वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४५६ | वेदान्त-दर्शन | [ पाद ४
है। बृहदारण्यकमें कहा है कि 'स यथा सैन्धवघनोऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नो रसघन एवैवं वा अरेऽयमात्मानन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एव ।'—'जिस प्रकार नमकका डला बाहर-भीतरसे रहित सब-का-सब रसघन है, वैसे ही यह आत्मा बाहर-भीतरके भेदसे रहित सब-का- सब प्रज्ञानघन ही है।' (बृह० उ० ४।५।१३) इसलिये उसका अपने स्वरूपसे सम्पन्न होना चैतन्य घनरूपमें ही स्थित होना है। सम्बन्ध— अब आचार्य बादरायण इस विषयमें अपना सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं— एवमप्युपन्यासात् पूर्वभावादविरोधं बादरायणः ॥ ४ । ४ । ७॥ एवम्=इस प्रकारसे अर्थात् औडुलोमि और जैमिनिके कथनानुसार; अपि=भी; उपन्यासात्= श्रुतिमें उस मुक्तात्माके स्वरूपका निरूपण होनेसे तथा; पूर्वभावात्= पहले (चौथे सूत्रमें) कहे हुए भावसे भी; अविरोधम्=सिद्धान्तमें कोई विरोध नहीं है; बादरायणः ( आह )=यह बादरायण कहते हैं। व्याख्या—आचार्य जैमिनिके कथनानुसार मुक्तात्माका स्वरूप परब्रह्म परमात्माके सदृश दिव्यगुणोंसे सम्पन्न होता है—यह बात श्रुतियों और स्मृतियोंमें कही गयी है तथा आचार्य औडुलोमिके कथनानुसार चेतनमात्र स्वरूपसे स्थित होनेका वर्णन भी पाया जाता है। इसी प्रकार पहले (४।४।४) सूत्रमें जैसा बताया गया है, उसके अनुसार परमेश्वरमें अभिन्नरूपसे स्थित होनेका वर्णन भी मिलता है। इसलिये यही मानना ठीक है कि उस मुक्तात्माके भावानुसार उसकी तीनों ही प्रकारसे स्थिति हो सकती है। इसमें कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध—यहाँतक परमधाममें जानेवाले उपासकोंके विषयमें निर्णय किया गया। अब जो उपासक प्रजापति ब्रह्माके लोकको प्राप्त होते हैं, उनके विषयमें निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। यहाँ प्रश्न होता है कि उन उपासकोंको ब्रह्मलोकोंके भोगोंकी प्राप्ति किस प्रकार होती है, इसपर कहते हैं—