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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

४४६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

४४६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सम्बन्ध— दूसरी श्रुतिमें जो यह कहा है कि वह अमानव पुरुष इनको ब्रह्मके समीप ले जाता है, वह कथन कार्यब्रह्म माननेसे उपयुक्त नहीं होता; क्योंकि श्रुतिका उद्देश्य यदि कार्यब्रह्मकी प्राप्ति बताना होता तो ब्रह्माके समीप पहुँचा देता है, ऐसा कथन होना चाहिये था ! इसपर कहते हैं— सामीप्यात्तु तद्व्यपदेशः ॥ ४। ३।९॥ तद्व्यपदेशः = वह कथन; तु = तो; सामीप्यात् = ब्रह्मकी समीपताके कारण ब्रह्माके लिये भी हो सकता है। व्याख्या— 'जो सबसे पहले ब्रह्माको रचता है तथा जो उसको समस्त वेदोंका ज्ञान प्रदान करता है, परमात्म-ज्ञानविषयक बुद्धिको प्रकट करनेवाले उस प्रसिद्ध परमदेव परमेश्वरकी मैं मुमुक्षु साधक शरण ग्रहण करता हूँ।'* (श्वेता० उ० ६।१८) इस श्रुति-कथनके अनुसार ब्रह्मा उस परब्रह्मका पहला कार्य होनेके कारण ब्रह्माको 'ब्रह्म' कहा गया है, ऐसा मानना युक्तिसंगत हो सकता है। सम्बन्ध— गीतामें कहा है कि ब्रह्माके लोकतक सभी लोक पुनरावृत्तिशील हैं (गीता ८।१६)। इस प्रसंगमें ब्रह्माकी आयु पूर्ण हो जानेपर वहाँ जानेवालोंका वापस लौटना अनिवार्य है और श्रुतिमें देवयानमार्गसे जानेवालोंका वापस न लौटना स्पष्ट कहा है; इसलिये कार्यब्रह्मकी प्राप्ति न मानकर परब्रह्मकी प्राप्ति मानना ही उचित मालूम होता है, इसपर बादरिकी ओरसे कहा जाता है— कार्यात्यये तदध्यक्षेण सहातः परमभिधानात् ॥ ४। ३।१० ॥ कार्यात्यये = कार्यरूप ब्रह्मलोकका नाश होनेपर; तदध्यक्षेण = उसके स्वामी ब्रह्माके; सह=सहित; अतः =इससे; परम् =श्रेष्ठ परब्रह्म परमात्माको; अभिधानात् = प्राप्त होनेका कथन है, इसलिये (पुनरावृत्ति नहीं होगी)।

  • यह मन्त्र पृष्ठ ९८ में अर्थसहित आ गया है।

सूत्र ११-१२ ] अध्याय ४ ४४७

सूत्र ११-१२ ] अध्याय ४ ४४७ व्याख्या—'जिन्होंने उपनिषदोंके विज्ञानद्वारा उनके अर्थभूत परमात्माका भलीभाँति निश्चय कर लिया है तथा कर्मफल और आसक्तिके त्यागरूप योगसे जिनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया है, वे सब साधक ब्रह्मलोकोंमें जाकर अन्तकालमें परम अमृतस्वरूप होकर भलीभाँति मुक्त हो जाते हैं।'१ (मु० उ० ३।२।६) इस प्रकार श्रुतिमें उन सबकी मुक्तिका कथन होनेसे यह सिद्ध होता है कि प्रलयकालमें ब्रह्मलोकका नाश होनेपर उसके स्वामी ब्रह्माके सहित वहाँ गये हुए ब्रह्मविद्याके उपासक भी परब्रह्मको प्राप्त होकर मुक्त हो जाते हैं, इसलिये उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती। सम्बन्ध—स्मृति-प्रमाणसे अपने पक्षको पुष्ट करते हैं— स्मृतेश्च ॥ ४।३।११॥ स्मृतेः=स्मृति-प्रमाणसे; च=भी (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—'वे सब शुद्ध अन्तःकरणवाले पुरुष प्रलयकाल प्राप्त होनेपर समस्त जगत्के अन्तमें ब्रह्माके साथ उस परमपदमें प्रविष्ट हो जाते हैं।'२ (कू० पु०, पूर्व ख० ११।२८४) इस प्रकार स्मृतिमें भी यही भाव प्रदर्शित किया है, इसलिये कार्यब्रह्मकी प्राप्ति होती है, यही मानना ठीक है। सम्बन्ध—यहाँतक बादरिके पक्षकी स्थापना करके अब उसके उत्तरमें आचार्य जैमिनिका मत उद्धृत करते हैं— परं जैमिनिर्मुख्यत्वात् ॥ ४।३।१२॥ जैमिनिः=आचार्य जैमिनिका कहना है कि; मुख्यत्वात्=ब्रह्मशब्दका मुख्य वाच्यार्थ होनेके कारण; परम्=परब्रह्मको प्राप्त होता है (यही मानना युक्तिसंगत है)। १-यह मन्त्र पृष्ठ ३६० में अर्थसहित आ गया है। २-ब्रह्मणा सह ते सर्वे सम्प्राप्ते प्रतिसंचरे। परस्यान्ते कृतात्मानः प्रविशन्ति परं पदम् ॥

