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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

सूत्र ३९ ] अध्याय ३ ३४९

सूत्र ३९ ] अध्याय ३ ३४९ लेकर जीवसे उसकी भिन्नता नहीं बतायी जा सकती है' तो यह कथन ठीक नहीं है; क्योंकि- कामादीतरत्र तत्र चायतनादिभ्यः ॥ ३।३।३९॥ (उस परब्रह्मके) इतरत्र = दूसरी जगह (बताये हुए); कामादि = सत्यकामत्वादि धर्म; तत्र च= जहाँ निर्विशेष स्वरूपका वर्णन है वहाँ भी हैं. आयतनादिभ्यः = क्योंकि वहाँ उसके सर्वाधारत्व आदि धर्मोंका वर्णन पाया जाता है। व्याख्या- उस परब्रह्म परमेश्वरके जो सत्यसंकल्पत्व, सर्वज्ञत्व तथा सर्वेश्वरत्वादि धर्म विभिन्न श्रुतियोंमें बतलाये गये हैं, वे सब जहाँ निर्विशेष ब्रह्मका वर्णन है, वहाँ भी हैं; क्योंकि निर्विशेष स्वरूपका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियोंमें भी ब्रह्मके सर्वाधारत्व आदि सविशेषधर्मोंका वर्णन है। इसलिये वैसे दूसरे धर्मोंका भी वहाँ अध्याहार कर लेना उचित है। बृहदारण्यकमें गार्गीके प्रश्नका उत्तर देते हुए याज्ञवल्क्यने उस परम अक्षर परमात्माके स्वरूपका वर्णन किया है। वहाँ पहले 'अस्थूलमणणु' (न स्थूल है; न सूक्ष्म है) इत्यादि प्रकारसे निर्विशेष स्वरूपके लक्षणोंका वर्णन करके अन्तमें कहा है कि 'इस अक्षरके ही प्रशासनमें सूर्य और चन्द्रमा धारण किये हुए हैं, उस अक्षरके ही प्रशासनमें द्युलोक और पृथिवी धारण किये हुए हैं।' इस प्रकार याज्ञवल्क्यने यहाँ उस अक्षरब्रह्मको समस्त जगत्का आधार बतलाया है (बृह० उ० ३।८।८-९)१ इसी तरह मुण्डकोपनिषद्में 'जाननेमें न आनेवाला, पकड़नेमें न आनेवाला' इत्यादि प्रकारसे निर्विशेष स्वरूपके धर्मोंका वर्णन करनेके पश्चात् उस ब्रह्मको नित्य, विभु, सर्वगत, अत्यन्त सूक्ष्म और समस्त प्राणियोंका कारण बताकर उसे विशेष धर्मोंसे युक्त भी कहा गया है (मु० उ० १।१।६)२ इससे यह सिद्ध होता है कि 'वह परमात्मा दोनों १-यह मन्त्र १। ३। १० और ११ की व्याख्यामें आया है। २-यह मन्त्र सूत्र १। २। २१ की व्याख्यामें आया है।

३५० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ प्रकारके धर्मोंवाला है।' इसलिये दूसरी जगह कहे हुए सत्यसंकल्पत्व, सर्वज्ञत्व आदि जितने भी परमेश्वरके दिव्य गुण हैं, वे उनमें स्वाभाविक हैं, उपाधिकृत नहीं हैं। अतः जहाँ जिन लक्षणोंका वर्णन नहीं है, वहाँ उनका अध्याहार कर लेना चाहिये; इस प्रकार परमात्मा और जीवात्मामें समानधर्मता न होनेके कारण उनमें सर्वथा अभेद नहीं माना जा सकता। सम्बन्ध—यदि जीव और ईश्वरका भेद उपाधिकृत नहीं माना जायगा, तब तो अनेक द्रष्टाओंकी सत्ता सिद्ध हो जायगी। इस परिस्थितिमें श्रुतिद्वारा जो यह कहा है कि 'इससे अन्य कोई द्रष्टा नहीं है' इत्यादि, उसकी व्यवस्था कैसे होगी? इसपर कहते हैं— आदरादलोपः ॥ ३। ३। ४० ॥ आदरात् = वह कथन परमेश्वरके प्रति आदरका प्रदर्शक होनेके कारण; अलोपः = उसमें अन्य द्रष्टाका लोप अर्थात् निषेध नहीं है। व्याख्या—उस परब्रह्म परमेश्वरको सर्वश्रेष्ठ बतलानेके लिये वहाँ आदरकी दृष्टिसे अन्य द्रष्टाका निषेध किया गया है, वास्तवमें नहीं। भाव यह है कि वह परब्रह्म परमेश्वर ऐसा द्रष्टा, ऐसा सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता है कि उसकी अपेक्षा अन्य सब जीव द्रष्टा होते हुए भी नहींके समान हैं; क्योंकि उनमें पूर्ण द्रष्टापन नहीं है। प्रलयकालमें जड तत्त्वोंकी भाँति जीवोंको भी किसी प्रकारका विशेष ज्ञान नहीं रहता तथा वर्तमानकालमें भी जो जीवोंका जानना, देखना, सुनना आदि है, वह सीमित है और उस अन्तर्यामी परमेश्वरके ही सकाशासे है। (ऐ० उ० १। ३। ११) तथा (प्र० उ० ४। ९) वही इसका प्रेरक है, अतः यह सर्वथा स्वतन्त्र नहीं है। इससे यही सिद्ध होता है कि श्रुतिका वह कहना भगवान्‌की श्रेष्ठता दिखलानेके लिये है, वास्तवमें अन्य द्रष्टाका निषेध करनेके लिये नहीं है। सम्बन्ध—उपर्युक्त कथन परमेश्वरके प्रति आदर सूचित करनेके लिये है, इस बातको प्रकारान्तरसे सिद्ध करते हैं—

