वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ होता'* (क० उ० १।२।१८) इत्यादि। इसलिये यह सर्वथा निर्विवाद है कि जीवात्मा स्वरूपसे उत्पन्न नहीं होता। सम्बन्ध — जीवकी नित्यताको दृढ़ करनेके लिये पुनः कहते हैं— ज्ञोऽत एव॥ २।३।१८॥ अतः=(वह नित्य अर्थात् जन्म-मरणसे रहित है) इसलिये; एव=ही; ज्ञः=ज्ञाता है। व्याख्या—वह जीवात्मा स्वरूपसे जन्मने-मरनेवाला नहीं है, नित्य चेतन है, इसीलिये वह ज्ञाता है। भाव यह कि वह जन्मने-मरनेवाला या घटने-बढ़नेवाला और अनित्य होता तो ज्ञाता नहीं हो सकता। किंतु सिद्ध योगी अपने जन्म-जन्मान्तरोंकी बात जान लेता है तथा प्रत्येक जीवात्मा पहले शरीरसे सम्बन्ध छोड़कर जब दूसरे नवीन शरीरको धारण करता है, तब पूर्वस्मृतिके अनुसार स्तन-पानादिमें प्रवृत्त हो जाता है। इसी प्रकार पशु-पक्षी आदिको भी प्रजोत्पादनका ज्ञान पहलेके अनुभवकी स्मृतिसे हो जाता है। तथा बालकपन और युवा अवस्थाओंकी घटनाएँ जिसकी जानकारीमें रहती हैं वह नहीं बदलता, यह सबका अनुभव है, यदि आत्माका परिवर्तन होता तो वह ज्ञाता नहीं हो सकता। इससे यह सिद्ध होता है कि जीव नित्य है और ज्ञान-स्वरूप है, शरीरोंके बदलनेसे जीवात्मा नहीं बदलता। सम्बन्ध — जीवात्मा नित्य है, शरीरके बदलनेसे वह नहीं बदलता; इस बातको प्रकारान्तरसे पुनः सिद्ध करते हैं— उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम्॥ २।३।१९॥ उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम्=(एक ही जीवात्माके) शरीरसे उत्क्रमण करने,
- न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