वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सम्बन्ध— इस ग्रन्थमें अबतकके विवेचनसे परब्रह्म परमेश्वरको जड- चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण सिद्ध किया गया। इससे यह प्रतीत होता है कि उस परब्रह्मसे अन्य तत्त्वोंकी भाँति जीवोंकी भी उत्पत्ति होती है। यदि यही बात है तो फिर यह प्रश्न उठता है कि परमात्माका ही अंश होनेसे जीवात्मा तो अविनाशी, नित्य तथा जन्म-मरणसे रहित माना गया है, उसकी उत्पत्ति कैसे होती है? इसपर कहते हैं— चराचरव्यपाश्रयस्तु स्यात्तद्व्यपदेशो भाक्तस्तद्भाव- भावित्वात् ॥ २ । ३ । १६ ॥ तु=किंतु; चराचरव्यपाश्रयः=चराचर शरीरोंको लेकर कहा हुआ; तद्व्यपदेशः=वह जन्म-मरण आदिका कथन; भाक्तः स्यात्=जीवात्माके लिये गौणरूपसे हो सकता है; तद्भावभावित्वात्=क्योंकि वह उन-उन शरीरोंके भावसे भावित रहता है। व्याख्या—यह जीवात्मा वास्तवमें सर्वथा शुद्ध परमेश्वरका अंश, जन्म-मरणसे रहित विज्ञानस्वरूप नित्य अविनाशी है; इसमें कोई शंका नहीं है। तो भी यह अनादि परम्परागत अपने कर्मोंके अनुसार प्राप्त हुए स्थावर (वृक्ष-पहाड़ आदि), जंगम (देव, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि) शरीरोंके आश्रित है, उन-उनके साथ तद्रूप हो रहा है, 'मैं शरीरसे सर्वथा भिन्न हूँ, इससे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है,' इस वास्तविक तत्त्वको नहीं जानता; इस कारण उन-उन शरीरोंके जन्म-मरण आदिको लेकर गौणरूपसे जीवात्माका उत्पन्न होना श्रुतिमें कहा गया है, इसलिये कोई विरोध नहीं है। कल्पके आदिमें इस जड-चेतनात्मक अनादिसिद्ध जगत्का प्रकट हो जाना ही उस परमात्मासे इसका उत्पन्न होना है और कल्पके अन्तमें उस परमेश्वरमें विलीन हो जाना ही उसका लय है (गीता ९।७-१०) इसके सिवा, परब्रह्म परमात्मा किन्हीं नये जीवोंको उत्पन्न करते हों, ऐसी बात नहीं है। इस प्रकार स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीन प्रकारके शरीरोंके आश्रित जीवात्माका