सूत्र ४१ ] अध्याय ३ ३५१

सूत्र ४१ ] अध्याय ३ ३५१ उपस्थितेऽतस्तद्वचनात् ॥ ३ । ३ । ४१ ॥ उपस्थिते = उक्त वचनोंसे किसी प्रकार अन्य चेतनका निषेध प्राप्त होनेपर भी; अतः = इस ब्रह्मकी अपेक्षा अन्य द्रष्टाका निषेध बतानेके कारण (वह कथन आदरार्थक ही है); तद्वचनात् = क्योंकि उन वाक्योंके साथ बार-बार अतः शब्दका प्रयोग किया गया है। व्याख्या—जहाँ उस परमात्मासे अन्य द्रष्टा, श्रोता आदिका निषेध है (बृह० उ० ३।७।२३), वहाँ उस वर्णनमें बार-बार ‘अतः’ शब्दका प्रयोग किया गया है, इसलिये यही सिद्ध होता है कि इसकी अपेक्षा या इससे अधिक कोई द्रष्टा, श्रोता आदि नहीं है। यदि सर्वथा अन्य द्रष्टाका निषेध करना अभीष्ट होता तो ‘अतः’ शब्दकी कोई आवश्यकता नहीं होती। जैसे यह कहा जाय कि इससे अन्य कोई धार्मिक नहीं है तो इस कथनद्वारा अन्य धार्मिकोंसे उसकी श्रेष्ठता बताना ही अभीष्ट है, न कि अन्य सब धार्मिकोंका अभाव बतलाना। उसी प्रकार वहाँ जो यह कहा गया है कि ‘इस परमात्मासे अन्य कोई द्रष्टा आदि नहीं है’ उस कथनका भी यही अर्थ है कि इससे अधिक कोई द्रष्टापन आदि गुणोंसे युक्त पुरुष नहीं है; यह परमात्मा ही सर्वश्रेष्ठ द्रष्टा आदि है; क्योंकि उसी वर्णनके प्रसंगमें (बृह० उ० ३। ७। २२)* परब्रह्म परमात्माको जीवात्माका अन्तर्यामी और जीवात्माको उसका शरीर बताकर दोनोंके भेदका प्रतिपादन किया है। यदि ‘नान्योऽतो द्रष्टा’ इत्यादि वाक्योंसे अन्य द्रष्टा अर्थात् जीवात्माका निषेध बताना माना जाय तो पूर्व वर्णनसे विरोध आयेगा, इसलिये वहाँ अन्य द्रष्टाके निषेधका तात्पर्य परमात्माको सर्वश्रेष्ठ द्रष्टा बताकर उसके प्रति आदर प्रदर्शित करना ही समझना चाहिये। सम्बन्ध—यहाँतक यह निर्णय किया गया कि जीवात्मा और परमात्माका

  • यह मन्त्र सूत्र १।२।२० की टिप्पणीमें आया है।

३५२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

३५२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ भेद उपाधिकृत नहीं है तथा उस परब्रह्म परमेश्वरमें जो सर्वज्ञत्व, सर्वशक्तिमत्ता, सर्वाधारता तथा सर्वसुहृद् होना आदि दिव्य गुण शास्त्रोंमें बताये गये हैं, वे भी उपाधिकृत नहीं हैं; किंतु स्वभावसिद्ध और नित्य हैं। जहाँ ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन करते समय उनका वर्णन न हो, वहाँ भी उन सबका अध्याहार कर लेना चाहिये। अब फलविषयक श्रुतियोंका विरोधाभास दूर करके सिद्धान्त-निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। दहरविद्यामें तथा प्रजापति-इन्द्रके संवादमें जो ब्रह्मविद्याका वर्णन है, उसके फलमें इच्छानुसार नाना प्रकारके भोगोंको भोगनेकी बात कही गयी है (छा० उ० ८।२।१ से १० तक); किंतु दूसरी जगह वैसी बात नहीं कही गयी है। अतः यह जिज्ञासा होती है कि ब्रह्मलोकको प्राप्त होनेवाले सभी साधकोंके लिये यह नियम है या इसमें विकल्प है ? इसपर कहते हैं— तन्निर्धारणानियमस्तद्दृष्टेः पृथग्घ्यप्रतिबन्धः फलम्॥ ३।३।४२॥ तन्निर्धारणानियमः = भोगोंके भोगनेका निश्चित नियम नहीं है; तद्दृष्टेः = क्योंकि यह बात उस प्रकरणमें बार-बार 'यदि' शब्दके प्रयोगसे देखी गयी है; हि = इसके सिवा, दूसरा कारण यह भी है कि; पृथक् = कामोपभोगसे भिन्न संकल्पवालेके लिये; अप्रतिबन्धः = जन्म- मरणके बन्धनसे छूट जाना ही; फलम् = फल बताया गया है। व्याख्या—ब्रह्मलोकमें जानेवाले सभी साधकोंको उस लोकके दिव्य भोगोंका उपभोग करना पड़े, यह नियम नहीं है; क्योंकि जहाँ-जहाँ ब्रह्मलोककी प्राप्तिका वर्णन किया गया है, वहाँ सब जगह भोगोंके उपभोगकी बात नहीं कही है तथा जहाँ कही है, वहाँ भी 'यदि' शब्दका प्रयोग करके साधकके इच्छानुसार उसका विकल्प दिखा दिया है। (छा० उ० ८।२।१ से १० तक) इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि जो साधक ब्रह्मलोकके या अन्य किसी भी देवलोकके भोगोंको भोगनेकी इच्छा रखता है उसीको वे भोग मिलते हैं, ब्रह्मविद्याकी स्तुतिके लिये यह आनुषंगिक वर्णन है, उस विद्याका

सूत्र ४३-४४ ] अध्याय ३ ३५३ मुख्य फल नहीं है। परमात्माके साक्षात्कारमें तो ये भोग विलम्ब करनेवाले विघ्न हैं, अतः साधकको इन भोगोंकी भी उपेक्षा ही करनी चाहिये। इसलिये जिनके मनमें भोग भोगनेका संकल्प नहीं है, उनके लिये जन्म-मरणके बन्धनसे छूटकर तत्काल परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाना ही उसका मुख्य फल बताया गया है। (बृह० उ० ४।४।६^१ तथा क० उ० २।३।१४^२)। सम्बन्ध—'यदि ब्रह्मलोकके भोगकी भी उस परब्रह्म परमेश्वरके साक्षात्कारमें विलम्ब करनेवाले हैं, तब श्रुतिने ऐसे फलोंका वर्णन किसलिये किया?' इस जिज्ञासापर कहते हैं— प्रदानवदेव तदुक्तम्॥ ३।३।४३॥ तदुक्तम् = वह कथन; प्रदानवत् = वरदानकी भाँति; एव = ही हैं। व्याख्या—जिस प्रकार भगवान् या कोई शक्तिशाली महापुरुष किसी श्रद्धालु व्यक्तिको उसकी श्रद्धा और रुचि बढ़ानेके लिये वरदान दे दिया करते हैं, उसी प्रकार स्वर्गके भोगोंसे आसक्ति रखनेवाले सकामकर्मी श्रद्धालु मनुष्योंकी ब्रह्मविद्यामें श्रद्धा बढ़ाकर उसमें उन्हें प्रवृत्त करनेके लिये एवं कर्मोंके फलरूप स्वर्गीय भोगोंकी तुच्छता दिखलानेके लिये भी श्रुतिका वह कथन है। सम्बन्ध—उक्त सिद्धान्तको पुष्ट करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं— लिंगभूयस्त्वात्तद्धि बलीयस्तदपि॥ ३।३।४४॥ लिंगभूयस्त्वात् = जन्म-मरणरूप संसारसे सदाके लिये मुक्त होकर उस परब्रह्मको प्राप्त हो जानारूप फल बतानेवाले लक्षणोंकी अधिकता होनेके कारण; तद्बलीयः = वही फल बलवान् (मुख्य) है; हि = क्योंकि; तदपि = वह दूसरे फलोंका वर्णन भी मुख्य फलका महत्त्व प्रकट करनेके लिये ही है। १-यह मन्त्र सूत्र ३।३।३० की व्याख्यामें आया है। २-यह मन्त्र सूत्र ३।४।५२ की टिप्पणीमें आया है।

