कारण एकमात्र ब्रह्म है; क्योंकि भिन्न-भिन्न कल्पोंमें भिन्न-भिन्न क्रमसे जगत्की उत्पत्तिका वर्णन श्रुतियों और स्मृतियोंमें पाया जाता है। अतः किसी एक ही क्रमको निश्चित कर देना नहीं बन सकता (देखिये मु० उ० २।१।५ से ९ तक)। १-दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः। अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात् परतः परः॥ (मु० उ० २।१।२) २-एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च। खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी॥ (मु० उ० २।१।३)
२१६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
२१६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सम्बन्ध— इस ग्रन्थमें अबतकके विवेचनसे परब्रह्म परमेश्वरको जड- चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण सिद्ध किया गया। इससे यह प्रतीत होता है कि उस परब्रह्मसे अन्य तत्त्वोंकी भाँति जीवोंकी भी उत्पत्ति होती है। यदि यही बात है तो फिर यह प्रश्न उठता है कि परमात्माका ही अंश होनेसे जीवात्मा तो अविनाशी, नित्य तथा जन्म-मरणसे रहित माना गया है, उसकी उत्पत्ति कैसे होती है? इसपर कहते हैं— चराचरव्यपाश्रयस्तु स्यात्तद्व्यपदेशो भाक्तस्तद्भाव- भावित्वात् ॥ २ । ३ । १६ ॥ तु=किंतु; चराचरव्यपाश्रयः=चराचर शरीरोंको लेकर कहा हुआ; तद्व्यपदेशः=वह जन्म-मरण आदिका कथन; भाक्तः स्यात्=जीवात्माके लिये गौणरूपसे हो सकता है; तद्भावभावित्वात्=क्योंकि वह उन-उन शरीरोंके भावसे भावित रहता है। व्याख्या—यह जीवात्मा वास्तवमें सर्वथा शुद्ध परमेश्वरका अंश, जन्म-मरणसे रहित विज्ञानस्वरूप नित्य अविनाशी है; इसमें कोई शंका नहीं है। तो भी यह अनादि परम्परागत अपने कर्मोंके अनुसार प्राप्त हुए स्थावर (वृक्ष-पहाड़ आदि), जंगम (देव, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि) शरीरोंके आश्रित है, उन-उनके साथ तद्रूप हो रहा है, 'मैं शरीरसे सर्वथा भिन्न हूँ, इससे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है,' इस वास्तविक तत्त्वको नहीं जानता; इस कारण उन-उन शरीरोंके जन्म-मरण आदिको लेकर गौणरूपसे जीवात्माका उत्पन्न होना श्रुतिमें कहा गया है, इसलिये कोई विरोध नहीं है। कल्पके आदिमें इस जड-चेतनात्मक अनादिसिद्ध जगत्का प्रकट हो जाना ही उस परमात्मासे इसका उत्पन्न होना है और कल्पके अन्तमें उस परमेश्वरमें विलीन हो जाना ही उसका लय है (गीता ९।७-१०) इसके सिवा, परब्रह्म परमात्मा किन्हीं नये जीवोंको उत्पन्न करते हों, ऐसी बात नहीं है। इस प्रकार स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीन प्रकारके शरीरोंके आश्रित जीवात्माका
सूत्र १७ ] अध्याय २ २१७
