वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
अतएव मरनेके बाद आत्मा परलोकमें जाकर कर्मोंका फल भोगता है या ब्रह्मलोकमें जाकर मुक्त हो जाता है, ये सभी बातें असंगत हैं। सम्बन्ध—इसके उत्तरमें सूत्रकार कहते हैं— व्यतिरेकस्तद्भावाभावित्वान्न तूपलब्धिवत् ॥ ३। ३। ५४॥ व्यतिरेकः = शरीरसे आत्मा भिन्न है; तद्भावाभावित्वात् = क्योंकि शरीर रहते हुए भी उसमें आत्मा नहीं रहता, इसलिये; न=आत्मा शरीर नहीं है; तु=किंतु; उपलब्धिवत् = ज्ञातापनकी उपलब्धिके सदृश (आत्माका शरीरसे भिन्न होना सिद्ध होता है)। व्याख्या—शरीर ही आत्मा है, यह बात ठीक नहीं है, किंतु शरीरसे भिन्न, शरीर आदि समस्त भूतों और उनके कार्योंको जाननेवाला आत्मा अवश्य है, क्योंकि मृत्युकालमें शरीर हमारे सामने पड़ा रहता है तो भी उसमें सब पदार्थोंको जाननेवाला चेतन आत्मा नहीं रहता। अतः जिस प्रकार यह प्रत्यक्ष है कि शरीरके रहते हुए भी उसमें जीवात्मा नहीं रहता, उसी प्रकार यह भी मान ही लेना चाहिये कि शरीरके न रहनेपर भी आत्मा रहता है, वह इस स्थूल शरीरमें नहीं तो अन्य (सूक्ष्म) शरीरमें रहता है; परंतु आत्माका अभाव नहीं होता। अतः यह कहना सर्वथा युक्तिविरुद्ध है कि इस स्थूल शरीरसे भिन्न आत्मा नहीं है। यदि इस शरीरसे भिन्न चेतन आत्मा नहीं होता तो वह अपने और दूसरोंके शरीरोंको नहीं जान सकता; क्योंकि घटादि जड पदार्थोंमें एक-दूसरेको या अपने-आपको जाननेकी शक्ति नहीं है। जिस प्रकार सबका ज्ञाता होनेके कारण ज्ञातारूपमें आत्माकी उपलब्धि प्रत्यक्ष है, उसी प्रकार शरीरका ज्ञाता होनेके कारण इस ज्ञेय शरीरसे उसका भिन्न होना भी प्रत्यक्ष है। सम्बन्ध—प्रसंगवश प्राप्त हुए नास्तिकवादका संक्षेपमें खण्डन करके, अब पुनः भिन्न-भिन्न श्रुतियोंपर विचार करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। जिज्ञासा यह है कि भिन्न-भिन्न शाखाओंमें यज्ञोंके उद्गीथ