३५४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

३५४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ व्याख्या - वेदान्त-शास्त्रमें जहाँ-जहाँ ब्रह्मज्ञानके फलका वर्णन किया गया है, वहाँ इस जन्म-मृत्युरूप संसारसे सदाके लिये छूटकर उस परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जानारूप फलका ही अधिकतासे वर्णन मिलता है, इसलिये वही प्रबल अर्थात् प्रधान फल है, ऐसा मानना चाहिये; क्योंकि उसके साथ-साथ जो किसी-किसी प्रकरणमें ब्रह्मलोकके भोगोंकी प्राप्तिरूप दूसरे फलका वर्णन आता है, वह भी मुख्य फलकी प्रधानता सिद्ध करनेके लिये ही है। इसीलिये उसका सब प्रकरणोंमें वर्णन नहीं किया गया है; किंतु उपर्युक्त मुख्य फलका वर्णन तो सभी प्रकरणोंमें आता है। सम्बन्ध - ब्रह्मज्ञान ही इस जन्म-मृत्युरूप संसारसे छूटनेका निश्चित उपाय है, यह बात सिद्ध करनेके लिये पूर्वपक्षकी उत्थापना की जाती है- पूर्वविकल्पः प्रकरणात्स्यात् क्रियामानसवत् ॥ ३।३।४५ ॥ क्रियामानसवत् = शारीरिक और मानसिक क्रियाओंमें स्वीकृत विकल्पकी भाँति; पूर्वविकल्पः = पहले कही हुई अग्निविद्या भी विकल्पसे मुक्तिकी हेतु; स्यात् = हो सकती है; प्रकरणात् = यह बात प्रकरणसे सिद्ध होती है। व्याख्या - नचिकेताके प्रश्न और यमराजके उत्तरविषयक प्रकरणकी आलोचना करनेसे यही सिद्ध होता है कि जिस प्रकार उपासनासम्बन्धी शारीरिक क्रियाकी भाँति मानसिक क्रिया भी फल देनेमें समर्थ है, अतः अधिकारिभेदसे जो फल शारीरिक क्रिया करनेवालेको मिलता है, वही मानसिक क्रिया करनेवालेको भी मिल जाता है; उसी प्रकार अग्निहोत्ररूप कर्म भी ब्रह्मविद्याकी ही भाँति मुक्तिका हेतु हो सकता है। उक्त प्रकरणमें नचिकेताने प्रश्न करते समय यमराजसे यह बात कही है कि 'स्वर्गलोकमें किंचिन्मात्र भय नहीं है, वहाँ न तो आपका डर है और न बुढ़ापेका ही, भूख और प्यास - इनसे पार होकर यह जीव शोकसे रहित हुआ स्वर्गमें प्रसन्न होता है, उस स्वर्गके देनेवाले अग्निहोत्ररूप कर्मके रहस्यको आप जानते हैं, वह मुझे बताइये' इत्यादि (क० उ० १।१।१२-१३)। इसपर यमराजने वह

सूत्र ४६-४७ ] अध्याय ३ ३५५

सूत्र ४६-४७ ] अध्याय ३ ३५५ अग्निहोत्र-क्रियासम्बन्धी सब रहस्य नचिकेताको समझा दिया (१। १ । १५)। फिर उस अग्निहोत्ररूप कर्मकी स्तुति करते हुए यमराजने कहा है कि 'इस अग्निहोत्रका तीन बार अनुष्ठान करनेवाला जन्म-मृत्युसे तर जाता है और अत्यन्त शान्तिको प्राप्त हो जाता है।' इत्यादि (१। १। १७-१८)। इस प्रकरणको देखते हुए इस अग्निहोत्ररूप कर्मको मुक्तिका कारण माननेमें कोई आपत्ति मालूम नहीं होती। जिस प्रकार इसके पीछे कही हुई ब्रह्मविद्या मुक्तिमें हेतु है, वैसे ही उसके पहले कहा हुआ यह अग्निहोत्ररूप कर्म भी मुक्तिमें हेतु माना जा सकता है। सम्बन्ध— उसी बातको दृढ़ करते हैं— अतिदेशाच्च ॥ ३ । ३ । ४६ ॥ अतिदेशात्=अतिदेशसे अर्थात् विद्याके समान कर्मोंको मुक्तिमें हेतु बताया जानेके कारण; च=भी (ऊपर कही हुई बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—केवल प्रकरणके बलपर ही कर्म मुक्तिमें हेतु सिद्ध होता है, ऐसी बात नहीं है। श्रुतिने विद्याके समान ही कर्मका भी फल बताया है। यथा—'त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू।' (क० उ० १। १। १७) अर्थात् 'यज्ञ, दान और तपरूप तीन कर्मोंको करनेवाला मनुष्य जन्म-मृत्युसे तर जाता है।' इससे भी कर्मोंका मुक्तिमें हेतु होना सिद्ध होता है। सम्बन्ध— पहले दो सूत्रोंमें उठाये हुए पूर्वपक्षका सूत्रकार उत्तर देते हैं— विद्यैव तु निर्धारणात् ॥ ३ । ३ । ४७॥ तु=किंतु; निर्धारणात्=श्रुतियोंद्वारा निश्चितरूपसे कह दिया जानेके कारण; विद्या एव=केवलमात्र ब्रह्मविद्या ही मुक्तिमें कारण है (कर्म नहीं)। व्याख्या—श्रुतिमें कहा है कि 'तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥' अर्थात् 'उस परब्रह्म परमात्माको जानकर ही मनुष्य जन्म-मरणको लाँघ जाता है। परमपद (मोक्ष)-की प्राप्तिके लिये दूसरा कोई मार्ग (उपाय) नहीं है' (श्वेता० उ० ३।८)। इस प्रकार यहाँ

