भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 347, कुल 486 में से

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पृष्ठ 347

३४४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ व्याख्या—मुण्डक और श्वेताश्वतरमें जो कहा है कि 'एक साथ रहकर परस्पर सखाभाव रखनेवाले दो पक्षी (जीवात्मा और परमात्मा) एक ही शरीररूप वृक्षका आश्रय लेकर रहते हैं, उन दोनोंमेंसे एक तो कर्मफलरूप सुख-दुःखोंको भोगता है और दूसरा न खाता हुआ केवल देखता रहता है।१ इस प्रकार यह जीव शरीरकी आसक्तिमें निमग्न होकर असमर्थताके कारण मोहित हो चिन्ता करता रहता है। यदि यह भक्तोंद्वारा सेवित अपने पास रहनेवाले सखा परमेश्वरको और उसकी विचित्र महिमाको देख ले तो तत्काल ही शोकरहित हो जाय।'२ तथा कठोपनिषद्में कहा है कि 'मनुष्य-शरीरमें परब्रह्मके उत्तम निवासस्थान हृदयगुहामें छिपे हुए और अपने सत्यस्वरूपका अनुभव करनेवाले (जीव और ईश्वर) दोनों हैं, जो कि छाया और धूपकी भाँति भिन्न स्वभाववाले हैं। ऐसा ब्रह्मवेत्ता कहते हैं।' (क० उ० १।३।१)३ इन सभी स्थलोंमें द्विवचनान्त शब्दोंका प्रयोग करके जीव और ईश्वरको परिच्छिन्न स्थल— हृदयमें स्थित बताया गया है। इससे सिद्ध होता है कि तीनों जगह कही हुई विद्या एक है। इसी प्रकार जहाँ-जहाँ उस परब्रह्म परमेश्वरको प्राणियोंके हृदयमें स्थित बताया गया है, उन सब स्थलोंमें वर्णित विद्याकी भी एकता समझ लेनी चाहिये। सम्बन्ध—अब परमात्माको सर्वान्तर्यामी बतलानेवाली श्रुतियोंपर विचार आरम्भ करते हैं— अन्तरा भूतग्रामवत्स्वात्मनः ॥ ३।३।३५ ॥ भूतग्रामवत्=आकाशादि भूतसमुदायकी भाँति (वह परमात्मा); स्वात्मनः=साधकके अपने आत्माका भी; अन्तरा=अन्तरात्मा (अन्तर्यामी है); (आमननात्)=क्योंकि यही बात अन्य श्रुतिमें कही गयी है। १-यह मन्त्र सूत्र १। ३। ७ की व्याख्यामें आया है। २-यह मन्त्र सूत्र १। २। २२ की व्याख्यामें आया है। ३-यह मन्त्र सूत्र १। २। ११ की व्याख्यामें आया है।