वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
सूत्र १५-१६ ] अध्याय ३ २९५
सूत्र १५-१६ ] अध्याय ३ २९५ सम्बन्ध—अब दूसरे दृष्टान्तसे उसी बातको सिद्ध करते हैं— प्रकाशवच्चावैयर्थ्यात् ॥ ३ । २ । १५ ॥ च=तथा; प्रकाशवत्=प्रकाशकी भाँति; अवैयर्थ्यात्=दोनोंमेंसे कोई भी लक्षण या उसके प्रतिपादक वेदवाक्य व्यर्थ नहीं हैं, इसलिये (यही सिद्ध होता है कि परमात्मा दोनों लक्षणोंवाला है)। व्याख्या—जिस प्रकार अग्नि और बिजली आदि सभी ज्योतियोंके दो रूप होते हैं—एक प्रकट और दूसरा अप्रकट—उन दोनोंमेंसे कोई भी व्यर्थ नहीं है, दोनों ही सार्थक हैं, उसी प्रकार उस ब्रह्मके भी दोनों रूप सार्थक हैं, व्यर्थ नहीं हैं; क्योंकि ऐसा माननेसे ही उसकी उपासना आदिकी सार्थकता होगी, दोनोंमेंसे किसी एकको प्रधान और दूसरेको गौण या अनावश्यक मान लेंगे तो उसकी सार्थकता नहीं होगी। श्रुतिमें उसके दोनों लक्षणोंका वर्णन है, श्रुतिके वचन कभी व्यर्थ नहीं हो सकते; क्योंकि वे स्वतःप्रमाण हैं, अतः उन वेदवाक्योंकी सार्थकताके लिये भी ब्रह्मको सविशेष और निर्विशेष दोनों प्रकारके लक्षणोंसे युक्त मानना ही उचित है। सम्बन्ध—अब श्रुतिमें प्रतीत होनेवाले विरोधका दो सूत्रोंद्वारा समाधान किया जाता है— आह च तन्मात्रम् ॥ ३ । २ । १६ ॥ तन्मात्रम्=(श्रुति उस परमात्माको) केवल सत्य, ज्ञान और अनन्तमात्र; च=ही; आह=बताती है, वहाँ सगुणवाचक शब्दोंका प्रयोग नहीं है। व्याख्या—तैत्तिरीय-श्रुतिमें ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ (तै० उ० २।१) अर्थात् ‘ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त है’—इस प्रकार ब्रह्मको केवल ज्ञानस्वरूप ही बताया है, सत्यसंकल्पत्व आदि गुणोंवाला नहीं बताया, अतः उसको दोनों लक्षणोंवाला नहीं माना जा सकता। सम्बन्ध—ऐसी बात नहीं है; किंतु—
२९६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
२९६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ दर्शयति चाथो अपि स्मर्यते ॥ ३ । २ । १७ ॥ अथो = उक्त कथनके अनन्तर; दर्शयति = श्रुति उसीको अनेक रूपवाला भी दिखाती है; च = इसके सिवा; स्मर्यते अपि = स्मृतिमें भी उसके सगुण स्वरूपका वर्णन आया है। व्याख्या—पूर्वोक्त 'सत्यं ज्ञानमनन्तम्' इस मन्त्रमें आगे चलकर उस परमात्माको सबके हृदयमें निहित बताया है और उसीसे समस्त जगत्की उत्पत्तिका वर्णन किया है; (तै० उ० २। १); फिर उसे रस-स्वरूप, सबको आनन्द देनेवाला (२। ७) और सबका संचालक (२। ८) कहा है। इसलिये उस श्रुतिको केवल निर्गुणपरक मानना उचित नहीं है। इसी प्रकार स्मृतिमें भी जगह-जगह उस परब्रह्मके स्वरूपका वर्णन दोनों प्रकारसे उपलब्ध होता है। जैसे—'जो मुझे अजन्मा, अनादि और लोकमहेश्वर जानता है, वह मनुष्योंमें ज्ञानी है और सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।'१ (गीता १०। ३) 'मुझे सब यज्ञ और तपोंका भोक्ता, सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर, समस्त प्राणियोंका सुहृद् जानकर मनुष्य शान्तिको प्राप्त होता है।'२ (गीता ५। २९) 'ऐसे सगुण रूपवाला मैं केवल अनन्य भक्तिके द्वारा देखा जा सकता हूँ, तत्त्वसे जाननेमें आ सकता हूँ और मुझमें प्रवेश भी किया जा सकता है।'३ (गीता ११। ५४) श्रीमद्भगवद्गीताके पंद्रहवें अध्यायमें क्षर और अक्षरका लक्षण बताकर यह स्पष्ट रूपसे कहा गया है कि 'उत्तम पुरुष इन दोनोंसे भिन्न है, जो कि परमात्मा नामसे कहा जाता है, जो तीनों लोकोंमें प्रविष्ट होकर १-यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् । असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २-भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् । सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥ ३-भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन । ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप ॥
सूत्र १८ ] अध्याय ३ २९७
सूत्र १८ ] अध्याय ३ २९७ सबको धारण करता है तथा जो सबका ईश्वर एवं अविनाशी है।'१ (१५।१७) इस प्रकार परब्रह्म पुरुषोत्तमके सगुण स्वरूपका वर्णन करके अन्तमें यह भी कहा है कि 'जो मुझे इस प्रकार पुरुषोत्तम जानता है, वह सब कुछ जाननेवाला है'२ (१५।१९)। इस प्रकारके बहुत-से वचन स्मृतियोंमें पाये जाते हैं, जिनमें भगवान्के सगुण रूपका वर्णन है और उसे वास्तविक बताया गया है। इसी तरह श्रुतियों और स्मृतियोंमें परमेश्वरके निर्गुण- निर्विशेष रूपका भी वर्णन पाया जाता है३ और वह भी सत्य है; इसलिये यही सिद्ध होता है कि ब्रह्म दोनों प्रकारके लक्षणोंवाला है। सम्बन्ध— उस परब्रह्म परमेश्वरका सगुण रूप उपाधिभेदसे नहीं, किंतु स्वाभाविक है; इसी बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरा प्रमाण देते हैं— अत एव चोपमा सूर्यकादिवत् ॥ ३।२।१८॥ च=और; अत एव=इसीलिये अर्थात् उस परमेश्वरका उभय रूप स्वाभाविक है, यह सिद्ध करनेके लिये ही; सूर्यकादिवत्=सूर्य आदिके प्रतिबिम्बकी भाँति; उपमा=उपमा दी गयी है। व्याख्या—'सब भूतोंका आत्मा परब्रह्म परमेश्वर एक है, तथापि वह भिन्न-भिन्न प्राणियोंमें स्थित है, अतः जलमें प्रतिबिम्बित चन्द्रमाकी भाँति एक और अनेक रूपसे भी दीखता है।'४ (ब्रह्मबिन्दु उ० १२) इस दृष्टान्तसे यह बात दिखायी गयी है कि वह सर्वान्तर्यामी परमेश्वर सगुण और निर्गुण-भेदसे १-उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः। यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥ २-यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्। स सर्वविद्..............................................॥ ३-देखिये कठोपनिषद् १।३।१५, मुण्डक० १।१।६ तथा माण्डूक्य० ७। ४-एक एव हि भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः। एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत्॥
२९८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
२९८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
अलग-अलग नहीं, किंतु एक ही है; तथापि प्रत्येक जीवात्मामें अलग- अलग दिखायी दे रहा है ! यहाँ चन्द्रमाके प्रतिबिम्बका दृष्टान्त देकर यह भाव दिखाया गया है कि जैसे सूर्य और चन्द्रमा आदिमें जो प्रकाश गुण है, वह स्वाभाविक है, उपाधिसे नहीं है; उसी प्रकार परमात्मामें भी जो सत्य- संकल्पत्व, सर्वज्ञत्व और सर्वव्यापित्वादि गुण हैं वे स्वाभाविक हैं, उपाधिसे नहीं हैं। दूसरा यह भाव दिखाया है कि जिस प्रकार चन्द्रमाका प्रतिबिम्ब जलमें अलग-अलग दीखता हुआ भी एक है, उसी प्रकार परमात्मा सब प्राणियोंमें अन्तर्यामीरूपसे अलग-अलगकी भाँति स्थित हुआ भी एक ही है तथा वह सबमें रहता हुआ भी उन-उनके गुण-दोषोंसे अलिप्त है। गीताके निम्नांकित वचनसे भी इसी सिद्धान्तकी पुष्टि होती है 'अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।' 'वह परमात्मा विभागरहित है तो भी विभक्तकी भाँति सब प्राणियोंमें स्थित है' इत्यादि (१३। १६) यही उसकी विचित्र महिमा है। सम्बन्ध—यहाँ प्रतिबिम्बका दृष्टान्त दिया जानेके कारण यह भ्रम हो सकता है कि परमात्माका सब प्राणियोंमें रहना प्रतिबिम्बकी भाँति मिथ्या ही है, वास्तवमें नहीं है; अतः इस भ्रमकी निवृत्तिके लिये अगला सूत्र कहते हैं— अम्बुवदग्रहणात्तु न तथात्वम् ॥ ३। २। १९॥ तु=किंतु; अम्बुवत्=जलमें स्थित चन्द्रमाकी भाँति; अग्रहणात् = परमात्मा- का ग्रहण न होनेके कारण (उस परमेश्वरको); तथात्वम् = सर्वथा वैसा; न=नहीं समझना चाहिये। व्याख्या- पूर्व सूत्रमें परमेश्वरको समस्त प्राणियोंमें स्थित बताते हुए जलमें दीखनेवाले चन्द्रमाका दृष्टान्त दिया; किंतु पूर्णतया वह दृष्टान्त परमात्मामें नहीं घटता; क्योंकि चन्द्रमा वस्तुतः जलमें नहीं है, केवल उसका प्रतिबिम्ब दीखता है परंतु परमात्मा तो स्वयं सबके हृदयमें सचमुच ही स्थित है और उन-उन जीवोंके कर्मानुसार उनको अपनी शक्तिके द्वारा संसारचक्रमें भ्रमण कराता है (गीता १८ । ६१)। अतः चन्द्रमाके प्रतिबिम्बकी भाँति
सूत्र २०-२१ ] अध्याय ३ २९९ परमेश्वरकी स्थिति नहीं है। यहाँ दृष्टान्तका केवल एक अंश लेकर ऐसा समझना चाहिये कि परमेश्वर एक होकर भी नाना-सा दीखता है, वास्तवमें वह नाना नहीं है, तथापि सर्वशक्तिमान् होनेके कारण अलग- अलग प्राणियोंमें एक रूपसे स्थित है। सम्बन्ध—यदि ऐसी बात है तो प्रतिबिम्बका दृष्टान्त क्यों दिया गया ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— वृद्धिह्रासभाक्त्वमन्तर्भावादुभयसामंजस्यादेवम् ॥ ३।२।२०॥ अन्तर्भावात् = शरीरके भीतर स्थित होनेके कारण; वृद्धिह्रासभाक्त्वम् = शरीरकी भाँति परमात्माके बढ़ने-घटनेवाला होनेकी सम्भावना होती है, अतः (उसके निषेधमें); उभयसामंजस्यात् = परमात्मा और चन्द्रप्रतिबिम्ब— इन दोनोंकी समानता है, इसलिये; एवम् = इस प्रकारका दृष्टान्त दिया गया है। व्याख्या—उपमा उपमेय वस्तुके किसी एक अंशकी समानताको लेकर दी जाती है। पूर्णतया दोनोंकी एकता हो जाय तब तो वह उपमा ही नहीं कही जायगी; अपितु वास्तविक वर्णन हो जायगा। अतः यहाँ यह जिस प्रकार चन्द्रमाका प्रतिबिम्ब जलमें रहता हुआ भी जलके घटने-बढ़ने आदि विकारोंसे सम्बद्ध नहीं होता; वैसे ही परब्रह्म परमेश्वर सबमें रहता हुआ भी निर्विकार रहता है, उनके घटने-बढ़ने आदि किसी भी विकारसे वह लिप्त नहीं होता। इतना ही आशय इस दृष्टान्तका है, इसलिये इस दृष्टान्तसे यह शंका नहीं करनी चाहिये कि परमात्माकी सब प्राणियोंमें जो स्थिति बतायी गयी है, वह भी चन्द्रमाके प्रतिबिम्बकी भाँति अवास्तविक (झूठी) होगी। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे पुनः उस भ्रमकी निवृत्ति की जाती है— दर्शनाच्च ॥ ३।२।२१॥ दर्शनात् = श्रुतिमें दूसरे दृष्टान्त देखे जाते हैं, इसलिये; च = भी (यही सिद्ध होता है कि परमात्माकी स्थिति प्रतिबिम्बकी भाँति अवास्तविक नहीं है)।