निश्चितरूपसे एकमात्र ब्रह्मज्ञानको ही मुक्तिका कारण बताया गया है; इसलिये ब्रह्मविद्या ही मुक्तिका हेतु है कर्म नहीं। ब्रह्मविद्याका उपदेश देते समय नचिकेतासे स्वयं यमराजने ही कहा है कि— एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति। तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्॥ 'जो सब प्राणियोंका अन्तर्यामी, एक, अद्वितीय तथा सबको अपने वशमें रखनेवाला है, जो अपने एक ही रूपको बहुत प्रकारसे बना लेता है, उस अपने ही हृदयमें स्थित परमेश्वरको जो ज्ञानी देखते हैं, उन्हींको सदा रहनेवाला आनन्द प्राप्त होता है, दूसरोंको नहीं।' (क० उ० २।२। १२)। अतः पहले अग्निविद्याके प्रकरणमें जो जन्म-मृत्युसे छूटना और अत्यन्त शान्तिकी प्राप्तिरूप फल बताया है, वह कथन स्वर्गलोककी स्तुति करनेके लिये गौणरूपसे है, ऐसा समझना चाहिये। सम्बन्ध—उसी बातको दृढ़ करते हैं— दर्शनाच्च ॥ ३ । ३ । ४८ ॥ दर्शनात् = श्रुतिमें जगह-जगह वैसा वर्णन देखा जानेसे; च = भी (यही दृढ़ होता है)। व्याख्या—श्रुतिमें यज्ञादि कर्मोंका फल स्वर्गलोकमें जाकर वापस आना (मु० उ० १।२।९, १०) और ब्रह्मज्ञानका फल जन्म-मरणसे छूटकर परमात्माको प्राप्त हो जाना (मु० उ० ३।२।५, ६) बताया गया है, इससे भी यही सिद्ध होता है कि एकमात्र ब्रह्मविद्या ही मुक्तिमें हेतु है, यज्ञादि कर्म नहीं। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे पूर्वपक्षका उत्तर देते हुए इस प्रकरणको समाप्त करते हैं— श्रुत्यादिबलीयस्त्वाच्च न बाधः ॥ ३।३।४९॥ श्रुत्यादिबलीयस्वात् = प्रकरणकी अपेक्षा श्रुतिप्रमाण और लक्षण आदि

व्याख्या—वेदके अर्थ और भावका निर्णय करनेमें प्रकरणकी

सूत्र ५० ] अध्याय ३ ३५७

बलवान् होनेके कारण; च = भी; बाधः = प्रकरणके द्वारा सिद्धान्तका बाध; न = नहीं हो सकता। व्याख्या—वेदके अर्थ और भावका निर्णय करनेमें प्रकरणकी अपेक्षा श्रुतिका वचन और लक्षण आदि अधिक बलवान् माने जाते हैं, इसलिये प्रकरणसे सिद्ध होनेवाली बातका निराकरण करनेवाले बहुत- से श्रुतिप्रमाण हों तथा उसके विरुद्ध लक्षण भी पाये जायँ तो केवल प्रकरणकी यह सामर्थ्य नहीं है कि वह सिद्धान्तमें बाधा उपस्थित कर सके। इससे यही सिद्ध होता है कि परमात्माका साक्षात् करनेके लिये बताये हुए उपासनादि उपाय अर्थात् ब्रह्मविद्या ही परमात्माकी प्राप्ति और जन्म-मरणसे छूटनेका साधन है, सकाम यज्ञ आदि कर्म नहीं। सम्बन्ध—अब श्रुतिमें बताये हुए ब्रह्मविद्याके फलभेदका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। सभी ब्रह्मविद्याओंका उद्देश्य एकमात्र परब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार करा देना और इस जीवात्माको सदाके लिये सब प्रकारके दुःखोंसे मुक्त कर देना है, फिर किसी विद्याका फल ब्रह्मलोकादिकी प्राप्ति है और किसीका फल इस शरीरमें रहते हुए ही ब्रह्मको प्राप्त हो जाना है—इस प्रकार फलमें भेद क्यों किया गया है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— अनुबन्धादिभ्यः प्रज्ञान्तरपृथक्त्ववद् दृष्टश्च तदुक्तम् ॥ ३।३।५० ॥ अनुबन्धादिभ्यः = भावविषयक अनुबन्ध आदिके भेदसे; प्रज्ञान्तर- पृथक्त्ववत् = उद्देश्यभेदसे की जानेवाली दूसरी उपासनाओंके पार्थक्य (भेद)—की भाँति; च = इसकी भी पृथक्ता है, ऐसा कथन, दृष्टः = उन-उन प्रकरणोंमें देखा गया है; तदुक्तम् = तथा यह पहले भी बताया जा चुका है। व्याख्या—जिस प्रकार उद्देश्यभेदसे की हुई भिन्न-भिन्न देवताओंसे सम्बन्ध रखनेवाली उपासनाओंकी भिन्नता तथा उनका फलभेद होता है, उसी प्रकार इस एक उद्देश्यसे की जानेवाली ब्रह्मविद्यामें भी साधकोंकी भावना

३५८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

३५८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

भिन्न-भिन्न होनेके कारण उपासनाके प्रकारमें और उसके फलमें आंशिक भेद होना स्वाभाविक है। अभिप्राय यह कि सभी साधक एक ही प्रकारका भाव लेकर ब्रह्मप्राप्तिके साधनोंमें नहीं लगते, प्रत्येक साधककी भावनामें भेद रहता है। कोई साधक तो ऐसा होता है जो स्वभावसे ही समस्त भोगोंको दुःखप्रद और परिवर्तनशील समझकर उनसे विरक्त हो जाता है तथा परब्रह्म परमेश्वरके साक्षात्कार होनेमें थोड़ा भी विलम्ब उसके लिये असह्य होता है। कोई साधक ऐसा होता है जो बुद्धिके विचारसे तो भोगोंको दुःखरूप समझता है, इसीलिये साधनमें भी लगा है, परंतु ब्रह्मलोकमें प्राप्त होनेवाले भोग दुःखसे मिले हुए नहीं हैं, वहाँ केवल सुख-ही-सुख है तथा वहाँ जानेके बाद पुनरावृत्ति नहीं होती, सदाके लिये जन्म-मरणसे मुक्ति हो जाती है, इस भावनासे भावित है, परमात्माकी प्राप्ति तत्काल ही हो, ऐसी तीव्र लालसावाला नहीं है। इसी प्रकार साधकोंकी भावना अनेक प्रकारकी हो सकती है तथा उन भावनाओंके और योग्यताके भेदसे उनके अधिकारमें भी भेद होना स्वाभाविक है। इसलिये उन्हें बीचमें प्राप्त होनेवाले फलोंमें भेद होना सम्भव है। जन्म-मरणरूप संसार-बन्धनसे सदाके लिये मुक्ति एवं परब्रह्म पुरुषोत्तमकी प्राप्तिरूप जो चरम फल है, वह तो उन सबको यथासमय प्राप्त होता ही है। साधकके भावानुबन्धसे फलमें भेद होनेकी बात उन-उन प्रकरणोंमें स्पष्टरूपसे उपलब्ध होती है। जैसे इन्द्र और विरोचन ब्रह्माजीसे ब्रह्मविद्या सीखनेके लिये गये। उनकी जो ब्रह्मविद्याके साधनमें प्रवृत्ति हुई उसमें मुख्य कारण यह था जो उन्होंने ब्रह्माजीके मुखसे यह सुना कि उस परमात्माको जान लेनेवाला समस्त लोकोंको और समस्त भोगोंको प्राप्त हो जाता है। इस फलश्रुतिपर ही उनका मुख्य लक्ष्य था, इसीलिये विरोचन तो उस विद्याका अधिकारी न होनेके कारण उसमें टिक ही नहीं सका; परंतु इन्द्रने उस विद्याको ग्रहण किया। फिर भी उसके मनमें प्रधानता उन लोकों और भोगोंकी ही थी, यह वहाँके प्रकरणमें स्पष्ट है (छा० उ० ८। ७। ३)। दहरविद्यामें भी उसी प्रकारसे ब्रह्मलोकके दिव्य भोगोंकी प्रशंसा है

