वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 460, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ८–१०] अध्याय ४ ४५७ संकल्पादेव तु तच्छ्रुतेः ॥४।४।८॥ तु = (उन भोगोंकी प्राप्ति) तो; संकल्पात् = संकल्पसे; एव = ही होती है; तच्छ्रुतेः = क्योंकि श्रुतिमें यही बात कही गयी है। व्याख्या—'यह आत्मा मनरूप दिव्य नेत्रोंसे ब्रह्मलोकके समस्त भोगोंको देखता हुआ रमण करता है।' (छा० उ० ८। १२। ५, ६) यह बात श्रुतिमें कही गयी है; इससे यह सिद्ध होता है कि मनके द्वारा केवल संकल्पसे ही उपासकको उस लोकके दिव्य भोगोंका अनुभव होता है। सम्बन्ध—युक्तिसे भी उसी बातको दृढ़ करते हैं— अत एव चानन्याधिपतिः ॥ ४।४।९॥ अत एव = इसीलिये; च = तो; अनन्याधिपतिः = (मुक्तात्माको) ब्रह्माके सिवा अन्य स्वामीसे रहित बताया गया है। व्याख्या—'वह स्वराज्यको प्राप्त हो जाता है, मनके स्वामी हिरण्यगर्भको प्राप्त हो जाता है; अतः वह स्वयं बुद्धि, मन, वाणी, नेत्र और श्रोत्र—सबका स्वामी हो जाता है' (तै० उ० १। ६)। भाव यह कि एक ब्रह्माजीके सिवा अन्य किसीका भी उसपर आधिपत्य नहीं रहता, इसीलिये पूर्वसूत्रमें कहा गया है कि 'वह मनके द्वारा संकल्पमात्रसे ही सब दिव्य भोगोंको प्राप्त कर लेता है।' सम्बन्ध—उसे संकल्पमात्रसे जो दिव्य भोग प्राप्त होते हैं, उनके उपभोगके लिये वह शरीर भी धारण करता है या नहीं? इसपर आचार्य बादरिका मत उपस्थित करते हैं— अभावं बादरिराह ह्येवम् ॥ ४।४।१०॥ अभावम् = उसके शरीर नहीं होता ऐसा; बादरिः = आचार्य बादरि मानते हैं; हि = क्योंकि; एवम् = इसी प्रकार; आह = श्रुति कहती है। व्याख्या—आचार्य बादरिका कहना है कि उस लोकमें स्थूल शरीरका अभाव है, अतः बिना शरीरके केवल मनसे ही उन भोगोंको भोगता है;