३०० वेदान्त-दर्शन [ पाद २
३०० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ व्याख्या—कठोपनिषद् (२। २। ९)-में कहा है कि— अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव। एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च॥ 'जिस प्रकार समस्त ब्रह्माण्डमें प्रविष्ट हुआ एक ही अग्नि नाना रूपोंमें उनके सदृश रूपवाला हो रहा है, उसी प्रकार सब प्राणियोंका अन्तरात्मा परमेश्वर एक होता हुआ ही नाना रूपोंमें प्रत्येकके रूपवाला- सा हो रहा है तथा उनके बाहर भी है।' अग्निकी ही भाँति वहाँ वायु और सूर्यके दृष्टान्तसे भी परमेश्वरकी वस्तुगत गुण-दोषसे निर्लेपता सिद्ध की गयी है (क० उ० २। २। १०-११)। इस प्रकार प्रतिबिम्बके अतिरिक्त दूसरे दृष्टान्त, जो उस ब्रह्मकी स्थितिके सत्यत्वका प्रतिपादन करनेवाले हैं, वेदमें देखे जाते हैं; इसलिये भी प्राणियोंमें और प्रत्येक वस्तुमें उस परब्रह्म परमेश्वरकी स्थिति प्रतिबिम्बकी भाँति आभासमात्र नहीं; किंतु सत्य है। अतएव वह सगुण और निर्गुण दोनों प्रकारके लक्षणोंवाला है, यही मानना युक्तिसंगत है। सम्बन्ध— यहाँतक यह सिद्ध किया गया कि परब्रह्म परमेश्वर दोनों प्रकारके लक्षणोंवाला है। अब यह जिज्ञासा होती है कि वेदमें ब्रह्मको दोनों प्रकारवाला बताकर अन्तमें जो ऐसा कहा गया है 'नेति-नेति' अर्थात् ऐसा नहीं है, ऐसा नहीं है, इन निषेधपरक श्रुतियोंका क्या अभिप्राय है? अतः इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— प्रकृतैतावत्त्वं हि प्रतिषेधति ततो ब्रवीति च भूयः ॥ ३।२।२२॥ प्रकृतैतावत्त्वम् = प्रकरणमें जो ब्रह्मके लक्षण बताये गये हैं, उनकी इयत्ताका; प्रतिषेधति = 'नेति-नेति' श्रुति निषेध करती है; हि = क्योंकि; ततः = उसके बाद; भूयः = दुबारा; ब्रवीति च = कहती भी है। व्याख्या— बृहदारण्यकोपनिषद्में ब्रह्मके मूर्त और अमूर्त दो रूप बताकर प्रकरण आरम्भ किया गया है। वहाँ भौतिक जगत्में तो पृथ्वी, जल
सूत्र २२ ] अध्याय ३ ३०१
सूत्र २२ ] अध्याय ३ ३०१ और तेज—इन तीनोंको उनके कार्यसहित, मूर्त बताया है तथा वायु और आकाशको अमूर्त कहा है। उसी प्रकार आध्यात्मिक जगत्में प्राण और हृदयाकाशको अमूर्त तथा उससे भिन्न शरीर और इन्द्रियगोलकादिको मूर्त बताया है। उनमेंसे जिनको मूर्त बताया, उनको नाशवान् अर्थात् उस रूपमें न रहनेवाले, किंतु प्रत्यक्ष उपलब्ध होनेके कारण 'सत्' कहा, उसी प्रकार अमूर्तको अमृत अर्थात् नष्ट न होनेवाला बतलाया। इस प्रकार उन जड तत्त्वोंका विवेचन करते समय ही आधिभौतिक जगत्में सूर्यमण्डलको और आध्यात्मिक जगत्में नेत्रको मूर्तका सार बताया है। इसी प्रकार आधिदैविक जगत्में सूर्यमण्डलस्थ पुरुषको और आध्यात्मिक जगत्में नेत्रस्थ पुरुषको अमूर्तका सार कहा है। इस तरह सगुण परमेश्वरके साकार और निराकार— इन दो रूपोंका वर्णन करके फिर कहा गया है कि 'नेति-नेति' अर्थात् इतना ही नहीं, इतना ही नहीं। इससे बढ़कर कोई उपदेश नहीं है। तदनन्तर यह बताया गया है 'उस परम तत्त्वका नाम सत्यका सत्य है, यह प्राण अर्थात् जीवात्मा सत्य है और उसका भी सत्य वह परब्रह्म परमेश्वर है।' (बृह० उ० २। ३। १—६) इस प्रकार उस परमेश्वरके साकार रूपका वर्णन करके यह भाव दिखाया गया है कि इनमें जो जड अंश है, वह तो उसकी अपरा प्रकृतिका विस्तार है और जो चेतन है, वह जीवात्मारूप उसकी परा प्रकृति है और इन दोनों सत्योंका आश्रयभूत वह परब्रह्म परमेश्वर इनसे भी पर अर्थात् श्रेष्ठ है। अतः यहाँ 'नेति-नेति' श्रुति सगुण परमात्माका प्रतिषेध करनेके लिये नहीं है; किंतु इसकी इयत्ता अर्थात् वह इतना ही है, इस परिमित भावका निषेध करके उस परमेश्वरकी असीमता—अनन्तता सिद्ध करनेके लिये है। इसीलिये 'नेति-नेति' कहकर सत्यके सत्य परमेश्वरका होना सिद्ध किया गया है। अतः यह परब्रह्म परमेश्वर केवल निर्गुण-निर्विशेष ही है, सगुण नहीं; ऐसी बात नहीं समझनी चाहिये। सम्बन्ध—उस परब्रह्म परमात्माके सगुण और निर्गुण दोनों ही स्वरूप वास्तवमें प्राकृत मन-बुद्धि और इन्द्रियोंसे अतीत हैं, इस भावको स्पष्ट करनेके लिये कहते हैं—
३०२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