सूत्र ५१ ] अध्याय ३ ३५९

सूत्र ५१ ] अध्याय ३ ३५९ (छा० उ० ८। १। ६)। अतः जिनके भीतर इन फलश्रुतियोंके आधारपर ब्रह्मलोकके भोग प्राप्त करनेका संकल्प है, उनको तत्काल ब्रह्मका साक्षात्कार कैसे हो सकता है? किन्तु जो भोगोंसे सर्वथा विरक्त होकर उस परब्रह्म परमात्माको साक्षात् करनेके लिये तत्पर हैं, उन्हें परमात्माकी प्राप्ति होनेमें विलम्ब नहीं हो सकता। शरीरके रहते-रहते यहीं परमात्माका साक्षात्कार हो जाता है। अतः भावनाके भेदसे भिन्न-भिन्न अधिकारियोंको प्राप्त होनेवाले फलमें भेद होना उचित ही है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे उसी सिद्धान्तको दृढ़ करते हैं— न सामान्यादप्युपलब्धेर्मृत्युवन्न हि लोकापत्तिः ॥ ३ । ३ । ५१ ॥ सामान्यात्=यद्यपि सभी ब्रह्मविद्या समानभावसे मोक्षमें हेतु हैं; अपि=तथापि; न=बीचमें होनेवाले फलभेदका निषेध नहीं है; हि=क्योंकि; उपलब्धेः=परब्रह्म परमेश्वरका साक्षात्कार हो जानेपर; मृत्युवत्=जिस प्रकार मृत्यु होनेपर जीवात्माका स्थूल शरीरसे सम्बन्ध नहीं रहता, उसी प्रकार उसका सूक्ष्म या कारण किसी भी शरीरसे सम्बन्ध नहीं रहता, इसलिये; लोकापत्तिः=किसी भी लोककी प्राप्ति; न=नहीं हो सकती। व्याख्या—सभी ब्रह्मविद्या अन्तमें मुक्ति देनेवाली हैं, इस विषयमें सबकी समानता है तो भी किसीका ब्रह्मलोकमें जाना और किसीका ब्रह्मलोक- में न जाकर यहीं ब्रह्मको प्राप्त हो जाना तथा वहाँ जाकर भी किसीका प्रलयकालतक भोगोंके उपभोगका सुख अनुभव करना और किसीका तत्काल ब्रह्ममें लीन हो जाना—इत्यादिरूपसे जो फल-भेद हैं, वे उन साधकोंके भावसे सम्बन्ध रखते हैं; इसलिये इस भेदका निषेध नहीं हो सकता। अतएव जिस साधकको मृत्युके पहले कभी भी परमात्माका साक्षात्कार हो जाता है, जो उस परमेश्वरके तत्त्वको भलीभाँति जान लेता है, जिसकी ब्रह्मलोकपर्यन्त किसी भी लोकके सुख-भोगमें किंचिन्मात्र भी वासना नहीं रही है, वह किसी भी लोकविशेषमें नहीं जाता, वह तो तत्काल ही उस

३६० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है। (बृह० उ० ४।४।६१ तथा क० उ० २।३।१४२) प्रारब्धभोगके अन्तमें उसके स्थूल, सूक्ष्म और कारण- शरीरोंके तत्त्व उसी प्रकार अपने-अपने कारण-तत्त्वोंमें विलीन हो जाते हैं, जिस प्रकार मृत्युके बाद प्रत्येक मनुष्यके स्थूल-शरीरके तत्त्व पाँचों भूतोंमें विलीन हो जाते हैं (मु० उ० ३।२।७)।३ सम्बन्ध—ऐसा होनेमें क्या प्रमाण है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— परेण च शब्दस्य ताद्विध्यं भूयस्त्वात्त्वनुबन्धः ॥ ३।३।५२ ॥ परेण=बादवाले मन्त्रोंसे (यह सिद्ध होता है); च=तथा; शब्दस्य=उसमें कहे हुए शब्दसमुदायका; ताद्विध्यम्=उसी प्रकारका भाव है; तु=किंतु अन्य साधकोंके; भूयस्त्वात्=दूसरे भावोंकी अधिकतासे; अनुबन्धः=सूक्ष्म और कारण-शरीरसे सम्बन्ध रहता है। (इस कारण वे ब्रह्मलोकमें जाते हैं)। व्याख्या—मुण्डकोपनिषद्में पहले तो यह बात कही गयी है कि— वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः। ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे॥ 'वेदान्तशास्त्रके ज्ञानद्वारा जिन्होंने वेदान्तके अर्थभूत परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका निश्चय कर लिया है, कर्मफलरूप समस्त भोगोंके त्यागरूप योगसे जिनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया है, वे सब साधक मरणकालमें ब्रह्मलोकोंमें जाकर परम अमृतस्वरूप होकर सर्वथा मुक्त हो जाते हैं' (३।२।६)। इसके बाद अगले मन्त्रमें जिनको इस शरीरका नाश होनेसे पहले ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है, उनके विषयमें इस प्रकार कहा है— १-यह मन्त्र सूत्र ३।३।३० की व्याख्यामें आया है। २-यह मन्त्र सूत्र ३।४।५२ की टिप्पणीमें आया है। ३-यह मन्त्र अगले सूत्रकी व्याख्यामें है।

