भारतकोश
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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

सूत्र १४ ] अध्याय २ १८१

सूत्र १४ ] अध्याय २ १८१ भिन्नताकी समानता है, इसलिये; अनवस्थितेः=उनमें अनवस्थादोषकी प्राप्ति हो जानेपर परमाणुओंके संयोगसे जगत्की उत्पत्ति नहीं हो सकेगी। व्याख्या—वैशेषिकोंकी मान्यताके अनुसार युतसिद्ध अर्थात् अलग- अलग रह सकनेवाली वस्तुओंमें परस्पर संयोग-सम्बन्ध होता है और अयुत- सिद्ध अर्थात् अलग-अलग न रहनेवाली वस्तुओंमें समवाय-सम्बन्ध होता है। रज्जु (रस्सी) और घट—ये युतसिद्ध वस्तुएँ हैं, अतः इनमें संयोग- सम्बन्ध ही स्थापित हो सकता है। तन्तु और वस्त्र—ये अयुतसिद्ध वस्तुएँ हैं, अतः इनमें सदा समवाय-सम्बन्ध रहता है। यद्यपि कारणसे कार्य अत्यन्त भिन्न है तो भी उनके मतमें समवायि कारण और कार्यका पारस्परिक सम्बन्ध 'समवाय' कहा गया है। इसके अनुसार दो अणुओंसे उत्पन्न होनेवाला 'द्व्यणुक' नामक कार्य उन अणुओंसे भिन्न होकर भी समवाय-सम्बन्धके द्वारा उनसे सम्बद्ध होता है, ऐसा मान लेनेपर, जैसे द्व्यणुक उन अणुओंसे भिन्न है, उसी प्रकार 'समवाय' भी समवायीसे भिन्न है। भेदकी दृष्टिसे दोनोंमें समानता है। अतः जैसे द्व्यणुक समवाय-सम्बन्धके द्वारा उन दो अणुओंसे सम्बद्ध माना गया है, उसी प्रकार समवाय भी अपने समवायीके साथ नूतन समवाय-सम्बन्धके द्वारा सम्बद्ध माना जा सकता है। इस प्रकार एकके बाद दूसरे समवाय-सम्बन्धकी कल्पना होती रहेगी और इस परम्पराका कहीं भी अन्त न होनेके कारण अनवस्था दोष प्राप्त होगा। अतः समवाय- सम्बन्ध सिद्ध न हो सकनेके कारण दो अणुओंसे द्व्यणुककी उत्पत्ति आदि क्रमसे जगत्की सृष्टि नहीं हो सकती। सम्बन्ध— यदि परमाणुओंमें सृष्टि और प्रलयके निमित्त क्रियाका होना स्वाभाविक मान लें तो क्या आपत्ति है? इसपर कहते हैं— नित्यमेव च भावात् ॥ २।२।१४॥ च=इसके सिवा (परमाणुओंमें प्रवृत्ति या निवृत्तिका कर्म स्वाभाविक माननेपर); नित्यम्=सदा; एव=ही; भावात्=सृष्टि या प्रलयकी सत्ता बनी रहेगी, इसलिये (परमाणुकारणवाद असंगत है)।

१८२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

१८२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ व्याख्या—परमाणुवादी परमाणुओंको नित्य मानते हैं, अतः उनका जैसा भी स्वभाव माना जाय, वह नित्य ही होगा। यदि ऐसा मानें कि उनमें प्रवृत्ति-मूलक कर्म स्वभावतः होता है, तब तो सदा ही सृष्टि होती रहेगी, कभी भी प्रलय नहीं होगा। यदि उनमें निवृत्ति-मूलक कर्मका होना स्वाभाविक मानें तब तो सदा संहार ही बना रहेगा, सृष्टि नहीं होगी। यदि दोनों प्रकारके कर्मोंको उनमें स्वाभाविक माना जाय तो यह असंगत जान पड़ता है; क्योंकि एक ही तत्त्वमें परस्परविरुद्ध दो स्वभाव नहीं रह सकते। यदि उनमें दोनों तरहके कर्मोंका न होना ही स्वाभाविक मान लिया जाय तब तो यह स्वीकार करना पड़ेगा कि कोई निमित्त प्राप्त होनेपर ही उनमें प्रवृत्ति एवं निवृत्ति-सम्बन्धी कर्म भी हो सकते हैं; परंतु उनके द्वारा माने हुए निमित्तसे सृष्टिका आरम्भ न होना पहले ही सिद्ध कर दिया गया है, इसलिये यह परमाणुकारणवाद सर्वथा अयुक्त है। सम्बन्ध—अब परमाणुओंकी नित्यतामें ही संदेह उपस्थित करते हुए परमाणुकारणवादकी व्यर्थता सिद्ध करते हैं— रूपादिमत्त्वाच्च विपर्ययो दर्शनात्॥ २। २। १५॥ च=तथा; रूपादिमत्त्वात्=परमाणुओंको रूप, रस आदि गुणोंवाला माना गया है, इसलिये; विपर्ययः =उनमें नित्यताके विपरीत अनित्यताका दोष उपस्थित होता है; दर्शनात्=क्योंकि ऐसा ही देखा जाता है। व्याख्या—वैशेषिक मतमें परमाणु नित्य होनेके साथ-साथ रूप, रस आदि गुणोंसे युक्त भी माने गये हैं। इससे उनमें नित्यताके विपरीत अनित्यताका दोष उपस्थित होता है; रूपादि गुणोंसे युक्त होनेपर वे नित्य नहीं माने जा सकते, क्योंकि रूप आदि गुणवाली जो घट आदि वस्तुएँ हैं, उनकी अनित्यता प्रत्यक्ष देखी जाती है। यदि उन परमाणुओंको रूप, रस आदि गुणोंसे रहित मानें तो उनके कार्यमें रूप आदि गुण नहीं होने चाहिये। इसके सिवा वैसा न माननेपर 'रूपादिमन्तो नित्याश्च'—रूपादि गुणोंसे युक्त और