३०२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ तदव्यक्तमाह हि ॥ ३ । २ । २३ ॥ हि=क्योंकि (श्रुति); तत्=उस सगुण रूपको; अव्यक्तम्=इन्द्रियोंद्वारा जाननेमें न आनेवाला; आह=कहती है। व्याख्या—केवल निर्गुण-निराकाररूपसे ही वह परब्रह्म परमेश्वर अव्यक्त अर्थात् मन-इन्द्रियोंद्वारा जाननेमें न आनेवाला है, इतना ही नहीं, इसीकी भाँति उसका सगुण स्वरूप भी इन प्राकृत मन और इन्द्रिय आदिका विषय नहीं है; क्योंकि श्रुति और स्मृतियोंमें उसको भी अव्यक्त कहा गया है। मुण्डकोपनिषद्में पहले परमेश्वरके सगुण स्वरूपका वर्णन इस प्रकार किया गया है— यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्। तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरंजनः परमं साम्यमुपैति ॥ 'जब वह द्रष्टा (जीवात्मा) सबके शासक, ब्रह्माके भी आदिकारण, समस्त जगत्के रचयिता, दिव्यप्रकाशस्वरूप परम पुरुष परमात्माको प्रत्यक्ष कर लेता है, उस समय पुण्य-पाप दोनोंको भलीभाँति धो-बहाकर निर्मल हुआ ज्ञानी सर्वोत्तम समताको प्राप्त कर लेता है।' (मु० उ० ३।१।३) इसके बाद चौथेसे सातवें मन्त्रतक सत्य, तप और ज्ञान आदिको उसकी प्राप्तिका उपाय बताया गया। फिर अनेक विशेषणोंद्वारा उसके स्वरूपका वर्णन करके अन्तमें कहा है— न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा। (मु० ३।१।८) 'यह परमात्मा न तो नेत्रोंसे, न वाणीसे, न दूसरी इन्द्रिय या मनसे, न तपसे और न कर्मोंसे ही देखा जा सकता है।' इसी प्रकारका वर्णन अन्यान्य श्रुतियोंमें भी है, विस्तारभयसे यहाँ अधिक प्रमाण नहीं दिये गये हैं। सम्बन्ध—इससे यह नहीं समझना चाहिये कि परब्रह्म परमेश्वरका किसी भी अवस्थामें प्रत्यक्ष दर्शन नहीं होता; क्योंकि—
सूत्र २४-२५ ] अध्याय ३ ३०३
सूत्र २४-२५ ] अध्याय ३ ३०३ अपि च संराधने प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ॥ ३ । २ । २४ ॥ अपि च=इस प्रकार अव्यक्त होनेपर भी; संराधने=आराधना करनेपर (उपासक परमेश्वरका प्रत्यक्ष दर्शन पाते हैं); प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् = यह बात वेद और स्मृति—दोनोंके ही कथनसे सिद्ध होती है। व्याख्या—श्रुतियों और स्मृतियोंमें जहाँ सगुण और निर्गुण परमेश्वरको इन्द्रियादिके द्वारा देखनेमें न आनेवाला बताया है, वहीं यह भी कहा है कि वह परमात्मा नामजप, स्मरण, ध्यान आदि आराधनाओं द्वारा प्रत्यक्ष होनेवाला भी है (मु० उ० ३ । १ । ८;* श्वेता० १ । ३, १०; २ । १५ तथा श्रीमद्भगवद्गीता ११। ५४)। इस तरहके अनेक प्रमाण हैं। वेद और स्मृतियोंके इन वचनोंमें उस सगुण-निर्गुणस्वरूप परब्रह्म परमात्माको आराधनाके द्वारा प्रत्यक्ष होनेवाला बताया गया है, इसलिये यह सिद्ध होता है कि उसके प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं। भगवान्ने स्वयं कहा है—'हे अर्जुन! अनन्य भक्तिके द्वारा ही मुझे तत्त्वसे जाना जा सकता है। मेरा दर्शन हो सकता और मुझमें प्रवेश किया जा सकता है।' (११ । ५४) इसलिये भी यही सिद्ध होता है कि वह परब्रह्म परमेश्वर अवश्य है और वह सगुण तथा निर्गुण—दोनों ही लक्षणोंवाला है। सम्बन्ध—उस परमेश्वरका स्वरूप आराधनासे जाननेमें आता है, अन्यथा नहीं, इस कथनसे तो यह सिद्ध होता है कि वास्तवमें परमात्मा निर्विशेष ही है, केवल भक्तके लिये आराधनाकालमें सगुण होता है, ऐसी शंका होनेपर कहते हैं— प्रकाशादिवच्चावैशेष्यं प्रकाशश्च कर्मण्यभ्यासात् ॥ ३ । २ । २५ ॥ प्रकाशादिवत् = अग्नि आदिके प्रकाशादि गुणोंकी भाँति; च=ही; अवैशेष्यम् = (परमात्मामें भी) भेद नहीं है; प्रकाशः = प्रकाश; च=भी; कर्मणि = कर्ममें; अभ्यासात् = अभ्यास करनेसे ही (प्रकट होता है)। व्याख्या—जिस प्रकार अग्नि और बिजली आदि तत्त्व प्रकाश और
- ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ॥
३०४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
३०४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ उष्णता आदि गुणोंसे युक्त हैं, उनका वह रूप जब प्रकट हो, उस अवस्थामें भी वे उन-उन स्वाभाविक गुणोंसे युक्त हैं और प्रकट न हो—छिपा हो, उस समय भी वे उन गुणोंसे युक्त हैं। व्यक्त और अव्यक्त स्थितिमें उन स्वाभाविक गुणोंसे युक्त होनेमें कोई अन्तर नहीं आता। उसी प्रकार वह परमेश्वर उपासनाद्वारा प्रत्यक्ष होनेके समय जिस प्रकार समस्त कल्याणमय विशुद्ध दिव्यगुणोंसे सम्पन्न है, वैसे ही अप्रकट अवस्थामें भी है; ऐसा समझना चाहिये। अग्नि आदि तत्त्वोंको प्रकट करनेके लिये जो साधन बताये गये हैं, उनका अभ्यास करनेपर ही वे अपने गुणोंसहित प्रकट होते हैं। उसी प्रकार आराधना करनेपर अप्रकट परमेश्वरका प्रकट हो जाना उचित ही है। सम्बन्ध—उभयलिंगवाले प्रकरणको समाप्त करते हुए अन्तमें कहते हैं— अतोऽनन्तेन तथा हि लिंगम्॥ ३।२।२६॥ अतः=इन ऊपर बताये हुए कारणोंसे यह सिद्ध हुआ कि; अनन्तेन=(वह ब्रह्म) अनन्त दिव्य कल्याणमय गुणसमुदायसे सम्पन्न है; हि=क्योंकि; तथा=वैसे ही; लिंगम्=लक्षण उपलब्ध होते हैं। व्याख्या—पूर्वोक्त कारणोंसे यही सिद्ध होता है कि वह परब्रह्म परमेश्वर सत्यसंकल्पता, सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता, सौहार्द, पतितपावनता, आनन्द, विज्ञान, असंगता और निर्विकारिता आदि असंख्य कल्याणमय गुणसमुदायसे सम्पन्न और निर्विशेष—समस्त गुणोंसे रहित भी है; क्योंकि श्रुतिमें ऐसा ही लक्षण मिलता है (श्वे० उ० ३। ८–२१)। सम्बन्ध—अब परम पुरुष और उसकी प्रकृति भिन्न है या अभिन्न ? इस विषयपर विचार करनेके लिये प्रकरण आरम्भ किया जाता है। यहाँ पहले यह बात बतायी जाती है कि शक्ति और शक्तिमान्में किस प्रकार अभेद है— उभयव्यपदेशात्त्वहिकुण्डलवत्॥ ३।२।२७॥ उभयव्यपदेशात्=दोनों प्रकारका कथन होनेसे; अहिकुण्डलवत्=सर्पके कुण्डलाकारत्वकी भाँति; तु=ही (उसका भाव समझना चाहिये)।
