वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
सूत्र ३४ ] अध्याय ३ ३४३
सूत्र ३४ ] अध्याय ३ ३४३ लक्ष्य करानेवाले भाव हैं; औपसदवत्=अतः 'उपसत्' कर्मसम्बन्धी मन्त्रोंकी भाँति; तदुक्तम्=उनका अध्याहार कर लेना उचित है, यह बात कही गयी है। व्याख्या—बृहदारण्यकमें याज्ञवल्क्यने कहा है कि 'हे गार्गि! जिसको तुम पूछ रही हो, उस तत्त्वको ब्रह्मवेत्तालोग अक्षर कहते हैं अर्थात् निर्गुण- निराकार अविनाशी ब्रह्म बतलाते हैं। वह न मोटा है, न पतला है, न छोटा है, न बड़ा है' इत्यादि (बृह० उ० ३।८।८)। इस प्रकार वहाँ ब्रह्मको इन सब पदार्थोंसे, इन्द्रियोंसे और शरीरधारी जीवोंसे अत्यन्त विलक्षण बतलाया गया है। तथा मुण्डकोपनिषद्में अंगिरा ऋषिने शौनकसे कहा है कि 'वह परा विद्या है, जिससे उस अक्षर (परब्रह्म परमात्मा)-की प्राप्ति होती है, जो जानने और पकड़नेमें आनेवाला नहीं है, जो गोत्र, वर्ण, आँख, कान, पैर आदिसे रहित है, किंतु सर्वव्यापी, अतिसूक्ष्म, विनाशरहित और समस्त प्राणियोंका कारण है, उसको ज्ञानी पुरुष सब ओरसे देखते हैं (मु० उ० १। १। ५, ६)। इस प्रकार वेदमें उस अक्षरब्रह्मके जो विशेषण बतलाये गये हैं, उनको ब्रह्मके वर्णनमें सभी जगह ग्रहण कर लेना चाहिये; क्योंकि ब्रह्मके सविशेष और निर्विशेष सभी लक्षण समान हैं तथा सभी उसीके भाव हैं अर्थात् उस ब्रह्मके स्वरूपका लक्ष्य करानेके लिये ही कहे हुए भाव हैं, इसलिये 'उपसत्' कर्मसम्बन्धी मन्त्रोंकी भाँति उनका अध्याहार कर लेना उचित है। यह बात कही गयी है। सम्बन्ध—'मुण्डक (३।१।१) और श्वेताश्वतर (४।६)-में तो पक्षीके दृष्टान्तसे जीव और ईश्वरको मनुष्यके हृदयमें स्थित बतलाया है और कठोपनिषद्में छाया तथा धूपकी भाँति ईश्वर और जीवको मनुष्यके हृदयमें स्थित बतलाया है; इन श्रुतियोंमें जिस विद्या अथवा विज्ञानका वर्णन है, वह एक-दूसरेसे भिन्न है या अभिन्न?' इस जिज्ञासापर कहते हैं— इयदामननात् ॥ ३। ३। ३४॥ (उक्त तीनों मन्त्रोंमें एक ही ब्रह्मविद्याका वर्णन है) इयदामननात्= क्योंकि सभी जगह इयत्ता (इतनापन)-का वर्णन समान है।
३४४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
३४४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ व्याख्या—मुण्डक और श्वेताश्वतरमें जो कहा है कि 'एक साथ रहकर परस्पर सखाभाव रखनेवाले दो पक्षी (जीवात्मा और परमात्मा) एक ही शरीररूप वृक्षका आश्रय लेकर रहते हैं, उन दोनोंमेंसे एक तो कर्मफलरूप सुख-दुःखोंको भोगता है और दूसरा न खाता हुआ केवल देखता रहता है।१ इस प्रकार यह जीव शरीरकी आसक्तिमें निमग्न होकर असमर्थताके कारण मोहित हो चिन्ता करता रहता है। यदि यह भक्तोंद्वारा सेवित अपने पास रहनेवाले सखा परमेश्वरको और उसकी विचित्र महिमाको देख ले तो तत्काल ही शोकरहित हो जाय।'२ तथा कठोपनिषद्में कहा है कि 'मनुष्य-शरीरमें परब्रह्मके उत्तम निवासस्थान हृदयगुहामें छिपे हुए और अपने सत्यस्वरूपका अनुभव करनेवाले (जीव और ईश्वर) दोनों हैं, जो कि छाया और धूपकी भाँति भिन्न स्वभाववाले हैं। ऐसा ब्रह्मवेत्ता कहते हैं।' (क० उ० १।३।१)३ इन सभी स्थलोंमें द्विवचनान्त शब्दोंका प्रयोग करके जीव और ईश्वरको परिच्छिन्न स्थल— हृदयमें स्थित बताया गया है। इससे सिद्ध होता है कि तीनों जगह कही हुई विद्या एक है। इसी प्रकार जहाँ-जहाँ उस परब्रह्म परमेश्वरको प्राणियोंके हृदयमें स्थित बताया गया है, उन सब स्थलोंमें वर्णित विद्याकी भी एकता समझ लेनी चाहिये। सम्बन्ध—अब परमात्माको सर्वान्तर्यामी बतलानेवाली श्रुतियोंपर विचार आरम्भ करते हैं— अन्तरा भूतग्रामवत्स्वात्मनः ॥ ३।३।३५ ॥ भूतग्रामवत्=आकाशादि भूतसमुदायकी भाँति (वह परमात्मा); स्वात्मनः=साधकके अपने आत्माका भी; अन्तरा=अन्तरात्मा (अन्तर्यामी है); (आमननात्)=क्योंकि यही बात अन्य श्रुतिमें कही गयी है। १-यह मन्त्र सूत्र १। ३। ७ की व्याख्यामें आया है। २-यह मन्त्र सूत्र १। २। २२ की व्याख्यामें आया है। ३-यह मन्त्र सूत्र १। २। ११ की व्याख्यामें आया है।
सूत्र ३५ ] अध्याय ३ ३४५
सूत्र ३५ ] अध्याय ३ ३४५ व्याख्या—राजा जनककी सभामें याज्ञवल्क्यसे चक्रायणके पुत्र उषस्तने कहा कि 'जो अपरोक्ष ब्रह्म है, जो सबका अन्तरात्मा है, उसको मुझे समझाइये।' तब याज्ञवल्क्यने कहा—'जो तेरा अन्तरात्मा है, वही सबका है।' उसके पुनः जिज्ञासा करनेपर याज्ञवल्क्यने विस्तारसे समझाया कि 'जो प्राणके द्वारा सबको प्राणक्रियासम्पन्न करता है।' आदि। उसके बाद उषस्तके पुनः पूछनेपर बताया कि 'दृष्टिके द्रष्टाको देखा नहीं जा सकता, श्रुतिके श्रोताको सुना नहीं जा सकता, मतिके मन्ताको मनन नहीं किया जा सकता, विज्ञातिके विज्ञाताको जाना नहीं जा सकता, यह तेरा अन्तरात्मा ही सबका अन्तरात्मा है' (बृह० उ० ३।४।१, २)। फिर कहोल ऋषिने भी वही बात पूछी कि 'जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है, जो सबका अन्तरात्मा है, उसको मुझे समझावें।' याज्ञवल्क्यने उत्तरमें कहा कि 'जो तेरा अन्तरात्मा है, वही सबका अन्तरात्मा है। जो भूख, प्यास, शोक, मोह, बुढ़ापा और मृत्यु सबसे अतीत है' इत्यादि (बृह० उ० ३।