सूत्र १६ ] अध्याय २ १८३ नित्य हैं, इस प्रतिज्ञाकी सिद्धि नहीं होती। इस प्रकार अनुपपत्तियोंसे भरा हुआ यह परमाणुवाद कदापि सिद्ध नहीं होता। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे परमाणुवादको सदोष सिद्ध करते हैं— उभयथा च दोषात्॥ २। २। १६॥ उभयथा=परमाणुओंको न्यूनाधिक गुणोंसे युक्त मानें या गुणरहित मानें, दोनों प्रकारसे; च=ही; दोषात्=दोष आता है, इसलिये (परमाणुवाद सिद्ध नहीं होता।) व्याख्या—पृथिवी आदि भूतोंमेंसे किसीमें अधिक और किसीमें कम गुण देखे जाते हैं, इससे उनके आरम्भक परमाणुओंमें भी न्यूनाधिक गुणोंकी स्थिति माननी होगी। ऐसी दशामें यदि उनको अधिक गुणोंसे युक्त माना जाय तब तो सभी कार्योंमें उतने ही गुण होने चाहिये; क्योंकि कारणके गुण कार्यमें समानजातीय गुणान्तर प्रकट करते हैं। उस दशामें जलमें भी गन्ध और तेजमें भी गन्ध एवं रस प्रकट होनेका दोष प्राप्त होगा। अधिक गुणवाली पृथिवीमें स्थूलता नामक गुण देखा जाता है, यही गुण कारणभूत परमाणुमें मानना पड़ेगा। यदि ऐसा मानें कि उनमें न्यूनतम अर्थात् एक-एक गुण ही हैं तब तो सभी स्थूल भूतोंमें एक-एक गुण ही प्रकट होना चाहिये। उस अवस्थामें तेजमें स्पर्श नहीं होगा, जलमें रूप और स्पर्श नहीं रहेंगे तथा पृथिवीमें रस, रूप एवं स्पर्शका अभाव होगा; क्योंकि उनके परमाणुओंमें एकसे अधिक गुणका अभाव है। यदि उनमें सर्वथा गुणोंका अभाव मान लें तो उनके कार्योंमें जो गुण प्रकट होते हैं, वे उन कारणोंके विपरीत होंगे। यदि कहें कि विभिन्न भूतोंके अनुसार उनके कारणोंमें कहीं अधिक, कहीं कम गुण स्वीकार करनेसे दोष नहीं आवेगा; तो ठीक नहीं है; क्योंकि जिन परमाणुओंमें अधिक गुण माने जायँगे, उनकी परमाणुता ही नहीं रह जायगी; अतः परमाणुवाद किसी भी युक्तिसे सिद्ध नहीं होता है। सम्बन्ध—अब परमाणुवादको अग्राह्य बताते हुए इस प्रकरणको समाप्त करते हैं—

१८४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

१८४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ अपरिग्रहाच्चात्यन्तमनपेक्षा ॥ २ । २ । १७ ॥ अपरिग्रहात् = परमाणुकारणवादको शिष्ट पुरुषोंने ग्रहण नहीं किया है, इसलिये; च = भी; अत्यन्तम् अनपेक्षा = इसकी अत्यन्त उपेक्षा करनी चाहिये। व्याख्या — पूर्वोक्त प्रधानकारणवादमें अंशतः सत्कार्यवादका निरूपण है। अतः उस सत्कार्यवादरूप अंशको मनु आदि शिष्ट पुरुषोंने ग्रहण किया है, परंतु इस परमाणुकारणवादको तो किसी भी श्रेष्ठ पुरुषने स्वीकार नहीं किया है, अतः यह सर्वथा उपेक्षणीय है। सम्बन्ध — ग्यारहवेंसे सत्रहवेंतक सात सूत्रोंमें परमाणुवादका खण्डन किया गया। अब क्षणिकवादका निराकरण करनेके लिये यह प्रकरण आरम्भ करते हैं— समुदाये उभयहेतुकेऽपि तदप्राप्तिः ॥ २ । २ । १८ ॥ उभयहेतुके = परमाणुहेतुक बाह्य समुदाय और स्कन्धहेतुक आभ्यन्तर समुदाय ऐसे दो प्रकारके; समुदाये = समुदायको स्वीकार कर लेनेपर; अपि = भी; तदप्राप्तिः = उस समुदायकी प्राप्ति (सिद्धि) नहीं होती है। व्याख्या — बौद्धमतके अनुयायी परस्पर किंचित् मतभेदको लेकर चार श्रेणियोंमें विभक्त हो गये हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—वैभाषिक, सौत्रान्तिक, योगाचार तथा माध्यमिक। इनमें वैभाषिक और सौत्रान्तिक ये दोनों बाह्य पदार्थोंकी सत्ता स्वीकार करते हैं। दोनोंमें अन्तर इतना ही है कि वैभाषिक प्रत्यक्ष दीखनेवाले बाह्य पदार्थोंका अस्तित्व मानता है और सौत्रान्तिक विज्ञानसे अनुमित बाह्य पदार्थोंकी सत्ता स्वीकार करता है। वैभाषिकके मतमें घट आदि बाह्य पदार्थ प्रत्यक्ष प्रमाणके विषय हैं। सौत्रान्तिक घट आदिके रूपमें उत्पन्न विज्ञानको ही प्रत्यक्ष मानता है और उसके द्वारा घटादि पदार्थोंकी सत्ताका अनुमान करता है। योगाचारके मतमें ‘निरालम्ब विज्ञान’ मात्रकी ही सत्ता है, बाह्य पदार्थ स्वप्नमें देखी जानेवाली वस्तुओंकी भाँति मिथ्या है। माध्यमिक सबको शून्य ही मानता है। उसके मतमें दीपशिखाकी भाँति संस्कारवश क्षणिक विज्ञानकी धारा ही बाह्य पदार्थोंके रूपमें प्रतीत होती है। जैसे

सूत्र १८ ] अध्याय २ १८५

दीपककी शिखा प्रतिक्षण मिट रही है, फिर भी एक धारा-सी बनी रहनेके कारण उसकी प्रतीति होती है, उसी प्रकार बाह्य पदार्थ भी प्रतिक्षण नष्ट हो रहे हैं, उनकी विज्ञान-धारामात्र प्रतीत होती है। जैसे तैल चुक जानेपर दीपशिखा बुझ जाती है, उसी प्रकार संस्कार नष्ट होनेपर विज्ञान-धारा भी शान्त हो जाती है। इस प्रकार अभाव या शून्यताकी प्राप्ति ही उसकी मान्यताके अनुसार अपवर्ग या मुक्ति है। इस सूत्रमें वैभाषिक तथा सौत्रान्तिकके मतको एक मानकर उसका निराकरण किया जाता है। उन दोनोंकी मान्यताका स्वरूप इस प्रकार है— रूप, विज्ञान, वेदना, संज्ञा तथा संस्कार—ये पाँच स्कन्ध हैं। पृथिवी आदि चार भूत तथा भौतिक वस्तुएँ—शरीर, इन्द्रिय और विषय—ये 'रूपस्कन्ध' कहलाते हैं। पार्थिव परमाणु रूप, रस, गन्ध और स्पर्श—इन चार गुणोंसे युक्त एवं कठोर स्वभाववाले होते हैं; वे ही समुदायरूपमें एकत्र हो पृथिवीके आकारमें संगठित होते हैं। जलीय परमाणु, रूप, रस और स्पर्श—इन तीनोंसे युक्त एवं स्निग्ध स्वभावके होते हैं, वे ही जलके आकारमें संगठित होते हैं। तेजके परमाणु रूप और स्पर्श गुणसे युक्त एवं उष्ण स्वभाववाले हैं; वे अग्निके आकारमें संगठित हो जाते हैं। वायुके परमाणु स्पर्शकी योग्यतावाले एवं गतिशील होते हैं; वे ही वायुरूपमें संगठित होते हैं। फिर पृथिवी आदि चार भूत शरीर, इन्द्रिय और विषयरूपमें संगठित होते हैं। इस तरह ये चार प्रकारके क्षणिक परमाणु हैं, जो भूत-भौतिक संघातकी उत्पत्तिमें कारण बनते हैं। यह परमाणुहेतुक भूत-भौतिक वर्ग ही रूपस्कन्ध एवं बाह्य समुदाय कहलाता है। 'विज्ञानस्कन्ध' कहते हैं आभ्यन्तरिक विज्ञानके प्रवाहको। इसीमें 'मैं' की प्रतीति होती है। यही घट-ज्ञान; पट-ज्ञान आदिके रूपमें अविच्छिन्न धाराकी भाँति स्थित है। इसीको कर्ता, भोक्ता और आत्मा कहते हैं। इसीसे सारा लौकिक व्यवहार चलता है। सुख-दुःख आदिकी अनुभूतिका नाम 'वेदनास्कन्ध' है। उपलक्षणसे जो वस्तुकी प्रतीति करायी जाती है, जैसे ध्वजसे गृहकी और दण्डसे पुरुषकी, उसीका नाम 'संज्ञास्कन्ध'

