वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ देवदत्तके पुत्रोंका परिचय देते समय कहता है—‘ये सब-के-सब देवदत्तके पुत्र हैं।' फिर वह उनमेंसे किसी एक या दोका ही नाम लेकर यदि कहे कि ‘इनकी उत्पत्ति देवदत्तसे हुई है’ तो भी उन सबकी उत्पत्ति देवदत्तसे ही मानी जायगी, उसी प्रकार जब समस्त विकारात्मक जगत्को उस ब्रह्मका कार्य बता दिया गया, तब आकाश उससे अलग कैसे रह सकता है। अतः तेज आदिकी सृष्टि बताते समय यदि आकाशका नाम छूट गया तो भी यही सिद्ध होता है कि आकाश भी अन्य तत्त्वोंकी भाँति ब्रह्मका कार्य है और वह उससे उत्पन्न होता है। वायु और आकाशको अमृत कहनेका तात्पर्य देवताओंकी भाँति उन्हें अन्य तत्त्वोंकी अपेक्षा चिरस्थायी बतानामात्र है। सम्बन्ध— इस प्रकार आकाशका उत्पन्न होना सिद्ध करके उसीके उदाहरणसे यह निश्चय किया जाता है कि वायु भी उत्पन्न होता है— एतेन मातरिश्वा व्याख्यातः॥ २।३।८॥ एतेन = इससे अर्थात् आकाशकी उत्पत्ति सिद्ध करनेवाले कथनसे ही; मातरिश्वा = वायुका उत्पन्न होना; व्याख्यातः = बता दिया गया। व्याख्या— जिन युक्तियों और श्रुतिप्रमाणोंद्वारा पूर्वसूत्रोंमें ब्रह्मसे आकाशका उत्पन्न होना निश्चित किया गया, उन्हींसे यह कहना भी हो गया कि वायु भी उत्पन्न होता है, अतः उसके विषयमें अलग कहना आवश्यक नहीं समझा गया। सम्बन्ध— इस प्रकार आकाश और वायुको उत्पत्तिशील बतलाकर अब इस दृश्य-जगत्में जिन तत्त्वोंको दूसरे मतवाले नित्य मानते हैं तथा जिनकी उत्पत्तिका स्पष्ट वर्णन वेदमें नहीं आया है, उन सबको भी उत्पत्तिशील बतानेके लिये अगला सूत्र कहते हैं— असम्भवस्तु सतोऽनुपपत्तेः॥ २।३।९॥ सतः = ‘सत्’ शब्दवाच्य ब्रह्मके सिवा (अन्य किसीका उत्पन्न न होना);