५।१)। इन दोनों प्रकरणोंको दृष्टिमें रखकर इस तरहके सभी प्रकरणोंका एक साथ निर्णय करते हैं। यहाँ यह प्रश्न उठता है कि 'इसमें जो अन्तरात्मा बतलाया गया है, वह जीवात्मा है या परमात्मा ? यदि परमात्मा है तो किस प्रकार ?' इसका उत्तर देते हुए सूत्रकार कहते हैं—जिस प्रकार भूतसमुदायमें पृथिवीका अन्तरात्मा जल है, जलका तेज है, तेजका वायु है और वायुका भी आकाश है। अतः सबका अन्तरात्मा आकाश है। उसी प्रकार समस्त जड तत्त्वोंका अन्तरात्मा जीवात्मा है और जो अपने-आप का अर्थात् जीवात्माका भी अन्तरात्मा है, वह सबका अन्तरात्मा है; क्योंकि अन्य श्रुतिमें यही बात कही गयी है। अर्थात् उसी प्रकरणके सातवें ब्राह्मणमें उद्दालकके प्रश्नका उत्तर देते हुए याज्ञवल्क्यने उस परब्रह्म परमात्माको पृथिवी आदि समस्त भूतसमुदायका अन्तर्यामी बतलाते हुए
३४६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
३४६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ अन्तमें विज्ञानात्मा अर्थात् जीवात्माका भी अन्तर्यामी उसीको बतलाया है तथा प्रत्येक वाक्यके अन्तमें कहा है कि 'यही तेरा अन्तर्यामी अमृतस्वरूप आत्मा है।'१ श्वेताश्वतरमें भी कहा गया है कि 'सब प्राणियोंमें छिपा हुआ वह एक देव सर्वव्यापी और समस्त प्राणियोंका अन्तरात्मा है, वह सबके कर्मोंका अधिष्ठाता, सबका निवासस्थान, सबका साक्षी, सर्वथा विशुद्ध और गुणातीत है।'२ (श्वेता० उ० ६।११) इसलिये यही सिद्ध होता है कि सबका अन्तरात्मा वह परब्रह्म पुरुषोत्तम ही है। जीवात्मा सबका अन्तरात्मा नहीं हो सकता। सम्बन्ध—अब कही हुई बातमें शंका उठाकर उसका उत्तर देते हैं— अन्यथाभेदानुपपत्तिरिति चेन्नोपदेशान्तरवत् ॥ ३। ३। ३६ ॥ चेत्=यदि कहो कि; अन्यथा=दूसरे प्रकारसे; अभेदानुपपत्तिः=अभेदकी सिद्धि नहीं होगी, इसलिये (उक्त प्रकरणमें जीवात्मा और परमात्माका अभेद मानना ही उचित है); इति न=तो यह ठीक नहीं; उपदेशान्तरवत्=क्योंकि दूसरे उपदेशकी भाँति अभेदकी सिद्धि हो जायगी। व्याख्या—यदि कहो कि उक्त वर्णनके अनुसार जीवात्मा और परमात्माके भेदको उपाधिकृत न मानकर वास्तविक मान लेनेपर अभेदकी सिद्धि नहीं होगी तो ऐसी बात नहीं है। दूसरी जगहके उपदेशकी भाँति यहाँ भी अभेदकी सिद्धि हो जायगी। अर्थात् जिस प्रकार दूसरी जगह कार्यकारणभावके अभिप्रायसे परब्रह्म परमेश्वरकी जड-प्रपंच और जीवात्माके साथ एकता करके उपदेश दिया गया है, उसी प्रकार प्रत्येक स्थानमें अभेदकी सिद्धि हो जायगी। भाव यह कि श्वेतकेतुको उसके पिताने मिट्टी, लोहा और सोनेके १-यह मन्त्र सूत्र १।२।२० की टिप्पणीमें आया है तथा इसका विस्तार सूत्र १।२।१८ और १९ की व्याख्यामें भी देखना चाहिये। २-यह मन्त्र सूत्र १।१।२ की टिप्पणीमें आया है।
सूत्र ३७ ] अध्याय ३ ३४७
सूत्र ३७ ] अध्याय ३ ३४७ अंशद्वारा कार्यकारणकी एकता समझायी, उसके बाद (छा० उ० ६।८।७ से ६। १६। ३ तक) नौ बार पृथक्-पृथक् दृष्टान्त देकर प्रत्येकके अन्तमें यह बात कही है कि 'स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदँ सर्वं तत्सत्यँ स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो' 'यह जो अणिमा अर्थात् अत्यन्त सूक्ष्म परमात्मा है, इसीका स्वरूप यह समस्त जगत् है, वही सत्य है; वह आत्मा है और वह तू है अर्थात् कार्य और कारणकी भाँति तेरी और उसकी एकता है।' उसी प्रकार सब जगह समझ लेना चाहिये। सम्बन्ध - यदि परमात्मा और जीवात्माका उपाधिकृत भेद और वास्तविक अभेद मान लिया जाय तो क्या हानि है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं- व्यतिहारो विशिंषन्ति हीतरवत् ॥ ३।३।३७॥ व्यतिहारः = परस्पर व्यत्यय करके अभेदका वर्णन है, इसलिये उपाधिकृत भेद सिद्ध नहीं होता; हि= क्योंकि; इतरवत् = सभी श्रुतियाँ दूसरेकी भाँति; विशिंषन्ति = विशेषण देकर वर्णन करती हैं। व्याख्या - परमात्माके साथ जीवात्माकी एकताका प्रतिपादन करते हुए श्रुतिने कहा है कि 'तद् योऽहं सोऽसौ योऽसौ सोऽहम्।' अर्थात् 'जो मैं हूँ सो वह है और जो वह है सो मैं हूँ' (ऐ० आ० २।४।३) तथा 'त्वं वाहमस्मि भगवो देवतेऽहं वै त्वमसि' (वराहोपनिषद् २। ३४) अर्थात् 'हे भगवन् ! हे देव ! निश्चय ही 'तुम' मैं हूँ और 'मैं' तुम हो।' इस प्रकार व्यतिहारपूर्वक अर्थात् एकमें दूसरेके धर्मोंका विनिमय करते हुए एकताका प्रतिपादन किया गया है। ऐसा वर्णन उन्हीं स्थलोंपर किया जाता है, जहाँ इतर वस्तुकी भाँति वास्तवमें भेद होते हुए भी प्रकारान्तरसे अभेद बतलाना अभीष्ट हो। जैसा कि दूसरी जगह श्रुतिमें देखा जाता है- 'अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथः।' (छा० उ० १।५।१) अर्थात् 'निश्चय ही जो उद्गीथ है, वह प्रणव है और जो प्रणव है, वह उद्गीथ है।' उद्गीथ और प्रणवमें भेद होते हुए भी यहाँ उपासनाके लिये श्रुतिने व्यतिहारवाक्यद्वारा