१८६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

१८६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ है। राग, द्वेष, मोह, मद, मात्सर्य, भय, शोक और विषाद आदि जो चित्तके धर्म हैं, उन्हींको 'संस्कारस्कन्ध' कहते हैं। विज्ञान आदि चार स्कन्ध चित्त- चैत्तिक कहलाते हैं। विज्ञानस्कन्धरूप चित्तका नाम ही आत्मा है; शेष तीन स्कन्ध 'चैत्य' अथवा 'चैत्तिक' हैं। ये सब प्रकारके व्यवहारोंका आश्रय बनकर अन्तःकरणमें संगठित होते हैं। यह चारों स्कन्धोंका समुदाय या चित्त-चैत्तिक वर्ग 'आभ्यन्तर समुदाय' कहा गया है। इन दोनों समुदायोंसे भिन्न और किसी वस्तु (आत्मा, आकाश आदि)-की सत्ता ही नहीं है। ये ही दोनों बाह्य और आभ्यन्तर समुदाय समस्त लोक-व्यवहारके निर्वाहक हैं। इनसे ही सब कार्य चल जाता है, इसलिये नित्य 'आत्मा' को माननेकी आवश्यकता ही नहीं है। इसके उत्तरमें कहा जाता है कि परमाणु जिसमें हेतु बताये गये हैं, वह भूत-भौतिक बाह्य समुदाय और स्कन्धहेतुक आभ्यन्तर समुदाय—ये दोनों प्रकारके समुदाय तुम्हारे कथनानुसार मान लिये जायँ तो भी उक्त समुदायकी सिद्धि असम्भव ही है, क्योंकि समुदायके अन्तर्गत जो वस्तुएँ हैं, वे सब अचेतन हैं, एक-दूसरेकी अपेक्षासे शून्य हैं। अतः उनके द्वारा समुदाय अथवा संघात बना लेना असम्भव है। परमाणु आदि सभी वस्तुएँ तुम्हारी मान्यताके अनुसार क्षणिक भी हैं। एक क्षणमें जो परमाणु हैं, वे दूसरे क्षणमें नहीं हैं। फिर वे क्षणविध्वंसी परमाणु और पृथिवी आदि भूत इस समुदाय या संघातके रूपमें एकत्र होनेका प्रयत्न कैसे कर सकते हैं, कैसे उनका संघात बन सकता है अर्थात् किसी प्रकार और कभी भी नहीं बन सकता; इसलिये उनके संघातपूर्वक जगत्-उत्पत्तकी कल्पना करना सर्वथा युक्तिविरुद्ध है; अतः वैभाषिक और सौत्रान्तिकोंका मत माननेयोग्य नहीं है। सम्बन्ध— पूर्वपक्षीकी ओरसे दिये जानेवाले समाधानका स्वयं उल्लेख करके सूत्रकार उसका खण्डन करते हैं— इतरेतरप्रत्ययत्वादितिचेन्नोत्पत्तिमात्रनिमित्तत्वात्॥ २। २। १९॥ चेत्=यदि कहो; इतरेतरप्रत्ययत्वात्=अविद्या, संस्कार, विज्ञान आदिमेंसे

सूत्र १९ ] अध्याय २ १८७ एक-एक दूसरे-दूसरेके कारण होते हैं, अतः इन्हींसे समुदायकी सिद्धि हो सकती है; इति न = तो यह ठीक नहीं है; उत्पत्तिमात्रनिमित्तत्वात् = क्योंकि ये अविद्या आदि उत्तरोत्तरकी उत्पत्तिमात्रमें ही निमित्त माने गये हैं (समुदाय या संघातमें नहीं; अतः इनसे भी समुदायकी सिद्धि नहीं हो सकती)। व्याख्या—बौद्धशास्त्रमें विज्ञानसंततिके कुछ हेतु माने गये हैं, उनके नाम इस प्रकार हैं—अविद्या, संस्कार, विज्ञान, नाम, रूप, षडायतन स्पर्श, वेदना, तृष्णा, उपादान, भव, जाति, जरा, मरण, शोक, परिदेवना, दुःख तथा दुर्मनस्ता आदि क्षणिक वस्तुओंमें नित्यता और स्थिरता आदिका जो भ्रम है, वही ‘अविद्या’ कहलाता है। यह अविद्या विषयोंमें रागादिरूप ‘संस्कार’ उत्पन्न करनेमें कारण बनती है। वह संस्कार गर्भस्थ शिशुमें आलय ‘विज्ञान’ उत्पन्न करता है। उस आलय-विज्ञानसे पृथिवी आदि चार भूत होते हैं, जो शरीर एवं समुदायके कारण हैं। वही नामका आश्रय होनेसे ‘नाम’ भी कहा गया है। वह नाम ही श्याम-गौर आदि रूपवाले शरीरका उत्पादक होता है। गर्भस्थ शरीरकी जो कलल-बुद्बुद आदि अवस्थाएँ हैं, उन्हींको नाम तथा ‘रूप’ शब्दका वाच्य कहा गया है। पृथिवी आदि चार भूत, नाम, रूप, शरीर, विज्ञान और धातु—ये छः जिनके आश्रय हैं, उन इन्द्रियोंके समूहको ‘षडायतन’ कहा गया है। नाम, रूप तथा इन्द्रियोंके परस्पर सम्बन्धका नाम ‘स्पर्श’ है। उससे सुख आदिकी ‘वेदना’ (अनुभूति) होती है। उससे क्रमशः तृष्णा, उपादान, भव, जाति, जरावस्था, मृत्यु, शोक, परिदेवना तथा दुर्मनस्ता (मनकी उद्विग्नता) आदि भी इसी प्रकार उत्पन्न होते हैं। तत्पश्चात् पुनः अविद्या आदिके क्रमसे पूर्वोक्त सभी बातें प्रकट होती रहती हैं। ये घटीयन्त्र (रहट)-की भाँति निरन्तर चक्कर लगाते हैं, अतः यदि इस मान्यताको लेकर कहा जाय कि इन्हींसे समुदायकी भी सिद्धि हो जाती है तो यह ठीक नहीं है; क्योंकि पूर्वोक्त अविद्या आदिमेंसे जो पूर्ववर्ती है, वह बादमें कहे हुए संस्कार आदिकी उत्पत्तिमात्रमें कारण होता है, संघातकी उत्पत्तिमें नहीं; अतः उसकी सिद्धि असम्भव है।

