भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 307, कुल 486 में से

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पृष्ठ 307

३०४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ उष्णता आदि गुणोंसे युक्त हैं, उनका वह रूप जब प्रकट हो, उस अवस्थामें भी वे उन-उन स्वाभाविक गुणोंसे युक्त हैं और प्रकट न हो—छिपा हो, उस समय भी वे उन गुणोंसे युक्त हैं। व्यक्त और अव्यक्त स्थितिमें उन स्वाभाविक गुणोंसे युक्त होनेमें कोई अन्तर नहीं आता। उसी प्रकार वह परमेश्वर उपासनाद्वारा प्रत्यक्ष होनेके समय जिस प्रकार समस्त कल्याणमय विशुद्ध दिव्यगुणोंसे सम्पन्न है, वैसे ही अप्रकट अवस्थामें भी है; ऐसा समझना चाहिये। अग्नि आदि तत्त्वोंको प्रकट करनेके लिये जो साधन बताये गये हैं, उनका अभ्यास करनेपर ही वे अपने गुणोंसहित प्रकट होते हैं। उसी प्रकार आराधना करनेपर अप्रकट परमेश्वरका प्रकट हो जाना उचित ही है। सम्बन्ध—उभयलिंगवाले प्रकरणको समाप्त करते हुए अन्तमें कहते हैं— अतोऽनन्तेन तथा हि लिंगम्॥ ३।२।२६॥ अतः=इन ऊपर बताये हुए कारणोंसे यह सिद्ध हुआ कि; अनन्तेन=(वह ब्रह्म) अनन्त दिव्य कल्याणमय गुणसमुदायसे सम्पन्न है; हि=क्योंकि; तथा=वैसे ही; लिंगम्=लक्षण उपलब्ध होते हैं। व्याख्या—पूर्वोक्त कारणोंसे यही सिद्ध होता है कि वह परब्रह्म परमेश्वर सत्यसंकल्पता, सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता, सौहार्द, पतितपावनता, आनन्द, विज्ञान, असंगता और निर्विकारिता आदि असंख्य कल्याणमय गुणसमुदायसे सम्पन्न और निर्विशेष—समस्त गुणोंसे रहित भी है; क्योंकि श्रुतिमें ऐसा ही लक्षण मिलता है (श्वे० उ० ३। ८–२१)। सम्बन्ध—अब परम पुरुष और उसकी प्रकृति भिन्न है या अभिन्न ? इस विषयपर विचार करनेके लिये प्रकरण आरम्भ किया जाता है। यहाँ पहले यह बात बतायी जाती है कि शक्ति और शक्तिमान्‌में किस प्रकार अभेद है— उभयव्यपदेशात्त्वहिकुण्डलवत्॥ ३।२।२७॥ उभयव्यपदेशात्=दोनों प्रकारका कथन होनेसे; अहिकुण्डलवत्=सर्पके कुण्डलाकारत्वकी भाँति; तु=ही (उसका भाव समझना चाहिये)।