सूत्र २८ ] अध्याय ३ ३०५
सूत्र २८ ] अध्याय ३ ३०५ व्याख्या—जिस प्रकार सर्प कभी संकुचित हो कुण्डलाकार हो जाता है और कभी अपनी साधारण अवस्थामें रहता है; किंतु दोनों अवस्थाओंमें वह सर्प एक ही है। साधारण अवस्थामें रहना उसका कारणभाव है, उस समय उसकी कुण्डलादिभावमें प्रकट होनेकी शक्ति अप्रकट है, तथापि वह उसमें विद्यमान है और उससे अभिन्न है। एवं कुण्डलादि आकारमें स्थित होना उसका कार्यभाव है, यही उसकी पूर्वोक्त अप्रकट शक्तिका प्रकट होना है। उसी प्रकार वह परब्रह्म जब कारण-अवस्थामें रहता है, उस समय उसकी अपरा तथा परा प्रकृतिरूप दोनों शक्तियाँ सृष्टिके पूर्व उसमें अभिन्नरूपसे विद्यमान रहती हुई भी अप्रकट रहती हैं और वही जब कार्यरूपमें स्थित होता है, तब उसकी उक्त दोनों शक्तियाँ भी भिन्न- भिन्न नाम-रूपोंमें प्रकट हो जाती हैं। अतः श्रुतिमें जो ब्रह्मको निराकार बताया गया है, वह उसकी कारणावस्थाको लेकर है और जो उसे अपनी शक्तियोंसे युक्त एवं साकार बताया है, वह उसकी कार्यावस्थाको लेकर है। इस प्रकार श्रुतिमें उसके कारण और कार्य दोनों स्वरूपोंका वर्णन हुआ है, इसलिये यह सिद्ध होता है कि परब्रह्म परमात्मामें उसकी शक्ति सदा ही अभिन्न रूपसे विद्यमान रहती है। सम्बन्ध— प्रकारान्तरसे उसी बातको सिद्ध करते हैं— प्रकाशाश्रयवद्वा तेजस्त्वात् ॥ ३। २। २८ ॥ वा = अथवा; प्रकाशाश्रयवत् = प्रकाश और उसके आश्रयकी भाँति उनका अभेद है; तेजस्त्वात् = क्योंकि तेजकी दृष्टिसे दोनों एक ही हैं। व्याख्या—जिस प्रकार प्रकाश और उसका आश्रय सूर्य वास्तवमें तेज-तत्त्वके नाते अभिन्न हैं तो भी दोनोंको पृथक्-पृथक् कहा जाता है, उसी प्रकार परमेश्वर और उसकी शक्ति-विशेष वास्तवमें अभिन्न होनेपर भी उनका अलग-अलग वर्णन किया जाता है। भाव यह कि प्रकाश और सूर्यकी भाँति परमात्मा और उसकी प्रकृतिमें परस्पर भेद नहीं है तो भी इनमें भेद माना जा सकता है।
व्याख्या—अथवा पहले (सूत्र २।३।४३ में) जिस प्रकार परमात्माका
३०६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ सम्बन्ध—पुनः उसी बातको समझानेके लिये कहते हैं— पूर्ववद्वा॥ ३।२।२९॥ वा = अथवा; पूर्ववत् = जिस प्रकार पहले सिद्ध किया जा चुका है, वैसे ही (दोनोंका अभेद समझ लेना चाहिये)। व्याख्या—अथवा पहले (सूत्र २।३।४३ में) जिस प्रकार परमात्माका अपने अंशभूत जीवसमुदायसे अभेद सिद्ध किया गया है, उसी प्रकार यहाँ शक्ति और शक्तिमान्का अभेद समझ लेना चाहिये। सम्बन्ध—शक्ति और शक्तिमान्के अभेदका मुख्य कारण बताते हैं— प्रतिषेधाच्च॥ ३।२।३०॥ प्रतिषेधात् = दूसरेका प्रतिषेध होनेसे; च = भी (अभेद ही सिद्ध होता है)। व्याख्या—श्रुतिमें कहा गया है कि 'यह जगत् प्रकट होनेसे पहले एकमात्र परमात्मा ही था, दूसरा कोई भी चेष्टा करनेवाला नहीं था' (ऐ० उ० १।१।१)। इस कथनमें अन्यका प्रतिषेध होनेके कारण भी यही समझा जाता है कि जगत्की उत्पत्तिके पहले प्रलयकालमें उस परब्रह्म परमेश्वरकी दोनों प्रकृतियाँ उसमें विलीन रहती हैं; अतः उनमें किसी प्रकारके भेदकी प्रतीति नहीं होती है; इसीलिये उनका अभेद बताया गया है। सम्बन्ध—यहाँतक उस परब्रह्म परमात्माका अपनी दोनों प्रकृतियोंसे अभेद किस प्रकार है—इसका स्पष्टीकरण किया गया। अब उन दोनोंसे उसकी विलक्षणता और श्रेष्ठताका प्रतिपादन करते हैं— परमतः सेतून्मानसम्बन्धभेदव्यपदेशेभ्यः ॥ ३।२।३१॥ अतः = इस जड-चेतनरूप दोनों प्रकृतियोंके समुदायसे; परम् = (वह ब्रह्म) अत्यन्त श्रेष्ठ है; सेतून्मानसम्बन्धभेदव्यपदेशेभ्यः = क्योंकि श्रुतिमें सेतु, उन्मान, सम्बन्ध तथा भेदका वर्णन (करके यही सिद्ध) किया गया है। व्याख्या—इस जड-चेतनात्मक समस्त जगत्की कारणभूता जो
सूत्र ३१ ] अध्याय ३ ३०७
सूत्र ३१ ] अध्याय ३ ३०७ भगवान्की अपरा एवं परा नामवाली दो प्रकृतियाँ हैं (गीता ७।४, ५), श्वेताश्वतरोपनिषद् (१।१०)-में जिनका 'क्षर' और 'अक्षर' के नामसे वर्णन हुआ है, श्रीमद्भगवद्गीतामें कहीं क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके नामसे (१३।१) तथा कहीं प्रकृति और पुरुषके नामसे (१३।१९) जिनका उल्लेख किया गया है, उन दोनों प्रकृतियोंसे तथा उन्हींके विस्ताररूप इस दृश्य जगत्से वह परब्रह्म पुरुषोत्तम सर्वथा विलक्षण एवं परम श्रेष्ठ है (गीता १५।१७); क्योंकि वेदमें उसकी श्रेष्ठताको सिद्ध करनेवाले चार हेतु उपलब्ध होते हैं—१-सेतु, २-उन्मान, ३-सम्बन्ध और ४-भेदका वर्णन। सेतुका वर्णन श्रुतिमें इस प्रकार आया है—'अथ य आत्मा स सेतुर्विधृतिः।' (छा० उ० ८।४।१)—'यह जो परमात्मा है, यही सबको धारण करनेवाला सेतु है।' 