भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 198, कुल 486 में से

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पृष्ठ 198

सूत्र ३१-३२ ] अध्याय २ १९५ व्याख्या—जो वस्तु पहले उपलब्ध हो चुकी है, उसीके संस्कार बुद्धिमें जमते हैं और वे ही वासनारूपसे स्फुरित होते हैं। पदार्थोंकी सत्ता स्वीकार न करनेसे उनकी उपलब्धि नहीं होगी और उपलब्धि सिद्ध हुए बिना पूर्व अनुभवके अनुसार वासनाका होना सिद्ध नहीं होगा। इसलिये विज्ञानवादियोंकी मान्यता ठीक नहीं है। बाह्य पदार्थोंको सत्य मानना ही युक्तिसंगत है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे वासनाका खण्डन करते हैं— क्षणिकत्वाच्च ॥ २।२।३१ ॥ क्षणिकत्वात्=बौद्धमतके अनुसार वासनाकी आधारभूता बुद्धि भी क्षणिक है, इसलिये; च=भी (वासनाकी सत्ता सिद्ध नहीं होती)। व्याख्या—वासनाकी आधारभूत जो बुद्धि है, उसे भी विज्ञानवादी क्षणिक मानते हैं। इसलिये वासनाके आधारकी स्थिर सत्ता न होनेके कारण निराधार वासनाका अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता, इसलिये भी बौद्धमत भ्रान्तिपूर्ण है। सम्बन्ध—अब सूत्रकार बौद्धमतमें सब प्रकारकी अनुपपत्ति होनेके कारण उसकी अनुपयोगिता सूचित करते हुए इस प्रकरणका उपसंहार करते हैं— सर्वथानुपपत्तेश्च ॥ २।२।३२ ॥ (विचार करनेपर बौद्धमतमें) सर्वथा=सब प्रकारसे; अनुपपत्तेः= अनुपपत्ति (असंगति) दिखायी देती है; इसलिये; च=भी (बौद्धमत उपादेय नहीं है)। व्याख्या—बौद्धमतकी मान्यताओंपर जितना ही विचार किया जाता है, उतना ही उनकी प्रत्येक बात युक्तिविरुद्ध जान पड़ती है। बौद्धोंकी प्रत्येक मान्यताका युक्तियोंसे खण्डन हो जाता है, अतः वह कदापि उपादेय नहीं है। यहाँ सूत्रकारने प्रसंगका उपसंहार करते हुए माध्यमिक बौद्धोंके सर्वशून्यवादका भी खण्डन कर दिया—यह बात इसीके अन्तर्गत समझ लेनी