३४८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
३४८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ दोनोंकी एकताका प्रतिपादन किया है। इसी प्रकार यहाँ भी उपासनाके लिये परमात्माके साथ जीवात्माकी एकता बतायी गयी है, ऐसा समझना चाहिये। जहाँ उपाधिकृत भेद होता है, वहाँ ऐसा कथन संगत नहीं होता। यहाँ इस एकताके प्रतिपादनका प्रयोजन यही जान पड़ता है कि उपासक यदि उपासना- कालमें अपनेको परमात्माकी भाँति देह और उसके व्यवहारसे सर्वथा असंग तथा नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त समझकर तद्रूप हो ध्यान करे तो वह शीघ्र ही सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है। सम्बन्ध—पुनः प्रकारान्तरसे औपाधिक भेदकी मान्यताका निराकरण करते हैं— सैव हि सत्यादयः ॥ ३।३।३८॥ सा एव=(परमात्मा और जीवका औपाधिक भेद तथा वास्तवमें अत्यन्त अभेद माननेपर) वही अनुपपत्ति है; हि=क्योंकि; सत्यादयः=(परमात्माके) सत्यसंकल्पत्व आदि धर्म (जीवात्माके नहीं माने जा सकते)। व्याख्या—जैसे पूर्वसूत्रमें यह अनुपपत्ति दिखा आये हैं कि जीवात्मा और परमात्मामें अत्यन्त अभेद होनेपर श्रुतिके व्यतिहार-वाक्यद्वारा दोनोंकी एकताका स्थापन संगत नहीं हो सकता, वैसे ही अनुपपत्ति इस सूत्रमें भी प्रकारान्तरसे दिखायी जाती है। कहना यह है कि परमात्माके स्वरूपका जहाँ वर्णन किया गया है, वहाँ उसे सत्यकाम, सत्यसंकल्प, अपहतपाप्मा, अजर, अमर, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, सबका परम कारण तथा सर्वाधार बताया गया है। ये सत्यकामत्व आदि धर्म जीवात्माके धर्मोंसे सर्वथा विलक्षण हैं। जीवात्मामें इनका पूर्णरूपसे होना सम्भव नहीं है। जब दोनोंमें धर्मकी समानता नहीं है, तब उनका अत्यन्त अभेद कैसे सिद्ध हो सकता है। इसलिये परमात्मा और जीवात्माका भेद उपाधिकृत है—यह मान्यता असंगत है। सम्बन्ध—यदि कहा जाय कि 'परब्रह्म परमेश्वरमें जो सत्यकामत्व आदि धर्म श्रुतिद्वारा बताये गये हैं, वे स्वाभाविक नहीं, किंतु उपाधिके सम्बन्धसे हैं, वास्तवमें ब्रह्मका स्वरूप तो निर्विशेष है। अतः इन धर्मोंको
सूत्र ३९ ] अध्याय ३ ३४९
सूत्र ३९ ] अध्याय ३ ३४९ लेकर जीवसे उसकी भिन्नता नहीं बतायी जा सकती है' तो यह कथन ठीक नहीं है; क्योंकि- कामादीतरत्र तत्र चायतनादिभ्यः ॥ ३।३।३९॥ (उस परब्रह्मके) इतरत्र = दूसरी जगह (बताये हुए); कामादि = सत्यकामत्वादि धर्म; तत्र च= जहाँ निर्विशेष स्वरूपका वर्णन है वहाँ भी हैं. आयतनादिभ्यः = क्योंकि वहाँ उसके सर्वाधारत्व आदि धर्मोंका वर्णन पाया जाता है। व्याख्या- उस परब्रह्म परमेश्वरके जो सत्यसंकल्पत्व, सर्वज्ञत्व तथा सर्वेश्वरत्वादि धर्म विभिन्न श्रुतियोंमें बतलाये गये हैं, वे सब जहाँ निर्विशेष ब्रह्मका वर्णन है, वहाँ भी हैं; क्योंकि निर्विशेष स्वरूपका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियोंमें भी ब्रह्मके सर्वाधारत्व आदि सविशेषधर्मोंका वर्णन है। इसलिये वैसे दूसरे धर्मोंका भी वहाँ अध्याहार कर लेना उचित है। बृहदारण्यकमें गार्गीके प्रश्नका उत्तर देते हुए याज्ञवल्क्यने उस परम अक्षर परमात्माके स्वरूपका वर्णन किया है। वहाँ पहले 'अस्थूलमणणु' (न स्थूल है; न सूक्ष्म है) इत्यादि प्रकारसे निर्विशेष स्वरूपके लक्षणोंका वर्णन करके अन्तमें कहा है कि 'इस अक्षरके ही प्रशासनमें सूर्य और चन्द्रमा धारण किये हुए हैं, उस अक्षरके ही प्रशासनमें द्युलोक और पृथिवी धारण किये हुए हैं।' इस प्रकार याज्ञवल्क्यने यहाँ उस अक्षरब्रह्मको समस्त जगत्का आधार बतलाया है (बृह० उ० ३।८।८-९)१ इसी तरह मुण्डकोपनिषद्में 'जाननेमें न आनेवाला, पकड़नेमें न आनेवाला' इत्यादि प्रकारसे निर्विशेष स्वरूपके धर्मोंका वर्णन करनेके पश्चात् उस ब्रह्मको नित्य, विभु, सर्वगत, अत्यन्त सूक्ष्म और समस्त प्राणियोंका कारण बताकर उसे विशेष धर्मोंसे युक्त भी कहा गया है (मु० उ० १।१।६)२ इससे यह सिद्ध होता है कि 'वह परमात्मा दोनों १-यह मन्त्र १। ३। १० और ११ की व्याख्यामें आया है। २-यह मन्त्र सूत्र १। २। २१ की व्याख्यामें आया है।
३५० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ प्रकारके धर्मोंवाला है।' इसलिये दूसरी जगह कहे हुए सत्यसंकल्पत्व, सर्वज्ञत्व आदि जितने भी परमेश्वरके दिव्य गुण हैं, वे उनमें स्वाभाविक हैं, उपाधिकृत नहीं हैं। अतः जहाँ जिन लक्षणोंका वर्णन नहीं है, वहाँ उनका अध्याहार कर लेना चाहिये; इस प्रकार परमात्मा और जीवात्मामें समानधर्मता न होनेके कारण उनमें सर्वथा अभेद नहीं माना जा सकता। सम्बन्ध—यदि जीव और ईश्वरका भेद उपाधिकृत नहीं माना जायगा, तब तो अनेक द्रष्टाओंकी सत्ता सिद्ध हो जायगी। इस परिस्थितिमें श्रुतिद्वारा जो यह कहा है कि 'इससे अन्य कोई द्रष्टा नहीं है' इत्यादि, उसकी व्यवस्था कैसे होगी? इसपर कहते हैं— आदरादलोपः ॥ ३। ३। ४० ॥ आदरात् = वह कथन परमेश्वरके प्रति आदरका प्रदर्शक होनेके कारण; अलोपः = उसमें अन्य द्रष्टाका लोप अर्थात् निषेध नहीं है। व्याख्या—उस परब्रह्म परमेश्वरको सर्वश्रेष्ठ बतलानेके लिये वहाँ आदरकी दृष्टिसे अन्य द्रष्टाका निषेध किया गया है, वास्तवमें नहीं। भाव यह है कि वह परब्रह्म परमेश्वर ऐसा द्रष्टा, ऐसा सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता है कि उसकी अपेक्षा अन्य सब जीव द्रष्टा होते हुए भी नहींके समान हैं; क्योंकि उनमें पूर्ण द्रष्टापन नहीं है। प्रलयकालमें जड तत्त्वोंकी भाँति जीवोंको भी किसी प्रकारका विशेष ज्ञान नहीं रहता तथा वर्तमानकालमें भी जो जीवोंका जानना, देखना, सुनना आदि है, वह सीमित है और उस अन्तर्यामी परमेश्वरके ही सकाशासे है। (ऐ० उ० १। ३। ११) तथा (प्र० उ० ४। ९) वही इसका प्रेरक है, अतः यह सर्वथा स्वतन्त्र नहीं है। इससे यही सिद्ध होता है कि श्रुतिका वह कहना भगवान्की श्रेष्ठता दिखलानेके लिये है, वास्तवमें अन्य द्रष्टाका निषेध करनेके लिये नहीं है। सम्बन्ध—उपर्युक्त कथन परमेश्वरके प्रति आदर सूचित करनेके लिये है, इस बातको प्रकारान्तरसे सिद्ध करते हैं—
सूत्र ४१ ] अध्याय ३ ३५१
सूत्र ४१ ] अध्याय ३ ३५१ उपस्थितेऽतस्तद्वचनात् ॥ ३ । ३ । ४१ ॥ उपस्थिते = उक्त वचनोंसे किसी प्रकार अन्य चेतनका निषेध प्राप्त होनेपर भी; अतः = इस ब्रह्मकी अपेक्षा अन्य द्रष्टाका निषेध बतानेके कारण (वह कथन आदरार्थक ही है); तद्वचनात् = क्योंकि उन वाक्योंके साथ बार-बार अतः शब्दका प्रयोग किया गया है। व्याख्या—जहाँ उस परमात्मासे अन्य द्रष्टा, श्रोता आदिका निषेध है (बृह० उ० ३।७।२३), वहाँ उस वर्णनमें बार-बार ‘अतः’ शब्दका प्रयोग किया गया है, इसलिये यही सिद्ध होता है कि इसकी अपेक्षा या इससे अधिक कोई द्रष्टा, श्रोता आदि नहीं है। यदि सर्वथा अन्य द्रष्टाका निषेध करना अभीष्ट होता तो ‘अतः’ शब्दकी कोई आवश्यकता नहीं होती। जैसे यह कहा जाय कि इससे अन्य कोई धार्मिक नहीं है तो इस कथनद्वारा अन्य धार्मिकोंसे उसकी श्रेष्ठता बताना ही अभीष्ट है, न कि अन्य सब धार्मिकोंका अभाव बतलाना। उसी प्रकार वहाँ जो यह कहा गया है कि ‘इस परमात्मासे अन्य कोई द्रष्टा आदि नहीं है’ उस कथनका भी यही अर्थ है कि इससे अधिक कोई द्रष्टापन आदि गुणोंसे युक्त पुरुष नहीं है; यह परमात्मा ही सर्वश्रेष्ठ द्रष्टा आदि है; क्योंकि उसी वर्णनके प्रसंगमें (बृह० उ० ३। ७। २२)* परब्रह्म परमात्माको जीवात्माका अन्तर्यामी और जीवात्माको उसका शरीर बताकर दोनोंके भेदका प्रतिपादन किया है। यदि ‘नान्योऽतो द्रष्टा’ इत्यादि वाक्योंसे अन्य द्रष्टा अर्थात् जीवात्माका निषेध बताना माना जाय तो पूर्व वर्णनसे विरोध आयेगा, इसलिये वहाँ अन्य द्रष्टाके निषेधका तात्पर्य परमात्माको सर्वश्रेष्ठ द्रष्टा बताकर उसके प्रति आदर प्रदर्शित करना ही समझना चाहिये। सम्बन्ध—यहाँतक यह निर्णय किया गया कि जीवात्मा और परमात्माका
- यह मन्त्र सूत्र १।२।२० की टिप्पणीमें आया है।
३५२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
३५२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ भेद उपाधिकृत नहीं है तथा उस परब्रह्म परमेश्वरमें जो सर्वज्ञत्व, सर्वशक्तिमत्ता, सर्वाधारता तथा सर्वसुहृद् होना आदि दिव्य गुण शास्त्रोंमें बताये गये हैं, वे भी उपाधिकृत नहीं हैं; किंतु स्वभावसिद्ध और नित्य हैं। जहाँ ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन करते समय उनका वर्णन न हो, वहाँ भी उन सबका अध्याहार कर लेना चाहिये। अब फलविषयक श्रुतियोंका विरोधाभास दूर करके सिद्धान्त-निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। दहरविद्यामें तथा प्रजापति-इन्द्रके संवादमें जो ब्रह्मविद्याका वर्णन है, उसके फलमें इच्छानुसार नाना प्रकारके भोगोंको भोगनेकी बात कही गयी है (छा० उ० ८।२।१ से १० तक); किंतु दूसरी जगह वैसी बात नहीं कही गयी है। अतः यह जिज्ञासा होती है कि ब्रह्मलोकको प्राप्त होनेवाले सभी साधकोंके लिये यह नियम है या इसमें विकल्प है ? इसपर कहते हैं— तन्निर्धारणानियमस्तद्दृष्टेः पृथग्घ्यप्रतिबन्धः फलम्॥ ३।३।४२॥ तन्निर्धारणानियमः = भोगोंके भोगनेका निश्चित नियम नहीं है; तद्दृष्टेः = क्योंकि यह बात उस प्रकरणमें बार-बार 'यदि' शब्दके प्रयोगसे देखी गयी है; हि = इसके सिवा, दूसरा कारण यह भी है कि; पृथक् = कामोपभोगसे भिन्न संकल्पवालेके लिये; अप्रतिबन्धः = जन्म- मरणके बन्धनसे छूट जाना ही; फलम् = फल बताया गया है। व्याख्या—ब्रह्मलोकमें जानेवाले सभी साधकोंको उस लोकके दिव्य भोगोंका उपभोग करना पड़े, यह नियम नहीं है; क्योंकि जहाँ-जहाँ ब्रह्मलोककी प्राप्तिका वर्णन किया गया है, वहाँ सब जगह भोगोंके उपभोगकी बात नहीं कही है तथा जहाँ कही है, वहाँ भी 'यदि' शब्दका प्रयोग करके साधकके इच्छानुसार उसका विकल्प दिखा दिया है। (छा० उ० ८।२।१ से १० तक) इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि जो साधक ब्रह्मलोकके या अन्य किसी भी देवलोकके भोगोंको भोगनेकी इच्छा रखता है उसीको वे भोग मिलते हैं, ब्रह्मविद्याकी स्तुतिके लिये यह आनुषंगिक वर्णन है, उस विद्याका