४४८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

४४८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ व्याख्या—वह अमानव पुरुष इनको ब्रह्मके समीप पहुँचा देता है (छा० उ० ५।१०।२) श्रुतिके इस वाक्यमें कहा हुआ 'ब्रह्म' शब्द मुख्यतया परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है, इसलिये अर्चि आदि मार्गसे जानेवाले परब्रह्म परमात्माको ही प्राप्त होते हैं, कार्यब्रह्मको नहीं। जहाँ मुख्य अर्थकी उपयोगिता नहीं हो, वहीं गौण अर्थकी कल्पना की जा सकती है, मुख्य अर्थकी उपयोगिता रहते हुए नहीं। वह परब्रह्म परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण होनेपर भी उसके परम धामका प्रतिपादन और वहाँ विद्वान् उपासकोंके जानेका वर्णन श्रुतियों (क० उ० १।३।९), (प्र० उ० १।१०) और स्मृतियोंमें (गीता १५। ६) जगह-जगह किया गया है। इसलिये उसके लोकविशेषमें गमन करनेके लिये कहना कार्यब्रह्मका द्योतक नहीं है। बहुवचनका प्रयोग भी आदरके लिये किया जाना सम्भव है तथा उस सर्वशक्तिमान् परमेश्वरके अपने लिये रचे हुए अनेक लोकोंका होना भी कोई असम्भव बात नहीं है। अतः सर्वथा यही सिद्ध होता है कि वे उसीके परमधाममें जाते हैं तथा परब्रह्म परमात्माको ही प्राप्त होते हैं; कार्यब्रह्मको नहीं। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे जैमिनिके मतको दृढ़ करते हैं— दर्शनाच्च ॥ ४।३।१३॥ दर्शनात् = श्रुतिमें जगह-जगह गतिपूर्वक परब्रह्मकी प्राप्ति दिखायी गयी है, इससे; च=भी (यही सिद्ध होता है कि कार्यब्रह्मकी प्राप्ति नहीं है)। व्याख्या—'उनमेंसे सुषुम्णा नाड़ीद्वारा ऊपर उठकर अमृतत्वको प्राप्त होता है।' (छा० उ० ८।६।६) 'वह संसारमार्गके उस पार उस विष्णुके परमपदको प्राप्त होता है।' (क० उ० १। ३। ९) इसके सिवा सुषुम्णा नाड़ीद्वारा शरीरसे निकलकर जानेका वर्णन कठोपनिषद्में भी वैसा ही आया है (क० उ० २।३।१६)। इस प्रकार जगह-जगह

सूत्र १४-१५ ] अध्याय ४ ४४९

सूत्र १४-१५ ] अध्याय ४ ४४९

गतिपूर्वक परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति श्रुतिमें प्रदर्शित की गयी है। इससे यही सिद्ध होता है कि देवयानमार्गके द्वारा जानेवाले ब्रह्मविद्याके उपासक परब्रह्मको ही प्राप्त होते हैं, न कि कार्यब्रह्मको। सम्बन्ध— प्रकारान्तरसे जैमिनिके मतको दृढ़ करते हैं— न च कार्ये प्रतिपत्त्यभिसन्धिः ॥ ४ । ३ । १४ ॥ च=इसके सिवा; प्रतिपत्त्यभिसन्धिः=उन ब्रह्मविद्याके उपासकोंका प्राप्तिविषयक संकल्प भी; कार्ये=कार्यब्रह्मके लिये; न=नहीं है। व्याख्या— इसके सिवा, उन ब्रह्मविद्याके उपासकोंका जो प्राप्तिविषयक संकल्प है, वह कार्यब्रह्मके लिये नहीं है अपितु परब्रह्म परमात्माको ही प्राप्त करनेके लिये उनकी साधनामें प्रवृत्ति देखी गयी है, इसलिये भी उनको कार्यब्रह्मकी प्राप्ति नहीं हो सकती, परब्रह्मकी ही प्राप्ति होती है। श्रुतिमें जो यह कहा गया है कि वे प्रजापतिके सभाभवनको प्राप्त होते हैं (छा० उ० ८।१४।१), उस प्रसंगमें भी उपासकका लक्ष्य प्रजापतिके लोकमें रहना नहीं है; किंतु परब्रह्मके परमधाममें जाना ही है; क्योंकि वहाँ जिस यशोंके यश यानी महायशका वर्णन है, वह ब्रह्मका ही नाम है, यह बात अन्यत्र श्रुतिमें कही गयी है (श्वेता० उ० ४।१९) तथा उसके पहले (छा० उ० ८।१३।१)-के प्रसंगसे भी यही सिद्ध हो सकता है कि वहाँ साधकका लक्ष्य परब्रह्म ही है। सम्बन्ध— इस प्रकार बादरिके पक्षकी और उसके उत्तरकी स्थापना करके अब सूत्रकार अपना मत प्रकट करते हुए सिद्धान्तका वर्णन करते हैं— अप्रतीकालम्बनान्नयतीति बादरायण उभयथा- दोषात्तत्क्रतुश्च ॥ ४।३।१५॥ अप्रतीकालम्बनान्=वाणी आदि प्रतीकका अवलम्बन करके उपासना करनेवालोंके सिवा अन्य सब उपासकोंको; नयति=(ये अर्चि आदि

४५० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

४५० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ देवतालोग देवयानमार्गसे) ले जाते हैं; उभयथा=(अतः) दोनों प्रकारसे; अदोषात्=माननेमें कोई दोष न होनेके कारण; तत्क्रतुः=उनके संकल्पानुसार परब्रह्मको; च=और कार्यब्रह्मको प्राप्त कराना सिद्ध होता है; इति=यह; बादरायणः=व्यासदेव कहते हैं। व्याख्या—आचार्य बादरायण अपना सिद्धान्त बतलाते हुए यह कहते हैं कि जिस प्रकार वाणी आदिमें ब्रह्मकी प्रतीक-उपासनाका वर्णन है, उसी प्रकार दूसरी-दूसरी वैसी उपासनाओंका भी उपनिषदोंमें वर्णन है। उन उपासकोंके सिवा, जो ब्रह्मलोकोंके भोगोंको स्वेच्छानुसार भोगनेकी इच्छावाले कार्यब्रह्मके उपासक हैं और जो परब्रह्म परमात्माको प्राप्त करनेकी इच्छासे उस सर्वशक्तिमान् सर्वज्ञ परमेश्वरकी उपासना करनेवाले हैं उन दोनों प्रकारके उपासकोंको उनकी भावनाके अनुसार कार्यब्रह्मके भोगसम्पन्न लोकोंमें और परब्रह्म परमात्माके परमधाममें दोनों जगह ही वह अमानव पुरुष पहुँचा देता है, इसलिये दोनों प्रकारकी मान्यतामें कोई दोष नहीं है; क्योंकि उपासकका संकल्प ही इस विशेषतामें कारण है। श्रुतिमें भी यह वर्णन स्पष्ट है कि 'जिनको परब्रह्मके परमधाममें पहुँचाते हैं, उनका मार्ग भी प्रजापति ब्रह्माके लोकमें होकर ही है (कौ० उ० १।३)। अतः जिनके अन्तःकरणमें लोकोंमें रमण करनेके संस्कार होते हैं, उनको वहाँ छोड़ देते हैं, जिनके मनमें वैसे भाव नहीं होते, उनको परमधाममें पहुँचा देते हैं; परंतु देवयानमार्गसे गये हुए दोनों प्रकारके ही उपासक वापस नहीं लौटते। सम्बन्ध—प्रतीकोपासनावालोंको अर्चिमार्गसे नहीं ले जानेका क्या कारण है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— विशेषं च दर्शयति ॥ ४।३।१६ ॥ विशेषम्=इसका विशेष कारण; च=भी; दर्शयति=श्रुति दिखाती है। व्याख्या—वाणी आदि प्रतीकोपासनावालोंको देवयानमार्गके अधिकारी