१८८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

१८८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ सम्बन्ध— पूर्वसूत्रमें यह बात बतायी गयी कि अविद्या आदि हेतु संस्कार आदिकी उत्पत्तिमात्रमें ही निमित्त माने गये हैं, अतः उनसे संघात (समुदाय)- की सिद्धि नहीं हो सकती। अब यह सिद्ध करते हैं कि वे अविद्या आदि हेतु संस्कार आदि भावोंकी उत्पत्तिमें भी निमित्त नहीं हो सकते— उत्तरोत्पादे च पूर्वनिरोधात् ॥ २।२।२०॥ च=तथा; उत्तरोत्पादे=बादमें होनेवाले भावकी उत्पत्तिके समय; पूर्वनिरोधात्=पहले क्षणमें विद्यमान कारणका नाश हो जाता है, इसलिये (पूर्वोक्त अविद्या आदि हेतु, संस्कार आदि उत्तरोत्तर भावोंकी उत्पत्तिमें कारण नहीं हो सकते)। व्याख्या—घट और वस्त्र आदिमें यह प्रत्यक्ष देखा जाता है कि कारणभूत मृत्तिका और तन्तु आदि अपने कार्यके साथ विद्यमान रहते हैं। तभी उनमें कार्य-कारणभावकी सिद्धि होती है; किंतु बौद्धमतमें समस्त पदार्थोंका प्रत्येक क्षणमें नाश माना गया है, अतः उनके मतानुसार कार्यमें कारणकी विद्यमानता सिद्ध नहीं होगी। जिस क्षणमें कार्यकी उत्पत्ति होगी, उसी क्षणमें कारणका निरोध अर्थात् विनाश हो जायगा; इसलिये उनकी मान्यताके अनुसार कारण-कार्यभावकी सिद्धि न होनेसे वे अविद्या आदि हेतु, संस्कार आदि उत्तरोत्तर भावोंकी उत्पत्तिके कारण नहीं हो सकते। सम्बन्ध—कारणके न रहनेपर भी कार्यकी उत्पत्ति मान लें तो क्या आपत्ति है? इसपर कहते हैं— असति प्रतिज्ञोपरोधो यौगपद्यमन्यथा ॥ २।२।२१॥ असति=कारणके न रहनेपर (भी कार्यकी उत्पत्ति माननेसे); प्रतिज्ञोपरोधः=प्रतिज्ञा भंग होगी; अन्यथा=नहीं तो; यौगपद्यम्=कारण और कार्यकी एक कालमें सत्ता माननी पड़ेगी। व्याख्या—बौद्धमतमें चार हेतुओंसे विज्ञानकी उत्पत्ति मानी गयी है,

सूत्र २२ ] अध्याय २ १८९

सूत्र २२ ] अध्याय २ १८९ उनके नाम इस प्रकार हैं- अधिपतिप्रत्यय, सहकारिप्रत्यय, समनन्तरप्रत्यय और आलम्बनप्रत्यय। ये क्रमशः इन्द्रिय, प्रकाश, मनोयोग और विषयके पर्याय हैं। इन चारों हेतुओंके होनेपर ही विज्ञानकी उत्पत्ति होती है, यह उनकी प्रतिज्ञा है। यदि कारणके बिना ही कार्यकी उत्पत्ति मानी जाय तो उक्त प्रतिज्ञा भंग होगी और यदि ऐसा नहीं मानते हैं तो कारण और कार्य दोनोंकी एक कालमें सत्ता माननी पड़ेगी; अतः किसी प्रकार भी उनका मत समीचीन अथवा उपादेय नहीं है। सम्बन्ध - बौद्धमतानुयायी यह मानते हैं कि प्रतिसंख्या-निरोध, अप्रति- संख्यानिरोध तथा आकाश- इन तीनोंके अतिरिक्त समस्त वस्तुएँ क्षणिक (प्रतिक्षण नष्ट होनेवाली) हैं। दोनों निरोध और आकाश तो कोई वस्तु ही नहीं हैं, ये अभावमात्र हैं। निरोध तो विनाशका बोधक होनेसे अभाव है ही, आकाश भी आवरणका अभावमात्र ही है। इनमेंसे आकाशकी अभावरूपताका निराकरण तो २४ वें सूत्रमें किया जायगा। यहाँ उनके माने हुए दो प्रकारके निरोधोंका निराकरण करनेके लिये कहते हैं- प्रतिसंख्याप्रतिसंख्यानिरोधाप्राप्तिरविच्छेदात् ॥ २।२।२२॥ प्रतिसंख्याप्रतिसंख्यानिरोधाप्राप्तिः = प्रतिसंख्यानिरोध और अप्रति- संख्यानिरोध - इन दो प्रकारके निरोधोंकी सिद्धि नहीं हो सकती; अविच्छेदात् = क्योंकि संतान (प्रवाह)-का विच्छेद नहीं होता। व्याख्या- उनके मतमें जो बुद्धिपूर्वक सहेतुक विनाश है उसका नाम प्रतिसंख्यानिरोध है। यह तो पूर्णज्ञानसे होनेवाले आत्यन्तिक प्रलयका वाचक है। दूसरा जो स्वभावसे ही बिना किसी निमित्तके अबुद्धिपूर्वक विनाश होता है, उसका नाम अप्रतिसंख्यानिरोध है। यह स्वाभाविक प्रलय है। यह दोनों प्रकारका निरोध - किसी वस्तुका न रहना उनके मतानुसार सिद्ध नहीं हो सकता; क्योंकि वे समस्त पदार्थोंको प्रतिक्षण विनाशशील मानते हैं और असत् कारणोंसे 'सत्' कार्यकी उत्पत्ति भी प्रतिक्षण स्वीकार करते हैं। इस मान्यताके अनुसार एक पदार्थका नाश और दूसरेकी उत्पत्तिका क्रम विद्यमान

१९० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ रहनेसे दोनोंकी परम्परा निरन्तर चलती ही रहेगी। इसके रुकनेका कोई भी कारण उनकी मान्यताके अनुसार नहीं है। इसीलिये किसी प्रकारके निरोधकी सिद्धि नहीं होगी। सम्बन्ध— बौद्धमतवाले ऐसा मानते हैं कि सब पदार्थ क्षणिक और असत्य होते हुए भी भ्रान्तिरूप अविद्याके कारण स्थिर और सत्य प्रतीत होते हैं। ज्ञानके द्वारा अविद्याका अभाव होनेसे सबका अभाव हो जाता है। इस प्रकार बुद्धिपूर्वक निरोधकी सिद्धि होती है। इसका निराकरण करनेके लिये कहते हैं— उभयथा च दोषात्॥ २। २। २३॥ उभयथा=दोनों प्रकारसे; च=भी; दोषात्=दोष आता है, इसलिये (उनकी मान्यता युक्तिसंगत नहीं है)। व्याख्या—यदि यह माना जाय कि भ्रान्तिरूप अविद्यासे प्रतीत होनेवाला यह जगत् पूर्ण ज्ञानसे अविद्याका नाश होनेपर उसीके साथ नष्ट हो जाता है तब तो जो बिना कारणके अपने-आप विनाश—सब पदार्थोंका अभाव माना गया है, उस अप्रतिसंख्यानिरोधकी मान्यतामें विरोध आवेगा तथा यदि यह माना जाय कि भ्रान्तिसे प्रतीत होनेवाला जगत् बिना पूर्ण ज्ञानके अपने-आप नष्ट हो जाता है, तब ज्ञान और उसके साधनका उपदेश व्यर्थ होगा। अतः उनका मत किसी प्रकार भी युक्तिसंगत नहीं है। सम्बन्ध—अब आकाश कोई पदार्थ नहीं, किंतु आवरणका अभावमात्र है, इस मान्यताका खण्डन करते हैं— आकाशे चाविशेषात्॥ २। २। २४॥ आकाशे=आकाशके विषयमें; च=भी, उनकी मान्यता ठीक नहीं है; अविशेषात्=क्योंकि अन्य भाव-पदार्थोंसे उसमें कोई विशेषता नहीं है। व्याख्या—पृथिवी, जल आदि जितने भी भाव-पदार्थ देखे जाते हैं, उन्हींकी भाँति आकाश भी भावरूप है। आकाशकी भी सत्ताका सबको बोध