'एष सेतुर्विधरणः' (बृह० उ० ४। ४। २२)—'यह सबको धारण करनेवाला सेतु है।' इत्यादि। दूसरा हेतु है उन्मानका वर्णन। उन्मानका अर्थ है सबसे बड़ा माप-महत् परिमाण। श्रुतिमें उस परमेश्वरको सबसे बड़ा बताया गया है—'तावानस्य महिमा ततो ज्यायाँँश्च पूरुषः। पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥' (छा० उ० ३।१२।६)—'उतनी उसकी महिमा है, वह परम पुरुष परमात्मा इससे भी श्रेष्ठ हैं। सम्पूर्ण भूत-प्राणी इसका एक पाद हैं और शेष तीन अमृतस्वरूप पाद अप्राकृत परमधाममें हैं।' तीसरा हेतु है सम्बन्धका प्रतिपादन। परब्रह्म परमेश्वरको पूर्वोक्त प्रकृतियोंका स्वामी, शासक एवं संचालक बताकर श्रुतिने इनमें स्वामि-सेवकभाव, शास्य-शासकभाव तथा नियन्तृ-नियन्तव्यभावरूप सम्बन्धका उपपादन किया है। जैसे—'ईश्वरोंके भी परम महेश्वर, देवताओंके भी परम देवता, पतियोंके भी परम पति, समस्त ब्रह्माण्डके स्वामी एवं स्तुति करनेयोग्य उस प्रकाशस्वरूप परमात्माको हम जानते हैं।'* (श्वेता० उ० ६।७) 'वह ज्ञानस्वरूप परमात्मा सबका स्रष्टा,
- यह मन्त्र सूत्र १।३।४३ की व्याख्यामें आ चुका है।
३०८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
३०८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ सर्वज्ञ, स्वयं ही अपने प्राकट्यका हेतु, कालका भी महाकाल, समस्त कल्याणमय गुणोंसे सम्पन्न और सबको जाननेवाला है। वह प्रकृति और जीवात्माका स्वामी, समस्त गुणोंका शासक तथा जन्म-मृत्युरूप संसारमें बाँधने, स्थित रखने और उससे मुक्त करनेवाला है।'१ चौथा हेतु है भेदका प्रतिपादन। उस परब्रह्म परमात्माको इन दोनों प्रकृतियोंका अन्तर्यामी एवं धारण-पोषण करनेवाला बताकर तथा अन्य प्रकारसे भी श्रुतिने इनसे उसकी भिन्नताका निरूपण किया है।२ इन सब कारणोंसे यही सिद्ध होता है कि वह सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, सर्वान्तर्यामी, सर्वाधार, सबका स्वामी परमात्मा अपनी दोनों प्रकृतियोंसे अत्यन्त विलक्षण और परम श्रेष्ठ है; क्योंकि इन श्रुतियोंमें कहा हुआ उन परमात्माका स्वरूप दिव्य, अलौकिक और उपाधिरहित है तथा उस परब्रह्मको जाननेका फल परम शान्तिकी प्राप्ति,३ सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त होना४ तथा अमृतको प्राप्त होना बताया गया है।५ सम्बन्ध- यहाँतक यह सिद्ध किया गया कि उस परब्रह्म परमात्माका अपनी अपरा और परा नामक प्रकृतियोंके साथ अभेद भी है और भेद भी। १. स विश्वकृद् विश्वविदात्मयोनिर्ज्ञः कालकालो गुणी सर्वविद् यः। प्रधानक्षेत्रज्ञपतिर्गुणेशः सँसारमोक्षस्थितिबन्धहेतुः ॥ (श्वेता० ६। १६) २. देखिये (श्वेताश्वतरोपनिषद् अध्याय ४ के ६, ७, ८-१४-१५ आदिमन्त्र), (मु० उ० ३।१।१-२), (श्वेता० उ० १।९), (बृ० उ० ३।४।१-२ तथा ३।७।१ से २३ तक)। ३. तमीशानं वरदं देवमीड्यं निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ॥ (श्वेता० उ० ४।११) 'ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति ॥' (श्वेता० उ० ४।१४) 'तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥' (क० उ० २।२।१३) ४. ज्ञात्वा देवं सर्वपाशापहानिः। (श्वेता० उ० १।११) ५. तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥ (श्वेता० उ० ३।८)
सूत्र ३२ ] अध्याय ३ ३०९
सूत्र ३२ ] अध्याय ३ ३०९ अब यह जिज्ञासा होती है कि इन दोनोंमेंसे अभेदपक्ष उत्तम है या भेदपक्ष ? अतः इसका निर्णय करनेके लिये सूत्रकार कहते हैं— सामान्यात् ॥ ३ । २ । ३२ ॥ सामान्यात्=श्रुतिमें भेद-वर्णन और अभेद-वर्णन दोनों समानभावसे हैं इससे, तु=तो (यही निश्चय होता है कि भेद और अभेद दोनों ही पक्ष मान्य हैं)। व्याख्या—परब्रह्म परमात्माको सबका ईश्वर१, अधिपति२, प्रेरक३, शासक४ और अन्तर्यामी५ बतानेवाली भेदप्रतिपादक श्रुतियाँ जिस प्रकार प्रमाण-भूत हैं, उसी प्रकार ‘तत्त्वमसि’ (छा० उ० ६।८ वेंसे १६ वें खण्डतक)—‘वह ब्रह्म तू है,’ ‘अयमात्मा ब्रह्म’ (बृह० उ० २।५।१९)— ‘यह आत्मा ब्रह्म है।’ इत्यादि अभेदप्रतिपादक श्रुतियाँ भी प्रमाण हैं। दोनोंकी प्रामाणिकतामें किंचिन्मात्र भी अन्तर नहीं है। इसलिये किसी एक पक्षको श्रेष्ठ और दूसरेको इसके विपरीत बताना कदापि सम्भव नहीं है। अतः भेद और अभेद दोनों ही पक्ष मान्य हैं। सम्बन्ध— श्रुतिमें कहीं तो उस ब्रह्मको अपनेसे भिन्न मानकर उसकी उपासना करनेके लिये कहा है; यथा—‘तंँह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥’ (श्वेता० उ० ६।१८)—‘परमात्मज्ञानविषयक बुद्धिको प्रकट करनेवाले उन प्रसिद्ध देव परमेश्वरकी मैं संसारबन्धनसे छूटनेकी इच्छावाला उपासक शरण लेता हूँ।’ इस मन्त्रके अनुसार उपासक अपनेसे भिन्न उपास्यदेवकी शरण ग्रहण करता है। इससे भेदोपासना सिद्ध होती है और कहीं १. ‘एष सर्वेश्वरः’। (मा० उ० ६) २. ‘एष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिः। (बृह० उ० ४।४।२२) ३. ‘भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा’। (श्वेता० उ० १।१२) ४. ‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः।’ (बृह० उ० ३।८।९) ५. ‘एष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥’ (बृह० उ० ३।७।३)