सूत्र १६ ] अध्याय ४ ४५१

सूत्र १६ ] अध्याय ४ ४५१ क्यों नहीं ले जाते, इसका विशेष कारण उन-उन उपासनाओंके विभिन्न फलका वर्णन करते हुए श्रुति स्वयं ही दिखलाती है, वाणीमें प्रतीकोपासनाका फल जहाँतक वाणीकी गति है, वहाँतक इच्छानुसार विचरण करनेकी शक्ति बताया गया है (छा० उ० ७।२।२)। इसी प्रकार दूसरी प्रतीकोपासनाओंका अलग-अलग फल बताया है, सबके फलमें एकता नहीं है। इसलिये वे उपासक देवयानमार्गसे न तो कार्यब्रह्मके लोकमें जानेके अधिकारी हैं और न परब्रह्म परमेश्वरके परमधाममें ही जानेके अधिकारी हैं; अतः उस मार्गके अधिकारी देवताओंका अर्चिमार्गसे उनको न ले जाना उचित ही है। तीसरा पाद सम्पूर्ण

चौथा पाद

चौथा पाद तीसरे पादमें अर्चि आदि मार्गद्वारा परब्रह्म और कार्यब्रह्मके लोकमें जानेवालोंकी गतिके विषयमें निर्णय किया गया। अब उपासकोंके संकल्पानुसार ब्रह्मलोकमें पहुँचनेके बाद जो उनकी स्थितिका भेद होता है, उसका निर्णय करनेके लिये चौथा पाद आरम्भ किया जाता है। उसमें पहले उन साधकोंके विषयमें निर्णय करते हैं, जिनका उद्देश्य परब्रह्मकी प्राप्ति है और जो उस परब्रह्मके अप्राकृत दिव्य परमधाममें जाते हैं। सम्पद्याविर्भावः स्वेन शब्दात् ॥ ४।४।१ ॥ सम्पद्य = परमधामको प्राप्त होकर (इस जीवका); स्वेन = अपने वास्तविक स्वरूपसे; आविर्भावः = प्राकट्य होता है; शब्दात् = क्योंकि श्रुतिमें ऐसा ही कहा गया है। व्याख्या—'जो यह उपासक इस शरीरसे ऊपर उठकर परम ज्ञानस्वरूप परमधामको प्राप्त होता है वह (वहाँ) अपने वास्तविक स्वरूपसे सम्पन्न हो जाता है। यह आत्मा है—ऐसा आचार्यने कहा—यह (उसको प्राप्त होनेवाला) अमृत है, अभय है और यही ब्रह्म है। निस्संदेह उस इस (प्राप्तव्य) परब्रह्मका नाम सत्य है।' (छा० उ० ८।३।४)—इस श्रुतिसे यही सिद्ध होता है कि परमधामको प्राप्त होते ही वह साधक अपने वास्तविक स्वरूपसे सम्पन्न हो जाता है अर्थात् प्राकृत सूक्ष्म शरीरसे रहित, श्रुतिमें बताये हुए पुण्य-पापशून्य, जरा-मृत्यु आदि विकारोंसे रहित, सत्यकाम, सत्य-संकल्प, शुद्ध एवं अजर-अमररूपसे युक्त हो जाता है। (छा० उ० ८।१।५) इस प्रकरणमें जो संकल्पसे ही पितर आदिकी उपस्थिति होनेका वर्णन है, वह ब्रह्मविद्याके माहात्म्यका सूचक है। उसका भाव यह है कि जीवनकालमें ही हृदयाकाशके भीतर संकल्पसे पितृलोक आदिके सुखका अनुभव होता है, न कि ब्रह्मलोकमें जानेके बाद; क्योंकि उस प्रकरणके वर्णनमें यह

सूत्र २ ] अध्याय ४ ४५३

सूत्र २ ] अध्याय ४ ४५३ बात स्पष्ट है। वहाँ जीवनकालमें ही उनका संकल्पसे उपस्थित होना कहा है (छा० उ० ८।२।१ से १०)। इसके बाद उसके लिये प्रतिदिन यहाँ हृदयमें ही परमानन्दकी प्राप्ति होनेकी बात कही है (छा० उ० ८।३।३)। तदनन्तर शरीर छोड़कर परमधाममें जानेकी बात बतायी गयी है (छा० उ० ८।३।४) और उसका नाम सत्य अर्थात् सत्यलोक कहा है। उसके पूर्व जो यह कहा है कि 'जो यहाँ इस आत्माको तथा इन सत्यकामोंको जानकर परलोकमें जाते हैं, उनका सब लोकोंमें इच्छानुसार गमन होता है' (छा० उ० ८।१।६) यह वर्णन आत्मज्ञानकी महिमा दिखानेके लिये है किंतु दूसरे खण्डका वर्णन तो स्पष्ट ही जीवनकालका है। उक्त प्रकरण दहर-विद्याका है और 'दहर' यहाँ परब्रह्म परमेश्वरका वाचक है, यह बात पहले सिद्ध की जा चुकी है, (ब्र० सू० १।३।१४) इसलिये यहाँ यह नहीं कहा जा सकता कि यह प्रकरण हिरण्यगर्भकी या जीवात्माके अपने स्वरूपकी उपासनाका है। सम्बन्ध—उस परमधाममें जो वह उपासक अपने वास्तविक रूपसे सम्पन्न होता है, उसमें पहलेकी अपेक्षा क्या विशेषता होती है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— मुक्तः प्रतिज्ञानात्॥ ४।४।२॥ प्रतिज्ञानात्=प्रतिज्ञा की जानेके कारण यह सिद्ध होता है कि; मुक्तः=(वह स्वरूप) सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त (होता) है। व्याख्या—श्रुतिमें जगह-जगह यह प्रतिज्ञा की गयी है कि 'उस परब्रह्म परमात्माके लोकको प्राप्त होनेके बाद यह साधक सदाके लिये सब प्रकारके बन्धनोंसे छूट जाता है।' (मु० उ० ३।२।६) इसीसे यह सिद्ध होता है कि अपने वास्तविक स्वरूपसे सम्पन्न होनेपर उपासक सब प्रकारके बन्धनोंसे रहित, सर्वथा शुद्ध, दिव्य, विभु और विज्ञानमय होता है, उसमें किसी प्रकारका विकार नहीं रहता। पूर्वकालमें अनादिसिद्ध कर्मसंस्कारोंके कारण जो इसका स्वरूप कर्मानुसार प्राप्त शरीरके अनुरूप