सूत्र २५ ] अध्याय २ १९१

सूत्र २५ ] अध्याय २ १९१ होता है। पृथिवी गन्धका, जल रसका, तेज रूपका तथा वायु स्पर्शका आश्रय है; इसी प्रकार शब्दका भी कोई आश्रय होना चाहिये। आकाश ही उसका आश्रय है; आकाशमें ही शब्दका श्रवण होता है। यदि आकाश न हो तो शब्दका श्रवण ही नहीं हो सकता। प्रत्येक वस्तुके लिये आधार और अवकाश (स्थान) चाहिये। आकाश ही शेष चार भूतोंका आधार है तथा वही सम्पूर्ण जगत्को अवकाश देता है। इससे भी आकाशकी सत्ता प्रत्यक्ष है। पक्षी आकाशमें चलनेके कारण ही खग या विहंग कहलाते हैं। कोई भी भाव-पदार्थ अभावमें नहीं विचरण करता है। श्रुतिने परमात्मासे आकाशकी उत्पत्ति स्पष्ट शब्दोंमें स्वीकार की है—‘आत्मन आकाशः सम्भूतः।' (तै० उ० २। १) इस प्रकार युक्ति तथा प्रमाणसे भी आकाशकी सत्ता सिद्ध है; कोई ऐसा विशेष कारण नहीं है, जिससे आकाशको भावरूप न माना जा सके। अतः आकाशकी अभावरूपता किसी प्रकार सिद्ध न होनेके कारण बौद्धोंकी मान्यता युक्तिसंगत नहीं है। सम्बन्ध— बौद्धोंके मतमें 'आत्मा' भी नित्य वस्तु नहीं, क्षणिक है; अतः उनकी इस मान्यताका खण्डन करते हुए कहते हैं— अनुस्मृतेश्च ॥ २। २। २५ ॥ अनुस्मृतेः = पहलेके अनुभवोंका बारम्बार स्मरण होता है, (इसलिये अनुभव करनेवाला आत्मा क्षणिक नहीं है) इस युक्तिसे; च= भी (बौद्धमत असंगत सिद्ध होता है)। व्याख्या—सभी मनुष्योंको अपने पहले किये हुए अनुभवोंका बारम्बार स्मरण होता है। जैसे 'मैंने अमुक दिन अमुक ग्राममें अमुक वस्तु देखी थी, मैं बालकपनमें अमुक खेल खेला करता था। मैंने आजसे बीस वर्ष पहले जिसे देखा था, वही यह है' इत्यादि। इस प्रकार पूर्व अनुभवोंका जो बारम्बार स्मरण होता है, उसे 'अनुस्मृति' कहते हैं। यह तभी हो सकती है, जब कि अनुभव करनेवाला आत्मा नित्य माना जाय। उसे क्षणिक माननेसे यह स्मरण

१९२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

१९२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ नहीं बन सकता; क्योंकि एक क्षण पहले जो अनुभव करनेवाला था, वह दूसरे क्षणमें नहीं रहता। बहुत वर्षोंमें तो असंख्य क्षणोंके भीतर असंख्य बार आत्माका परिवर्तन हो जायगा। अतः उक्त अनुस्मृति होनेके कारण यही सिद्ध होता है कि आत्मा क्षणिक नहीं, किंतु नित्य है। इसीलिये बौद्धोंका क्षणिकवाद सर्वथा अनुपपन्न है। सम्बन्ध—बौद्धोंका यह कथन है कि 'जब बोया हुआ बीज स्वयं नष्ट होता है, तभी उससे अंकुर उत्पन्न होता है। दूधको मिटाकर दही बनता है, इसी प्रकार कारण स्वयं नष्ट होकर ही कार्य उत्पन्न करता है।' इस तरह अभावसे ही भावकी उत्पत्ति होती है। उनकी इस धारणाका खण्डन करनेके लिये सूत्रकार कहते हैं— नासतोऽदृष्टत्वात् ॥ २।२।२६ ॥ असतः=असत्‌से (कार्यकी उत्पत्ति); न=नहीं हो सकती; अदृष्टत्वात्=क्योंकि ऐसा देखा नहीं गया है। व्याख्या—खरगोशके सींग, आकाशके फूल और वन्ध्या-पुत्र आदि केवल वाणीसे ही कहे जाते हैं, वास्तवमें हैं नहीं; तथा आकाशमें नीलापन और तिरवरे आदि बिना हुए ही प्रतीत होते हैं; ऐसे असत् पदार्थोंमें किसी कार्यकी उत्पत्ति या सिद्धि नहीं देखी जाती है। उनसे विपरीत जो मिट्टी, जल आदि सत् पदार्थ हैं, उनसे घट और बर्फ आदि कार्योंकी उत्पत्ति प्रत्यक्ष देखी जाती है। इससे यही सिद्ध होता है कि जो वास्तवमें नहीं है, केवल वाणीसे जिसका कथनमात्र होता है, अथवा जो बिना हुए ही प्रतीत हो रहा है, उससे कार्यकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। बीज और दूधका अभाव नहीं होता। किंतु रूपान्तरमात्र होता है; अतः जगत्‌का कारण सत् है और वह सर्वथा सत्य है। इसलिये बौद्धोंकी उपर्युक्त मान्यता असंगत है। सम्बन्ध—किसी नित्य चेतन कर्ताके बिना क्षणिक पदार्थोंसे अपने- आप कार्य उत्पन्न होते हैं, इस मान्यताका खण्डन दूसरी युक्तिके द्वारा करते हैं—