सूत्र ५३ ] अध्याय ३ ३६१

सूत्र ५३ ] अध्याय ३ ३६१ गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु । कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति ॥ ‘उनकी पंद्रह कलाएँ अर्थात् प्राणोंके सहित सब इन्द्रियाँ अपने-अपने देवताओंमें विलीन हो जाती हैं, जीवात्मा और उसके समस्त कर्मसंस्कार— ये सब-के-सब परम अविनाशी परमात्मामें एक हो जाते हैं’ (३।२।७)। फिर नदी और समुद्रका दृष्टान्त देकर बताया है कि ‘तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥’—‘वह ब्रह्मको जाननेवाला विद्वान् नाम- रूपको यहीं छोड़कर परात्पर ब्रह्ममें विलीन हो जाता है’ (३।२।८)। इस प्रकार शुद्ध अन्तःकरणवाले अधिकारियोंके लिये ब्रह्मलोककी प्राप्ति बतानेके बाद साक्षात् ब्रह्मको जान लेनेवाले विद्वान्का यहीं नाम-रूपसे मुक्त होकर परब्रह्ममें विलीन हो जाना सूचित करनेवाले शब्दसमुदाय पूर्वसूत्रमें कही हुई बातको स्पष्ट करते हैं। इसलिये यह सिद्ध होता है कि जिनके अन्तःकरणमें ब्रह्मलोकके महत्त्वका भाव है, वहाँ जानेके संकल्पसे जिनका सूक्ष्म और कारण-शरीरसे सम्बन्ध-विच्छेद नहीं हुआ, ऐसे ही साधक ब्रह्मलोकोंमें जाते हैं। जिनको यहीं ब्रह्मसाक्षात्कार हो जाता है, वे नहीं जाते। यह अवान्तर फल-भेद होना उचित ही है। सम्बन्ध—यहाँतक मुक्तिविषयक फलभेदके प्रकरणको समाप्त करके अब शरीरपातके बाद आत्माकी सत्ता और कर्मफलका भोग न माननेवाले नास्तिकोंके मतका खण्डन करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं— एक आत्मनः शरीरे भावात् ॥ ३।३।५३ ॥ एके=कई एक कहते हैं कि; आत्मनः=आत्माका; शरीरे=शरीर होनेपर ही; भावात्=भाव होनेके कारण (शरीरसे भिन्न आत्माकी सत्ता नहीं है)। व्याख्या—कई एक नास्तिकोंका कहना है कि जबतक शरीर है, तभीतक इसमें चेतन आत्माकी प्रतीति होती है, शरीरके अभावमें आत्मा प्रत्यक्ष नहीं है। इससे यही सिद्ध होता है कि शरीरसे भिन्न आत्मा नहीं है;

सम्बन्ध—इसके उत्तरमें सूत्रकार कहते हैं—

३६२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

अतएव मरनेके बाद आत्मा परलोकमें जाकर कर्मोंका फल भोगता है या ब्रह्मलोकमें जाकर मुक्त हो जाता है, ये सभी बातें असंगत हैं। सम्बन्ध—इसके उत्तरमें सूत्रकार कहते हैं— व्यतिरेकस्तद्भावाभावित्वान्न तूपलब्धिवत् ॥ ३। ३। ५४॥ व्यतिरेकः = शरीरसे आत्मा भिन्न है; तद्भावाभावित्वात् = क्योंकि शरीर रहते हुए भी उसमें आत्मा नहीं रहता, इसलिये; न=आत्मा शरीर नहीं है; तु=किंतु; उपलब्धिवत् = ज्ञातापनकी उपलब्धिके सदृश (आत्माका शरीरसे भिन्न होना सिद्ध होता है)। व्याख्या—शरीर ही आत्मा है, यह बात ठीक नहीं है, किंतु शरीरसे भिन्न, शरीर आदि समस्त भूतों और उनके कार्योंको जाननेवाला आत्मा अवश्य है, क्योंकि मृत्युकालमें शरीर हमारे सामने पड़ा रहता है तो भी उसमें सब पदार्थोंको जाननेवाला चेतन आत्मा नहीं रहता। अतः जिस प्रकार यह प्रत्यक्ष है कि शरीरके रहते हुए भी उसमें जीवात्मा नहीं रहता, उसी प्रकार यह भी मान ही लेना चाहिये कि शरीरके न रहनेपर भी आत्मा रहता है, वह इस स्थूल शरीरमें नहीं तो अन्य (सूक्ष्म) शरीरमें रहता है; परंतु आत्माका अभाव नहीं होता। अतः यह कहना सर्वथा युक्तिविरुद्ध है कि इस स्थूल शरीरसे भिन्न आत्मा नहीं है। यदि इस शरीरसे भिन्न चेतन आत्मा नहीं होता तो वह अपने और दूसरोंके शरीरोंको नहीं जान सकता; क्योंकि घटादि जड पदार्थोंमें एक-दूसरेको या अपने-आपको जाननेकी शक्ति नहीं है। जिस प्रकार सबका ज्ञाता होनेके कारण ज्ञातारूपमें आत्माकी उपलब्धि प्रत्यक्ष है, उसी प्रकार शरीरका ज्ञाता होनेके कारण इस ज्ञेय शरीरसे उसका भिन्न होना भी प्रत्यक्ष है। सम्बन्ध—प्रसंगवश प्राप्त हुए नास्तिकवादका संक्षेपमें खण्डन करके, अब पुनः भिन्न-भिन्न श्रुतियोंपर विचार करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। जिज्ञासा यह है कि भिन्न-भिन्न शाखाओंमें यज्ञोंके उद्गीथ

सूत्र ५५-५६ ] अध्याय ३ ३६३ आदि अंगोंमें भेद है, अतः यज्ञादिके अंगोंसे सम्बन्ध रखनेवाली उपासना एक शाखामें कहे हुए प्रकारसे दूसरी शाखावालोंको करनी चाहिये या नहीं, इसपर कहते हैं— अङ्गावबद्धास्तु न शाखासु हि प्रतिवेदम्॥ ३।३।५५॥ अंगावबद्धाः=यज्ञके उद्गीथ आदि अंगोंसे सम्बद्ध उपासनाएँ; शाखासु हि=जिस शाखामें कही गयी हों, उसीमें करनेयोग्य हैं; न=ऐसी बात नहीं है; तु=किंतु; प्रतिवेदम्=प्रत्येक वेदकी शाखावाले उसका अनुष्ठान कर सकते हैं। व्याख्या—'ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत'—'ॐ इस एक अक्षरकी उद्गीथके रूपमें उपासना करनी चाहिये' (छा० उ० १।१।१), 'लोकेषु पञ्चविधँ सामोपासीत'—'पाँच प्रकारके सामकी लोकोंके साथ सम्बन्ध जोड़कर उपासना करनी चाहिये' (छा० उ० २।२।१)। इत्यादि प्रकारसे यज्ञादिके अंगरूप उद्गीथ आदिसे सम्बन्ध रखनेवाली जो प्रतीकोपासना बतायी गयी है, उसका जिस शाखामें वर्णन है, उसी शाखावालोंको उसका अनुष्ठान करना चाहिये, अन्य शाखावालोंको नहीं करना चाहिये, ऐसी बात नहीं है; अपितु प्रत्येक वेदकी शाखाके अनुयायी उसका अनुष्ठान कर सकते हैं। सम्बन्ध—इसी बातको उदाहरणसे स्पष्ट करते हैं— मन्त्रादिवद्वाविरोधः ॥ ३।३।५६॥ वा=अथवा यों समझो कि; मन्त्रादिवत्=मन्त्र आदिकी भाँति; अविरोधः=इसमें कोई विरोध नहीं है। व्याख्या—जिस प्रकार एक शाखामें बताये हुए मन्त्र और यज्ञोपयोगी अन्य पदार्थ, दूसरी शाखावाले भी आवश्यकतानुसार व्यवहारमें ला सकते हैं, उसमें किसी प्रकारका विरोध नहीं है; उसी प्रकार पूर्वसूत्रमें कही हुई यज्ञांगोंसे सम्बन्ध रखनेवाली उपासनाओंके अनुष्ठानमें भी कोई विरोध नहीं है।