४५४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४

४५४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ हो रहा था; (ब्र० सू० २।३।३०) परमधाममें जानेके बाद वैसा नहीं रहता। यह सब बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है। सम्बन्ध—यह कैसे निश्चय होता है कि उस समय उपासक सब बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है? इसपर कहते हैं— आत्मा प्रकरणात्॥ ४।४।३॥ प्रकरणात्=प्रकरणसे (यह सिद्ध होता है कि वह); आत्मा=शुद्ध आत्मा ही हो जाता है। व्याख्या—उस प्रकरणमें जो वर्णन है उसमें यह स्पष्ट कहा गया है कि ‘वह ब्रह्मलोकमें प्राप्त होनेवाला स्वरूप आत्मा है’ (छा० उ० ८।३।४)। अतः उस प्रकरणसे ही यह सिद्ध होता है कि उस समय वह सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त होकर परमात्माके समान परम दिव्य शुद्ध स्वरूपसे युक्त हो जाता है (गीता १४।२; मु० ३।१।३)। सम्बन्ध—अब यह जिज्ञासा होती है कि ब्रह्मलोकमें जाकर उस उपासककी परमात्मासे पृथक् स्थिति रहती है या वह उन्हींमें मिल जाता है। इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं। पहले क्रमशः तीन प्रकारके मत प्रस्तुत करते हैं— अविभागेन दृष्टत्वात्॥४।४।४॥ अविभागेन=(उस मुक्तात्माकी स्थिति उस परब्रह्ममें) अविभक्त रूपसे होती है; दृष्टत्वात्=क्योंकि यही बात श्रुतिमें देखी गयी है। व्याख्या—श्रुतिमें कहा गया है कि— 'यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति। एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम॥' ‘हे गौतम! जिस प्रकार शुद्ध जलमें गिरा हुआ शुद्ध जल वैसा ही हो जाता है, उसी प्रकार परमात्माको जाननेवाले मुनिका आत्मा हो जाता है’ (क० उ० २।१।१५)। ‘जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ नाम-रूपोंको

सूत्र ५-६ ] अध्याय ४ ४५५ छोड़कर समुद्रमें विलीन हो जाती हैं, वैसे ही परमात्माको जाननेवाला विद्वान् नाम-रूपसे मुक्त होकर परात्पर, दिव्य, परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है'* (मु० उ० ३।२।८)। श्रुतिके इस वर्णनसे यह सिद्ध होता है कि मुक्तात्मा उस परब्रह्म परमात्मामें अविभक्त रूपसे ही स्थित होता है। सम्बन्ध - इस विषयमें जैमिनिका मत बतलाते हैं- ब्राह्मेण जैमिनिरूपन्यासादिभ्यः ॥४।४।५॥ जैमिनिः = आचार्य जैमिनि कहते हैं कि; ब्राह्मेण = ब्रह्मके सदृश रूपसे स्थित होता है; उपन्यासादिभ्यः = क्योंकि श्रुतिमें जो उसके स्वरूपका निरूपण किया गया है, उसे देखनेसे और स्मृति-प्रमाणसे भी यही सिद्ध होता है। व्याख्या - आचार्य जैमिनिका कहना है कि श्रुतिमें 'वह निर्मल होकर परम समताको प्राप्त हो जाता है।' (मु० उ० ३।१।३) ऐसा वर्णन मिलता है तथा उक्त प्रकरणमें भी उसका दिव्य स्वरूपसे सम्पन्न होना कहा गया है (छा० उ० ८।३।४) एवं गीतामें भी भगवान्ने कहा है कि 'इस ज्ञानका आश्रय लेकर मेरे दिव्य गुणोंकी समताको प्राप्त हुए महापुरुष सृष्टिकालमें उत्पन्न और प्रलयकालमें व्यथित नहीं होते' (गीता १४। २)। इन प्रमाणोंसे यह सिद्ध होता है कि वह उपासक उस परमात्माके सदृश दिव्य स्वरूपसे सम्पन्न होता है। सम्बन्ध - इसी विषयमें आचार्य औडुलोमिका मत उपस्थित करते हैं- चितितन्मात्रेण तदात्मकत्वादित्यौडुलोमिः ॥४।४।६॥ चितितन्मात्रेण = केवल चेतनमात्र स्वरूपसे स्थित रहता है; तदात्म- कत्वात्=क्योंकि उसका वास्तविक स्वरूप वैसा ही है; इति = ऐसा; औडुलोमिः = आचार्य औडुलोमि कहते हैं। व्याख्या - परमधाममें गया हुआ मुक्तात्मा अपने वास्तविक चैतन्यमात्र स्वरूपसे स्थित रहता है; क्योंकि श्रुतिमें उसका वैसा ही स्वरूप बताया गया