३१० वेदान्त-दर्शन [ पाद २
३१० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ 'तत्त्वमसि' (छा० उ० ६।८।८- 'वह ब्रह्म तू है।' 'अयमात्मा ब्रह्म' (बृह० उ० २।५।१९) - 'यह आत्मा ब्रह्म है।' तथा 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत।' (छा० उ० ३।१४।१) - 'यह सब जगत् ब्रह्म है; क्योंकि उसीसे उत्पन्न होता, उसीमें रहकर जीवन धारण करता और उसीमें लीन हो जाता है; इस प्रकार शान्तचित्त होकर उपासना करे।' इत्यादि वचनोंद्वारा केवल अभेदभावसे उपासनाका उपदेश मिलता है। इस प्रकार कहीं भेदभावसे और कहीं अभेदभावसे उपासनाके लिये आदेश देनेका क्या अभिप्राय है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— बुद्धयर्थः पादवत्॥ ३।२।३३॥ पादवत् = अवयवरहित परमात्माके चार पाद बताये जानेकी भाँति; बुद्धयर्थः = मनन-निदिध्यासन आदि उपासनाके लिये वैसा उपदेश है। व्याख्या—जिस प्रकार अवयवरहित एकरस परब्रह्म पुरुषोत्तमका तत्त्व समझानेके लिये चार पादोंकी कल्पना करके श्रुतिमें उसके स्वरूपका वर्णन किया गया है, (मा० उ० २) उसी प्रकार पूर्वोक्त रीतिसे भेद या अभेदभावसे उपासनाका उपदेश उस परमात्माके तत्त्वका बोध करानेके लिये ही किया गया है; क्योंकि साधकोंकी प्रकृति भिन्न-भिन्न होती है। कोई भेदोपासनाको ग्रहण करते हैं, कोई अभेदोपासनाको। किसी भी भावसे उपासना करनेवाला साधक एक ही लक्ष्यपर पहुँचता है। दोनों प्रकारकी उपासनाओंसे होनेवाला तत्त्वज्ञान और भगवत्प्राप्तिरूप फल एक ही है। अतः परमात्माके तत्त्वका बोध करानेके लिये साधककी प्रकृति, योग्यता, रुचि और विश्वासके अनुसार श्रुतिमें भेद या अभेद उपासनाका वर्णन सर्वथा उचित ही है। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि यदि ब्रह्म और उसकी दोनों प्रकृतियोंमें भेद नहीं है तो ब्रह्मकी परा प्रकृतिरूप जो जीवसमुदाय हैं, उनमें भी परस्पर भेद सिद्ध नहीं होगा। ऐसा सिद्ध होनेसे श्रुतियोंमें जो उसके नानात्वका वर्णन है, उसकी संगति कैसे होगी? इसपर कहते हैं—
सूत्र ३४-३५ ] अध्याय ३ ३११ स्थानविशेषात् प्रकाशादिवत् ॥ ३।२।३४॥ प्रकाशादिवत् = प्रकाश आदिकी भाँति; स्थानविशेषात् = शरीररूप स्थानकी विशेषताके कारण (उनमें नानात्व आदि भेदका होना विरुद्ध नहीं है)। व्याख्या—जिस प्रकार सभी प्रकाशमान पदार्थ प्रकाश-जातिकी दृष्टिसे एक हैं; किंतु दीपक, ग्रह, नक्षत्र, तारा, अग्नि, सूर्य, चन्द्र आदिमें स्थान और शक्तिका भेद होनेके कारण इन सबमें परस्पर भेद एवं नानात्व है ही; उसी प्रकार भगवान्की पराप्रकृतिके नाते सब जीवसमुदाय अभिन्न हैं तथापि जीवोंके अनादि कर्म-संस्कारोंका जो समूह है, उसके अनुसार फलरूपमें प्राप्त हुए शरीर, बुद्धि एवं शक्ति आदिके तारतम्यसे उनमें परस्पर भेद होना असंगत नहीं है। सम्बन्ध—उसी बातको दृढ़ करनेके लिये कहते हैं— उपपत्तेश्च ॥ ३।२।३५ ॥ उपपत्तेः = श्रुतिकी संगतिसे; च = भी (यह बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—श्रुतिमें जगत्की उत्पत्तिसे पहले एकमात्र अद्वितीय परमात्माकी ही सत्ता बतायी गयी है। फिर उसीसे सबकी उत्पत्तिका वर्णन करके उसे सबका अभिन्ननिमित्तोपादान कारण सिद्ध किया गया है। उसके बाद 'तत्त्वमसि' (वह ब्रह्म तू है) इत्यादि वचनोंद्वारा उस परमात्माको अपनेसे अभिन्न मानकर उसकी उपासना करनेके लिये उपदेश दिया गया है। फिर उसीको भोक्ता, भोग्य आदिसे युक्त इस विचित्र जड-चेतनात्मक जगत्का स्रष्टा, संचालक तथा जीवोंके कर्मफलभोग एवं बन्ध-मोक्षकी व्यवस्था करनेवाला कहा गया है। जीवसमुदाय तथा उनके कर्म-संस्कारोंको अनादि बताकर उनकी उत्पत्तिका निषेध किया गया है। इन सब प्रसंगोंपर विचार करनेसे यही सिद्ध होता है कि जीवसमुदाय चैतन्य-जातिके कारण तो परस्पर एक या अभिन्न हैं; परंतु विभिन्न कर्म-संस्कारजनित सीमित व्यक्तित्वके कारण भिन्न-भिन्न हैं। प्रलयकालमें सब जीव ब्रह्ममें विलीन होते हैं, सृष्टिके समय
३१२ वेदान्त-दर्शन [पाद २
