भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 197, कुल 486 में से

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पृष्ठ 197

१९४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ वैधर्म्याच्च न स्वप्नादिवत् ॥ २।२।२९॥ वैधर्म्यात् = जाग्रत् अवस्थामें उपलब्ध होनेवाले पदार्थोंसे स्वप्न आदिमें प्रतीत होनेवाले पदार्थोंके धर्ममें भेद होनेके कारण; च = भी; (जाग्रत्में उपलब्ध होनेवाले पदार्थ) स्वप्नादिवत् = स्वप्नादिमें उपलब्ध पदार्थोंकी भाँति; न = मिथ्या नहीं हैं। व्याख्या - स्वप्नावस्था में प्रतीत होनेवाले पदार्थ पहलेके देखे, सुने और अनुभव किये हुए ही होते हैं, तथा वे जागनेपर उपलब्ध नहीं होते। एकके स्वप्नकी घटना दूसरेको नहीं दीखती। उसी प्रकार बाजीगरद्वारा कल्पित पदार्थ भी थोड़ी देरके बाद नहीं उपलब्ध होते। मरुभूमिकी तप्त बालुकाराशिमें प्रतीत होनेवाले जल, सीपमें दीखनेवाली चाँदी तथा भ्रमवश प्रतीत होनेवाली दूसरी किसी वस्तुकी भी सत्तारूपसे उपलब्धि नहीं होती है। परंतु जो जाग्रत्-कालमें प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाली वस्तुएँ हैं, उनके विषयमें ऐसी बात नहीं है। वे एक ही समय बहुतोंको समानरूपसे उपलब्ध होती हैं, कालान्तरमें भी उनकी उपलब्धि देखी जाती है। एक प्रकारका आकार नष्ट कर दिया जानेपर भी दूसरे आकारमें उनकी सत्ता विद्यमान रहती है। इस प्रकार स्वप्नादिमें भ्रान्तिसे प्रतीत होनेवाले पदार्थोंके और सत्पदार्थोंके धर्मोंमें बहुत अन्तर है। इसलिये स्वप्नादिके दृष्टान्तके बलपर यह कहना उपयुक्त नहीं है कि 'उपलब्धिमात्रसे पदार्थकी सत्ता सिद्ध नहीं होती।' सम्बन्ध - विज्ञानवादी ऐसा कहते हैं कि बाह्य पदार्थ न होनेपर भी पूर्ववासनाके कारण बुद्धिद्वारा उन विचित्र पदार्थोंका उपलब्ध होना सम्भव है, अतः इसका खण्डन करते हैं- न भावोऽनुपलब्धेः ॥ २।२।३०॥ भावः = विज्ञानवादियोंद्वारा कल्पित वासनाकी सत्ता; न = सिद्ध नहीं होती; अनुपलब्धेः = क्योंकि उनके मतके अनुसार बाह्य पदार्थोंकी उपलब्धि ही नहीं हो सकती।