  • यह मन्त्र सूत्र १। ४। २१ की व्याख्यामें अर्थसहित आया है।

४५६ | वेदान्त-दर्शन | [ पाद ४

४५६ | वेदान्त-दर्शन | [ पाद ४

है। बृहदारण्यकमें कहा है कि 'स यथा सैन्धवघनोऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नो रसघन एवैवं वा अरेऽयमात्मानन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एव ।'—'जिस प्रकार नमकका डला बाहर-भीतरसे रहित सब-का-सब रसघन है, वैसे ही यह आत्मा बाहर-भीतरके भेदसे रहित सब-का- सब प्रज्ञानघन ही है।' (बृह० उ० ४।५।१३) इसलिये उसका अपने स्वरूपसे सम्पन्न होना चैतन्य घनरूपमें ही स्थित होना है। सम्बन्ध— अब आचार्य बादरायण इस विषयमें अपना सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं— एवमप्युपन्यासात् पूर्वभावादविरोधं बादरायणः ॥ ४ । ४ । ७॥ एवम्=इस प्रकारसे अर्थात् औडुलोमि और जैमिनिके कथनानुसार; अपि=भी; उपन्यासात्= श्रुतिमें उस मुक्तात्माके स्वरूपका निरूपण होनेसे तथा; पूर्वभावात्= पहले (चौथे सूत्रमें) कहे हुए भावसे भी; अविरोधम्=सिद्धान्तमें कोई विरोध नहीं है; बादरायणः ( आह )=यह बादरायण कहते हैं। व्याख्या—आचार्य जैमिनिके कथनानुसार मुक्तात्माका स्वरूप परब्रह्म परमात्माके सदृश दिव्यगुणोंसे सम्पन्न होता है—यह बात श्रुतियों और स्मृतियोंमें कही गयी है तथा आचार्य औडुलोमिके कथनानुसार चेतनमात्र स्वरूपसे स्थित होनेका वर्णन भी पाया जाता है। इसी प्रकार पहले (४।४।४) सूत्रमें जैसा बताया गया है, उसके अनुसार परमेश्वरमें अभिन्नरूपसे स्थित होनेका वर्णन भी मिलता है। इसलिये यही मानना ठीक है कि उस मुक्तात्माके भावानुसार उसकी तीनों ही प्रकारसे स्थिति हो सकती है। इसमें कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध—यहाँतक परमधाममें जानेवाले उपासकोंके विषयमें निर्णय किया गया। अब जो उपासक प्रजापति ब्रह्माके लोकको प्राप्त होते हैं, उनके विषयमें निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। यहाँ प्रश्न होता है कि उन उपासकोंको ब्रह्मलोकोंके भोगोंकी प्राप्ति किस प्रकार होती है, इसपर कहते हैं—

सूत्र ८–१०] अध्याय ४ ४५७

सूत्र ८–१०] अध्याय ४ ४५७ संकल्पादेव तु तच्छ्रुतेः ॥४।४।८॥ तु = (उन भोगोंकी प्राप्ति) तो; संकल्पात् = संकल्पसे; एव = ही होती है; तच्छ्रुतेः = क्योंकि श्रुतिमें यही बात कही गयी है। व्याख्या—'यह आत्मा मनरूप दिव्य नेत्रोंसे ब्रह्मलोकके समस्त भोगोंको देखता हुआ रमण करता है।' (छा० उ० ८। १२। ५, ६) यह बात श्रुतिमें कही गयी है; इससे यह सिद्ध होता है कि मनके द्वारा केवल संकल्पसे ही उपासकको उस लोकके दिव्य भोगोंका अनुभव होता है। सम्बन्ध—युक्तिसे भी उसी बातको दृढ़ करते हैं— अत एव चानन्याधिपतिः ॥ ४।४।९॥ अत एव = इसीलिये; च = तो; अनन्याधिपतिः = (मुक्तात्माको) ब्रह्माके सिवा अन्य स्वामीसे रहित बताया गया है। व्याख्या—'वह स्वराज्यको प्राप्त हो जाता है, मनके स्वामी हिरण्यगर्भको प्राप्त हो जाता है; अतः वह स्वयं बुद्धि, मन, वाणी, नेत्र और श्रोत्र—सबका स्वामी हो जाता है' (तै० उ० १। ६)। भाव यह कि एक ब्रह्माजीके सिवा अन्य किसीका भी उसपर आधिपत्य नहीं रहता, इसीलिये पूर्वसूत्रमें कहा गया है कि 'वह मनके द्वारा संकल्पमात्रसे ही सब दिव्य भोगोंको प्राप्त कर लेता है।' सम्बन्ध—उसे संकल्पमात्रसे जो दिव्य भोग प्राप्त होते हैं, उनके उपभोगके लिये वह शरीर भी धारण करता है या नहीं? इसपर आचार्य बादरिका मत उपस्थित करते हैं— अभावं बादरिराह ह्येवम् ॥ ४।४।१०॥ अभावम् = उसके शरीर नहीं होता ऐसा; बादरिः = आचार्य बादरि मानते हैं; हि = क्योंकि; एवम् = इसी प्रकार; आह = श्रुति कहती है। व्याख्या—आचार्य बादरिका कहना है कि उस लोकमें स्थूल शरीरका अभाव है, अतः बिना शरीरके केवल मनसे ही उन भोगोंको भोगता है;

४५८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४

४५८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४

क्योंकि श्रुतिमें इस प्रकार कहा है—'स वा एष एतेन दैवेन चक्षुषा मनसैतान् कामान् पश्यन् रमते ॥ य एते ब्रह्मलोके ।' (छा० उ० ८। १२। ५-६) 'निश्चय ही वह यह आत्मा इस दिव्य नेत्र मनके द्वारा जो ये ब्रह्मलोकके भोग हैं, इनको देखता हुआ रमण करता है।' इसके सिवा उसका अपने दिव्य्यरूपसे सम्पन्न होना भी कहा है (८।१२।२)। दिव्य रूप स्थूल देहके बन्धनसे रहित होता है। इसलिये कार्यब्रह्मके लोकमें गये हुए मुक्तात्माके स्थूल शरीरका अभाव मानना ही उचित है (८।१३।१)। सम्बन्ध—इस विषयमें आचार्य जैमिनिका मत बतलाते हैं— भावं जैमिनिर्विकल्पामननात् ॥ ४।४।११ ॥ जैमिनिः=आचार्य जैमिनि; भावम्=मुक्तात्माके शरीरका अस्तित्व मानते हैं; विकल्पामननात्=क्योंकि कई प्रकारसे स्थित होनेका श्रुतिमें वर्णन आता है। व्याख्या—आचार्य जैमिनिका कहना है कि 'मुक्तात्मा एक प्रकारसे होता है, तीन प्रकारसे होता है, पाँच प्रकारसे होता है, सात प्रकारसे, नौ प्रकारसे तथा ग्यारह प्रकारसे होता है, ऐसा कहा गया है।' (छा० उ० ७। २६ । २) इस तरह श्रुतिमें उसका नाना भावोंसे युक्त होना कहा है, इससे यही सिद्ध होता है कि उसके स्थूल शरीरका भाव है अर्थात् वह शरीरसे युक्त होता है, अन्यथा इस प्रकार श्रुतिका कहना संगत नहीं हो सकता। सम्बन्ध—अब इस विषयमें आचार्य बादरायण अपना मत प्रकट करते हैं— द्वादशाहवदुभयविधं बादरायणोऽतः ॥ ४।४।१२ ॥ बादरायणः=वेदव्यासजी कहते हैं कि; अतः=पूर्वोक्त दोनों मतोंसे; द्वादशाहवत्=द्वादशाह यज्ञकी भाँति; उभयविधम्=दोनों प्रकारकी स्थिति उचित है। व्याख्या—वेदव्यासजी कहते हैं कि दोनों आचार्योंका कथन प्रमाणयुक्त है; अतः उपासकके संकल्पानुसार शरीरका रहना और न रहना दोनों ही सम्भव

