भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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पृष्ठ 214

सूत्र १०-११ ] अध्याय २ २११ तु=तो; असम्भवः = असम्भव है; अनुपपत्तेः = क्योंकि अन्य किसीका उत्पन्न न होना युक्ति और प्रमाणद्वारा सिद्ध नहीं हो सकता। व्याख्या—जिस पूर्णब्रह्म परमात्माका श्रुतिमें जगह-जगह सत् नामसे वर्णन आया है तथा जो इस जड-चेतनात्मक जगत्का परम कारण माना गया है, उसे छोड़कर इस जगत्में कोई भी तत्त्व ऐसा नहीं है, जो उत्पत्तिशील न हो। बुद्धि, अहंकार, काल तथा गुण और परमाणु आदि सभी उत्पत्तिशील हैं। क्योंकि वेदमें प्रलयके समय एकमात्र परब्रह्म परमेश्वरसे भिन्न किसीका अस्तित्व स्वीकार नहीं किया गया है इसलिये युक्ति या प्रमाणद्वारा कोई भी पदार्थ उत्पन्न न होनेवाला सिद्ध नहीं हो सकता। अतः ब्रह्मके सिवा सब कुछ उत्पत्तिशील है। सम्बन्ध— छान्दोग्योपनिषद्में यह कहा है कि ‘उस ब्रह्मने तेजको रचा’ और तैत्तिरीयोपनिषद्में बताया गया है कि ‘सर्वात्मा परमेश्वरसे आकाश उत्पन्न हुआ, आकाशसे वायु और वायुसे तेज।’ अतः यहाँ तेजको किससे उत्पन्न हुआ माना जाय? ब्रह्मसे या वायुसे? इस जिज्ञासापर कहते हैं— तेजोऽतस्तथा ह्याह॥ २।३।१०॥ तेजः=तेज; अतः=इस (वायु)-से (उत्पन्न हुआ); तथा हि=ऐसा ही; आह=अन्यत्र कहा है। व्याख्या—तेज-तत्त्व वायुसे उत्पन्न हुआ, यही मानना चाहिये; क्योंकि यही बात श्रुतिमें दूसरी जगह कही गयी है। भाव यह है कि उस ब्रह्मने वायुसे तेजकी रचना की अर्थात् आकाश और वायुको पहले उत्पन्न करके उसके बाद वायुसे तेजकी उत्पत्ति की; ऐसा माननेपर दोनों श्रुतियोंकी एकवाक्यता हो जायगी। सम्बन्ध— इसी प्रकार— आपः ॥ २।३।११॥ आपः = जल (तेजसे उत्पन्न हुआ)।