वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 220, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र १७ ] अध्याय २ २१७ परमात्मासे उत्पन्न होना और उसमें विलीन होना श्रुति-स्मृतियोंमें जगह- जगह कहा गया है। जीवोंको भगवान् उनके परम्परागत संचित कर्मोंके अनुसार ही अच्छी-बुरी योनियोंमें उत्पन्न करते हैं, यह पहले सिद्ध कर दिया गया है (देखिये ब्र० सू० २।१।३४)। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जीवोंकी उत्पत्ति गौण न मानकर मुख्य मान ली जाय तो क्या आपत्ति है, इसपर कहते हैं— नात्माऽश्रुतेर्नित्यत्वाच्च ताभ्यः ॥ २।३।१७॥ आत्मा=जीवात्मा; न=वास्तवमें उत्पन्न नहीं होता; अश्रुतेः=क्योंकि श्रुतिमें कहीं भी जीवात्माकी उत्पत्ति नहीं बतायी गयी है; च=इसके सिवा; ताभ्यः= उन श्रुतियोंसे ही; नित्यत्वात्=इसकी नित्यता सिद्ध की गयी है, इसलिये भी (जीवात्माकी उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती)। व्याख्या—श्रुतिमें कहीं भी जीवात्माका वास्तवमें उत्पन्न होना नहीं कहा गया है। मुण्डकोपनिषद्में जो अग्निके दृष्टान्तसे नाना भावोंकी उत्पत्तिका वर्णन है* (मु० उ० २।१।१) वह पूर्वसूत्रमें कहे अनुसार शरीरोंकी उत्पत्तिको लेकर ही है। इसी प्रकार दूसरी श्रुतियोंके कथनका उद्देश्य भी समझ लेना चाहिये। अतः श्रुतिका यही निश्चित सिद्धान्त है कि जीवात्माकी स्वरूपसे उत्पत्ति नहीं होती। इतना ही नहीं, श्रुतियोंद्वारा उसकी नित्यताका भी प्रतिपादन किया गया है। छान्दोग्योपनिषद्में सजीव वृक्षके दृष्टान्तसे श्वेतकेतुको समझाते हुए उसके पिताने कहा है कि 'जीवापेतं वाव किलेदं म्रियते न जीवो म्रियते।' अर्थात् 'जीवसे रहित हुआ यह शरीर ही मरता है, जीवात्मा नहीं मरता' (छा० उ० ६।११।३), कठोपनिषद्में कहा है कि यह विज्ञानस्वरूप जीवात्मा न तो जन्मता है और न मरता ही है। यह अजन्मा, नित्य, सदा रहनेवाला और पुराण है, शरीरका नाश होनेपर इसका नाश नहीं
- यह मन्त्र पृष्ठ २१४ की टिप्पणीमें आ गया है।