सूत्र १३-१४ ] अध्याय ४ ४५९

सूत्र १३-१४ ] अध्याय ४ ४५९ है। जैसे द्वादशाह-यज्ञ श्रुतिमें कहीं अनेककर्तृक होनेपर ‘सत्र’ और नियतकर्तृक होनेपर ‘अहीन’ माना गया है, उसी तरह यहाँ भी श्रुतिमें दोनों प्रकारका कथन होनेसे मुक्तात्माका स्थूल शरीरसे युक्त होकर दिव्य भोगोंका भोगना और बिना शरीरके केवल मनसे ही उनका उपभोग करना भी सम्भव है। उसकी यह दोनों प्रकारकी स्थिति उचित है, इसमें कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध—बिना शरीरके केवल मनसे उपभोग कैसे होता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— तन्वभावे संध्यवदुपपत्तेः ॥ ४।४।१३ ॥ तन्वभावे = शरीरके अभावमें; संध्यवत् = स्वप्नकी भाँति (भोगोंका उपभोग होता है); उपपत्तेः = क्योंकि यही मानना युक्तिसंगत है। व्याख्या—जैसे स्वप्नमें स्थूल शरीरके बिना मनसे ही समस्त भोगोंका उपभोग होता देखा जाता है, वैसे ही ब्रह्मलोकमें भी बिना शरीरके समस्त दिव्य भोगोंका उपभोग होना सम्भव है; इसलिये बादरिकी यह मान्यता सर्वथा उचित ही है। सम्बन्ध—शरीरके द्वारा किस प्रकार उपभोग होता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— भावे जाग्रद्वत् ॥ ४।४।१४॥ भावे=शरीर होनेपर; जाग्रद्वत्=जाग्रत्-अवस्थाकी भाँति (उपभोग होना युक्तिसंगत है)। व्याख्या—आचार्य जैमिनिके मतानुसार जिस मुक्तात्माको शरीरकी उपलब्धि होती है, वह उसके द्वारा उसी प्रकार भोगोंका उपभोग करता है, जैसे यहाँ जाग्रत्-अवस्थामें साधारण मनुष्य विषयोंका अनुभव करता है। ब्रह्मलोकमें ऐसा होना भी सम्भव है; इसलिये दोनों प्रकारकी स्थिति माननेमें कोई आपत्ति नहीं है। सम्बन्ध—जैमिनिने जिस श्रुतिका प्रमाण दिया है, उसके अनुसार मुक्तात्माके

४६० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४

४६० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ अनेक शरीर होनेकी बात ज्ञात होती है, इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि वे अनेक शरीर निरात्मक होते हैं या उनका अधिष्ठाता इससे भिन्न होता है ? इसपर कहते हैं— प्रदीपवदावेशस्तथा हि दर्शयति ॥ ४।४।१५ ॥ प्रदीपवत् = दीपककी भाँति; आवेशः = सभी शरीरोंमें मुक्तात्माका प्रवेश हो सकता है; हि = क्योंकि; तथा दर्शयति = श्रुति ऐसा दिखाती है। व्याख्या—जैसे अनेक दीपकोंमें एक ही अग्नि प्रकाशित होती है अथवा जिस प्रकार अनेक बल्बोंमें बिजलीकी एक ही शक्ति व्याप्त होकर उन सबको प्रकाशित कर देती है, उसी प्रकार एक ही मुक्तात्मा अपने संकल्पसे रचे हुए समस्त शरीरोंमें प्रविष्ट होकर दिव्यलोकके भोगोंका उपभोग कर सकता है; क्योंकि श्रुतिमें उस एकका ही अनेक रूप होना दिखाया गया है (छा० उ० ७।२६।२)। सम्बन्ध—मुक्तात्मा तो समुद्रमें नदियोंकी भाँति नाम-रूपसे मुक्त होकर उस परब्रह्म परमेश्वरमें विलीन हो जाता है (मु० उ० ३।२।८), यह बात पहले कह चुके हैं। इसके सिवा और भी जगह-जगह इसी प्रकारका वर्णन मिलता है। फिर यहाँ उनके नाना शरीर धारण करनेकी और यथेच्छ भोगभूमियोंमें विचरनेकी बात कैसे कही गयी है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— स्वाप्ययसम्पत्त्योरन्यतरापेक्षमाविष्कृतं हि ॥ ४।४।१६ ॥ स्वाप्ययसम्पत्त्योः = सुषुप्ति और परब्रह्मकी प्राप्ति—इन दोनोंमेंसे; अन्यतरापेक्षम् = किसी एककी अपेक्षासे कहे हुए (वे वचन हैं); हि = क्योंकि; आविष्कृतम् = श्रुतियोंमें इस बातको स्पष्ट किया गया है। व्याख्या—श्रुतिमें जो किसी प्रकारका ज्ञान न रहनेकी और समुद्रमें नदीकी भाँति उस परमात्मामें मिल जानेकी बात कही गयी है, वह कार्यब्रह्मके लोकोंको प्राप्त होनेवाले अधिकारियोंके विषयमें नहीं है; अपितु लय-अवस्थाको लेकर वैसा कथन है (छा० उ० ६।८।१; प्र० उ० ४।७, ८)। (प्रलयकालमें

