भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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पृष्ठ 364

सूत्र ५३ ] अध्याय ३ ३६१ गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु । कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति ॥ ‘उनकी पंद्रह कलाएँ अर्थात् प्राणोंके सहित सब इन्द्रियाँ अपने-अपने देवताओंमें विलीन हो जाती हैं, जीवात्मा और उसके समस्त कर्मसंस्कार— ये सब-के-सब परम अविनाशी परमात्मामें एक हो जाते हैं’ (३।२।७)। फिर नदी और समुद्रका दृष्टान्त देकर बताया है कि ‘तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥’—‘वह ब्रह्मको जाननेवाला विद्वान् नाम- रूपको यहीं छोड़कर परात्पर ब्रह्ममें विलीन हो जाता है’ (३।२।८)। इस प्रकार शुद्ध अन्तःकरणवाले अधिकारियोंके लिये ब्रह्मलोककी प्राप्ति बतानेके बाद साक्षात् ब्रह्मको जान लेनेवाले विद्वान्का यहीं नाम-रूपसे मुक्त होकर परब्रह्ममें विलीन हो जाना सूचित करनेवाले शब्दसमुदाय पूर्वसूत्रमें कही हुई बातको स्पष्ट करते हैं। इसलिये यह सिद्ध होता है कि जिनके अन्तःकरणमें ब्रह्मलोकके महत्त्वका भाव है, वहाँ जानेके संकल्पसे जिनका सूक्ष्म और कारण-शरीरसे सम्बन्ध-विच्छेद नहीं हुआ, ऐसे ही साधक ब्रह्मलोकोंमें जाते हैं। जिनको यहीं ब्रह्मसाक्षात्कार हो जाता है, वे नहीं जाते। यह अवान्तर फल-भेद होना उचित ही है। सम्बन्ध—यहाँतक मुक्तिविषयक फलभेदके प्रकरणको समाप्त करके अब शरीरपातके बाद आत्माकी सत्ता और कर्मफलका भोग न माननेवाले नास्तिकोंके मतका खण्डन करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं— एक आत्मनः शरीरे भावात् ॥ ३।३।५३ ॥ एके=कई एक कहते हैं कि; आत्मनः=आत्माका; शरीरे=शरीर होनेपर ही; भावात्=भाव होनेके कारण (शरीरसे भिन्न आत्माकी सत्ता नहीं है)। व्याख्या—कई एक नास्तिकोंका कहना है कि जबतक शरीर है, तभीतक इसमें चेतन आत्माकी प्रतीति होती है, शरीरके अभावमें आत्मा प्रत्यक्ष नहीं है। इससे यही सिद्ध होता है कि शरीरसे भिन्न आत्मा नहीं है;