भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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पृष्ठ 346

सूत्र ३४ ] अध्याय ३ ३४३ लक्ष्य करानेवाले भाव हैं; औपसदवत्=अतः 'उपसत्' कर्मसम्बन्धी मन्त्रोंकी भाँति; तदुक्तम्=उनका अध्याहार कर लेना उचित है, यह बात कही गयी है। व्याख्या—बृहदारण्यकमें याज्ञवल्क्यने कहा है कि 'हे गार्गि! जिसको तुम पूछ रही हो, उस तत्त्वको ब्रह्मवेत्तालोग अक्षर कहते हैं अर्थात् निर्गुण- निराकार अविनाशी ब्रह्म बतलाते हैं। वह न मोटा है, न पतला है, न छोटा है, न बड़ा है' इत्यादि (बृह० उ० ३।८।८)। इस प्रकार वहाँ ब्रह्मको इन सब पदार्थोंसे, इन्द्रियोंसे और शरीरधारी जीवोंसे अत्यन्त विलक्षण बतलाया गया है। तथा मुण्डकोपनिषद्में अंगिरा ऋषिने शौनकसे कहा है कि 'वह परा विद्या है, जिससे उस अक्षर (परब्रह्म परमात्मा)-की प्राप्ति होती है, जो जानने और पकड़नेमें आनेवाला नहीं है, जो गोत्र, वर्ण, आँख, कान, पैर आदिसे रहित है, किंतु सर्वव्यापी, अतिसूक्ष्म, विनाशरहित और समस्त प्राणियोंका कारण है, उसको ज्ञानी पुरुष सब ओरसे देखते हैं (मु० उ० १। १। ५, ६)। इस प्रकार वेदमें उस अक्षरब्रह्मके जो विशेषण बतलाये गये हैं, उनको ब्रह्मके वर्णनमें सभी जगह ग्रहण कर लेना चाहिये; क्योंकि ब्रह्मके सविशेष और निर्विशेष सभी लक्षण समान हैं तथा सभी उसीके भाव हैं अर्थात् उस ब्रह्मके स्वरूपका लक्ष्य करानेके लिये ही कहे हुए भाव हैं, इसलिये 'उपसत्' कर्मसम्बन्धी मन्त्रोंकी भाँति उनका अध्याहार कर लेना उचित है। यह बात कही गयी है। सम्बन्ध—'मुण्डक (३।१।१) और श्वेताश्वतर (४।६)-में तो पक्षीके दृष्टान्तसे जीव और ईश्वरको मनुष्यके हृदयमें स्थित बतलाया है और कठोपनिषद्में छाया तथा धूपकी भाँति ईश्वर और जीवको मनुष्यके हृदयमें स्थित बतलाया है; इन श्रुतियोंमें जिस विद्या अथवा विज्ञानका वर्णन है, वह एक-दूसरेसे भिन्न है या अभिन्न?' इस जिज्ञासापर कहते हैं— इयदामननात् ॥ ३। ३। ३४॥ (उक्त तीनों मन्त्रोंमें एक ही ब्रह्मविद्याका वर्णन है) इयदामननात्= क्योंकि सभी जगह इयत्ता (इतनापन)-का वर्णन समान है।