सूत्र १७] अध्याय ४ ४६१

सूत्र १७] अध्याय ४ ४६१ भी प्राणियोंकी स्थिति सुषुप्तिकी भाँति ही रहती है, इसलिये उसका पृथक् उल्लेख सूत्रमें नहीं किया, यही अनुमान होता है)। अथवा परब्रह्मकी प्राप्ति अर्थात् सायुज्य मुक्तिको लेकर वैसा कहा गया है (मु० उ० ३।२।८; बृह० उ० २।४।१२)। भाव यह कि लय-अवस्था और सायुज्य मुक्ति इन दोनोंमेंसे किसी एकके उद्देश्यसे वैसा कथन है; क्योंकि ब्रह्मलोकोंमें जानेवाले अधिकारियोंके लिये तो स्पष्ट शब्दोंमें वहाँके दिव्य भोगोंके उपभोगकी, अनेक शरीर धारण करनेकी तथा यथेच्छ लोकोंमें विचरण करनेकी बात श्रुतिमें उन-उन स्थलोंमें कही गयी है। इसलिये किसी प्रकारका विरोध या असम्भव बात नहीं है। सम्बन्ध — यदि ब्रह्मलोकमें गये हुए मुक्त आत्माओंमें इस प्रकार अपने अनेक शरीर रचकर भोगोंका उपभोग करनेकी सामर्थ्य है, तब तो उनमें परमेश्वरकी भाँति जगत्की रचना आदि कार्य करनेकी भी सामर्थ्य हो जाती होगी ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— जगद्व्यापारवर्जं प्रकरणादसन्निहितत्वाच्च ॥४।४।१७॥ जगद्व्यापारवर्जम् = जगत्की रचना आदि व्यापारको छोड़कर और बातोंमें ही उनकी सामर्थ्य है; प्रकरणात् = क्योंकि प्रकरणसे यही सिद्ध होता है; च = तथा; असन्निहितत्वात् = जगत्की रचना आदि व्यापारसे इनका कोई निकट सम्बन्ध नहीं दिखाया गया है (इसलिये भी वही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या — जहाँ-जहाँ इस जड-चेतनात्मक समस्त जगत्की उत्पत्ति, संचालन और प्रलयका प्रकरण श्रुतियोंमें आया है (तै० उ० ३।१; छा० उ० ६।२।१—३; ऐ० उ० १।१; बृह० उ० ३।७।३ से २३ तक; शतपथ० १४।३।५।७ से ३१ तक); वहाँ सभी जगह यह कार्य उस परब्रह्म परमात्माका ही बताया गया है। ब्रह्मलोकको प्राप्त होनेवाले मुक्तात्माओंका सृष्टिरचनादि कार्यसे सम्बन्ध कहीं नहीं बताया गया है। इन दोनों कारणोंसे यही बात सिद्ध होती है कि इस जड-चेतनात्मक

४६२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ समस्त जगत्की रचना, उसका संचालन और प्रलय आदि जितने भी कार्य हैं, उनमें उन मुक्तात्माओंका कोई हाथ या सामर्थ्य नहीं है; वे केवल वहाँके दिव्य भोगोंका उपभोग करनेकी ही यथेष्ट सामर्थ्य रखते हैं। सम्बन्ध — इसपर पूर्वपक्ष उठाकर उसके समाधानपूर्वक पूर्व सूत्रमें कहे हुए सिद्धान्तको पुष्ट करते हैं— प्रत्यक्षोपदेशादिति चेन्नाधिकारिकमण्डल- स्थोक्तेः ॥ ४ । ४ । १८ ॥ चेत् = यदि कहो कि; प्रत्यक्षोपदेशात् = वहाँ प्रत्यक्षरूपसे इच्छानुसार लोकोंमें विचरनेका उपदेश है, अर्थात् वहाँ जाकर इच्छानुसार कार्य करनेका अधिकार बताया गया है; इति न = तो यह बात नहीं है; आधिकारिकमण्डलस्थोक्तेः = क्योंकि वह कहना अधिकारियोंके लोकोंमें स्थित भोगोंका उपभोग करनेके लिये ही है। व्याख्या — यदि कोई ऐसी शंका करे कि 'वह स्वराट् हो जाता है, उसकी समस्त लोकोंमें इच्छानुसार गमन करनेकी शक्ति हो जाती है।' (छा० उ० ७।२५।२) 'वह स्वराज्यको प्राप्त हो जाता है।' (तै० उ० १।६।२) इत्यादि श्रुतिवाक्योंमें उसे स्पष्ट शब्दोंमें स्वराट् और स्वराज्यको प्राप्त बताया है तथा इच्छानुसार भिन्न-भिन्न लोकोंमें विचरनेकी सामर्थ्यसे सम्पन्न कहा गया है, इससे उसका जगत्की रचना आदिके कार्यमें अधिकार है, यह स्वतः सिद्ध हो जाता है, तो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि वहाँ यह भी कहा है कि 'वह सबके मनके स्वामीको प्राप्त हो जाता है' (तै० उ० १।६।२)। अतः उसकी सब सामर्थ्य उस ब्रह्मलोककी प्राप्तिके प्रभावसे है और ब्रह्माके अधीन है, इसलिये जगत्के कार्यमें हस्तक्षेप करनेकी उसमें शक्ति नहीं है। उसे जो शक्ति और अधिकार दिये गये हैं, वे केवल उन-उन अधिकारियोंके लोकोंमें स्थित भोगोंका उपभोग करनेकी स्वतन्त्रताके लिये ही हैं। अतः वह कथन वहींके लिये है—