३६४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

३६४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सम्बन्ध- जिस प्रकार वैश्वानरविद्यामें एक-एक अंगकी उपासनाका वर्णन आता है, उसी प्रकार और भी कई जगह आता है, ऐसी उपासनाओंमें उनके एक-एक अंगकी अलग-अलग उपासना करनी चाहिये या सब अंगोंका समुच्चय करके एक साथ सबकी उपासना करनी चाहिये। इस जिज्ञासापर कहते हैं- भूम्नः क्रतुवज्ज्यायस्त्वं तथा हि दर्शयति ॥ ३।३।५७॥ क्रतुवत्=अंग-उपांगसे परिपूर्ण यज्ञकी भाँति; भूम्नः = पूर्ण उपासनाकी; ज्यायस्त्वम् = श्रेष्ठता है; हि = क्योंकि; तथा = वैसा ही कथन; दर्शयति = श्रुति दिखलाती है। व्याख्या-जिस प्रकार यज्ञके किसी अंशका अनुष्ठान करना और किसीका न करना श्रेष्ठ नहीं है, किंतु सर्वांगपूर्ण अनुष्ठान ही श्रेष्ठ है, उसी प्रकार वैश्वानरविद्या आदिमें बतायी हुई उपासनाका अनुष्ठान भी पूर्णरूपसे करना ही श्रेष्ठ है; उसके एक अंगका नहीं। वैश्वानरविद्याकी भाँति सभी जगह यह बात समझ लेनी चाहिये; क्योंकि श्रुतिने वैसा ही भाव वैश्वानर- विद्याके वर्णनमें दिखाया है। राजा अश्वपतिने प्राचीनशाल आदि छहों ऋषियोंसे अलग-अलग पूछा कि 'तुम वैश्वानरकी किस प्रकार उपासना करते हो?' उन्होंने अपनी-अपनी बात कही। राजाने एक-एक करके सबको बताया- 'तुम अमुक अंगकी उपासना करते हो।' साथ ही उन्होंने उस एकांग उपासनाका साधारण फल बताया और उन सबको भय दिखाते हुए कहा, 'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा सिर गिर जाता, तुम अंधे हो जाते'-इत्यादि (छा० उ० ५।११ से १७ तक)। तदनन्तर (अठारहवें खण्डमें) यह बताया कि 'तुमलोग उस वैश्वानर परमात्माके एक-एक अंगकी उपासना करते हो, जो इस बातको समझकर आत्मरूपसे इसकी उपासना करता है, वह समस्त लोकमें, समस्त प्राणियोंमें और समस्त आत्माओंमें अन्न भक्षण करनेवाला हो जाता है।' (छा० उ० ५।१८।१) इस प्रकार वहाँ पूर्ण

सूत्र ५८-५९ ] अध्याय ३ ३६५

सूत्र ५८-५९ ] अध्याय ३ ३६५ उपासनाका अधिक फल बताया गया है। इसलिये यही सिद्ध होता है कि एक-एक अंगकी उपासनाकी अपेक्षा पूर्ण उपासना श्रेष्ठ है। अतः पूर्ण उपासनाका ही अनुष्ठान करना चाहिये। सम्बन्ध — नाना प्रकारसे बतायी हुई ब्रह्मविद्या भिन्न-भिन्न है कि एक ही है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— नाना शब्दादिभेदात् ॥ ३।३।५८ ॥ शब्दादिभेदात् = शब्द आदिका भेद होनेके कारण; नाना = सब विद्याएँ अलग-अलग हैं। व्याख्या — सद्विद्या, भूमविद्या, दहरविद्या, उपकोसलविद्या, शाण्डिल्यविद्या, वैश्वानरविद्या, आनन्दमयविद्या, अक्षरविद्या इत्यादि भिन्न-भिन्न नाम और विधि-विधानवाली इन विद्याओंमें नाम और प्रकार आदिका भेद है। किसी अधिकारीके लिये एक विद्या उपयुक्त होती है, तो अन्यके लिये दूसरी ही उपयुक्त होती है; इसलिये सबका फल एक ब्रह्मकी प्राप्ति होनेपर भी एक नहीं है, भिन्न-भिन्न है। सम्बन्ध — इन सबके समुच्चयका विधान है या विकल्पका अर्थात् इन सबको मिलाकर अनुष्ठान करना चाहिये या एक-एकका अलग-अलग ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— विकल्पोऽविशिष्टफलत्वात् ॥ ३।३।५९ ॥ अविशिष्टफलत्वात् = सब विद्याओंका एक ही फल है, फलमें भेद नहीं है, इसलिये; विकल्पः = अलग-अलग अनुष्ठान करना ही उचित है। व्याख्या — जिस प्रकार स्वर्गादिकी प्राप्तिके साधनभूत जो भिन्न- भिन्न यज्ञ-याग आदि बताये गये हैं, उनमेंसे जिन-जिनका फल एक है, उनका समुच्चय नहीं होता। यजमान अपने इच्छानुसार उनमेंसे किसी भी एक यज्ञका अनुष्ठान कर सकता है। इसी प्रकार उपर्युक्त विद्याओंका ब्रह्मसाक्षात्काररूप एक ही फल होनेके कारण उनके समुच्चयकी