सूत्र ४३-४४ ] अध्याय ३ ३५३ मुख्य फल नहीं है। परमात्माके साक्षात्कारमें तो ये भोग विलम्ब करनेवाले विघ्न हैं, अतः साधकको इन भोगोंकी भी उपेक्षा ही करनी चाहिये। इसलिये जिनके मनमें भोग भोगनेका संकल्प नहीं है, उनके लिये जन्म-मरणके बन्धनसे छूटकर तत्काल परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाना ही उसका मुख्य फल बताया गया है। (बृह० उ० ४।४।६^१ तथा क० उ० २।३।१४^२)। सम्बन्ध—'यदि ब्रह्मलोकके भोगकी भी उस परब्रह्म परमेश्वरके साक्षात्कारमें विलम्ब करनेवाले हैं, तब श्रुतिने ऐसे फलोंका वर्णन किसलिये किया?' इस जिज्ञासापर कहते हैं— प्रदानवदेव तदुक्तम्॥ ३।३।४३॥ तदुक्तम् = वह कथन; प्रदानवत् = वरदानकी भाँति; एव = ही हैं। व्याख्या—जिस प्रकार भगवान् या कोई शक्तिशाली महापुरुष किसी श्रद्धालु व्यक्तिको उसकी श्रद्धा और रुचि बढ़ानेके लिये वरदान दे दिया करते हैं, उसी प्रकार स्वर्गके भोगोंसे आसक्ति रखनेवाले सकामकर्मी श्रद्धालु मनुष्योंकी ब्रह्मविद्यामें श्रद्धा बढ़ाकर उसमें उन्हें प्रवृत्त करनेके लिये एवं कर्मोंके फलरूप स्वर्गीय भोगोंकी तुच्छता दिखलानेके लिये भी श्रुतिका वह कथन है। सम्बन्ध—उक्त सिद्धान्तको पुष्ट करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं— लिंगभूयस्त्वात्तद्धि बलीयस्तदपि॥ ३।३।४४॥ लिंगभूयस्त्वात् = जन्म-मरणरूप संसारसे सदाके लिये मुक्त होकर उस परब्रह्मको प्राप्त हो जानारूप फल बतानेवाले लक्षणोंकी अधिकता होनेके कारण; तद्बलीयः = वही फल बलवान् (मुख्य) है; हि = क्योंकि; तदपि = वह दूसरे फलोंका वर्णन भी मुख्य फलका महत्त्व प्रकट करनेके लिये ही है। १-यह मन्त्र सूत्र ३।३।३० की व्याख्यामें आया है। २-यह मन्त्र सूत्र ३।४।५२ की टिप्पणीमें आया है।
३५४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
३५४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ व्याख्या - वेदान्त-शास्त्रमें जहाँ-जहाँ ब्रह्मज्ञानके फलका वर्णन किया गया है, वहाँ इस जन्म-मृत्युरूप संसारसे सदाके लिये छूटकर उस परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जानारूप फलका ही अधिकतासे वर्णन मिलता है, इसलिये वही प्रबल अर्थात् प्रधान फल है, ऐसा मानना चाहिये; क्योंकि उसके साथ-साथ जो किसी-किसी प्रकरणमें ब्रह्मलोकके भोगोंकी प्राप्तिरूप दूसरे फलका वर्णन आता है, वह भी मुख्य फलकी प्रधानता सिद्ध करनेके लिये ही है। इसीलिये उसका सब प्रकरणोंमें वर्णन नहीं किया गया है; किंतु उपर्युक्त मुख्य फलका वर्णन तो सभी प्रकरणोंमें आता है। सम्बन्ध - ब्रह्मज्ञान ही इस जन्म-मृत्युरूप संसारसे छूटनेका निश्चित उपाय है, यह बात सिद्ध करनेके लिये पूर्वपक्षकी उत्थापना की जाती है- पूर्वविकल्पः प्रकरणात्स्यात् क्रियामानसवत् ॥ ३।३।४५ ॥ क्रियामानसवत् = शारीरिक और मानसिक क्रियाओंमें स्वीकृत विकल्पकी भाँति; पूर्वविकल्पः = पहले कही हुई अग्निविद्या भी विकल्पसे मुक्तिकी हेतु; स्यात् = हो सकती है; प्रकरणात् = यह बात प्रकरणसे सिद्ध होती है। व्याख्या - नचिकेताके प्रश्न और यमराजके उत्तरविषयक प्रकरणकी आलोचना करनेसे यही सिद्ध होता है कि जिस प्रकार उपासनासम्बन्धी शारीरिक क्रियाकी भाँति मानसिक क्रिया भी फल देनेमें समर्थ है, अतः अधिकारिभेदसे जो फल शारीरिक क्रिया करनेवालेको मिलता है, वही मानसिक क्रिया करनेवालेको भी मिल जाता है; उसी प्रकार अग्निहोत्ररूप कर्म भी ब्रह्मविद्याकी ही भाँति मुक्तिका हेतु हो सकता है। उक्त प्रकरणमें नचिकेताने प्रश्न करते समय यमराजसे यह बात कही है कि 'स्वर्गलोकमें किंचिन्मात्र भय नहीं है, वहाँ न तो आपका डर है और न बुढ़ापेका ही, भूख और प्यास - इनसे पार होकर यह जीव शोकसे रहित हुआ स्वर्गमें प्रसन्न होता है, उस स्वर्गके देनेवाले अग्निहोत्ररूप कर्मके रहस्यको आप जानते हैं, वह मुझे बताइये' इत्यादि (क० उ० १।१।१२-१३)। इसपर यमराजने वह
सूत्र ४६-४७ ] अध्याय ३ ३५५
सूत्र ४६-४७ ] अध्याय ३ ३५५ अग्निहोत्र-क्रियासम्बन्धी सब रहस्य नचिकेताको समझा दिया (१। १ । १५)। फिर उस अग्निहोत्ररूप कर्मकी स्तुति करते हुए यमराजने कहा है कि 'इस अग्निहोत्रका तीन बार अनुष्ठान करनेवाला जन्म-मृत्युसे तर जाता है और अत्यन्त शान्तिको प्राप्त हो जाता है।' इत्यादि (१। १। १७-१८)। इस प्रकरणको देखते हुए इस अग्निहोत्ररूप कर्मको मुक्तिका कारण माननेमें कोई आपत्ति मालूम नहीं होती। जिस प्रकार इसके पीछे कही हुई ब्रह्मविद्या मुक्तिमें हेतु है, वैसे ही उसके पहले कहा हुआ यह अग्निहोत्ररूप कर्म भी मुक्तिमें हेतु माना जा सकता है। सम्बन्ध— उसी बातको दृढ़ करते हैं— अतिदेशाच्च ॥ ३ । ३ । ४६ ॥ अतिदेशात्=अतिदेशसे अर्थात् विद्याके समान कर्मोंको मुक्तिमें हेतु बताया जानेके कारण; च=भी (ऊपर कही हुई बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—केवल प्रकरणके बलपर ही कर्म मुक्तिमें हेतु सिद्ध होता है, ऐसी बात नहीं है। श्रुतिने विद्याके समान ही कर्मका भी फल बताया है। यथा—'त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू।' (क० उ० १। १। १७) अर्थात् 'यज्ञ, दान और तपरूप तीन कर्मोंको करनेवाला मनुष्य जन्म-मृत्युसे तर जाता है।' इससे भी कर्मोंका मुक्तिमें हेतु होना सिद्ध होता है। सम्बन्ध— पहले दो सूत्रोंमें उठाये हुए पूर्वपक्षका सूत्रकार उत्तर देते हैं— विद्यैव तु निर्धारणात् ॥ ३ । ३ । ४७॥ तु=किंतु; निर्धारणात्=श्रुतियोंद्वारा निश्चितरूपसे कह दिया जानेके कारण; विद्या एव=केवलमात्र ब्रह्मविद्या ही मुक्तिमें कारण है (कर्म नहीं)। व्याख्या—श्रुतिमें कहा है कि 'तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥' अर्थात् 'उस परब्रह्म परमात्माको जानकर ही मनुष्य जन्म-मरणको लाँघ जाता है। परमपद (मोक्ष)-की प्राप्तिके लिये दूसरा कोई मार्ग (उपाय) नहीं है' (श्वेता० उ० ३।८)। इस प्रकार यहाँ
निश्चितरूपसे एकमात्र ब्रह्मज्ञानको ही मुक्तिका कारण बताया गया है; इसलिये ब्रह्मविद्या ही मुक्तिका हेतु है कर्म नहीं। ब्रह्मविद्याका उपदेश देते समय नचिकेतासे स्वयं यमराजने ही कहा है कि— एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति। तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्॥ 'जो सब प्राणियोंका अन्तर्यामी, एक, अद्वितीय तथा सबको अपने वशमें रखनेवाला है, जो अपने एक ही रूपको बहुत प्रकारसे बना लेता है, उस अपने ही हृदयमें स्थित परमेश्वरको जो ज्ञानी देखते हैं, उन्हींको सदा रहनेवाला आनन्द प्राप्त होता है, दूसरोंको नहीं।' (क० उ० २।२। १२)। अतः पहले अग्निविद्याके प्रकरणमें जो जन्म-मृत्युसे छूटना और अत्यन्त शान्तिकी प्राप्तिरूप फल बताया है, वह कथन स्वर्गलोककी स्तुति करनेके लिये गौणरूपसे है, ऐसा समझना चाहिये। सम्बन्ध—उसी बातको दृढ़ करते हैं— दर्शनाच्च ॥ ३ । ३ । ४८ ॥ दर्शनात् = श्रुतिमें जगह-जगह वैसा वर्णन देखा जानेसे; च = भी (यही दृढ़ होता है)। व्याख्या—श्रुतिमें यज्ञादि कर्मोंका फल स्वर्गलोकमें जाकर वापस आना (मु० उ० १।२।९, १०) और ब्रह्मज्ञानका फल जन्म-मरणसे छूटकर परमात्माको प्राप्त हो जाना (मु० उ० ३।२।५, ६) बताया गया है, इससे भी यही सिद्ध होता है कि एकमात्र ब्रह्मविद्या ही मुक्तिमें हेतु है, यज्ञादि कर्म नहीं। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे पूर्वपक्षका उत्तर देते हुए इस प्रकरणको समाप्त करते हैं— श्रुत्यादिबलीयस्त्वाच्च न बाधः ॥ ३।३।४९॥ श्रुत्यादिबलीयस्वात् = प्रकरणकी अपेक्षा श्रुतिप्रमाण और लक्षण आदि
व्याख्या—वेदके अर्थ और भावका निर्णय करनेमें प्रकरणकी
सूत्र ५० ] अध्याय ३ ३५७
बलवान् होनेके कारण; च = भी; बाधः = प्रकरणके द्वारा सिद्धान्तका बाध; न = नहीं हो सकता। व्याख्या—वेदके अर्थ और भावका निर्णय करनेमें प्रकरणकी अपेक्षा श्रुतिका वचन और लक्षण आदि अधिक बलवान् माने जाते हैं, इसलिये प्रकरणसे सिद्ध होनेवाली बातका निराकरण करनेवाले बहुत- से श्रुतिप्रमाण हों तथा उसके विरुद्ध लक्षण भी पाये जायँ तो केवल प्रकरणकी यह सामर्थ्य नहीं है कि वह सिद्धान्तमें बाधा उपस्थित कर सके। इससे यही सिद्ध होता है कि परमात्माका साक्षात् करनेके लिये बताये हुए उपासनादि उपाय अर्थात् ब्रह्मविद्या ही परमात्माकी प्राप्ति और जन्म-मरणसे छूटनेका साधन है, सकाम यज्ञ आदि कर्म नहीं। सम्बन्ध—अब श्रुतिमें बताये हुए ब्रह्मविद्याके फलभेदका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। सभी ब्रह्मविद्याओंका उद्देश्य एकमात्र परब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार करा देना और इस जीवात्माको सदाके लिये सब प्रकारके दुःखोंसे मुक्त कर देना है, फिर किसी विद्याका फल ब्रह्मलोकादिकी प्राप्ति है और किसीका फल इस शरीरमें रहते हुए ही ब्रह्मको प्राप्त हो जाना है—इस प्रकार फलमें भेद क्यों किया गया है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— अनुबन्धादिभ्यः प्रज्ञान्तरपृथक्त्ववद् दृष्टश्च तदुक्तम् ॥ ३।३।५० ॥ अनुबन्धादिभ्यः = भावविषयक अनुबन्ध आदिके भेदसे; प्रज्ञान्तर- पृथक्त्ववत् = उद्देश्यभेदसे की जानेवाली दूसरी उपासनाओंके पार्थक्य (भेद)—की भाँति; च = इसकी भी पृथक्ता है, ऐसा कथन, दृष्टः = उन-उन प्रकरणोंमें देखा गया है; तदुक्तम् = तथा यह पहले भी बताया जा चुका है। व्याख्या—जिस प्रकार उद्देश्यभेदसे की हुई भिन्न-भिन्न देवताओंसे सम्बन्ध रखनेवाली उपासनाओंकी भिन्नता तथा उनका फलभेद होता है, उसी प्रकार इस एक उद्देश्यसे की जानेवाली ब्रह्मविद्यामें भी साधकोंकी भावना
३५८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
३५८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