सूत्र २७-२८ ] अध्याय २ १९३ उदासीनानामपि चैवं सिद्धिः ॥ २ । २ । २७ ॥ च=इसके सिवा; एवम्=इस प्रकार (बिना कर्ताके स्वतः कार्यकी उत्पत्ति) माननेपर; उदासीनानाम्=उदासीन (कार्य-सिद्धिके लिये चेष्टा न करनेवाले) पुरुषोंका; अपि=भी; सिद्धिः=कार्य सिद्ध हो सकता है। व्याख्या—यदि ऐसा माना जाय कि 'कार्यकी उत्पत्ति होनेमें किसी नित्य चेतन कर्ताकी आवश्यकता नहीं है, क्षणिक पदार्थोंके समुदायसे अपने- आप कार्य उत्पन्न हो जाता है,' तब तो जो लोग उदासीन रहते हैं, कार्य आरम्भ नहीं करते या उसकी सिद्धिकी चेष्टासे विरत रहते हैं, उनके कार्य भी पदार्थगत शक्तिसे अपने-आप सिद्ध हो जाने चाहिये। परंतु ऐसा नहीं देखा जाता। इससे यही सिद्ध होता है कि उपर्युक्त मान्यता समीचीन नहीं है। सम्बन्ध—यहाँतक बौद्धोंके क्षणिकवादका खण्डन किया गया। अब विज्ञानवादका खण्डन करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। विज्ञानवादी बौद्ध (योगाचार) मानते हैं कि प्रतीत होनेवाला बाह्य पदार्थ वास्तवमें कुछ नहीं है, केवलमात्र स्वप्नकी भाँति बुद्धिकी कल्पना है; इस मान्यताका खण्डन करते हैं— नाभाव उपलब्धेः ॥ २ । २ । २८ ॥ अभावः=जाननेमें आनेवाले पदार्थोंका अभाव; न=नहीं है; उपलब्धेः= क्योंकि उनकी उपलब्धि होती है। व्याख्या—जाननेमें आनेवाले बाह्य पदार्थ मिथ्या नहीं हैं, वे कारणरूपमें तथा कार्यरूपमें भी सदा ही सत्य हैं। इसलिये उनकी प्रत्यक्ष उपलब्धि होती है। यदि वे स्वप्नगत पदार्थों तथा आकाशमें दीखनेवाली नीलिमा आदिकी भाँति सर्वथा मिथ्या होते तो इनकी उपलब्धि नहीं होती। सम्बन्ध—विज्ञानवादियोंकी ओरसे यह कहा जा सकता है कि 'उपलब्धिमात्रसे पदार्थकी सत्ता सिद्ध नहीं हो सकती; क्योंकि स्वप्नमें प्रतीत होनेवाले तथा बाजीगरद्वारा उपस्थित किये जानेवाले पदार्थ यद्यपि सत्य नहीं होते तो भी इनकी उपलब्धि देखी जाती है, इसपर कहते हैं—

१९४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ वैधर्म्याच्च न स्वप्नादिवत् ॥ २।२।२९॥ वैधर्म्यात् = जाग्रत् अवस्थामें उपलब्ध होनेवाले पदार्थोंसे स्वप्न आदिमें प्रतीत होनेवाले पदार्थोंके धर्ममें भेद होनेके कारण; च = भी; (जाग्रत्में उपलब्ध होनेवाले पदार्थ) स्वप्नादिवत् = स्वप्नादिमें उपलब्ध पदार्थोंकी भाँति; न = मिथ्या नहीं हैं। व्याख्या - स्वप्नावस्था में प्रतीत होनेवाले पदार्थ पहलेके देखे, सुने और अनुभव किये हुए ही होते हैं, तथा वे जागनेपर उपलब्ध नहीं होते। एकके स्वप्नकी घटना दूसरेको नहीं दीखती। उसी प्रकार बाजीगरद्वारा कल्पित पदार्थ भी थोड़ी देरके बाद नहीं उपलब्ध होते। मरुभूमिकी तप्त बालुकाराशिमें प्रतीत होनेवाले जल, सीपमें दीखनेवाली चाँदी तथा भ्रमवश प्रतीत होनेवाली दूसरी किसी वस्तुकी भी सत्तारूपसे उपलब्धि नहीं होती है। परंतु जो जाग्रत्-कालमें प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाली वस्तुएँ हैं, उनके विषयमें ऐसी बात नहीं है। वे एक ही समय बहुतोंको समानरूपसे उपलब्ध होती हैं, कालान्तरमें भी उनकी उपलब्धि देखी जाती है। एक प्रकारका आकार नष्ट कर दिया जानेपर भी दूसरे आकारमें उनकी सत्ता विद्यमान रहती है। इस प्रकार स्वप्नादिमें भ्रान्तिसे प्रतीत होनेवाले पदार्थोंके और सत्पदार्थोंके धर्मोंमें बहुत अन्तर है। इसलिये स्वप्नादिके दृष्टान्तके बलपर यह कहना उपयुक्त नहीं है कि 'उपलब्धिमात्रसे पदार्थकी सत्ता सिद्ध नहीं होती।' सम्बन्ध - विज्ञानवादी ऐसा कहते हैं कि बाह्य पदार्थ न होनेपर भी पूर्ववासनाके कारण बुद्धिद्वारा उन विचित्र पदार्थोंका उपलब्ध होना सम्भव है, अतः इसका खण्डन करते हैं- न भावोऽनुपलब्धेः ॥ २।२।३०॥ भावः = विज्ञानवादियोंद्वारा कल्पित वासनाकी सत्ता; न = सिद्ध नहीं होती; अनुपलब्धेः = क्योंकि उनके मतके अनुसार बाह्य पदार्थोंकी उपलब्धि ही नहीं हो सकती।

सूत्र ३१-३२ ] अध्याय २ १९५

सूत्र ३१-३२ ] अध्याय २ १९५ व्याख्या—जो वस्तु पहले उपलब्ध हो चुकी है, उसीके संस्कार बुद्धिमें जमते हैं और वे ही वासनारूपसे स्फुरित होते हैं। पदार्थोंकी सत्ता स्वीकार न करनेसे उनकी उपलब्धि नहीं होगी और उपलब्धि सिद्ध हुए बिना पूर्व अनुभवके अनुसार वासनाका होना सिद्ध नहीं होगा। इसलिये विज्ञानवादियोंकी मान्यता ठीक नहीं है। बाह्य पदार्थोंको सत्य मानना ही युक्तिसंगत है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे वासनाका खण्डन करते हैं— क्षणिकत्वाच्च ॥ २।२।३१ ॥ क्षणिकत्वात्=बौद्धमतके अनुसार वासनाकी आधारभूता बुद्धि भी क्षणिक है, इसलिये; च=भी (वासनाकी सत्ता सिद्ध नहीं होती)। व्याख्या—वासनाकी आधारभूत जो बुद्धि है, उसे भी विज्ञानवादी क्षणिक मानते हैं। इसलिये वासनाके आधारकी स्थिर सत्ता न होनेके कारण निराधार वासनाका अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता, इसलिये भी बौद्धमत भ्रान्तिपूर्ण है। सम्बन्ध—अब सूत्रकार बौद्धमतमें सब प्रकारकी अनुपपत्ति होनेके कारण उसकी अनुपयोगिता सूचित करते हुए इस प्रकरणका उपसंहार करते हैं— सर्वथानुपपत्तेश्च ॥ २।२।३२ ॥ (विचार करनेपर बौद्धमतमें) सर्वथा=सब प्रकारसे; अनुपपत्तेः= अनुपपत्ति (असंगति) दिखायी देती है; इसलिये; च=भी (बौद्धमत उपादेय नहीं है)। व्याख्या—बौद्धमतकी मान्यताओंपर जितना ही विचार किया जाता है, उतना ही उनकी प्रत्येक बात युक्तिविरुद्ध जान पड़ती है। बौद्धोंकी प्रत्येक मान्यताका युक्तियोंसे खण्डन हो जाता है, अतः वह कदापि उपादेय नहीं है। यहाँ सूत्रकारने प्रसंगका उपसंहार करते हुए माध्यमिक बौद्धोंके सर्वशून्यवादका भी खण्डन कर दिया—यह बात इसीके अन्तर्गत समझ लेनी