आवश्यकता नहीं है। साधक अपनी रुचिके अनुकूल किसी एक विद्याके अनुसार ही साधन कर सकता है। सम्बन्ध— जो सकाम उपासनाएँ अलग-अलग फलके लिये बतायी गयी हैं; उनका अनुष्ठान किस प्रकार करना चाहिये? इस जिज्ञासापर कहते हैं— काम्यास्तु यथाकामं समुच्चीयेरन्न वा पूर्व- हेत्वभावात् ॥ ३।३।६० ॥ काम्याः=सकाम उपासनाओंका अनुष्ठान; तु=तो; यथाकामम्=अपनी- अपनी कामनाके अनुसार; समुच्चीयेरन्=समुच्चय करके किया करें; वा=अथवा; न=समुच्चय न करके अलग-अलग करें; पूर्वहेत्वभावात्= क्योंकि इनमें पूर्वोक्त हेतु (फलकी समानता)-का अभाव है। व्याख्या—सकाम उपासनाओंमें सबका एक फल नहीं बताया गया है, भिन्न-भिन्न उपासनाका भिन्न-भिन्न फल कहा गया है, इस प्रकार पूर्वोक्त हेतु न होनेके कारण सकाम उपासनाका अनुष्ठान अधिकारी अपनी कामनाके अनुसार जिस प्रकार आवश्यक समझे, कर सकता है। जिन-जिन भोगोंकी कामना हो, उन-उनके लिये बतायी हुई सब उपासनाओंका समुच्चय करके भी कर सकता है और अलग-अलग भी कर सकता है, इसमें कोई अड़चन नहीं है। सम्बन्ध— अब उद्गीथ आदि अंगोंमें की जानेवाली उपासनाके विषयमें विचार करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। पहले चार सूत्रोंद्वारा पूर्वपक्षकी उत्थापना की जाती है— अङ्गेषु यथाश्रयभावः ॥ ३।३।६१॥ अङ्गेषु=भिन्न-भिन्न अंगोंमें (की जानेवाली उपासनाओंका); यथाश्रय- भावः=यथाश्रयभाव है अर्थात् जो उपासना जिस अंगके आश्रित है, उस अंगके अनुसार ही उस उपासनाका भी भाव समझ लेना चाहिये।

सूत्र ६२–६४] अध्याय ३ ३६७

सूत्र ६२–६४] अध्याय ३ ३६७ व्याख्या—यज्ञकर्मके अंगभूत उद्गीथ आदिमें की जानेवाली जो उपासनाएँ हैं, जिनका दिग्दर्शन पचपनवें सूत्रमें किया गया है, उनमेंसे जो उपासना जिस अंगके आश्रित है, उस आश्रयके अनुसार ही उसकी व्यवस्था करनी चाहिये। इसलिये यही सिद्ध होता है कि जिन-जिन कर्मोंके अंगोंका समुच्चय हो सकता है, उन-उन अंगोंमें की जानेवाली उपासनाओंका भी उन कर्मोंके साथ समुच्चय हो सकता है। सम्बन्ध—इसके सिवा— शिष्टेश्च ॥ ३। ३। ६२ ॥ शिष्टेः = श्रुतिके शासन (विधान)-से; च = भी (यही सिद्ध होता है)। व्याख्या—जिस प्रकार उद्गीथ आदि स्तोत्रोंके समुच्चयका श्रुतिमें विधान है, उसी प्रकार उनके आश्रित उपासनाओंके समुच्चयका विधान भी उनके साथ ही हो जाता है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि कर्मोंके अंगोंके अनुसार उनके आश्रित रहनेवाली उपासनाओंका समुच्चय हो सकता है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे उसी बातको दृढ़ करते हैं— समाहारात् ॥ ३ । ३ । ६३ ॥ समाहारात् = कर्मोंका समाहार बताया गया है, इसलिये उनके आश्रित उपासनाओंका भी समाहार (समुच्चय) उचित ही है। व्याख्या—उद्गीथ उपासनामें कहा है कि 'स्तोत्रगान करनेवाला पुरुष होताके कर्ममें जो स्तोत्रसम्बन्धी त्रुटि हो जाती है, उसका भी संशोधन कर लेता है' (छा० उ० १।५।५)। इस प्रकार प्रणव और उद्गीथकी एकता समझकर उद्गान करनेका महत्त्व दिखाया है। इस समाहारसे भी अंगाश्रित उपासनाका समुच्चय सूचित होता है। सम्बन्ध—पुनः उसी बातको दृढ़ करते हैं— गुणसाधारण्यश्रुतेश्च ॥ ३ । ३ । ६४ ॥ गुणसाधारण्यश्रुतेः=गुणोंकी साधारणता बतानेवाली श्रुतिसे; च=भी (यही बात सिद्ध होती है)।

३६८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

३६८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ व्याख्या-उपासनाका गुण जो ॐकार है, उसका प्रयोग समान भावसे दिखाया है। जैसे कहा है कि 'उस (ॐ) अक्षरसे ही यह त्रयीविद्या (तीनों वेदोंसे सम्बन्ध रखनेवाली यज्ञादि कर्मसम्बन्धी विद्या) प्रवृत्त होती है, ॐ ऐसा कहकर ही आश्रावण कर्म करता है, ॐ ऐसा कहकर होता (कथन) करता है, ॐ ऐसा कहकर ही उद्गाता स्तोत्रगान करता है।' (छा० उ० १।१।९) इसी प्रकार कर्मांग-सम्बन्धी गुण जो कि उद्गीथ आदि हैं, उनका भी समान भावसे प्रयोग श्रुतिमें विहित है। इसलिये भी उपासनाओंका उनके आश्रयभूत कर्मांगोंके साथ समुच्चय होना उचित सिद्ध होता है। सम्बन्ध - इस प्रकार चार सूत्रोंद्वारा पूर्वपक्षकी उत्थापना करके अब दो सूत्रोंमें उसका उत्तर देकर इस पादकी समाप्ति की जाती है- न वा तत्सहभावाश्रुतेः ॥ ३।३।६५ ॥ वा = किंतु; तत्सहभावाश्रुतेः = उन-उन उपासनाओंका समुच्चय बतानेवाली श्रुति नहीं है, इसलिये; न= उपासनाओंका समुच्चय सिद्ध नहीं हो सकता। व्याख्या-उन-उन उपासनाओंके आश्रयभूत जो उद्गीथ आदि अंग हैं, उन अंगोंके समाहारकी भाँति उनके साथ उपासनाओंका समाहार बतानेवाली कोई श्रुति नहीं है, इसलिये यह सिद्ध नहीं हो सकता कि उन-उन आश्रयोंके समुच्चयकी भाँति ही उपासनाओंका भी समुच्चय होना चाहिये; क्योंकि उपासनाओंका उद्देश्य भिन्न है, जिस उद्देश्यसे जिस फलके लिये यज्ञादि कर्म किये जाते हैं, उनके अंगोंमें की जानेवाली उपासना उनसे भिन्न उद्देश्यसे की जाती है, अतः अंगोंके साथ उपासनाके समुच्चयका सम्बन्ध नहीं है। इसलिये यही सिद्ध होता है कि उपासनाओंका समुच्चय नहीं बन सकता, उनका अनुष्ठान अलग-अलग ही करना चाहिये। सम्बन्ध - प्रकारान्तरसे इसी सिद्धान्तको दृढ़ करते हैं-