भिन्न-भिन्न होनेके कारण उपासनाके प्रकारमें और उसके फलमें आंशिक भेद होना स्वाभाविक है। अभिप्राय यह कि सभी साधक एक ही प्रकारका भाव लेकर ब्रह्मप्राप्तिके साधनोंमें नहीं लगते, प्रत्येक साधककी भावनामें भेद रहता है। कोई साधक तो ऐसा होता है जो स्वभावसे ही समस्त भोगोंको दुःखप्रद और परिवर्तनशील समझकर उनसे विरक्त हो जाता है तथा परब्रह्म परमेश्वरके साक्षात्कार होनेमें थोड़ा भी विलम्ब उसके लिये असह्य होता है। कोई साधक ऐसा होता है जो बुद्धिके विचारसे तो भोगोंको दुःखरूप समझता है, इसीलिये साधनमें भी लगा है, परंतु ब्रह्मलोकमें प्राप्त होनेवाले भोग दुःखसे मिले हुए नहीं हैं, वहाँ केवल सुख-ही-सुख है तथा वहाँ जानेके बाद पुनरावृत्ति नहीं होती, सदाके लिये जन्म-मरणसे मुक्ति हो जाती है, इस भावनासे भावित है, परमात्माकी प्राप्ति तत्काल ही हो, ऐसी तीव्र लालसावाला नहीं है। इसी प्रकार साधकोंकी भावना अनेक प्रकारकी हो सकती है तथा उन भावनाओंके और योग्यताके भेदसे उनके अधिकारमें भी भेद होना स्वाभाविक है। इसलिये उन्हें बीचमें प्राप्त होनेवाले फलोंमें भेद होना सम्भव है। जन्म-मरणरूप संसार-बन्धनसे सदाके लिये मुक्ति एवं परब्रह्म पुरुषोत्तमकी प्राप्तिरूप जो चरम फल है, वह तो उन सबको यथासमय प्राप्त होता ही है। साधकके भावानुबन्धसे फलमें भेद होनेकी बात उन-उन प्रकरणोंमें स्पष्टरूपसे उपलब्ध होती है। जैसे इन्द्र और विरोचन ब्रह्माजीसे ब्रह्मविद्या सीखनेके लिये गये। उनकी जो ब्रह्मविद्याके साधनमें प्रवृत्ति हुई उसमें मुख्य कारण यह था जो उन्होंने ब्रह्माजीके मुखसे यह सुना कि उस परमात्माको जान लेनेवाला समस्त लोकोंको और समस्त भोगोंको प्राप्त हो जाता है। इस फलश्रुतिपर ही उनका मुख्य लक्ष्य था, इसीलिये विरोचन तो उस विद्याका अधिकारी न होनेके कारण उसमें टिक ही नहीं सका; परंतु इन्द्रने उस विद्याको ग्रहण किया। फिर भी उसके मनमें प्रधानता उन लोकों और भोगोंकी ही थी, यह वहाँके प्रकरणमें स्पष्ट है (छा० उ० ८। ७। ३)। दहरविद्यामें भी उसी प्रकारसे ब्रह्मलोकके दिव्य भोगोंकी प्रशंसा है
सूत्र ५१ ] अध्याय ३ ३५९
सूत्र ५१ ] अध्याय ३ ३५९ (छा० उ० ८। १। ६)। अतः जिनके भीतर इन फलश्रुतियोंके आधारपर ब्रह्मलोकके भोग प्राप्त करनेका संकल्प है, उनको तत्काल ब्रह्मका साक्षात्कार कैसे हो सकता है? किन्तु जो भोगोंसे सर्वथा विरक्त होकर उस परब्रह्म परमात्माको साक्षात् करनेके लिये तत्पर हैं, उन्हें परमात्माकी प्राप्ति होनेमें विलम्ब नहीं हो सकता। शरीरके रहते-रहते यहीं परमात्माका साक्षात्कार हो जाता है। अतः भावनाके भेदसे भिन्न-भिन्न अधिकारियोंको प्राप्त होनेवाले फलमें भेद होना उचित ही है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे उसी सिद्धान्तको दृढ़ करते हैं— न सामान्यादप्युपलब्धेर्मृत्युवन्न हि लोकापत्तिः ॥ ३ । ३ । ५१ ॥ सामान्यात्=यद्यपि सभी ब्रह्मविद्या समानभावसे मोक्षमें हेतु हैं; अपि=तथापि; न=बीचमें होनेवाले फलभेदका निषेध नहीं है; हि=क्योंकि; उपलब्धेः=परब्रह्म परमेश्वरका साक्षात्कार हो जानेपर; मृत्युवत्=जिस प्रकार मृत्यु होनेपर जीवात्माका स्थूल शरीरसे सम्बन्ध नहीं रहता, उसी प्रकार उसका सूक्ष्म या कारण किसी भी शरीरसे सम्बन्ध नहीं रहता, इसलिये; लोकापत्तिः=किसी भी लोककी प्राप्ति; न=नहीं हो सकती। व्याख्या—सभी ब्रह्मविद्या अन्तमें मुक्ति देनेवाली हैं, इस विषयमें सबकी समानता है तो भी किसीका ब्रह्मलोकमें जाना और किसीका ब्रह्मलोक- में न जाकर यहीं ब्रह्मको प्राप्त हो जाना तथा वहाँ जाकर भी किसीका प्रलयकालतक भोगोंके उपभोगका सुख अनुभव करना और किसीका तत्काल ब्रह्ममें लीन हो जाना—इत्यादिरूपसे जो फल-भेद हैं, वे उन साधकोंके भावसे सम्बन्ध रखते हैं; इसलिये इस भेदका निषेध नहीं हो सकता। अतएव जिस साधकको मृत्युके पहले कभी भी परमात्माका साक्षात्कार हो जाता है, जो उस परमेश्वरके तत्त्वको भलीभाँति जान लेता है, जिसकी ब्रह्मलोकपर्यन्त किसी भी लोकके सुख-भोगमें किंचिन्मात्र भी वासना नहीं रही है, वह किसी भी लोकविशेषमें नहीं जाता, वह तो तत्काल ही उस
३६० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है। (बृह० उ० ४।४।६१ तथा क० उ० २।३।१४२) प्रारब्धभोगके अन्तमें उसके स्थूल, सूक्ष्म और कारण- शरीरोंके तत्त्व उसी प्रकार अपने-अपने कारण-तत्त्वोंमें विलीन हो जाते हैं, जिस प्रकार मृत्युके बाद प्रत्येक मनुष्यके स्थूल-शरीरके तत्त्व पाँचों भूतोंमें विलीन हो जाते हैं (मु० उ० ३।२।७)।३ सम्बन्ध—ऐसा होनेमें क्या प्रमाण है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— परेण च शब्दस्य ताद्विध्यं भूयस्त्वात्त्वनुबन्धः ॥ ३।३।५२ ॥ परेण=बादवाले मन्त्रोंसे (यह सिद्ध होता है); च=तथा; शब्दस्य=उसमें कहे हुए शब्दसमुदायका; ताद्विध्यम्=उसी प्रकारका भाव है; तु=किंतु अन्य साधकोंके; भूयस्त्वात्=दूसरे भावोंकी अधिकतासे; अनुबन्धः=सूक्ष्म और कारण-शरीरसे सम्बन्ध रहता है। (इस कारण वे ब्रह्मलोकमें जाते हैं)। व्याख्या—मुण्डकोपनिषद्में पहले तो यह बात कही गयी है कि— वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः। ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे॥ 'वेदान्तशास्त्रके ज्ञानद्वारा जिन्होंने वेदान्तके अर्थभूत परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका निश्चय कर लिया है, कर्मफलरूप समस्त भोगोंके त्यागरूप योगसे जिनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया है, वे सब साधक मरणकालमें ब्रह्मलोकोंमें जाकर परम अमृतस्वरूप होकर सर्वथा मुक्त हो जाते हैं' (३।२।६)। इसके बाद अगले मन्त्रमें जिनको इस शरीरका नाश होनेसे पहले ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है, उनके विषयमें इस प्रकार कहा है— १-यह मन्त्र सूत्र ३।३।३० की व्याख्यामें आया है। २-यह मन्त्र सूत्र ३।४।५२ की टिप्पणीमें आया है। ३-यह मन्त्र अगले सूत्रकी व्याख्यामें है।
सूत्र ५३ ] अध्याय ३ ३६१
सूत्र ५३ ] अध्याय ३ ३६१ गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु । कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति ॥ ‘उनकी पंद्रह कलाएँ अर्थात् प्राणोंके सहित सब इन्द्रियाँ अपने-अपने देवताओंमें विलीन हो जाती हैं, जीवात्मा और उसके समस्त कर्मसंस्कार— ये सब-के-सब परम अविनाशी परमात्मामें एक हो जाते हैं’ (३।२।७)। फिर नदी और समुद्रका दृष्टान्त देकर बताया है कि ‘तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥’—‘वह ब्रह्मको जाननेवाला विद्वान् नाम- रूपको यहीं छोड़कर परात्पर ब्रह्ममें विलीन हो जाता है’ (३।२।८)। इस प्रकार शुद्ध अन्तःकरणवाले अधिकारियोंके लिये ब्रह्मलोककी प्राप्ति बतानेके बाद साक्षात् ब्रह्मको जान लेनेवाले विद्वान्का यहीं नाम-रूपसे मुक्त होकर परब्रह्ममें विलीन हो जाना सूचित करनेवाले शब्दसमुदाय पूर्वसूत्रमें कही हुई बातको स्पष्ट करते हैं। इसलिये यह सिद्ध होता है कि जिनके अन्तःकरणमें ब्रह्मलोकके महत्त्वका भाव है, वहाँ जानेके संकल्पसे जिनका सूक्ष्म और कारण-शरीरसे सम्बन्ध-विच्छेद नहीं हुआ, ऐसे ही साधक ब्रह्मलोकोंमें जाते हैं। जिनको यहीं ब्रह्मसाक्षात्कार हो जाता है, वे नहीं जाते। यह अवान्तर फल-भेद होना उचित ही है। सम्बन्ध—यहाँतक मुक्तिविषयक फलभेदके प्रकरणको समाप्त करके अब शरीरपातके बाद आत्माकी सत्ता और कर्मफलका भोग न माननेवाले नास्तिकोंके मतका खण्डन करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं— एक आत्मनः शरीरे भावात् ॥ ३।३।५३ ॥ एके=कई एक कहते हैं कि; आत्मनः=आत्माका; शरीरे=शरीर होनेपर ही; भावात्=भाव होनेके कारण (शरीरसे भिन्न आत्माकी सत्ता नहीं है)। व्याख्या—कई एक नास्तिकोंका कहना है कि जबतक शरीर है, तभीतक इसमें चेतन आत्माकी प्रतीति होती है, शरीरके अभावमें आत्मा प्रत्यक्ष नहीं है। इससे यही सिद्ध होता है कि शरीरसे भिन्न आत्मा नहीं है;
सम्बन्ध—इसके उत्तरमें सूत्रकार कहते हैं—
३६२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
अतएव मरनेके बाद आत्मा परलोकमें जाकर कर्मोंका फल भोगता है या ब्रह्मलोकमें जाकर मुक्त हो जाता है, ये सभी बातें असंगत हैं। सम्बन्ध—इसके उत्तरमें सूत्रकार कहते हैं— व्यतिरेकस्तद्भावाभावित्वान्न तूपलब्धिवत् ॥ ३। ३। ५४॥ व्यतिरेकः = शरीरसे आत्मा भिन्न है; तद्भावाभावित्वात् = क्योंकि शरीर रहते हुए भी उसमें आत्मा नहीं रहता, इसलिये; न=आत्मा शरीर नहीं है; तु=किंतु; उपलब्धिवत् = ज्ञातापनकी उपलब्धिके सदृश (आत्माका शरीरसे भिन्न होना सिद्ध होता है)। व्याख्या—शरीर ही आत्मा है, यह बात ठीक नहीं है, किंतु शरीरसे भिन्न, शरीर आदि समस्त भूतों और उनके कार्योंको जाननेवाला आत्मा अवश्य है, क्योंकि मृत्युकालमें शरीर हमारे सामने पड़ा रहता है तो भी उसमें सब पदार्थोंको जाननेवाला चेतन आत्मा नहीं रहता। अतः जिस प्रकार यह प्रत्यक्ष है कि शरीरके रहते हुए भी उसमें जीवात्मा नहीं रहता, उसी प्रकार यह भी मान ही लेना चाहिये कि शरीरके न रहनेपर भी आत्मा रहता है, वह इस स्थूल शरीरमें नहीं तो अन्य (सूक्ष्म) शरीरमें रहता है; परंतु आत्माका अभाव नहीं होता। अतः यह कहना सर्वथा युक्तिविरुद्ध है कि इस स्थूल शरीरसे भिन्न आत्मा नहीं है। यदि इस शरीरसे भिन्न चेतन आत्मा नहीं होता तो वह अपने और दूसरोंके शरीरोंको नहीं जान सकता; क्योंकि घटादि जड पदार्थोंमें एक-दूसरेको या अपने-आपको जाननेकी शक्ति नहीं है। जिस प्रकार सबका ज्ञाता होनेके कारण ज्ञातारूपमें आत्माकी उपलब्धि प्रत्यक्ष है, उसी प्रकार शरीरका ज्ञाता होनेके कारण इस ज्ञेय शरीरसे उसका भिन्न होना भी प्रत्यक्ष है। सम्बन्ध—प्रसंगवश प्राप्त हुए नास्तिकवादका संक्षेपमें खण्डन करके, अब पुनः भिन्न-भिन्न श्रुतियोंपर विचार करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। जिज्ञासा यह है कि भिन्न-भिन्न शाखाओंमें यज्ञोंके उद्गीथ