१९६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

१९६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ चाहिये। तात्पर्य यह कि क्षणिकवाद और विज्ञानवादका जिन युक्तियोंसे खण्डन किया गया है, उन्हींके द्वारा सर्वशून्यवादका भी खण्डन हो गया; ऐसा मानना चाहिये। सम्बन्ध—यहाँतक बौद्धमतका निराकरण करके अब जैनमतका खण्डन करनेके लिये नया प्रकरण आरम्भ करते हैं। जैनीलोग सप्तभंगी-न्यायके अनुसार एक ही पदार्थकी सत्ता और असत्ता दोनों स्वीकार करते हैं, उनकी इस मान्यताका निराकरण करनेके लिये सूत्रकार कहते हैं— नैकस्मिन्नसम्भवात् ॥ २ । २ । ३३ ॥ एकस्मिन् = एक सत्य पदार्थमें; न = परस्पर-विरुद्ध अनेक धर्म नहीं रह सकते; असम्भवात् = क्योंकि यह असम्भव है। व्याख्या—जैनीलोग सात पदार्थ १ और पंच अस्तिकाय २ मानते हैं और सर्वत्र सप्तभंगी-न्यायकी अवतारणा करते हैं। उनकी मान्यताके अनुसार सप्तभंगी-न्यायका स्वरूप इस प्रकार है—१ स्यादस्ति (पदार्थकी सत्ता है), २ स्यान्नास्ति (प्रकारान्तरसे पदार्थकी सत्ता नहीं है), ३ स्यादस्ति च नास्ति च (हो सकता है कि पदार्थकी सत्ता हो भी और न भी हो), ४ स्यादवक्तव्यः (सम्भव है, वस्तुका स्वरूप कहने या वर्णन करनेयोग्य न हो), ५ स्यादस्ति चावक्तव्यश्च (सम्भव है, वस्तुकी सत्ता हो, पर वह वर्णन करनेयोग्य न हो), ६ स्यान्नास्ति चावक्तव्यश्च (सम्भव है, वस्तुकी सत्ता भी न हो और वह वर्णन करनेयोग्य भी न हो) तथा ७ स्यादस्ति च नास्ति चावक्तव्यश्च (सम्भव है, वस्तुकी सत्ता हो, न भी हो और वह वर्णन करनेयोग्य भी न १-उनके बताये हुए सात पदार्थ इस प्रकार हैं—जीव, अजीव, आस्रव, संवर, निर्जन, बन्ध और मोक्ष। २-पाँच अस्तिकाय इस प्रकार हैं—जीवास्तिकाय, पुद्गलास्तिकाय, धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय तथा आकाशास्तिकाय।

सूत्र ३४ ] अध्याय २ १९७

सूत्र ३४ ] अध्याय २ १९७ हो)। इस तरह वे प्रत्येक पदार्थके विषयमें विकल्प रखते हैं। सूत्रकारने इस सूत्रके द्वारा इसीका निराकरण किया है। उनका कहना है कि जो एक सत्य पदार्थ है, उसके प्रकार-भेद तो हो सकते हैं; परंतु उसमें विरोधी धर्म नहीं हो सकते। जो वस्तु है, उसका अभाव नहीं हो सकता। जो नहीं है, उसकी विद्यमानता नहीं हो सकती। जो नित्य पदार्थ है, वह नित्य ही है, अनित्य नहीं है। जो अनित्य है, वह अनित्य ही है, नित्य नहीं है। इसी प्रकार समझ लेना चाहिये। अतः जैनियोंका प्रत्येक वस्तुको विरुद्ध धर्मोंसे युक्त मानना युक्तिसंगत नहीं है। सम्बन्ध—जैनीलोगोंकी दूसरी मान्यता यह है कि आत्माका माप शरीरके बराबर है, उसमें दोष दिखाते हुए सूत्रकार कहते हैं— एवं चात्माकात्स्न्र्यम्॥ २।२।३४॥ एवं च=इसी प्रकार; आत्माकात्स्न्र्यम्=आत्माको अपूर्ण—एकदेशीय अर्थात् शरीरके बराबर मापवाला मानना भी युक्तिसंगत नहीं है। व्याख्या—जिस प्रकार एक पदार्थमें विरुद्ध धर्मोंको मानना युक्तिसंगत नहीं है, उसी प्रकार आत्माको एकदेशीय अर्थात् शरीरके बराबर मापवाला मानना भी युक्तिसंगत नहीं है; क्योंकि किसी मनुष्यशरीरमें रहनेवाले आत्माको यदि उसके कर्मवश कभी चींटीका शरीर प्राप्त हो तो वह उसमें कैसे समायेगा? इसी तरह यदि उसे हाथीका शरीर मिले तो उसका माप हाथीके बराबर कैसे हो जायगा। इसके सिवा, मनुष्यका शरीर भी जन्मके समय बहुत छोटा-सा होता है, पीछे बहुत बड़ा हो जाता है, तो आत्माका माप किस अवस्थाके शरीरके बराबर मानेंगे? शरीरका हाथ या पैर आदि कोई अंग कट जानेसे आत्मा नहीं कट जाता। इस प्रकार विचार करनेसे आत्माको शरीरके बराबर माननेकी बात भी सर्वथा दोषपूर्ण प्रतीत होती है; अतः जैनमत भी अनुपपन्न होनेके कारण अमान्य है। सम्बन्ध—यदि जैनीलोग यह कहें कि आत्मा छोटे शरीरमें छोटा और