३१२ वेदान्त-दर्शन [पाद २ पुनः उसीसे प्रकट होते हैं तथा ब्रह्मकी ही परा प्रकृतिके अन्तर्गत होनेसे उसीके अंश हैं; इसलिये तो वे परमात्मासे अभिन्न कहलाते हैं और परमात्मा उनका नियामक है तथा समस्त जीव उनके नियम्य हैं, इस कारण वे उस ब्रह्मसे भी भिन्न हैं और परस्पर भी। यही मानना युक्तिसंगत है। तथान्यप्रतिषेधात् ॥ ३ । २ । ३६ ॥ तथा = उसी प्रकार; अन्यप्रतिषेधात् = दूसरेका निषेध किया गया है, इसलिये भी (यही सिद्ध होता है)। व्याख्या - श्रुतिमें जगह-जगह परब्रह्म परमात्मासे भिन्न दूसरी किसी वस्तुकी सत्ताका निषेध किया गया है।* इससे भी यही सिद्ध होता है कि अपनी अपरा और परा दोनों शक्तियोंसे सम्पन्न वह परब्रह्म परमात्मा ही नाना रूपोंमें प्रकट हो रहा है। उसकी दोनों प्रकृतियोंमें नानात्व होनेपर भी उसमें कोई भेद नहीं है। वह सर्वथा निर्विकार, असंग, भेदरहित और अखण्ड है। सम्बन्ध - पूर्वोक्त बातको ही सिद्ध करनेके लिये दूसरी युक्ति प्रस्तुत करते हैं- अनेन सर्वगतत्वमायामशब्दादिभ्यः ॥ ३ । २ । ३७ ॥ अनेन = इस प्रकार भेद और अभेदके विवेचनसे; आयामशब्दादिभ्यः = तथा श्रुतिमें जो ब्रह्मकी व्यापकताको सूचित करनेवाले शब्द आदि हेतु हैं, उनसे भी; सर्वगतत्वम् = उस ब्रह्मका सर्वगत (सर्वत्र व्यापक) होना सिद्ध होता है। व्याख्या - 'उस सर्वश्रेष्ठ पुरुषोत्तमसे यह सम्पूर्ण जगत् परिपूर्ण हो रहा है।' (श्वेता० उ० ३ । ९ तथा ईश० १) 'परम पुरुष वह है जिससे यह समस्त जगत् व्याप्त है (गीता ८ । २२) इत्यादि श्रुति और स्मृतिके वचनोंमें जो परमात्माकी सर्वव्यापकताको सूचित करनेवाले 'सर्वगत' आदि शब्द प्रयुक्त
- मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किंचन। (क० उ० २ । १ । ११)
सूत्र ३८-३९] अध्याय ३ ३१३
सूत्र ३८-३९] अध्याय ३ ३१३ हुए हैं, उनसे तथा उपर्युक्त विवेचनसे भी यही सिद्ध होता है कि वह परमात्मा सर्वत्र व्यापक है। सर्वथा अभेद मान लेनेसे इस व्याप्य-व्यापक भावकी सिद्धि नहीं होगी। अतः यही निश्चय हुआ कि परब्रह्म पुरुषोत्तम अपनी दोनों प्रकृतियोंसे भिन्न भी हैं और अभिन्न भी; क्योंकि वे उनकी शक्ति हैं। शक्ति और शक्तिमान्में भेद नहीं होता इसलिये तथा उन प्रकृतियोंके अभिन्न निमित्तो- पादान कारण होनेसे भी वे उनसे अभिन्न हैं और इस प्रकार अभिन्न होते हुए भी उनके नियन्ता होनेके कारण वे उनसे सर्वथा विलक्षण एवं उत्तम भी हैं। सम्बन्ध—इस तरह उस ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन करके अब इस बातका निर्णय करनेके लिये कि जीवोंके कर्मोंका यथायोग्य फल देनेवाला कौन है, अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— फलमत उपपत्तेः ॥ ३।२।३८॥ फलम्=जीवोंके कर्मोंका फल; अतः=इस परब्रह्मसे ही होता है; उपपत्तेः=क्योंकि ऐसा मानना ही युक्तिसंगत है। व्याख्या—जो सर्वशक्तिमान् और सबके कर्मोंको जाननेवाला हो, वही जीवोंद्वारा किये हुए कर्मोंका यथायोग्य फल प्रदान कर सकता है। उसके सिवा न तो जड प्रकृति ही कर्मोंको जानने और उनके फलकी व्यवस्था करनेमें समर्थ है और न स्वयं जीवात्मा ही; क्योंकि वह अल्पज्ञ और अल्प शक्तिवाला है। कहीं-कहीं जो देवता आदिको कर्मोंका फल देनेवाला कहा गया है, वह भी भगवान्के विधानको लेकर कहा गया है, भगवान् ही उनको निमित्त बनाकर वह फल देते हैं (गीता ७। २२)। इस न्यायसे यही सिद्ध हुआ कि जीवोंके कर्मफल-भोगकी व्यवस्था करनेवाला वह परमात्मा ही है, दूसरा कोई नहीं। सम्बन्ध—केवल युक्तिसे ही यह बात सिद्ध होती है, ऐसा नहीं; किंतु— श्रुतत्वाच्च ॥ ३।२।३९॥ श्रुतत्वात्=श्रुतिमें ऐसा ही कहा गया है, इसलिये; च=भी (यही मानना ठीक है कि कर्मोंका फल परमात्मासे ही प्राप्त होता है)।
३१४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
३१४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ व्याख्या—वह परमेश्वर ही कर्मफलको देनेवाला है, इसका वर्णन वेदमें इस प्रकार आता है—य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः । तदेव शुक्लं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ॥ (क० उ० २ । २ । ८) 'जो यह जीवोंके कर्मानुसार नाना प्रकारके भोगोंका निर्माण करनेवाला परम पुरुष परमेश्वर प्रलयकालमें सबके सो जानेपर भी जागता रहता है, वही परम विशुद्ध है, वही ब्रह्म है और उसीको अमृत कहते हैं।' तथा श्वेताश्वतरमें भी इस प्रकार वर्णन आया है—'नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्' (श्वे० उ० ६ । १३)— 'जो एक नित्य चेतन परमात्मा बहुत-से नित्य चेतन आत्माओंके कर्मफल-भोगोंका विधान करता है।' इन वेदवाक्योंसे भी यही सिद्ध होता है कि जीवोंके कर्मफलकी व्यवस्था करनेवाला परमेश्वर ही है। सम्बन्ध—उस विषयमें आचार्य जैमिनिका मत उपस्थित किया जाता है— धर्मं जैमिनिरत एव ॥ ३ । २ । ४० ॥ अत एव=पूर्वोक्त कारणोंसे ही; जैमिनिः=जैमिनि; धर्मम्=धर्म (कर्म)-को (फलदाता) कहते हैं। व्याख्या—जैमिनि आचार्य मानते हैं कि युक्ति और वैदिक प्रमाण— इन दोनों कारणोंसे यह सिद्ध होता है कि धर्म अर्थात् कर्म स्वयं ही फलका दाता है; क्योंकि यह प्रत्यक्ष देखा जाता है कि खेती आदि कर्म करनेसे अन्नकी उत्पत्तिरूप फल होता है। इसी प्रकार वेदमें भी 'अमुक फलकी इच्छा हो तो अमुक कर्म करना चाहिये', ऐसा विधि-वाक्य होनेसे यही सिद्ध होता है कि कर्म स्वयं ही फल देनेवाला है, उससे भिन्न किसी कर्मफलदाताकी कल्पना आवश्यक नहीं है। सम्बन्ध—आचार्य जैमिनिके इस कथनको अयुक्त सिद्ध करते हुए सूत्रकार अपने मतको ही उपादेय बताते हैं—