सूत्र १७ ] अध्याय २ २१७ परमात्मासे उत्पन्न होना और उसमें विलीन होना श्रुति-स्मृतियोंमें जगह- जगह कहा गया है। जीवोंको भगवान् उनके परम्परागत संचित कर्मोंके अनुसार ही अच्छी-बुरी योनियोंमें उत्पन्न करते हैं, यह पहले सिद्ध कर दिया गया है (देखिये ब्र० सू० २।१।३४)। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जीवोंकी उत्पत्ति गौण न मानकर मुख्य मान ली जाय तो क्या आपत्ति है, इसपर कहते हैं— नात्माऽश्रुतेर्नित्यत्वाच्च ताभ्यः ॥ २।३।१७॥ आत्मा=जीवात्मा; न=वास्तवमें उत्पन्न नहीं होता; अश्रुतेः=क्योंकि श्रुतिमें कहीं भी जीवात्माकी उत्पत्ति नहीं बतायी गयी है; च=इसके सिवा; ताभ्यः= उन श्रुतियोंसे ही; नित्यत्वात्=इसकी नित्यता सिद्ध की गयी है, इसलिये भी (जीवात्माकी उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती)। व्याख्या—श्रुतिमें कहीं भी जीवात्माका वास्तवमें उत्पन्न होना नहीं कहा गया है। मुण्डकोपनिषद्में जो अग्निके दृष्टान्तसे नाना भावोंकी उत्पत्तिका वर्णन है* (मु० उ० २।१।१) वह पूर्वसूत्रमें कहे अनुसार शरीरोंकी उत्पत्तिको लेकर ही है। इसी प्रकार दूसरी श्रुतियोंके कथनका उद्देश्य भी समझ लेना चाहिये। अतः श्रुतिका यही निश्चित सिद्धान्त है कि जीवात्माकी स्वरूपसे उत्पत्ति नहीं होती। इतना ही नहीं, श्रुतियोंद्वारा उसकी नित्यताका भी प्रतिपादन किया गया है। छान्दोग्योपनिषद्में सजीव वृक्षके दृष्टान्तसे श्वेतकेतुको समझाते हुए उसके पिताने कहा है कि 'जीवापेतं वाव किलेदं म्रियते न जीवो म्रियते।' अर्थात् 'जीवसे रहित हुआ यह शरीर ही मरता है, जीवात्मा नहीं मरता' (छा० उ० ६।११।३), कठोपनिषद्में कहा है कि यह विज्ञानस्वरूप जीवात्मा न तो जन्मता है और न मरता ही है। यह अजन्मा, नित्य, सदा रहनेवाला और पुराण है, शरीरका नाश होनेपर इसका नाश नहीं
- यह मन्त्र पृष्ठ २१४ की टिप्पणीमें आ गया है।
२१८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
२१८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ होता'* (क० उ० १।२।१८) इत्यादि। इसलिये यह सर्वथा निर्विवाद है कि जीवात्मा स्वरूपसे उत्पन्न नहीं होता। सम्बन्ध — जीवकी नित्यताको दृढ़ करनेके लिये पुनः कहते हैं— ज्ञोऽत एव॥ २।३।१८॥ अतः=(वह नित्य अर्थात् जन्म-मरणसे रहित है) इसलिये; एव=ही; ज्ञः=ज्ञाता है। व्याख्या—वह जीवात्मा स्वरूपसे जन्मने-मरनेवाला नहीं है, नित्य चेतन है, इसीलिये वह ज्ञाता है। भाव यह कि वह जन्मने-मरनेवाला या घटने-बढ़नेवाला और अनित्य होता तो ज्ञाता नहीं हो सकता। किंतु सिद्ध योगी अपने जन्म-जन्मान्तरोंकी बात जान लेता है तथा प्रत्येक जीवात्मा पहले शरीरसे सम्बन्ध छोड़कर जब दूसरे नवीन शरीरको धारण करता है, तब पूर्वस्मृतिके अनुसार स्तन-पानादिमें प्रवृत्त हो जाता है। इसी प्रकार पशु-पक्षी आदिको भी प्रजोत्पादनका ज्ञान पहलेके अनुभवकी स्मृतिसे हो जाता है। तथा बालकपन और युवा अवस्थाओंकी घटनाएँ जिसकी जानकारीमें रहती हैं वह नहीं बदलता, यह सबका अनुभव है, यदि आत्माका परिवर्तन होता तो वह ज्ञाता नहीं हो सकता। इससे यह सिद्ध होता है कि जीव नित्य है और ज्ञान-स्वरूप है, शरीरोंके बदलनेसे जीवात्मा नहीं बदलता। सम्बन्ध — जीवात्मा नित्य है, शरीरके बदलनेसे वह नहीं बदलता; इस बातको प्रकारान्तरसे पुनः सिद्ध करते हैं— उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम्॥ २।३।१९॥ उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम्=(एक ही जीवात्माके) शरीरसे उत्क्रमण करने,
- न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