१९८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

१९८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

बड़ेमें बड़ा हो जाता है, इसलिये हमारी मान्यतामें कोई दोष नहीं है, तो इसके उत्तरमें कहते हैं— न च पर्यायादप्यविरोधो विकारादिभ्यः ॥ २।२।३५ ॥ च=इसके सिवा; पर्यायात् = आत्माको घटने-बढ़नेवाला मान लेनेसे; अपि=भी; अविरोधः = विरोधका निवारण; न =नहीं हो सकता; विकारादिभ्यः = क्योंकि ऐसा माननेपर आत्मामें विकार आदि दोष प्राप्त होंगे। व्याख्या—यदि यह मान लिया जाय कि आत्माको जब-जब जैसा मापवाला छोटा-बड़ा शरीर मिलता है, तब-तब वह भी वैसे ही मापवाला हो जाता है, तो भी आत्मा निर्दोष नहीं ठहरता, क्योंकि ऐसा मान लेनेपर उसको विकारी, अवयवयुक्त, अनित्य तथा इसी प्रकार अन्य अनेक दोषोंसे युक्त मानना हो जायगा। जो पदार्थ घटता-बढ़ता है, वह अवयवयुक्त होता है, किंतु आत्मा अवयवयुक्त नहीं माना गया है। घटने-बढ़नेवाला पदार्थ नित्य नहीं हो सकता परंतु आत्माको नित्य माना गया है। घटना और बढ़ना विकार है, यह आत्मामें सम्भव नहीं है; क्योंकि उसे निर्विकार माना गया है। इस प्रकार घटना-बढ़ना माननेसे अनेक दोष आत्मामें प्राप्त हो सकते हैं; अतः जैनियोंकी उपर्युक्त मान्यता युक्तिसंगत नहीं है। सम्बन्ध—जीवात्माको शरीरके बराबर मापवाला मानना सर्वथा असंगत है, इस बातको प्रकारान्तरसे सिद्ध करते हैं— अन्त्यावस्थितेश्चोभयनित्यत्वादविशेषः ॥ २।२।३६ ॥ च=और; अन्त्यावस्थितेः=अन्तिम अर्थात् मोक्षावस्थामें जो जीवका परिमाण है, उसकी नित्य स्थिति स्वीकार की गयी है, इसलिये; उभयनित्य- त्वात् = आदि और मध्य-अवस्थामें जो उसका परिमाण (माप) रहा है, उसको भी नित्य मानना हो जाता है, अतः, अविशेषः=कोई विशेषता नहीं रह जाती (सब शरीरोंमें उसका एक-सा माप सिद्ध हो जाता है)। व्याख्या—जैन-सिद्धान्तमें यह स्वीकार किया गया है कि मोक्षावस्थामें

सूत्र ३७ ] अध्याय २ १९९

सूत्र ३७ ] अध्याय २ १९९ जो जीवका परिमाण है, उसकी नित्यस्थिति है। यह घटता-बढ़ता नहीं है। इस कारण आदि और मध्यकी अवस्थामें भी जो उसका परिमाण है, उसको भी उसी प्रकार नित्य मानना हो जाता है, क्योंकि पहलेका माप अनित्य मान लेनेपर अन्तिम मापको भी नित्य नहीं माना जा सकता। जो नित्य है, वह सदासे ही एक-सा रहता है। बीचमें घटता-बढ़ता नहीं है। इसलिये पहले या बीचकी अवस्थाओंमें जितने शरीर उसे प्राप्त होते हैं, उन सबमें उसका छोटा या बड़ा एक-सा ही माप मानना पड़ेगा। किसी प्रकारकी विशेषताका मानना युक्तिसंगत नहीं होगा। इस प्रकार पूर्वापरकी मान्यतामें विरोध होनेके कारण आत्माको प्रत्येक शरीरके मापवाला मानना सर्वथा असंगत है। अतएव जैन-सिद्धान्त माननेके योग्य नहीं है। सम्बन्ध—इस प्रकार अनीश्वरवादियोंके मतका निराकरण करके अब पाशुपत सिद्धान्तवालोंकी मान्यतामें दोष दिखानेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं— पत्युरसामंजस्यात्॥ २। २। ३७॥ पत्युः = पशुपतिका मत भी आदरणीय नहीं है; असामंजस्यात् = क्योंकि वह युक्तिविरुद्ध है। व्याख्या—पशुपति-मतको माननेवालोंकी कल्पना बड़ी विचित्र है। इनके मतमें तत्त्वोंकी कल्पना वेदविरुद्ध है तथा मुक्तिके साधन भी ये लोग वेदविरुद्ध ही मानते हैं। उनका कथन है कि कण्ठी, रुचिका, कुण्डल, जटा, भस्म और यज्ञोपवीत—ये छः मुद्राएँ हैं। इनके द्वारा जो अपने शरीरको मुद्रित अर्थात् चिह्नित कर लेता है, वह इस संसारमें पुनः जन्म नहीं धारण करता। हाथमें रुद्राक्षका कंकण पहनना, मस्तकपर जटा धारण करना, मुर्देकी खोपड़ी लिये रहना तथा शरीरमें भस्म लगाना—इन सबसे मुक्ति मिलती है। इत्यादि प्रकारसे वे चिह्न धारण करनेमात्रसे भी मोक्ष होना मानते हैं। इसके सिवा, वे महेश्वरको केवल निमित्त कारण तथा प्रधानको उपादान कारण मानते हैं। ये सब बातें युक्तिसंगत नहीं हैं; इसलिये यह मत माननेयोग्य नहीं है।

२०० वेदान्त-दर्शन [ पाद २

२०० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ सम्बन्ध—अब पाशुपतोंके दार्शनिक मत निमित्तकारणवादका खण्डन करते हैं— सम्बन्धानुपपत्तेश्च ॥ २।२।३८ ॥ सम्बन्धानुपपत्तेः = सम्बन्धकी सिद्धि न होनेसे; च = भी (यह मान्यता असंगत है)। व्याख्या—पाशुपतोंकी मान्यताके अनुसार यदि ईश्वरको केवल निमित्त कारण माना जाय तो उपादान कारणके साथ उसका किस प्रकार सम्बन्ध होगा, यह बताना आवश्यक है। लोकमें यह देखा जाता है कि शरीरधारी निमित्त कारण कुम्भकार आदि ही घट आदि कार्यके लिये मृत्तिका आदि साधनोंके साथ अपना संयोगसम्बन्ध स्थापित करते हैं; किंतु ईश्वर शरीरादिसे रहित निराकार है, अतः उसका प्रधान आदिके साथ संयोगरूप सम्बन्ध नहीं हो सकता। अतएव उसके द्वारा सृष्टिरचना भी नहीं हो सकेगी। जो लोग वेदको प्रमाण मानते हैं, उनको तो सब बातें युक्तिसे सिद्ध करनेकी आवश्यकता नहीं पड़ती, क्योंकि वे परब्रह्म परमेश्वरको वेदके कथनानुसार सर्वशक्तिमान् मानते हैं, अतः वह शक्तिशाली परमेश्वर स्वयं ही निमित्त और उपादान कारण हो सकता है। वेदोंके प्रति जिनकी निष्ठा है, उनके लिये युक्तिका कोई मूल्य नहीं है। वेदमें जो कुछ कहा गया है, वह निर्भ्रान्त सत्य है; युक्ति उसके साथ रहे तो ठीक है, न रहे तो भी कोई चिन्ता नहीं है; किंतु जिनका मत केवल तर्कपर ही अवलम्बित है उनको तो अपनी प्रत्येक बात तर्कसे सिद्ध करनी ही चाहिये। परंतु पाशुपतोंकी उपर्युक्त मान्यता न वेदसे सिद्ध होती है, न तर्कसे ही। अतः वह सर्वथा अमान्य है। सम्बन्ध—अब उक्त मतमें दूसरी अनुपपत्ति दिखलाते हैं— अधिष्ठानानुपपत्तेश्च ॥ २।२।३९ ॥ अधिष्ठानानुपपत्तेः = अधिष्ठानकी उपपत्ति न होनेके कारण; च = भी (ईश्वरको केवल निमित्त कारण मानना उचित नहीं है)।