सूत्र १९-२०] अध्याय ४ ४६३

सूत्र १९-२०] अध्याय ४ ४६३ सम्बन्ध - यदि इस प्रकार उन-उन लोकोंके विकारमय भोगोंका उपभोग करनेके लिये ही वे सब शरीर, शक्ति और अधिकार आदि उसे मिले हैं, तब तो देवलोकोंको प्राप्त होनेवाले कर्माधिकारियोंके सदृश ही ब्रह्मविद्याका भी फल हुआ, इसमें विशेषता क्या हुई ? इस जिज्ञासापर कहते हैं- विकारावर्ति च तथा हि स्थितिमाह ॥४।४।१९॥ च = इसके सिवा; विकारावर्ति = वह मुक्तात्मा जन्मादि विकारोंसे रहित ब्रह्मरूप फलका अनुभव करता है; हि= क्योंकि; तथा=उसकी वैसी; स्थितिम् = स्थिति; आह = श्रुति कहती है। व्याख्या - श्रुतिमें ब्रह्मविद्याका मुख्य फल परब्रह्मकी प्राप्ति बताया गया है, 'जो जन्म, जरा आदि विकारोंको न प्राप्त होनेवाला, अजर-अमर, समस्त पापोंसे रहित तथा कल्याणमय दिव्य गुणोंसे सम्पन्न है।' (छा० उ० ८।१।५) इसलिये यही सिद्ध होता है कि उसको प्राप्त होनेवाला फल कर्मफलकी भाँति विकारी नहीं है। ब्रह्मलोकके भोग तो आनुषंगिक फल हैं। ब्रह्मविद्याकी सार्थकता तो परब्रह्मकी प्राप्ति करानेमें ही है। श्रुतिमें उस मुक्तात्माकी ऐसी ही स्थिति बतायी गयी है- 'यदा ह्येवैष एतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते। अथ सोऽभयं गतो भवति ॥' (तै० उ० २।७) अर्थात् 'जब यह जीवात्मा इस देखनेमें न आनेवाले, शरीररहित बतलानेमें न आनेवाले तथा दूसरेका आश्रय न लेनेवाले परब्रह्म परमात्मामें निर्भयतापूर्वक स्थिति लाभ करता है, तब वह निर्भय पदको प्राप्त हो जाता है।' सम्बन्ध - पहले कहे हुए सिद्धान्तको ही प्रमाणसे दृढ़ करते हैं- दर्शयतश्चैवं प्रत्यक्षानुमाने ॥ ४।४।२०॥ प्रत्यक्षानुमाने = श्रुति और स्मृति; च=भी; एवम् = इसी प्रकार; दर्शयतः = दिखलाती हैं। व्याख्या - श्रुतिमें स्पष्ट कहा है कि 'वह परम ज्योतिको प्राप्त हो अपने

४६४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४

४६४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ वास्तविक रूपसे सम्पन्न हो जाता है। यह आत्मा है, यही अमृत एवं अभय है और यही ब्रह्म है।' (छा० उ० ८।३।४) ब्रह्मलोक अन्य लोकोंकी भाँति विकारी नहीं है। श्रुतिमें उसे नित्य (छा० उ० ८।१३।१), सब पापोंसे रहित (छा० उ० ८।४।१) तथा रजोगुण आदिसे शून्य—विशुद्ध (प्र० उ० १।१६) कहा गया है। गीतामें भी कहा है कि 'इस ज्ञानकी उपासना करके मेरे सदृश धर्मोंको अर्थात् निर्लेपता आदि दिव्य कल्याणमय भावोंको प्राप्त हो जाते हैं, अतः वे न तो जगत्की रचनाके कालमें उत्पन्न होते हैं और न प्रलयकालमें मरनेका दुःख ही भोगते हैं।'* इस प्रकार श्रुतियों और स्मृतियोंमें जगह- जगह मुक्तात्माकी वैसी स्थिति दिखायी गयी है। उसका जो उन-उन अधिकारिवर्गोंके लोकोंमें जाना-आना और वहाँके भोगोंका उपभोग करना है, वह लीलामात्रा है, बन्धनकारक या पुनर्जन्मका हेतु नहीं है। सम्बन्ध—ब्रह्मलोकमें जानेवाले मुक्तात्माका जगत्की उत्पत्ति आदिमें अधिकार या सामर्थ्य नहीं है, इस पूर्वोक्त बातको इस प्रकरणके अन्तमें पुनः सिद्ध करते हैं— भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच्च ॥ ४।४।२१ ॥ भोगमात्रसाम्यलिङ्गात् = भोगमात्रमें समतारूप लक्षणसे; च = भी (यही सिद्ध होता है कि उसका जगत्की रचना आदिमें अधिकार नहीं होता)। व्याख्या—जिस प्रकार वह ब्रह्मा समस्त दिव्य कल्याणमय भोगोंका उपभोग करता हुआ भी उनसे लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार यह मुक्तात्मा भी उस ब्रह्मलोकमें रहते समय, उपासनाकालमें की हुई भावनाके अनुसार प्राप्त हुए वहाँके दिव्य भोगोंका बिना शरीरके स्वप्नकी भाँति केवल संकल्पसे या शरीर-धारणपूर्वक जाग्रत्की भाँति उपभोग करके भी उनसे लिप्त नहीं होता। इस प्रकार भोगमात्रमें उस ब्रह्माके साथ उसकी समानता है। इस लक्षणसे भी

  • इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः। सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च॥ (गीता १४। २)

सूत्र २२ ] अध्याय ४ ४६५

सूत्र २२ ] अध्याय ४ ४६५ यही सिद्ध होता है कि जगत्की रचना आदि कार्यमें उसका ब्रह्माके समान किसी भी अंशमें अधिकार या सामर्थ्य नहीं है। सम्बन्ध — यदि ब्रह्मलोकको प्राप्त होनेवाले मुक्त आत्माकी सामर्थ्य सीमित है, परमात्माके समान असीम नहीं है, तब तो उसके उपभोगका समय पूर्ण होनेपर उसका पुनर्जन्म भी हो सकता है? इसपर कहते हैं— अनावृत्तिः शब्दादनावृत्तिः शब्दात् ॥ ४ । ४ । २२ ॥ अनावृत्तिः = ब्रह्मलोकमें गये हुए आत्माका पुनरागमन नहीं होता; शब्दात् = यह बात श्रुतिके वचनसे सिद्ध होती है; अनावृत्तिः = पुनरागमन नहीं होता; शब्दात् = यह बात श्रुतिके वचनसे सिद्ध होती है। व्याख्या—श्रुतिमें बार-बार यह बात कही गयी है कि ब्रह्मलोकमें गया हुआ साधक वापस नहीं लौटता (बृह० उ० ६।२।१५; प्र० उ० १।१०; छा० उ० ८।६।६; ४।१५।६; ८।१५।१)। इस शब्द-प्रमाणसे यही सिद्ध होता है कि ब्रह्मलोकमें जानेवाला अधिकारी वहाँसे इस लोकमें नहीं लौटता। 'अनावृत्तिः शब्दात्' इस वाक्यकी आवृत्ति ग्रन्थकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है। चौथा पाद सम्पूर्ण श्रीवेदव्यासरचित वेदान्त-दर्शन (ब्रह्मसूत्र)-का चौथा अध्याय पूरा हुआ। ॥ वेदान्त-दर्शन सम्पूर्ण ॥